Home / Featured / कई जोड़ी आँखों के सपने और एक ‘सीक्रेट सुपरस्टार’

कई जोड़ी आँखों के सपने और एक ‘सीक्रेट सुपरस्टार’

सीक्रेट सुपरस्टार’ फिल्म पर कवयित्री स्मिता सिन्हा की एक अच्छी टिप्पणी- मॉडरेटर

========================================

‘सीक्रेट सुपरस्टार’ कहानी है सपनों के बनने की । एक ऐसा साझा सपना , जिसे एक साथ एक ही वक़्त में कई जोड़ी आंखें देखती हैं । यह कहानी है एक बेख़ौफ़ ज़िद की । एक ज़िद , उन सभी बंदिशों को तोड़ने की , जिसने जाने कब से कितनी ही संवेदनाओं को बंदी बना रखा है । यह कहानी है एक बेटी और उसकी माँ की । उनकी कसमसाहट और छटपटाहट की । उनके हिम्मत और हौसलों की । उनके टूटने , बिखरने और बनने की ।

      इंसिया (जायरा वासिम ) एक पंद्रह साल की स्कूल गर्ल , जिसे संगीत से बेइंतिहा प्यार है । खुली आंखो से सपने देखने वाली लड़की इंसिया , जिसे जब कोई राह नहीं सूझी तो उसने अपने म्यूजिक वीडियो यू टयूब पर अपलोड करने शुरु कर दिये । अपनी पहचान छुपाने के बावज़ूद उसकी आवाज़ रातों रात म्यूज़िक सेंसेशन बन गयी । इंसिया के लिये उसकी माँ ही पूरी दुनिया थी । नजमा (मेहर बिज़ ) जो इंसिया की आँखों में न सिर्फ़ सपनें बोतीं, बल्कि उसे पूरा करने के लिये तमाम जद्दोज़हद भी करतीं ।

      इंसिया का परिवार एक बेहद रुढ़िवादी और दकियानूसी परिवार था , जहाँ बेटा को संतान और बेटी को जिम्मेदारी समझा जाता । जहाँ पितृसत्तात्मक माहौल इस कदर हावी की एक एक साँस लेने से पहले भी कई कई बार सोचा जाता । जहाँ एक पिता बच्चों के सामने उनकी माँ पर हाथ उठा सकता था और इस जहन्नम सी ज़िंदगी से निकलने का ख़याल तक उनकी माँ के मन में नहीं आता । जहाँ हर ओर एक अनकहा दर्द रिसता रहता और लोग चुपचाप झेलते रहते । एक पारिवारिक कलह कैसे सपनों को तोड़ती चलती है , सीक्रेट सुपरस्टार उसी पटकथा पर बनी फिल्म है ।इसमें एक ओर इंसिया का अपने पिता के लिये आक्रोश और नफरत है तो दूसरी ओर माँ के लिये सहानुभूति । एक सीक्रेट सुपरस्टार की सारी ज़द्दोज़हद सिर्फ़ इसलिये की वह अपनी माँ को खुश देख सके । उसे मुक्त करा सके अपने पिता से । उसके पास उलझनें थीं , झंझावात थे , द्वंद था , बीते ज़माने के कई किस्से थे और लड़ाई अपनों के लिये अपनों के विरुद्ध लड़नी थी ।

       हालांकि ये आइडिया शुरु से था कि माँ कब क्या रुख़ अख्तियार करेगी , बावज़ूद ये ड्रामा लगातार दर्शकों को बांधे हुए था । माँ के किरदार में मेहर बिज़ को देखना सुकूनदेह रहा । बजरंगी भाईजान में भी मेहर ने माँ का किरदार बड़े ही सशक्त तरीके से निभाया था । इस फिल्म में कई बार उसकी संजीदगी देखकर हम काँप उठे । उसकी विवशता और तकलीफ़ हमें आँसूओं से रुला गयी और कभी कभी इतनी कोफ़्त कि आखिर क्यों और कब तक सहेगी वो सबकुछ । और यही वज़ह थी कि जब एयरपोर्ट पर वो बोली तो हम चाह रहे थे कि वो और बोले । ज़वाब दे एक एक करके अपनी सारी जिल्लतों का उस इन्सान  को जिसे पति कहते हैं ।

      इंसिया और नजमा , इन दो किरदारों ने दर्शकों को झकझोर दिया । जाने कितने सवाल उठे उनकी स्थितियों को देखते हुए । क्या वाक़ई ऐसे घर होते हैं ! क्या होते हैं ऐसे क्रूर पिता ! क्या होती हैं इतनी विवश मायें ! क्या आती हैं ऐसी पारिस्थितियां जब बच्चों को अपने पिता के खिलाफ़ खड़ा होना पड़े ! फ़िर जो कुछ सामने पर्दे पर घटित हो रहा था उसे एकदम से कैसे ख़ारिज करें हम । रुक कर सोचना तो पड़ेगा ही । भारतीय संदर्भ में पारिवारिक विघटन की सबसे बड़ी और मूल वजहें यही घरेलू क्लेश और हिंसा ही तो रही है ।

       बेहद गम्भीर और परिपक्व किरदारों के साथ गुज़र रहे दर्शकों के मूड को हलका बनाने का काम किया शक्ति कुमार (आमिर खान ) की इंट्री ने । स्वैग व कैमियो लुक लिये एक सेल्फ ओब्सेसड  म्यूज़िक डाइरेक्टर के किरदार में आमिर जब भी पर्दे पर आये दर्शकों को हँसा गये । एक बेहद ज़रूरी किरदार जिसने फिल्म को लीक से भटकने नहीं दिया । संतुलित बनाये रखा । जिसने सीक्रेट सुपरस्टार के कंधों को सहारा और सपनों का आसमान दिया । इंसिया का दोस्त चेतन (तीर्थ शर्मा ) तो पूरे सफ़र में उसका हमसफ़र बना रहा । इंसिया का सबसे सच्चा और अच्छा दोस्त , जिसने दोस्ती के मायने को बखूबी परिभाषित किया ।

      कुल मिलाकर इस फ़िल्म में वो सब कुछ है जो इसे एक उत्कृष्ट फ़िल्म का दर्ज़ा देती है । मंझे हुए कलाकार , सशक्त पटकथा , खुबसूरत संगीत और दमदार निर्देशन । हम किरदारों के साथ उनकी भावनाओं में बहते हैं,  डूबते हैं , उतरते हैं । हँसते हैं , रोते हैं । फ़िल्म में आगे आने वाले कई मोड़ों के प्रति आश्वस्त होने के बावज़ूद पलकें झपकाये बिना तमाम दृश्यों से गुज़रते जाते हैं । और जब हॉल से बाहर निकलते हैं तो बस ऐसे कि अभी अभी आज़ाद हुए हम , अभी अभी आज़ादी मिली हमारे सपनों को । कि हम हैं अपनी दुनिया के ‘ सीक्रेट सुपरस्टार ‘।

— स्मिता सिन्हा

  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

जिंदगी अपनी जब इस रंग से गुजरी ‘ग़ालिब’

मौलाना अल्ताफ हुसैन ‘हाली’ की किताब ‘यादगारे ग़ालिब’ को ग़ालिब के जीवन और उनकी कविता पर लिखी गई …

2 comments

  1. मुकेश कुमार सिन्हा

    मने, समीक्षा बताती है, देखने लायक मूवी है !!

  2. आपने अच्छी समीक्षा करी स्मिता , बधाई

Leave a Reply

Your email address will not be published.