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अपूर्णता की सम्पूर्णता: जिन्दगी 50-50

युवा लेखक भगवंत अनमोल के उपन्यास ‘ज़िन्दगी 50-50’ की आजकल बहुत चर्चा है. इसी उपन्यास की एक समीक्षा लिखकर भेजी है मिर्जापुर से शुभम् श्रीवास्तव ओम ने. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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युवा लेखक भगवंत अनामोल का नया उपन्यास ‘जिन्दगी 50-50‘ समाज के उस उपेक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता नजर आता है जो समाज का हिस्सा होकर भी समाज से ‘अलग‘ है। यह ‘अलग‘ होना वह अभिशाप है जिसके लिये वह व्यक्ति स्वयं उत्तरदायी कारक भी नहीं है। लेखक द्वारा इस ‘अलग‘ होने की उपेक्षाजनित पीड़ा की संवेदनात्मक प्रस्तुति इस उपन्यास का केन्द्रीय कथ्य है।

आज मानव सभ्यता विकास के उस उत्तर आधुनिक दौर में है जहाँ कार्य और कारण के मध्य का अंतर्संबंध धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। विज्ञान ने जहाँ मानव के लिए ‘टेस्ट ट्यूब बेबी‘ और ‘लिंग परिवर्तन‘ जैसे विकल्प खोल दिये हैं वहीं दूसरी ओर कई अपरिचित बीमारियाँ भी दीं। अब हमारे पास कृत्रिम बादल बना लेने की तकनीक है तो बादल फटने की आपदा भी। कुल मिलाकर यह एक संक्रमण काल की शुरूआत भर है। वह संक्रमण काल जिसकी नियति एक अँधेरी सुबह है।

संक्रमण के इस दौर में व्यक्ति और समाज की सापेक्षता भी संक्रमित हुई है। अब अर्थ वह महत्वपूर्ण कारक है जिसके द्वारा यह तय होता है कि व्यक्ति समाज सापेक्ष होगा या समाज व्यक्ति सापेक्ष। हमारी जेबों में स्मार्टफोन भी है और सांस्कृतिक दुराव भी। अर्थ प्रधानता ने संवेदनाओं का बाजारीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसे में साहित्य का संक्रमित हो जाना भी असामान्य नहीं है। फिर तो साहित्यकारों की जिम्मेदारियाँ भी बढ़नी स्वाभाविक है और स्थिति संदिग्धता भी। भगवंत अनमोल को भी इससे दो-चार होना पड़ा है।

जीवन के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं की विवेचना करती ‘जिन्दगी 50-50‘ वर्तमान सामाजिक ढाँचे के विरूद्ध एक प्रति ऊर्जा का निर्माण करने की कोशिश है जिसमें खोखली परम्पराओं और रूढ़ि बन चुकी मान्यताओं को समाप्त कर परिवर्तन का आह्वान करने की प्रबल आतुरता है। उपन्यास की कथावस्तु का केन्द्र वही ‘अलग‘ वर्ग है जो किसी अंग विशेष के अविकसित रह जाने से, चेहरे पर के किसी बर्थ मार्क जनित कुरूपता से, उपेक्षित है। यहाँ तक की मौलिक अधिकारों तक से वंचित। क्या है यह ‘अलग‘ होना? हम जो ‘अलग‘ नहीं हैं- की मानसिक विकलांगता या उनसे प्रतिस्पर्धी पराजय का भय!

प्रस्तुत उपन्यास इन्हीं प्रश्नों का एक तर्कपूर्ण प्रत्युत्तर है। उपन्यास में जहाँ एक ओर किन्नर हर्षा की पीड़ा है वहीं नायक और बर्थ मार्क के कारण उपेक्षित सौन्दर्य ‘अनाया‘ की खूबसूरत प्रेम कथा। उपन्यास का नायक अनमोल अपने किन्नर सन्तान के जन्म के साथ ही अपने किन्नर भाई हर्षा की स्मृतियों में उतरता है। वे स्मृतियाँ जिनमें हर्षा की चीख, घुटन और कराह दर्ज है, जहाँ हर्षा के आँसू और घाव दफन हैं। वह यह प्रण लेता है कि वह अपनी किन्नर सन्तान को उसके सारे अधिकार दिलायेगा। वह अपने पिता की वो प्रतिष्ठा जनित कुण्ठा अपने भीतर नहीं उतारना चाहता था जो उन्हें हर्षा के लिए अमानवीय बना देती थी।

नायक के हाथ लगी हर्षा की डायरी के धुँधले और गाढ़े पन्ने पूरे उपन्यास में बिखरकर उपन्यास के पृष्ठों को जीवन देने का काम करते प्रतीत होते हैं। हर्षा की डायरी एक जीवन्त दस्तावेज है जो संवेदनात्मक जुड़ाव के उस स्तर का प्रस्तुतीकरण करने में सफल है जहाँ निःस्वार्थ प्रेम और केवल देने की भावना है, पाने की तनिक भी नहीं। वह पितृ-प्रेम और संरक्षण से वंचित एक सन्तान के सन्तति-धर्म निर्वहन का मूक शिलालेख भी है। गहरी टीस और पीड़ा से भरे वाक्यों में भी थोड़ा बहुत हरापन लिख पाना वास्तव में एक ‘अलग‘ काम है जिसे विशिष्टता ही शब्दायित कर सकती है।

भाषा और संवाद की दृष्टि से इस उपन्यास में अनेक बहुरंगी दृश्य देखने को मिलते हैं। स्थिति और स्थान के अनुसार संवाद के विभिन्न स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। ठेठ कानपुरिया भी है तो ‘प्रोफेशनल टाकिंग‘ भी। युवा पाठकों को आकर्षित करने के उद्देश्य से लेखक ने स्वजनित ‘पापुलर एलीमेन्ट‘ डालने में भी कोई कोताही नहीं की है और संवेदना को शब्दों से संवेदनशील भी बनाया है। कुल मिलाकर उपन्यास पाठकों को बाँधे रखने में सफल प्रतीत होता है।

        उपन्यास के अनेकानेक दृश्य वास्तविक होने का साथ-साथ नाटकीय भी प्रतीत होते हैं। कहीं कहानी फैन्टेसी आधारित लगने लगती है फिर अचानकर से यथार्थ का स्पर्श पाकर गम्भीर भी। वस्तुतः फैन्टेसी और यथार्थ का एक कलात्मक समावेश देखने को मिलता है। उपन्यास के अन्त में जहाँ हर्षा की मृत्यु का दुखद दृश्य है वहीं नायक के किन्नर सन्तान सूर्या की सफलता की भी सूचना और साथ ही साथ प्रेमिका अनाया और उससे जन्मे पुत्र का नाटकीय मिलन भी। इस उपन्यास को पढ़ते हुए तमाम ऐसे बिन्दु मिलते हैं जहाँ यह तय कर पाना कठिन हो जाता  है कि इसे एक प्रेम कथा कहें या एक सामाजिक समस्या पर चिंतनपूर्ण दृष्टि। नाटकीयता और सजीवता जनित फैन्टेसी और यथार्थ का द्वन्द्व सहज ही अनुभव हो जाता है। इन सबके साथ ही सकारात्मक संदेश देता वह दृश्य भी जहाँ समाज का एक जिम्मेदार हिस्सा समाज के उस ‘अलग‘ हिस्से को दुबारा से जुड़ने के लिए जरा सा खिसककर ‘स्पेस‘ बनाता दिखाई देता है। वास्तव में यही दृश्य इस उपन्यास की उपलब्धि भी है और उपसंहार भी।

कृति- जिन्दगी 50-50

लेखक- भगवंत अनमोल

प्रकाशक- राजपाल एंड संज

मूल्य- 225/-

 
      

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One comment

  1. मुकेश कुमार सिन्हा

    अभी पढ़ रहा हूँ, बढ़िया उपन्यास !
    शानदार समीक्षा !

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