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हॉर्स तो बहुत होते हैं लेकिन विजेता कहलाता है ‘डार्क हॉर्स’

‘नीलोत्पल मृणाल के उपन्यास का शीर्षक ‘डार्क हॉर्स’ प्रोफेटिक साबित हुआ। ऐसे समय में जब हर महीने युवा लेखन के नए नए पोस्टर बॉय अवतरित हो रहे हों नीलोत्पल सबसे टिकाऊ पोस्टर बॉय हैं। वह स्वयं डार्क हॉर्स साबित हुए हैं। यह उनके लेखन की ताकत ही है कि ‘डार्क हॉर्स’ का पुनर्प्रकाशन हिन्द युग्म-वेस्टलैंड से हो रहा है। इसी मौके पर युवा कवयित्री-लेखिका स्मिता सिन्हा ने ‘डार्क हॉर्स’ पर एक सुंदर टिप्पणी की है। पढ़कर बताइएगा- मॉडरेटर

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‘डार्क हॉर्स ‘ मतलब रेस में दौड़ता ऐसा घोड़ा जिसपर किसी ने भी दाँव नहीं लगाया हो, जिससे किसी ने जीतने की उम्मीद ना की हो और वही घोड़ा सबको पीछे छोड़कर निकल जाये। जी हाँ,  हम बात कर रहे हैं नीलोत्पल मृणाल के उपन्यास ‘डार्क हॉर्स’ की। साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2016 से सम्मानित यह किताब अपने आठवें सँस्करण को लेकर फ़िर से सुर्ख़ियों में है।

         मेरी कुछ बेहद पसंदीदा किताबों की फेहरिस्त में एक किताब यह भी है। लगभग साल भर पहले पढ़ी थी मैंने इसे और आज तक इसके सम्मोहन में हूँ। लेखक के शब्दों की बानगी और उपमाओं की सहजता से आप अवाक और भौंचक रह जाते हैं। कहानी का बहाव आपको स्तम्भित करता जाता है और चौकस भी। आप निरंतरता में बने रहना चाहते हैं और लेखक ऐसा करने में सफल भी रहे। तमाम ऊहापोह के बीच ज़मीन से जुड़े गम्भीर विमर्शों का अवलोकन नीलोत्पल जिस सूक्ष्मता से करते चलते हैं एक पाठक के रुप में वो मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। चूँकि नीलोत्पल जी से मिल चुकी हूँ। खूब खूब सुना है उन्हें, तो मेरा यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ‘ डार्क हॉर्स’ जैसी बेबाक सच की बयानगी सिर्फ़ नीलोत्पल ही कर सकते थे।

          इस कहानी से मुझ जैसे पाठकों के जुड़ने की वज़ह ही इसकी स्वभाविकता है। मैं देख पा रही थी पटना से निकल कर जे एन यू, दिल्ली तक पहुँची एक लड़की, जिसके लिये शुरुआती दौर में यहाँ के माहौल से सामंजस्य बिठाना किसी क्रांति से कम नहीं था। मैं देख पा रही हॉस्टल से निकलने के बाद मुनिरका, कटवारिया सराय, बेर सराय में सिर छुपाने की क़वायद में लगी मैं। इसी वक़्त पर मैं देख रही थी डीयू नॉर्थ कैम्पस से निकले और बिहार झारखंड से ग्रेजुयेट करके आये मेरे दोस्तों को, जो सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के लिये किंग्सवे कैम्प, विजय नगर, कमला नगर, इंदिरा नगर में लॉज ढूँढ़ते नज़र आते। Rau’s जैसे प्रतिष्ठित किन्तु महँगे आईएएस कोंचिग इंस्टिट्यूट में इंस्टालमेंट में फीस जमा कराते। मैं देख रही थी दस बाय दस के सीलन से भरे कमरे में एडजस्ट करते तीन दोस्तों को, उनकी ठूँसी हुई किताबों को,  पूरे कमरे में बिखरे अखबार की कतरनों को और इन सब के बीच बड़ी ठसक से झिलमिलाते सपनों को।

              कथानक के परिदृश्यों के साथ साथ तमाम किरदारों को लेखक ने इस बखूबी से रचा है कई कई बार आप इन्हें अपने आस पास चहलक़दमी करते हुए महसूस करेंगे। इन सबके बीच आप स्वयँ को घटित होते हुए पायेंगे। किरदारों के समानांतर आप भी चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं, बतियाते हैं, हँसते हैं, रोते हैं।

             सिविल सर्विसेज आज भी बिहार, झारखंड, यूपी जैसे हिन्दी पट्टी के लोगों का पहला सपना होता है। “हाँ डॉक्टर बन के आप अपना करियर बना सकते थे, इंजीनियर बनके आप अपना करियर बना सकते थे, पर अगर अपने साथ साथ कई पीढ़ियों का करियर बनाना है तो आईएएस बनना होगा। “सामाजिक सम्मान और आर्थिक सुरक्षा के लिये प्रशासनिक पद साधन है और साध्य भी। बस इसी सोच को लेकर अपने सपनों को गढ़ने से लेकर उसे सच में बदलने की जद्दोज़हद का नाम है ‘डार्क हॉर्स’।

             संतोष, कहानी का एक साधारण किन्तु संघर्षरत युवाओं का एक ऐसा सशक्त प्रतिनिधि, जो अपने कँधों पर अपने माँ बाप के सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी उठा कर चलते हैं। भागलपुर से दिल्ली तक के सफ़र में उसे तनिक भी भान न रहा होगा कि आगे चलकर यही रास्ते कितने दुश्कर होने वाले हैं। वस्तुतः ‘डार्क हॉर्स’ संतोष जैसे उन तमाम युवाओं की आत्मकथा है जो अपनी सुरक्षा और महत्वकाँक्षा के बीच उपजे द्वंद से लगातार जूझते रहते हैं। जो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी जिजीविषा से हार और जीत के इस खेल में खुद को मज़बूती से बनाये रखते हैं।

             “गुरुराज, जो अपने आप में कई विरोधाभाषों का मिश्रण था और तार्किकता पर बड़ी निर्ममता से व्यंग्य करता था। ‘बुद्धिजीवी वर्ग ‘इस शब्द को वह एक गम्भीर फूहड़पन कहता था। कुल मिलाकर वह सम्भावनाओं से भरा एक निराश और बेचैन आदमी था।”  “रायसाहब, कई और छात्रों की तरह ये भी दिल्ली आईएएस बनके आसमान छूने आये, पर अब इसी में संतुष्ट रहा करते थे कि जूनियर इनके पाँव छूते हैं।” तो गुरुराज, रायसाहब, जावेद, मनोहर और विदिशा जैसे किरदार हमसे अलग कहाँ हैं! हमारे कॉलेज और कोचिंग इन्स्टिट्यूट में हम अक्सर ही तो टकराते रहे हैं इन सभी से।

               पूरी कहानी के दौरान मुख़र्जी नगर सपनों के पनाहगाह के रुप में उभरता है, जहाँ बसता है हमारा छोटा सा पुरबिया देस। बहती है गाँव की खाँटी सोंधी महक। बोली जाती हैं ठेठ बोली, करारा भदेसपन लिये। मुख़र्जी नगर जहाँ टकराव होता है गँवई सहजता और शहरी बौद्धिकता का। जहाँ पहनावा, बोली और हिन्दी माध्यम के नाम पर इन युवाओं के सामने कुंठायें परोसी जाती हैं। जहाँ सफलता और असफलता के पैमाने पर हर दिन उनकी कंडीशनिंग, उनके मूल्यों को परखा जाता है और जहाँ समझौतावादी प्रवृति में लड़के अपनी स्वाभावगत मौलिकता स्वतः ख़त्म करते चले जाते हैं। जहाँ हर दिन मिलने वाले ये कल्चरल शॉक इनके आत्मविश्वास की जड़ें हिला जाता है। बतरा सिनेमा जहाँ चाय की चुस्कियों के बीच परीक्षा के सिलेबस और सब्जेक्ट्स के कॉम्बिनेशन डिस्कस किये जाते। मार्क्सवाद और अल्वेयर कामू के साथ साथ आतँकवाद तक विमर्श के मुद्दे बनते। जहाँ सिगरेट के धुएं के छल्ले के साथ हर शाम धारणायें बना भी दी जातीं और कई कई अवधारणायें बिखेर भी दी जातीं।

              पूरी कहानी में नीलोत्पल बड़े आराम से तमाम सामाजिक सरोकारों को अनावृत करते चलते हैं। इनकी चुभन हम अंदर तक महसूस करते हैं। कितनी ही बातों पर जब संतोष, गुरुराज, मनोहर, जावेद और रायसाहब बेतक़ल्लुफ़ हुए जाते हैं, हम संजीदा हो उठते हैं। व्यँग्य की आड़ में बेहद गम्भीर बातों को कह जाने का कौशल लेखक ने खूब दिखाया है। खिलंदड़ी भाषा गुदगुदाती भी है और खूब खूब हंसाती भी है।

                वस्तुतः ‘डार्क हॉर्स’ सिर्फ़ उपन्यास नहीं, दस्तावेज़ है कई कई ज़िंदगियों का। दस्तावेज़ है भोगे गये यथार्थ का। दस्तावेज़ है उन संघर्षों का जिसने जाने कितनी हसरतों को पँख दिये। दस्तावेज़ है उन मानसिक झंझावातों का जिनमें वक़्त से पहले ही जाने कितनी उम्मीदें धराशायी हो गयीं। संवेदनाओं के गहरे उतार चढ़ाव से होते हुए एक अकुलाहट, एक छटपटाहट, एक बेचैनी, कुछ तनाव और ढेर सारे भटकाव से गुज़रते हुए सफ़लता के शिखर तक पहुँचने की कहानी है ‘डार्क हॉर्स’।

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