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अरुण शीतांश की कविताएँ

आज प्रस्तुत है कवि अरुण शीतांश की कविताएं। 2 नवम्बर 1972 के दिन अरवल जिले के विष्णुपुरा गाँव में जन्मे अरुण शीतांश ने भूगोल तथा हिंदी साहित्य में एम.ए.करने के बाद पी.एच.डी.और एल.एल.बी की डिग्री भी हासिल की।उनके अब तक दो कविता संग्रह :’एक ऐसी दुनिया की तलाश’वाणी प्रकाशन
और ‘हर मिनिट एक घटना है'(बोधि प्रकाशन) प्रकाशित हुए हैं। आलोचना में भी’शब्द साक्षी हैं’शीर्षक से उनकी एक किताब आई है।’पंचदीप’और ‘युवा कविता का जनतंत्र’शीर्षक से दो पुस्तकें सम्पादित करने के साथ-साथ उन्होंने ‘देशज’ नामक पत्रिका भी सम्पादन किया।सम्प्रति आरा में निवास कर रहे अरुण शीतांश एक शिक्षण संस्थान में कार्यरत हैं और साहित्य सृजन का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
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एक तार पर तीन चिड़ियाँ
 
सुबह-सुबह
एक ही तार पर तीन चिडियाँ आई
और बैठ गई
 
ऐसी बैठी जैसी बहने हों
 
एक चिङियाँ आसमान की ओर देख रही थी
दूसरी बिजली की ध्वनि सुन रही थी
तीसरी मेरी तरफ देख रही थी
 
तीनों चिङियाँ अपने काम पर थी
एक को दाना ले जाना था
दूसरे को चोंच में पानी
तीसरी को जोङी की तलाश थी
 
दूसरे दिन उसी तार पर चिड़ियाँ बैठी मिली
एक उङकर घोंसले में अंडे दी
दूसरी खेत से धान की बालियां लेकर उङी
तीसरी गभर्वती हो रही थी
 
एक सप्ताह उस तार पर नज़र रखी
 
एक दिन तीन चिड़ियाँ को बिजली छू दी
और तीनों मर गई
 
उस पल मैं मरा
कविता लिखते हुए ….l
 
छाया
अपनी ही छाया है
एक पौधे में फूल है
और गिरे पुष्प
मिट्टी की सुन्दरता को बढ़ा रही है
 
वहाँ छाया की मिट्टी में मिलन है
और शोभा भी
 
उसे ईट से कैद मत करो …
 
12.12.2017
 
अपनी लड़की को डाँटने के बाद
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कि जब विदा होगी
आज से दस साल बाद लड़की
डाँट क्या , रोता फिरुँगा
 
यह आजादी का समय है लड़की
चैन से जीने का
सही गलत करने का
 
जब पास में माँ नहीं होंगी
पापा के हाथ काँपेगे
 
तुम एक दिन चिड़िया सी उड़ान भरोगी
 
यह हमेशा होता रहा
कि माह भर उसी सोच में डूबा रहा कि
डाँटू तो कैसे कि
तुम्हारा उज्ज्वल भविष्य जगमग हो जाए
 
कि तुम इतनी सुख प्राप्त करो कि
गरीबों की सेवा कर सको
 
तुम्हारा आँगन हँसी से गुलजा़र रहे
 
यह सब लिखते हुए रोना ही आ रहा है
मुझे
जबकि तुम्हारी परीक्षा मार्च में ही है
जो जीवन के कई हिस्से को जोड़ेगी
 
और हम हैं कि डाँट ही रहें हैं
और डर रहे हैं ।
मेका
 
——–
 
चढ़ो और चढो़
उड़ जाओ आसमान में
यह शोभनीय है चाँद सितारो सा
 
वैज्ञानिक एक दिन खोज करेंगे इस अदा पर
कैसे चढ़े पेड़ के शाखा पर
 
एक दिन उत्तर भारत की बकरियाँ सोचेंगी कि
हम भी पैदा हुए थे भारत में
 
भारत में आग लगी हुई है
यह पेड़ यह मेका यह अासमान यह दृश्य कैसे बच गया तिरुपति के रास्ते
खगोलवेत्ता निहारेगे
एक साथ भारत में कई तस्वीरें बदल रहीं हैं
एक साथ कई नारे लग रहें हैं
एक साथ कई हत्याएँ हो रही हैं
एक साथ बच जा रहें हैं हम
 
समय का संगत करते हुए
हमने कई कई क्षेत्रों में कई कई बार सोचा कि
दुनिया बदल रही है
राजनीति बदल रही है
सोच बदल रही है
 
यह मेका क्यों नहीं बदल रहें हैं
क्या एक दिन इनकी भी हत्या होगी
क्या यह भी घास के शौकीन हो जाऐगे
 
हमने सोचना छोड़ दिया है .
 
हम देश प्रेमी है
देश पर सोचेगे
मेका पर माथा कौन खपायेगा ?
पेड़ पर चढ़े
या घास खायें !
 
दुनिया बदल रही है जरुर
 
दुनिया बच रही है
मेका से….
 
बाबूजी
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किसी विज्ञापन के लिए नहीं आया था यहां
धकेल दिया गया था गले में हड्डी लटकाकर
विष्णुपुरा से आरा
महज संयोज नहीं था
भगा दिया गया था मैं
 
बाबूजी
आपकी याद बहुत आती है
जब एक कंधे पर मैं बैठता था
और दूसरे कंधे पर कुदाल
रखे हुए केश को सहलाते हुए चला जाता था
खेंतों की मेड़ पर गेहूं की बालियां लेती थीं हिलोरें
थके हारे चेहरे पर तनिक भी नहीं था तनाव
 
नईकी चाची चट पट खाना निकाल जमीन को पोतते हुए
आंचल से सहला देती थी गाल
आज आप पांच लड़कों पांच पोतों और दो पोतियों के बीच
अकेले हैं
पता नहीं आब आप क्यों नहीं जाते खेत
क्यों नहीं जाते बाबा की फुलवारी
फिर ढहे हुए मकान में रहना चाहते हैं
और गांव जाने पर काजू-किशमिश खिलाना चाहते हैं
आप अब नहीं खिलाते बिस्कुट
जुल्म बाबा की दुकानवाली
जो दस बार गोदाम में गोदाम में या बीस बार बोयाम में हाथ डालकर
एक दाना दालमोट निकालते जैसे जादू
सुना है उस जादूगर की जमीन बिक गई
अनके लड़के धनबाद में बस गए
वहां आटा चक्की चलाते हैं
बाबूजी आपकी याद बहुत आती है
मधुश्रवा मलमास मेला की मिठाई
और परासी बाजार का शोभा साव का कपड़ा
आपके झूलन भारती दोस्त
सब याद आते हैं
 
सिर्फ याद नहीं आती है
अपने बचपन की मुस्कान…..
 
शीशम का पेड़
……………..
यह पेड़ कितना हरा भरा है
पानी टपक रहा है पत्तो से
इसकी जड़ें तर हो रही हैं
बूंद बूंद
 
भीगे हुए पेड.
जंगल की तरह हैं
जंगल में कई शेर हैं
शेर भी कई ढेर हैं
 
शीशम के छोटे छोटे पौधे बड़े नाज नखरे की तरह होते हैं
इसके बीज छिमियों की तरह जीवंत
 
हर डाल पर झूलते लटकते रहतें हैं बाली की तरह
 
न जाने कितने काटे गए
हत्यारे शोफे पर बैठतें हैं
होटल में सजातें है दरबार
मंत्रियों ने किसान के लगाए पौधे
बड़े होने पर हजार बार काटे
लगाये जनतादरबार
शीशम तमाम कठिनाईयों के बीच भी लंबा होना कम नहीं किया
छायादार
दमदार हुआ
ताकतवर
 
शीशम का जीवन
मनुष्य का जीवन है
 
हमारे हाथ ने कई बार लगाए पेड.
हमारे पॉव के अँगूठे से कई बार दबा बीज
और झूमने लगे खेत
 
हम शीशम हैं
शीशम के पेड़…..
 
अरूण शीतांश
२२.०९.२०१४
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