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फिल्मों के अंतरिक्ष से एक चकित करने वाला धूमकेतु है ‘ब्लैक पैंथर’

लेखक लेखिकाओं की पूरी नई पीढी हमारे बीच आ चुकी है. अब यह फिल्म समीक्षा ही देखिये. अमेरिकन सुपर हीरो फिल्म की यह बारीक समीक्षा लिखी है कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ ने. पढ़िए और नई पीढ़ी का स्वागत कीजिये- मॉडरेटर

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मैं फ़िल्में बहुत देखती हूँ, मगर फिल्म – रिव्यू!! मेरे बस की बात नहीं। लेकिन यह ‘ ब्लैक पैंथर’ फिल्म को देखना था कि मैं खुद को रोक न सकी।  मैं कोशिश करती हूँ कि मैं इस फिल्म के मुझ पर प्रभाव को सही शब्द दे सकूं। हो सकता है फिल्म के हर कोण और बिंदु पर मैं न्याय न कर पाऊं, लेकिन कोशिश की जा सकती है।

सबसे पहले एक गहरी सांस! यह फिल्म एक अनूठा और विस्तृत समर्पण है, ‘ ब्लैक संस्कृति, शक्ति और जादू ‘ के प्रति। उनके द्वारा जिये गए संघर्षों के प्रति। ओकलैंड, कैलिफ़ोर्निया से लेकर इथोपिया तक, जुलू से मसाई तक। इस पक्षपाती दुनिया में पहली बार एक ‘ब्लैक सुपरहीरो’ पर फिल्म बनी है। वह भी ऐसी फिल्म की आपके भीतरी अहसासों को झकझोर कर आपको अपनी सांसकृतिक पहचान खोजने के लिए प्रेरित कर दे।

मैं एक कलाकार हूं, कला के व्यवहृत स्वरूप मेरे प्रोफेशन का हिस्सा। मैं फैशन डिज़ायनर हूँ। तो शुरुआत वहीं से करूं जिस पक्ष ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया। क्योंकि यह फिल्म ब्लैक निर्माता, निर्देशक, विजुअल डिज़ाइनरों, स्क्रिप्ट लेखकों, कलाकारों, ड्रेस डिज़ाइनरों के समूह ने बनाई है तो यह फिल्म सीधे उसी विशाल संस्कृति का बारीक और पारदर्शी पक्ष बहुत भव्य खूबसूरती से रखती है। चाहे वे मूरसी और सूरमा महिलाओं की ‘लिप – प्लेट’ ( होंठों में बींध कर डाली गई एक प्लेट), गले की रिंग्स, तुर्काना सौंदर्यबोध, आदिवासी नृत्य, कलाएं और रीति – रिवाज़, ऐसा हर तत्व इस फिल्म में एक जीवंत स्थान पाता है, बल्कि अपनी भूमिका में हैं। इस फिल्म के छोटे – बड़े चरित्र और उनके लिबास, परिवेश और काल मिलकर अफ़्रीकन कल्चर की जीवित – जीवंत टैपेस्ट्री बुनते हैं।

ओह ! संगीत एलबम! इसे तो बेहतरीन होना ही था। केंड्रिक लमार अपने आप में अपनी प्रतिभा के ऊंचे मापदंड स्थापित कर चुके हैं लेकिन इस फिल्म में उन्होंने अपने ही इस म्यूज़िक स्कोर में बहुत कुछ पीछे छोड़ दिया। चौदह साउंड ट्रेक्स और पूरे ग्लोब में फैले अफ्रीकन संगीतज्ञों, कलाकारों के दिए संगीत और स्वर। ये सब मिलकर समग्र अफ़्रीकन आदि- संगीतिक आयामों में गुँथ कर अद्भुत समां बांध देते हैं।  इस फिल्म का म्यूज़िक स्कोर, न केवल आपके रोम खड़े कर देता है, बल्कि आप हॉल से निकल कर भी इसकी धुनों पर खुदको थिरकता महसूस कर सकते हो।  अनोखी बीट्स, धुनें, स्वर, गीतों के शब्द ये सब मिल कर आधुनिक अफ़्रीकन समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। “प्रे फॉर मी’ , ‘ ऑल द स्टार्स’ , ‘किंग्स डेड’ , ‘आय एम’ ये गाने मेरे प्रिय हैं। वीकेंड। ट्ज़ा, ख़ालिद, ट्रेविस स्कॉट, फ्यूचर, जे रॉक, जोर्जा स्मिथ ये तो वे नाम हैं जो फिल्म और इसके साउंड ट्रेक के जादू से निकलने पर मेरे जहन में बचे रह गए।  हम्म! मैं यह रिव्यू लिखते भी हुए इस फिल्म का संगीत सुन रही हूँ।

इस फिल्म की कहानी पर आऊं तो, संक्षिप्त में यही कि पिता की मृत्यु के बाद ट्चाला ( चैडविक बोज़मैन) को अपने घर और पिता की रियासत वकांडा लौटना पड़ता है और पिता का शासन राजा बन संभालना पड़ता है। तभी उसका शक्तिशाली शत्रु प्रकट हो जाता है।

‘किल मॉन्गर’ के रूप में माइकल बी जॉर्डन, मेरे लिए तो मैन ऑफ द मैच हैं। वे हीरो के बरक्स इस फिल्म का समानांतर केंद्रीय आकर्षण हैं, बाकि सारे जादू इनके इर्द – गिर्द जागते हैं। एक असली एंटॉगोनिस्ट, विलेन नहीं कह सकूंगी, वे प्रतिपक्षी ही हैं। इस फिल्म में विलेन भी चारित्रिक गहराई के साथ प्रस्तुत किया गया है। बहुत समय बाद ऐसे गहरे हीरॉइक गुणों वाला प्रतिपक्षी देखने को मिला। शायद यह आदि सभ्यताओं की और उनकी गाथाओं की विशेषता को रेखांकित करने वाली पुरा प्रवृत्ति है। यह इस फिल्म में आधुनिक मिथक के साथ उभर कर आई है।

ट्चाला और किल मॉन्गर का द्वंद्व ही यह है कि वकांडा राज्य और उसकी प्रजा को ही सुरक्षित रखना राजा का धर्म है? वकांडा जैसा राज्य गुप्त रूप से समृद्ध और शांत रह कर पूरी दुनिया में फैले अफ़्रीकन लोगों की ओर से आँख बंद किए कैसे रह सकता है? जबकि किल मॉन्गर चाहता है दुनिया को तकनीकी से समृद्ध कर बेहतर स्थान बनाए, वह एक मिथकीय तत्व से दुनिया को कभी न नष्ट होने वाली बनाना चाहता है और ट्चाला से वकांडा की सम्पत्ति और रिसोर्सेज़ चाहता है। वकांडा के सारे ब्लैक पैंथर राजा यही करते आए, वकांडा को गुप्त तौर पर रख अपने भीतर मगन। बाहर वह किल मॉन्गर से द्वंद्वरत है मगर ट्चाला के भीतर भी द्वंद्व है कि वह पूर्वजों की तरह आत्मकेंद्रित दुनिया का राजा बन शांति से रहे या नए जागरुक तरीके से वकांडा दुनिया से जुड़े, अपनी समृद्ध विरासत बांटे। अपनी दुनिया भर में फैली नस्लों का भी भला करे?
चैडविक ने इस मानसिक संघर्ष को लेकर बहुत अच्छा अभिनय किया है। वे हीरो है लेकिन माईकल बी जॉर्डन ने किल मॉन्गर के करेक्टर का ‘आर्च’ , एक कोण बखूबी साधा है। एक पराकाष्ठा पर तो वे कहीं ज्यादा ‘पैंथर’ महसूस होते हैं, ट्चाला के बरक्स। उन्होंने साबित कर दिया कि माईकल बी जॉर्डन आखिर माईकल बी जॉर्डन हैं।

यह फिल्म न केवल पूरी आधुनिक अफ्रीकन संस्कृति को झकझोर कर जगाती है बल्कि हम पाश्चात्य संस्कृतियों के पिछलग्गुओं को भी एक प्रेरणा देती है। फिल्म में यह बात ताज़गी से भर देती है कि इस फिल्म में गोरे चरित्र केवल दो एक जगह हैं। हांलांकि एंडी सैरिक का सनकी रोल भी दिल जीत लेता है और मार्टिन फ्रीमैन हमेशा की तरह चार्मिंग और कनफ्यूज्ड ( आखिर कौन नहीं है जो दिल न दिए बैठा हो शारलक होम्स के, मि. वॉटसन को)

सुपर हीरोज़ पर इतनी फिल्में देखीं मगर महिलाओं के करैक्टर उनमें बस रोमांटिक कर्व्स वाले होते थे।  मगर इस फिल्म में महिला पात्र पुरुषों जितने ही ताक़तवर। लुपिटा न्योंग्यो ‘नाकिया’ के रोल में यह परिदृश्य बदल कर रख देती है। दानाई गुरिरा ‘ओकोये’ के रोल में दृढ़ता, साहस और बुद्धि की सम्यक मानवीय प्रतीक महसूस होती है। क्वीन मदर के रूप में एंजेला बैस्सेट अच्छी लगती हैं। इस फिल्म में सारे महत्वपूर्ण स्टार कलाकार भरे हैं। रोल कैसा भी हो।
कॉमिक उपस्थिति वाली प्रिंसेस शुरी के रूप में, लैटिटा व्राईट।

और अंत में मैंने यह रेखांकित नहीं किया कि मैकअप का इस फिल्म में क्या रोल था तो मैं एक चूक करूंगी। बहुत सौंदर्यबोध और सटीक ढंग से अफ्रीकन सौंदर्य को इस फिल्म में प्रस्तुत किया है। जिसके पीछे गहरा संदेश है अफ़्रीकी युवाओं और बच्चों के लिए कि अमरीकी, ब्रिटिश, यूरोपियन अंदाज़ या सुंदरता के मापदंड हर जगह लागू नहीं होते। एक ज़माना था अमरीका – यूरोप में ब्लैक बच्चों को उनके घने घुंघराले बालों के कारण प्रताड़ित किया जाता था। उन्हें स्कूल से घर वापस भेजा जाता। हंसी उड़ाई जाती थी। तो इस फिल्म में घुंघराले बालों और असंख्य चोटियों और अफ्रीकन हेयरस्टायल्स और मेकअप को बहुत गौर से उभारा है।
इस फिल्म मुझे तो बेहद अचंभित किया है। लंबे समय बाद फिल्मों के अंतरिक्ष से एक चकित करने वाला धूमकेतु प्रकट हुआ है। अगर आप अब भी यह रिव्यू पढ़े जा रहे हैं और टिकट बुक नहीं करा रहे तो ……जल्दी करिए।

कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ

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