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शर्मिला जालान की कहानी ‘चारुलता’

आज समकालीन कहानी की एक विशिष्ट स्वर शर्मिला जालान की कहानी ‘चारुलता. शर्मिला जी कम लिखती हैं लेकिन भीड़ से अलग लिखती हैं, रहती हैं. हाल में ही उनका कहानी संग्रह वाग्देवी प्रकाशन से आया है ‘राग-विराग और अन्य कहानियां’. यह एक प्रेम कहानी है. चारुलता की, जिसे बचपन से ही एक बीमारी थी कि वह किसी से भी तुरंत प्रेम कर बैठती थी- मॉडरेटर

कहानी पढ़िए और साथ में वरिष्ठ लेखक जयशंकर की टिप्पणी भी-
“चारूलता” मन की पारदर्शिता और मार्मिकता पर ठहरती ठिठकती कहानी है । ‘चारूलता’ अगर एक तरफ अपने शीर्षक से रवि बाबू की कहानी ‘नष्टनीड़’ की याद दिलाती है, तब दूसरी तरफ नायिका की मासूमियत चेखव की कहानी ‘डार्लिंग ‘ की ।
चारु का अपना सा जीवन ,उस जीवन की ललक और लालसाएं . चारु के स्वप्न और मोहभंग और अंत में प्रेम के भले ही ट्रेजिक,पर अपने महत्व का अंत लिया पैराग्राफ
“इस छोटी सी कहानी का पाठ हमें यह बताता है कि मनुष्य अपने जीवन में अपने लिए कुछ आत्मीय – सा चुनना चाहता है , चुनने के वक्त के अस्पष्ट , अमूर्त वातावरण को नहीं जान पाता है और इससे चुनने की स्वतंत्रता की सीमाओं को भी नहीं जान पाता है।  चुनने की ये संभावनाएं, और सीमाएं हमारे भीतर किस तरह की व्यथाओं को जन्म देती रहती है इसे हम ‘चारुलता’ में  कुछ हद तक महसूस कर सकते हैं। —-जयशंकर

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चारुलता को बचपन से ही एक बीमारी थी । वह यह थी कि वह किसी से भी तुरंत प्रेम कर बैठती । प्रेम करने के बाद उसे यह लोक स्वर्ग-लोक दिखाई पड़ता । वह खूब अच्छी बनना चाहती । खूब सजती । खूब हँसती । सबको यह सलाह देती कि वे भी प्रेम करें । प्रेम करना बहुत अच्छी बात है ।

पर यह सब ज्यादा दिनों तक चल नहीं पाता । उसका प्रेम जल्दी टूट-छूट जाता और जब ऐसा होता तब उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता । उसे लगता यह दुनिया अच्छी नहीं है । यहाँ कोई भी अच्छा नहीं है । वह सबसे कहती फिरती, सब कुछ करना पर प्रेम मत करना । वह जीना नहीं चाहती । मरने की रट लगाती पर मरने की बात तुरंत भूल जाती जब उसके सामने कोई दूसरा आ जाता और वह फिर से प्रेम में पड़ जाती ।

अपनी इस बीमारी के कारण चारुलता बदनाम भी थी पर वह कहती – ‘मैं क्या करूं, सब कुछ अपने आप होता है ।’

इस बड़ी बीमारी ने उसमें छोटी-छोटी कई बीमारियाँ पैदा कर दी थीं । वे थीं – अकेले पड़े रहना, अकेले में कभी अपने से तो कभी प्रेमी से बात करना, कभी हँसना तो कभी रो लेना ।

चारुलता ने सबसे पहले पल्लू से प्रेम किया था । तब जब वह दस वर्ष की रही होगी। पल्लू का अच्छा नाम पल्लव था । वह उनकी गाड़ी धोता था । सुबह छह बजे रोज वह गाड़ी की चाबी मांगने आता । चारुलता जगी रहती । जैसे ही घंटी बजती वह दौड़कर दरवाजा खोलती और धीरे से बिना कुछ कहे, उसे चाबी पकड़ा देती । पल्लू मुस्कुरा देता । यहीं से उसकी बीमारी शुरू हुई थी । घर में और कोई उसे देखकर उस तरह नहीं मुस्कुराता जिस तरह पल्लू, इसलिए ही तो वह सबसे अलग था ।

चारुलता अक्सर रात में ही बड़ी दीदी से कभी मिठाई तो कभी कोई फल माँगकर पल्लू को देने के लिए रख लेती । कभी-कभी चारुलता की नींद बहुत सुबह खुल जाती तो वह जल्दी से उठकर मंजन करती, मुँह धोती,बाल संवारती । दीदी ध्यान से देखकर कहती, ‘चारू तुमने कंघी भी कर ली’ चारुलता जल्दी-जल्दी जवाब देती, ‘माँ कहती है -सुबह सबसे पहले केश संवारने चाहिए ।’ बाल बनाने के बाद चारुलता पल्लू का इंतजार करने लगती । कभी जब वह साढ़े छह बजे घंटी बजाता, चारुलता गुस्से में सोने चली जाती । सोचती, वह अब कभी भी दरवाजा नहीं खोलेगी । पल्लू को पता चल जाएगा कि देर से आने से क्या होता है । पर जैसे ही घंटी बजती वह लपक कर दरवाजा खोलती और पहले की तरह चाबी पकड़ाती ।

वह अकेले घंटों पल्लू से बात किया करती । पूरे दिन उसके साथ जो भी कुछ घटता सब कुछ उसे बताती । उसे लगता कि पूरी दुनिया में पल्लू ही एक ऐसा व्यक्ति है जिसे वह सब कुछ कहना चाहती है । उसे पता था कि पल्लू भी उसकी बात सुनना चाहता है ।

उस दिन वह पल्लू को रात की बात बताने लगी । रात जब बत्ती गुल हो गयी थी, माँ ने मोमबत्ती जलायी । मोमबत्ती जलाते ही अजीब बात हई । पूरा घर काली आकृतियों से भर गया । माँ का हाथ बहुत बड़ा हो गया । इतना बड़ा कि दीवार में समाया ही नहीं ।आसपास की दीवारों में आधा-आधा दिखलाई पड़ा ।

माँ के हाथ के साथ उसका अपना हाथ भी बहुत लम्बा होने लगा । हाथ ही क्या पैर, सिर सब कुछ ! उसी समय मच्छरों का एक झुण्ड उसके सिर पर बैठ गया । उसे तो तब पता चला जब भन-भन की आवाज हुई । वैसी आवाज उसने पहले कभी नहीं सुनी । जैसे ही उसने अपना सिर ऊँचा किया, मच्छर बिखरने लगे ।

चारुलता पल्लू को यह भी बताना चाहती थी कि कल जब वह स्नानघर में नहा रही थी तो उसने देखा, पानी जमा हो रहा है । उसने नल को पूरा खोल दिया । उसे मजा आने लगा । धीरे-धीरे वह उस पानी में हाथ-पाँव चलाने लगी । तभी उसका हाथ उस जाली पर गया जो नल के ठीक नीचे थी । वहाँ बालों का एक गुच्छा था । जैसे ही उसने उस गुच्छे को वहाँ से हटाया, जमा पानी धू-धू की आवाज करता हुआ जाली से नीचे चला गया ।

एक दिन की बात है, चारुलता ने देखा, उसका भाई पल्लू को डांट रहा है । कह रहा है, ‘एक नम्बर के निकम्मे हो । क्या ऐसे गाड़ी धोई जाती है गंदी छोड़ दी गाड़ी तुमने ? मैं एक पैसा भी नहीं दूँगा ।…. साला कामचोर कहीं का ।’ पल्लू चुपचाप वहाँ से चला गया । चारुलता को उस समय भैया पर बहुत गुस्सा आया । मन हुआ कि उनके मुँह पर थूक दे । कैसी अश्लील भाषा में उन्होंने पल्लू को डाँटा था । चारुलता का मन पूरे दिन खराब रहा । उस दिन के बाद से चारुलता के मन का खराब रहने का सिलसिला शुरू हो गया था । रोज भैया किसी न किसी बात पर पल्लू को डाँट देते । चारुलता अकेले बैठी सोचती कि वह पल्लू को समझाएगी, कहेगी -वह गाड़ी और अच्छी तरह धो दिया करे । गाड़ी की छत पर पानी ज्यादा डाले जिससे वहाँ चिपकी धूल-गंदगी धूल जाए ।

उस दिन के बाद से पता नहीं क्या हुआ, चारुलता ने देखा, पल्लू उसे देख पहले की तरह हँसता नहीं है । चारुलता रोज यह सोचकर उसे चाबी देने जाती कि शायद आज हँसे पर ऐसा कुछ नहीं हुआ । एक दिन चाबी लेते समय पल्लू अजीब ढंग से बोला, ‘कहो न अपने भाई को, वही गाड़ी धो लिया करे ।’

चारुलता को पल्लू की बात समझ में नहीं आई पर उस दिन के बाद से ऐसा कुछ हुआ कि पल्लू उसे कम अच्छा लगने लगा । उसका मन नहीं होता कि वह पल्लू से अकेले बैठकर बात करे । उसे अपनी सारी बातें बताए । धीरे-धीरे चारुलता सुबह देर तक सोने लगी । पल्लू को चाबी कभी माँ तो कभी दीदी देने लगी । जिस दिन चारुलता पल्लू को पूरी तरह भूल गयी उस दिन वह बहुत अकेली हो गई । पर उसका अकेलापन लम्बे समय तक चलने वाला नहीं था । उसे बीमारी जो थी ।

कुछ दिनों से दीदी को गाना सिखाने के लिए एक संगीत शिक्षक आने लगे थे । लम्बे, गौरवर्ण, मुस्कुराता चेहरा। चारुलता को वह बहुत अच्छे लगते । वह बहुत अच्छा गाते थे । चारुलता जब कभी दीदी के पास बैठकर गाना सुनती, देखती कि वह उसे देख रहे हैं । वह यह सोचने लगी थी कि वह उससे प्रेम करते हैं । वह यह बात दीदी को नहीं बता सकती थी । उसे दीदी से सहानुभूति थी कि उन्होंने दीदी से प्रेम न करके उससे प्रेम किया ।

चारुलता अपने हाव-भाव इस तरह के बना कर रखती कि कहीं दीदी को कुछ पता न चल जाए । दीदी जब कभी उसका चेहरा गौर से देखती, वह समझ जाती कि दीदी कुछ भांपने की कोशिश कर रही है । उस समय दीदी उसकी सबसे बड़ी शत्रु जन पड़ती । चारुलता जानती थी कि दीदी सोचती है कि वह एक बिगड़ैल लड़की है । तुरंत प्रेम करने लगती है । दीदी कुछ भी सोचे चारुलता को कोई फर्क नहीं पड़ता । उसने तो सोच लिया है कि कुछ भी हो वह बस उन्हीं से शादी करेगी । पर उन्हें कैसे बोले । दीदी को ही मदद करनी होगी ।

उन दिनों जब चारुलता स्वयं को दर्पण में देखती, उसे यह देखकर बहुत दुःख होता कि उसके सामने के दो दांत अजीब ढंग से बाहर निकले हुए हैं । ऐसे बेढंगे दांतों के साथ संगीत सर के सामने जाने में उसे बहुत शर्म आती । उसकी लम्बाई भी तो कम थी । उनके सामने वह बहुत छोटी लगती थी । अपनी लम्बाई बढाने के लिए वह अपनी सहेलियों की तरह नियमित रस्सी लेकर उछलने लगी । तैरने से भी कद बढ़ता है इसलिए उसने अपना नाम स्कूल में तैराकी में लिखवा लिया । वह भी गाना सीखना चाहती थी । माँ ने कहा था कि पहले दीदी को कुछ महीने सीखने दो, फिर तुम सीखना ।

चारुलता सोचती कि जब वह गाना गाएगी तब ‘सा’ करते हुए पूरा मुँह नहीं खोलेगी । दीदी कैसे मुँह फाड़ कर ‘सा’ करती हैं । कैसी भद्दी लगती हैं । वह जब गाएगी तब अपना हाथ भी ठीक से रखेगी । दीदी का बीच में हाथ हिलाना भी उसे अच्छा नहीं लगता ।

एक दिन संगीत सर नहीं आये । चारुलता को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था । वह बहुत देर तक उनका इंतजार करती रही । उस रात उसे नींद भी कहाँ आई । वह जानती थी कि सर का भी मन हो रहा होगा चारुलता को देखने का । दो दिन निकल गए, वह नहीं आये । चारुलता का कहीं भी किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था । वह अपना चेहरा छुपा रही थी कि कहीं दीदी को उसकी आँखे उदास न लगें ।

कुछ दिनों के बाद जब सर आये, चारुलता उन्हें देखते ही भागकर उनके पास गई और पूछा -‘आप इतने दिन क्यों नहीं आए ? वह चारुलता को हैरान होकर देखते रहे । धीरे से बोले, ‘दीदी को पता है ।’ चारुलता ने दीदी की तरफ देखा । दीदी तुरंत बोली, ‘तुमने पूछा ही नहीं ।’

चारुलता को दीदी पर बहुत गुस्सा आया । वह समझ गयी कि दीदी ने उसे जान-बूझकर नहीं बताया कि सर कुछ दिन नहीं आएँगे । दीदी उससे ईष्या करती है न । पर सर क्यों नहीं आए ! बता क्या थी ? कुछ दिनों बाद संगीत का अभ्यास करवाते हुए सर दीदी से बोले, मेरी बेटी की नाक एकदम अपनी माँ पर है ।’ चारुलता सन्न रह गयी । सर विवाहित हैं । दीदी ने बताया नहीं ? चारुलता सर और दीदी के सामने से उठकर दूसरे कमरे में चली गयी ।

कई-कई दिनों तक चारुलता ने दीदी से कोई बात नहीं की । वह छुप-छुप कर रोती रही । वह इस ताक में रहती कि कैसे माँ से संगीत शिक्षक की चुगली करे, कहे कि वह -सिखाते कम हैं और बातें ज्यादा करते हैं । चारुलता एक बार फिर अकेली थी ।

कुछ दिनों बाद की बात है । देखा गया, चारुलता इतिहास पढ़ाने वाली अध्यापिका को खूब ध्यान से देखने लगी है । मैडम का चेहरा हर समय उसकी आँखों के सामने रहता । चारुलता मैडम की तरह कम बोलने लगी थी । माँ और दीदी उसमें आये इस परिवर्तन से हैरान होने के बजाय परेशान थी । चारुलता से कुछ भी पूछा जाता वह हाँ, हूँ में जवाब देती । एक दिन चारुलता ने दीदी को बताया कि सोनल सेन जो उन्हें इतिहास पढ़ाती हैं, वह कब, कैसे बोलती और बात करती हैं, क्या पहनती हैं और कौन सा हैण्ड बैग रखती हैं ?

उन दिनों चारुलता सोनल सेनकी ही तरह अपने पास किताबें रखने लगी और उन्हें पढ़ने की कोशिश करने लगी । उसका प्रेम इस बार विकराल रूप धारण कर चुका था । वह एकदम अलग ढंग से हँसने, बोलने और चलने लगी । हर समय कहती, मैडम किसी भी बात को इस तरह समझाती हैं । ऐसा कहते हुए उसे मैडम की वह अंगुली याद आती जिसमें वह हमेशा सोने की अँगूठी पहने रहती, जो बहुत सुंदर थी । उसने सोनल सेनका जूड़ा भी बहुत पास से देखा था । दोनों भौंहों के बीच वह दो बिंदी लगाती थीं । वह भी उसे बहुत सुंदर लगती थी । उन दिनों चारुलता एकदम उन्हीं की तरह सजना चाहती ।

एक दिन चारुलता स्कूल पहुँची तो उसके मन की मुराद पूरी हो गयी । सोनल सेन एक अन्य अध्यापिका के साथ स्कूल के बाहर खड़ी मिली । चारुलता जल्दी-जल्दी उनकी तरफ बढ़ने लगी । उसने देखा, मैडम बार-बार अपने जूड़े को छू रही हैं उन्होंने तुरंत जूड़ा खोल लिया और अपने केश खोल कर खड़ी हो गयीं । खुले बालों में वह अच्छी नहीं लग रही थीं । चारुलता को उनका जोर-जोर से बात करना भी अजीब सा लगा । वह उनके बहुत पास गयी । नमस्ते कहा पर वह उसे देख ही नहीं रही थीं । न जाने वह चारुलता को देखना नहीं चाह रही थीं । मैडम के बगल में खड़ी अध्यापिका ने इशारा कर सोनल सेन से कहा-‘देखो ।’ मैडम ने चारुलता की तरफ देखा और विचित्र ढंग से नमस्ते का जवाब दे मुँह फेर लिया । चारुलता वहाँ से जाने लगी तभी उसने सुना सोनल सेन कह रही थीं , ‘ये लडकियाँ उसके पीछे घूमती रहती हैं, सोचती हैं नम्बर बढ़वा लेंगी ।’ यह सब सुनकर चारुलता का मन कैसा-कैसा हो गया । उससे चला नहीं जा रहा था ।

कुछ दिनों तक, चारुलता को हर बात पर गुस्सा आता रहा । वह माँ और दीदी पर बात-बात पर झुंझलाती-खीझती । माँ उसके इस व्यवहार पर उसे डांटती पर दीदी चुप रहती ।

धीरे-धीरे चारुलता बड़ी हो गयी । कॉलेज जाने लगी । उन वर्षों में उसने कितने प्रेम किये यह तो उसे भी ठीक से याद नहीं । हाँ बीच-बीच में कोशिश की, कि वह इस बीमारी से निजात पाए । कुछ परहेज भी किये, जैसे कि तुरंत किसी से बात न करना । किसी की बात सुनकर तुरंत खुश न होना । किसी को भी ज्यादा देर तक न देखना आदि ।

इसी तरह कई-कई दिन-महीने-वर्ष गुजर गए । चारुलता बूढी हो गयी । उसने बाद के सालों में एक रास्ता निकाला, वह यह कि जब भी किसी से प्रेम हो, उस बात को मन में ही रखो । चुपचाप प्रेमी को देखो, सुनो और परखो । जब प्रेम टूट जाए तो चेहरे पर कोई भाव मत लाओ । इस तरह करने से कोई भी नहीं कहेगा कि चारुलता बीमारी से मुक्त नहीं हुई ।

लोग समझने लगे कि चारुलता रोगमुक्त हो गई पर सत्य तो चारुलता ही जानती थी । लोगों की इस बात पर वह हँस देती । मन ही मन कहती भला इस रोग से भी कोई मुक्त हो सका है । यह तो शरीर धारण करते ही लग जाता है ।

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