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हृषिकेश सुलभ की कहानी ‘हबि डार्लिंग’

आज जाने माने लेखक हृषिकेश सुलभ का जन्म दिवस है. उनको पढ़ते हुए हम जैसे लेखकों ने लिखना सीखा. आज जानकी पुल की तरफ से उनको बधाई. वे इसी तरह हमें प्रेरणा देते रहें- मॉडरेटर

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     उस रात एक आदिम गंध पसरी हुई थी। यह गंध उसके रन्ध्रों से होती हुई उसके मन-प्राण को हिलोर रही थी। वह भारहीन हो गई थी। फूल की पंखुड़ियों की तरह। आलाप से छिटक कर द्रुत में भटकती आवाज़ की तरह। …..रुई वाली हवा मिठाई के गोले की तरह या फिर……! उसके साथ पहली बार ऐसा हो रहा था।

     वह पूरे घर में चक्कर काट रही थी। कभी सोने के कमरे में, …कभी ड्राइंग रूम में, तो कभी बालकनी में। कभी बिस्तर पर, कभी सोफे पर, …तो कभी डाइनिंग चेयर पर। उसकी देह और उसके मन में, …उसके घर की दीवारों में, …उन पर टँगी तस्वीरों में …हर सामान में, …यहाँ तक कि किचेन के डब्बों-बर्तनों में असंख्य आँखें उभर आई थीं और राह निहार रही थीं। बालकनी के गमलों में फूलों की जगह आँखें ही खिली हुई थीं। वह आ रहा है। बस पहुँचने ही वाला है वह । सच, ऐसा पहली बार हो रहा था। ऐसी आकुलता। ….ऐसी सिहरन। रोम रोम में झिरझिर हवा, …रिमझिम फुहियाँ। वह पिछले कुछ महीनों से उससे मिलती रही है। व्हाट्स एप्प पर चैट कर रही है। फोन पर घन्टों बातें करती है। रेस्तराँ में साथ बैठकर कॉफ़ी पी है। खाना खाया है। पर पहली बार वह घर आ रहा था, उसके आमंत्रण पर। उससे मिलने आ रहा था। निभृत एकांत में उसके साथ होने की कल्पना के जादू में तैर रही थी वह।

     उसके मोबाइल फोन पर ‘स्लो कॉफ़ी’ रिंगटोन बजा। और उसका नम्बर चमका और नाम, …नाम नहीं। …..नाम की जगह दर्ज़ था – माय लव। उसने बेचैनी से पूछा – “कहाँ हो?”

     “लिफ्ट में।“ उधर से एक जादुई आवाज़ आई। ख़ुशबू से मह-मह करती ऐसी आवाज़, …मानो  मख़मल में लिपटी इत्र की शीशी खुल गई हो। …….और वह दरवाज़े की ओर भागी।

     वह दरवाज़े पर था। दरवाज़ा खुला। वह भीतर आया। दोनों ने एक-दूसरे को बाँहों में कस लिया। वह भी द्रुत में भटकती आवाज़ की तरह ही गमक में भटक रहा था। अपने भीतर उमगती श्रुतियों के बीच उबचुभ हो रहा था। रात अभी शुरु ही हुई थी। …..पर रात का क्या ठिकाना, …कब ख़त्म हो जाए!

     बमुश्किल बीस-पच्चीस मिनट गुज़रे होंगे कि मोबाइल फिर बजा। और उस पर ‘हबि डार्लिंग’चमका। वह कुछ चौंकी पर परेशान नहीं हुई। उधर से आवाज़ आई – “कहाँ हो?”

     काँप गई उसकी देह। उसकी आँखें पल भर के लिए बन्द हुईं। हरहरा कर गिरते कदम्ब की छाया लहराई। उसने मुट्ठी में भींचा अपने मन को।

“आकर देख लो।“ उसके मन्द्र स्वर में चुनौती थी। ललकार।

     “आकर तो देखूँगा ही। ……तुम बताओ, …हो कहाँ?” धमकी और सवाल दोनों एक साथ। धमकी और सवाल के आवेग ‘हबि डर्लिंग’ के स्वर में टकराए और उस तक पहुँचे। इस टकराव से फूट रहे स्फुलिंग की छुवन से गहरी पीड़ा उभरी उसके भीतर।

     “आओ। ……इंतज़ार कर रही हूँ।“

      दोनों एक झटके में द्रुत से वापस आलाप तक पहुँचे। अब वे षड़ज-स्वर में बातें कर रहे थे। काॅफी बनने तक वह सिगरेट फूँकता रहा। काॅफी आई तो उसे जल्दबाज़ी में गटका, हालाँकि जीभ जल रही थी। समय नहीं था। वापस निकलना था। जल्दी से जल्दी, …हर हाल में। वह निकल गया। जाते हुए इतनी हड़बड़ी में था कि चूमना तक भूल गया। उसके तपते होठों की मरीचिका में लपटें लहराती रहीं।

     रूई वाली हवा मिठाई की तरह उसकी भारहीन देह, अब उसके उठाए नहीं उठ रही थी। आनन्द के अतिरेक से अभी भी सिहर रही थी उसकी देह। उसके जाने के बाद बेमन पाँव घसीटते हुए दरवाज़े तक गई। ……उसे बन्द किया। ….फिर वापस आकर पलंग पर कटे हुए कदम्ब वृक्ष की तरह धम्म से गिर गई।

     वह आँखें मूँद कर उस कदम्ब को याद कर रही थी। दृश्य गडमगड्ड हो रहे थे। कदम्ब के छोटे से बिरवे का आना। दो आँगन थे। एक भीतर, …औरतों के लिए। और दूसरा बाहर, …सामने से खुला और तीन ओर से घिरा। एक ओर बैठका और बरामदा। दूसरी ओर बरामदा और अन्न के भरे हुए कोठार। और सामने के खुले भाग के विपरीत तीसरा भीतर वाले आँगन में प्रवेश के लिए बने दोमुँहे से जुड़ा। इसी बाहर वाले आँगन में रोपा गया कदम्ब का बिरवा। वह सात साल की थी। अम्मा ने एक पायल ख़रीद कर पहना दी थी। छुनछुन करती फिरती थी इस आँगन से उस आँगन। कदम्ब बड़ा होता रहा। वह भी। दस साल में वह युवा, बलिष्ठ, ऊँचा और छतनार हुआ। वह भी ऊँची हुई, …रंग, नैन-नक्श, छातियाँ, नितम्ब – सब सजे-सँवरे। कदम्ब फूलते। फल बनते। पकते और आँगन की धरती पर गिरते।

     वह शहर में रहने लगी थी। हाॅस्टल में रह कर पढ़ रही थी। पिता और भाई दो-चार दिनों में एक बार आते। कुशल-क्षेम पूछते। ज़रूरतें जानते। हिदायतें देते। उसे यह पता नहीं चल सका था कि जासूसी भी करते थे। और एक दिन भाई ने हास्टल के वेटिंग रूम में उसके कमर तक लहराते केशों को मुट्ठी में भर लिया और घसीट-घसीट कर उसकी सहेलियों और वार्डन के सामने पीटा। वह उस समय रजस्वला थी। रात तक उसे साथ लेकर भाई वापस घर आया। उसकी अम्मा ने पीने के लिए दूध में हल्दी घोलकर दिया। अम्मा को उसके रजस्वला होने की बात मालूम हुई, उन्होंने चैन की साँस ली। पिता को भीतर वाले आँगन में बुलाकर बात की। बताया कि चिंता की कोई बात नहीं। सब ठीक-ठाक है। ईश्वर ने लाज बचा ली।

     भाई दरवाज़े पर नाग की तरह कुंडली मारे बैठ कर फुँफकारता रहता। एक दिन भाई नहीं था। कहीं आसपास ही गया था। वह दोमुँहा पार कर बाहर वाले आँगन में खड़ी थी। कदम्ब को निहार रही थी। उसकी छतनार डालों, …गझिन पत्तियों, …और लट्टुओं की तरह खिले फूलों को देख रही थी। …वह कदम्ब की आड़ में थोड़ी दूर पर हिलती-डुलती उस छाया को अपनी आँखों से टेर रही थी कि भाई आ गया। वह कदम्ब और कदम्ब के उस पार डोलती छाया में इस कदर खोई हुई थी कि भाई को आते हुए देख नहीं सकी। आते ही वह फुँफकारते हुए फन निकाल कर झपटा। वह सरपट भागी भीतर वाले आँगन में। वह चीख़ रहा था – “मना किया था न तुझे कि दोमुँहे से आगे पैर नहीं बढ़ाना। किसे निहार रही थी एक टक? तुझे जो-जो अच्छा लगता है, सब मटियामेट कर दूँगा। तुझे कदम के नीचे राधा बन कर खड़ा रहने का शौक चढ़ा है? मैं इसे जड़ से…….”

     उसी दोपहर, …भाई ने अपने हाथों कदम्ब को काट डाला। युवा कदम्ब हरहराते हुए गिरा धरती पर।

     उसने संयत किया ख़ुद को। उठी। शिफौन की झीनी साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज़, ब्रा – सब खोलकर वार्डरोब में ठूँसा। नंगी देह चलती हुई वाश-बेसिन तक आई। चेहरा धोकर गाउन पहना और बिस्तर पर लेट कर बेमन टीवी आॅन कर दिया। कोई इमोशनल दृश्य चल रहा था। नायक और नायिका गले मिल कर रो रहे थे। उसने साउन्ड म्युट किया और करवट फेर कर कमरे की दीवारों को घूरने लगी।

      दीवारों को घूरती उसकी आँखों में फिर कदम्ब उभरा। कट कर धरती पर गिरा हुआ कदम्ब। क्षत-विक्षत डालें, …बिखरी हुई पत्तियाँ और कच्चे फल। जवान पेड़ के कटने के अपशकुन से भयभीत अम्मा का छाती पीट-पीट कर रोना-चिल्लाना। अम्मा के रुदन में घुल रही थी हरहरा कर गिरते कदम्ब की आवाज़। फिर औरतों का गीत-नाद, …हल्दी, …बारात, …बैन्ड-बाजा, …परिछावन, …मँड़वा, …विवाह की वेदी, …भाँवर, …सप्तपदी, ….माथढँकाई, …विदाई। अनगिनत दृश्य, …अनगिनत आवाज़ें, ….असंख्य लोगबाग। और विदा से पहले भाई की जलती हुई आँखें और लहकते हुए शब्द और क्रोध के दाब में फुसफुसाती आवाज़। “अगर कुछ भी सुने तो गोली मार कर मिटा देंगे अपने पूरे कुल को…..। दीयरी जलाने पुरखों के डीह पर आना पड़ेगा तुमको। सुन रही हो न बुचिया?”

     फिर उसी शहर में बसेरा, जहाँ पढ़ाई वाला बस्ता छूट गया था। एक क्षीण-सी आशा कि शायद मिल जाए बस्ता। पुश्तैनी खेत का एक बड़ा टुकड़ा बेच कर पिता उसे विदा कर सके थे। हालाँकि सस्ते ही जान छूटी थी उनकी। कुल सम्पत्ति का दसवाँ हिस्सा भी नहीं गँवाना पड़ा। निठल्ला भाई भीतर ही भीतर प्रसन्न था कि कम में ही समय पर निबट गया यह संकट। वह जिस घर में पहुँची थी वहाँ असंतोष था कि ठग लिया उसके बाप-भाई ने। जो तय था उसमें भी घालमेल किया गया। ऐसे ही लोगों की बेटी-बहनें फूँक-ताप दी जाती हैं। …….सास और ननदों ने पारम्परिक व्यंग्य वाणों, श्वसुर ने मौन और अपने साथ हुई ठगी से बौखलाए पति ने बदले की हिंसक योजनाओं के साथ उसका स्वागत किया। पहली रात जब वह अपने निचले होठ को दातों से भींचकर सब कुछ सह गई, संदेह का शिकार बनी। जैसे हास्टल के वेटिंग रूम में भाई ने अपनी मुट्ठी में उसके केशों को भरकर खींचा था, लगभग वैसे ही, पहली ही रात उसके केशों को खींचते हुए हबि डार्लिंग ने कई सवाल दागे थे। उसकी चुप्पी से चिढ़कर कहा था – “कितने दिन चुप रहोगी…..? आज नहीं तो कल पता चल ही जायेगा। …..ज़रूर खेली-खाई हुई हो तुम …..तभी तो ! पहली रात में लड़कियाँ रो-रो कर जान दे देती हैं और तुम मज़े ले रही थी। ….सच बोलो। अगर ना है, … कभी कुछ नहीं किया, तो ना ही बोल दो। मैं भरोसा कर लूँगा।“

     उसने न ना कहा, न हाँ। और रोई भी नहीं। तय कर लिया था कि न तो कोई सफाई देगी और न रोएगी। अब इन हालातों में कहाँ और कैसे ढूँढ़ती अपना छूटा हुआ बस्ता। इंटर की परीक्षा होने वाली थी। वह दुबला-पतला लड़का उसकी तैयारियों में मदद कर रहा था। अपने नोट्स दे जाता और फिर दो-चार दिनों के भीतर आकर ले जाता। अच्छा दोस्त बन गया था, पर कभी उसने उँगली तक से नहीं छुआ। पता नहीं भाई ने क्या देखा! …..किसी से क्या सुना!

     हबि डार्लिंग की नौकरी शादी के तीन-चार महीनों बाद बैंक में लगी। कलेजा कट गया। मन मसोस कर रह गए हबि डार्लिंग। अपने पिता पर बरसे। इन तीन-चार महीनों में क्या बिगड़ रहा था कि बेटा ब्याहने की ऐसी जल्दबाज़ी थी? बड़ा घाटा हुआ। इस बैंक की नौकरी के बाद विवाह होता तो लड़की भी और पढ़ी-लिखी मिलती और कम से कम पाँच लाख का फ़र्क़ तो पड़ता ही। थोड़ी होशियारी बरतते पिता तो यह फ़र्क़ दस लाख तक का हो सकता था। चिरकुटों के घर की बेटी उठा लाए। न पूरा माल-असबाब मिला और न……। औरत भी प्योर नहीं लगती। ज़रूर पहले किसी के साथ….! यह तो बाद में पता चला कि इसके उत्पात के चलते हॉस्टल वालों ने इसे निकाल दिया था। भाई आकर हॉस्टल से ले गया था। सुना है, कसकर कूटा भी था और इसी चलते इंटर का इम्तेहान नहीं दे सकी। गाँव पर घर में ही नज़रबन्द करना पड़ा था इसे। सब भेद पता चला, पर शादी के बाद। संदेह तो शादी के बाद की पहली रात ही हो गया था, पर….। हबि डार्लिंग ने पिता को कोसा। पिता ने अपनी पत्नी को कोसा। और पत्नी यानी, हबि डार्लिंग की माता ने कोसा भाग्य को।

     उन्नीस की उम्र में पहला गर्भ और बेटी का जन्म। नइहर ससुराल, दोनों जगह कुहराम। फिर दूसरी बेटी का जन्म। शोक ही शोक और प्रताड़ना। तीन साल में दो बेटियों का जन्म और लिंग-परीक्षण के कारण दो गर्भपात। ख़ुद दो बेटियों को जन्म देने वाली सासु माँ दूसरी पोती के जन्म का आघात नहीं सह सकीं और लकवा मार गया। व्याही हुई दो बड़ी ननदों ने पक्षाघात का लांछन उसके ऊपर थोप कर अपनी माँ की सेवा-टहल से अपने को बरी कर लिया। लिथड़ती हुई सासु माँ गईं। इस बीच अपनी ममेरी बहन की शादी में वह दूसरे शहर गई। हबि डार्लिंग नहीं गए थे। वहीं, अपनी एक बहन की मदद से उसने कॉपर-टी लगवा लिया। किसी को कानों कान ख़बर तक न हुई। बस्ता छोड़कर अपने घर लौटने के बाद पहली बार, …एक लम्बे अरसे के बाद पहली बार वह प्रसन्न हुई। बैंक के खातों और डिपार्टमेंटल प्रोमोशन के लिए बैंकिंग प्रणाली के ज्ञान अर्जन में उलझे हबि डार्लिंग को उसने ठेंगा दिखा दिया।

     इस बीच श्वसुर गुज़रे। उसे अफ़सोस हुआ। ननदें यदाकदा छापामारों की तरह आतीं और बैंक बाबू से कुछ लूट-खसोट कर चली जातीं। जाते-जाते पलीतों में आग लगा जातीं और हबि डार्लिंग पटाखों की तरह कुछ दिनों तक फटते रहते। समय सरकता रहा और उसने बेटियों को पालते-पोसते हुए इंटर, बीए और उसके बाद उद्यमिता का एक शॉर्ट कोर्स किया। अपना शहर छूट गया था। मकान किराए पर लग गया। हबि डार्लिंग बैंक बाबू से बैंक अधिकारी हो गए थे। बेटियाँ सयानी होकर पुणे और हैदराबाद में पढ़ रही थीं। मुम्बई की पोस्टिंग के बाद इत्मिनान आ  गया था। उद्यमिता का शॉर्ट कोर्स काम आया। उसने अपना छोटा-सा व्यवसाय भी शुरु कर दिया था। दस से ज़्यादा औरतें उसके साथ रोज़गार पर लगी थीं। ज्वालामुखी के दहाने पर बसी गृहस्थी को ज़िन्दगी के गर्भ में उबलते खनिजों का उर्वरक मिला और वह जीवित रही।

     कालबेल की आवाज़ आई। उसने दरवाज़ा खोला। हबि डार्लिंग सामने थे। आसमानी रंग का छोटा ट्राली बैग साथ लिये। वे अपनी निर्धारित यात्रा एक दिन पहले ही समाप्त कर लौट आए थे। यह कोई नई बात नहीं थी। वह अक्सर ऐसा करते और ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा  उसे रँगे हाथ पकड़ने की थी।

     “खाना खाओगे या…..?”

     “या?

     “या खाकर आए हो?”

“तुमने बनाया है क्या खाना? …मैं तो आज आने वाला नहीं था, …तो बनाया किसके लिए था?”

     उसके जी में आया कि कह दे ‘अपने यार के लिए बनाया है’। उसे वह चीनी लोककथा याद आई, जिसमें एक औरत के दरवाज़े पर एक यात्री पहुँचता है और साँकल खटखटाता है। औरत निकलती है। वह यात्री उससे पानी माँगता है। पीठ पर भोजपत्रों के भारी बंडलों का बोझ लादे,  …थका-हारा। वह बहुत प्यासा है। औरत उसे पानी देती है। भोजन के लिए पूछती है। पहले वह सकुचाता है, पर भूखा होने की बात स्वीकारता है। औरत उसे घर के अंदर बैठाती है और भोजन देती है। वह जब जाने को तैयार होता है तो वह उस बोझ के बारे में पूछती है, जिसे वह अपनी पीठ पर ढो रहा है। यात्री बताता है कि वह एक शोधकर्ता है और औरतों के चरित्र के बारे में शोध कर रहा है। अब उसका शोध पूरा हो चुका है और वह वापस अपने नगर जा रहा है। इन बंडलों में औरतों के बारे में जानकारियाँ दर्ज़ हैं। इस बीच उस औरत का पति दरवाज़े की साँकल खटखटाता है। औरत उससे कहती है कि उसका पति बहुत क्रोधी और शक्की है। वह दोनों को मार डालेगा। औरत यात्री को भोजपत्र के बंडलों सहित सामने रखे एक संदूक में छिपा देती है। दरवाज़ा खोलती है। पति दरवाज़ा खुलने में हुई देर के चलते गालियाँ देता है और खाना माँगता है। वह खाना परोसती है। पति सन्दूक पर बैठकर खाने लगता है। वह औरत सन्दूक पर बैठने से मना करती है। पति गालियाँ देते हुए पूछता है कि वह क्यों न बैठे? …क्या उसने सन्दूक में अपने यार को छिपा रखा है? औरत मुस्कुराती है। उसका पति उसी सन्दूक पर बैठ कर खाता है। वह और खाना माँगता है। औरत कहती है कि खाना ख़त्म हो गया। वह चीख़ता है, हरामजादी, यार को खिला दिया क्या? औरत ठठा कर हँसती है और कहती है, हाँ मेरे राजा, अपने यार को खिला दिया। उसका पति गालियाँ देते हुए बाहर चला जाता है। वह यात्री को सन्दूक से बाहर निकालती है। यात्री हत्प्रभ! औरत ने उसके पूरा हो चुके शोध को अधूरा साबित कर दिया है। वह उसका आभार मानते हुए चला जाता है। …… वह मुस्कुराई। बोली – “यार बिना खाए चला गया। उसका हिस्सा बचा है। खाओगे तो गरम कर दूँ।“

     हबि डार्लिंग की भृकुटि तन गई। “बहुत लम्बी होती जा रही है तुम्हारी ज़ुबान। साली, किसी दिन ऐसे कूटूँगा कि ज़ुबान भीतर चली जाएगी और बच्चेदानी बाहर आ जाएगी।“

“तुम बार-बार भूल जाते हो। बच्चेदानी तो कैंसर के डर से तुम्हीं ने निकलवा दिया था। दूसरे अबार्सन के बाद, …छोटी गोद में थी और मैं काॅपर-टी लगवा कर आई थी। तभी जाने क्यों ख़ून आने लगा था और तुम डर गए थे कि कैंसर हुआ तो बहुत पैसे ख़र्च करने होंगे। …….और बेटियाँ छोटी-छोटी थीं, सो मेरा मरना तुम अफोर्ड ही नहीं कर सकते थे, …वर्ना निकलवाते ही नहीं तुम।“ वह हँसी, चीनी लोककथा वाली उस औरत की तरह।

     मारे क्रोध के हबि डार्लिंग दाँत किटकिटा रहे थे। वह फ्रि़ज़ के पास खड़ी उन्हें लहूलुहान होते देख रही थी। कुछ देर चुप रही। थोड़ा सम्भलने दिया उन्हें। अब इस खेल में उसे मज़ा आता था। अब वह अपमान, दुःख, भय और पछतावे से मुक्त हो चुकी थी। उसने कहा – “चिकेन गरम कर देती हूँ, तब तक तुम कपड़े बदल लो। फिर गरम-गरम रोटियाँ सेंक दूँगी। ……दो दिनों से बाहर का खाना खाते-खाते जी ऊब चुका होगा। है न?”

     यह ‘है न’ मारक था। सीधे सीने में जाकर लगा। बोले हबि डार्लिंग – “नहाऊँगा पहले। …..ये साली मुम्बई की धूल…….उमस…..पसीना…..चिपचिप……।“

     “मैं तो नहीं नहाऊँगी आज। अपनी देह की इस गंध के साथ ही सोऊँगी।“ उसकी आवाज़ मद्धिम थी और उसमें संगीत की लयकारी थी।

     “किसकी गंध?”

“परफ़्युम की।“ उसने बात बदल दी।

“कहाँ गई थी परफ़्युम लगा कर?”

     “यार से मिलने। तुम्हारी तरह बदबू करते हुए नहीं जाती मैं अपने चाहनेवालों के पास।“ फिर एक तीखी मुस्कान थी उसके साथ।

     “लात खाओगी आज तुम।“

     “आओ।“ झुक कर फ्रि़ज़ से चिकेन निकालते हुए मुड़ कर देखा उसने। हबि डार्लिंग जा चुके थे, …कपड़े बदलने…..नहाने।

     बेटियाँ जल्दी ही समझदार हो जाती हैं। चाहे कितनी भी धूल-धक्कड़ हो या कितना भी घना हो कुहासा,छिपकर काँपते सच तक उनकी आँखें पहुँच ही जाती हैं। देखने और सूँघने की कला में माहिर होती हैं बेटियाँ। पीठ पीछे चिपकी आँखें भी देख लेती हैं वे और होनी-अनहोनी की उस हर गंध को भी सूँघ लेती हैं जो घात करने के इंतज़ार में ठिठकी या छिपी होती है। समझदार होती बेटियों के सामने अच्छे और ताक़तवर पिता की छवि बनाए रखने की लालसा ने हबि डार्लिंग को कुछ दिनों के लिए विवश ज़रूर किया था,पर भीतर ही भीतर गाँठें बढ़ती जा रही थीं। और वह इस शहर को जागते-सोते,…दौड़ते-भागते, …घिसटते-लिथड़ते, …रोते-हँसते, ….गाते-विलाप करते हुए देखकर अपनी आत्मा की गाँठ का रेशा-रेशा खोल रही थी। शहर सिखाए कोतवाली,सो मुम्बई ने उसे हिम्मत और हिकमतें दोनों दी। उसने हबि डार्लिंग को पटा कर पहले अपना व्यवसाय शुरु किया। हबि डार्लिंग इतने भोले भी नहीं थे कि पट जाते। उन्होंने सोचा,उद्योंगों के लिए करोड़ों का कर्ज़ स्वीकृत करने के एवज में होने वाली कमीशन की काली कमाई को सफ़ेद करने के लिए पत्नी का व्यवसाय ढाल की तरह काम आयेगा,सो उन्होंने सहजता से सब स्वीकार किया था। कमर तक लटके केशों को सबसे पहले कटवाया था उसने और उन्हें इतना छोटा करवा लिया था कि वे किसी मुट्ठी की ज़द में न आ सकें। उसने अपने हबि डार्लिंग को आप कहना छोड़ कर तुम पुकारना शुरु किया। सम्बोधन के इस बदलाव ने पलक झपकते बहुत कुछ बदल दिया था उसके भीतर। उसने अपनी कमाई से कुछ शिफौन की साड़ियों की ख़रीददारी की। डीपकट,स्लीवलेस,बैकलेस ब्लाउज़ बनवाया। फ़्लोरल प्रिंट के कुछ ब्रा और पैंटीज़ भी लिया। बेटियों के साथ जाकर  कुछ जींस की पतलूनें और स्कर्ट्स  के साथ नए डिज़ाइन की जूतियाँ ली। माँ के इस कायांतरण से बेटियाँ आह्लादित थीं। पहले बड़ी बेटी पढ़ने पुणे गई। इसके अगले साल छोटी गई हैदराबाद। मुम्बई में अपनी माँ को अपने पिता के हवाले छोड़कर बेटियाँ चिन्तित थीं। छोटी के चले जाने के बाद तो बड़ी बेटी शुरु में काफी परेशान रही थी। बार-बार पुणे से भाग कर आती। पिता की फटकार सुनती। जब तक छोटी मुम्बई में थी,उसे भरोसा था कि पिता उसकी उपस्थिति का लोक-लाज रखेंगे,पर उसके जाते ही वह बेचैन रहने लगी थी। उसने बहुत धीरज के साथ बेटियों को भरोसा दिलाया था कि वह सुरक्षित है। हबि डार्लिंग ने भी सोचा था कि दोनों के जाने के बाद, …पर इस बीच उसने अपने को अपने भीतर जनमा ही नहीं लिया था बल्कि,पाल-पोस कर बड़ा भी कर लिया था।

     हबि डार्लिंग स्नानघर से तरोताज़ा होकर निकले। स्लिपिंग सूट पहना। ज़ुल्फ़ों में कंघी फिरा कर कई कोणों से अपने को देखा। डाइनिंग टेबल पर आकर बैठे। उसने खाना टेबल पर लगा दिया था। आठ-दस की जगह अब तीन  रोटियाँ ही खाते हैं हबि डार्लिंग। भाप से भरी आख़िरी रोटी प्लेट में डाल कर वह बेडरूम में चली गई। जाते-जाते कहती गई – “जूठे बर्तन सिंक में डाल देना।“

     वह बिस्तर पर थी। लस्त-पस्त। अक्सर ऐसा होता कि वह ध्वंस करती और हरहरा कर गिरते मलबे में ख़ुद ही दब जाती। सारा गर्दो गुबार उसकी आत्मा में भर जाता। ध्वंस की आवाजें बहुत देर तक अपनी बोझिल प्रतिध्वनियों के साथ उसके भीतर भाँवर काटती रहतीं। उसके हृदय की धमनियों का रक्त-प्रवाह इतना तेज़ हो जाता कि वे फटने-फटने को हो आतीं।

    “दम साधे क्यों पड़ी हो?” अपने चिर-परिचित सवाल के साथ हबि डार्लिंग ने शयन-कक्ष में प्रवेश किया।

     उसने आँखें खोल कर निमिष भर को देखा और फिर आँखें बन्द कर ली। वह बचना चाहती थी। वह अभी हर तरह की अयाचित स्थितियों से पीछा छुड़ाना चाहती थी। आँखें बन्द किए हुए धीरे से उसने कहा – “सो जाओ। ……थके होगे।“

“मैं नहीं थका हूँ। तुम्हारे पास मुझे थका देने का हुनर ही नहीं है।“ यह शिकायत नहीं दर्प था।

     वह चाहती थी थोड़ी देर पहले अपने रन्ध्रों में उमगते उस गंध की वापसी। …….वह चाहती थी गमक से आलाप में वापसी के बाद के षड़ज-स्वर की अपनी षिराओं में गूँज। ……वह चाहती थी आनन्द के उस हिंडोले से उतरने के बाद की विश्रांति का स्वप्निल सुख। …..वह चाहती थी उन सारे सुखों की वापसी, जिन्हें वह उसे सौंप गया था। वह आँखें बन्द कर अँधेरे में उस प्रकाश-वलय को खोज रही थी जिसकी दीप्ति में वह कुछ देर पहले तक डूबी हुई थी। पर क्या यह सम्भव था? वह अँधेरे में हाथ-पाँव मार रही थी कि कोई सिरा पकड़ में आ जाए कि यह आज की रात कटे, पर उसके हबि डार्लिंग उसके सौंपे सारे सुखों को चाट गए थे। उसके लिए सब कुछ अछोर था और वह बिस्तर पर बगल में अपने हबि डार्लिंग के होते हुए भी अकेली थी। कुछ ही घन्टे बीते थे कि वह उसके साथ था। उसका सुख उसके साथ था। …….कि वह एक जीवित लोक में भरा-पूरा जीवन जी रही थी। पर अब सब बदल चुका था। वह गया। यह अंदेशा उसे जल्दी लेकर चला गया कि कोई आ रहा है। उसके जाते ही पौधों पर बे-आवाज़ रेंगते हुए पत्तों-फुनगियों को चाट जाने वाले कीड़े की तरह हबि डार्लिंग आए और चाट गए सारा सुख। उसे अपने दुःखों, …अपनी पीड़ा, …अपने अकेलेपन के लिए इत्मिनान नहीं था। होता तो वह इसमें ही अपना सुख तलाश लेती। उसे ऐसे पलों में यही लगता कि मानो वह ख़ुद अपने को चबा रही है। ……कि उसके जीवन का सारा  सत्त चूस गए हबि डार्लिंग और वह अपनी ठठरी चबा रही है।

     अपनी अम्मा की मृत्यु से ठीक पहले वह अंतिम बार नइहर गई थी। बिछावन पर संज्ञा-शून्य पड़ी थीं अम्मा की असमय बूढ़ी हुई देह । अपनी लकवा ग्रस्त उस देह की ठठरी चबा रही थी अम्मा, जिसका सत्त जब तक जीते रहे, पिता चूसते रहे। अपने चेहरे पर भिनभिनाती मक्खियों को उड़ाने की ताक़त भी नहीं थी अम्मा के उन हाथों में, जिन हाथों से वे उसके केश सँवारा करती थीं। अम्मा टुकुर-टुकुर उसे निहारती रही थीं। भाई और भावज को अपने राजकाज से फु़र्सत नहीं थी। अम्मा को एक फालतू सामान की तरह घर के पिछवाड़े वाले बरामदे में फेंक दिया गया था। उसकी बेटियाँ साथ थीं। बड़ी होने के बाद पहली बार वे अपनी नानी को देख रही थीं और वह भी मृत्यु-शय्या पर। मरणासन्न। वह चाहती थी रुकना, पर हबि डार्लिंग ने कुछ घन्टों की मोहलत दी थी। वह चाहती थी अपनी अम्मा को साथ ले जाना, पर हबि डार्लिंग पहले ही चेतावनी जारी कर चुके थे। भाई जाने भी नहीं देता क्योंकि उसके भीतर यह डर कुंडली मारे बैठा था कि कहीं अगर किसी कागज़ पर अम्मा  के अँगूठे का निशान ले लिया किसी ने तो……! वह अम्मा की मृत्यु के लिए प्रार्थना करती हुई लौटी। लज्जित। …….पराजित। पराजित होकर तो वह पहली ही बार अपने नइहर से विदा हुई थी। वह लौटते हुए अपनी बेटियों से आँखें चुराती रही थी। अपनी अम्मा को असहाय छोड़कर लौटते हुए उसके पास अपनी बेटियों की आँखों में अपने लिए आश्रय तलाशने का साहस नहीं बचा था।

     जब-जब उसने अपने लिए साहस सँजोना चाहा बरसात में भींगी गाय की तरह थरथरा कर रह गई। जब-जब कसाई के ठीहे पर ज़िबह के लिए चढ़ी उसकी आँखों में भय और करुणा की काली छाया लरज़ती रही। पहली बार जब भाई ने हाॅस्टल के बेटिंग रुम में उसे उसकी सहेलियों के सामने पीटा, …कदम्ब के उस पार खड़ी उस साँवले लड़के की छाया निहारती हुई जब उसे भाई ने पकड़ा और कदम्ब को ही काट डाला, तब भी वह काँपती रही केवल। …..उसके कानों में भावज का गाया यह गीत गूँजता रहा कि ‘आवहू ननदोइया….पलंग चढ़ी बइठहू…..कचरहू मगही पान/अपना रंगीलिया के डंड़िया फनावहू….ले जाउ बैरन हमार’ और एक दिन भाई बारात बुला लाया। हबि डार्लिंग आए और वह मिमियाती हुई चली आई उनके साथ। नित नए बहाने, …कभी बोल और व्यवहार से आत्मा छिलती तो कभी हबि डार्लिंग के लात-जूतों से देह छिलती, पर वह हँकर-डँकर कर रो भी नहीं पाती।

     हबि डार्लिंग की हथेलियाँ उसकी देह टटोल रही थीं। वह दोनों टाँगें और बाहें छितराए चित पड़ी थी। उसकी देह की तमाम कोशिकाएँ हबि डार्लिंग के छूते ही रेत कणों में तब्दील हो गई थीं। जलविहीन, …सूखी हुई, …रेत भरी नदी की तरह बिछी रही वह। तेज़ आँधी की तरह बहते रहे हबि डार्लिंग और उड़ते रहे रेत के बगूले। वह चाहती थी कि इतनी रेत उड़े कि हबि डार्लिंग का मुँह, …नाक, …कान ही नहीं….फेफड़ा तक भर जाए रेत से। हूँफते हुए अलग हुए हबि डार्लिंग। एक भद्दी-सी गाली उछाल कर वाशरुम में घुस गए। वह वैसे ही पड़ी रही अपने अंग-अंग में रेत के ढूह लिये। हबि डार्लिंग वाशरुम से बाहर निकले और बालकनी में जाकर सिगरेट फूँकने लगे।

     वह सोच रही थी रात और दिन में इतना फ़र्क़ क्यों होता है। दिन में दुनिया के झमेले, पर दिन न बढ़ते हैं, न सिकुड़ते हैं। …और रातें कभी पलक झपकते बीत जाती हैं, …दूब की नोक पर टिकी ओस की तरह भाप बन कर उड़ जाती हैं और कभी सुरसा के मुँह की तरह ऐसे फैल जाती हैं कि सब कुछ समा जाता है उनमें। …….और उस रात, …जब गरजते हुए हबि डार्लिंग ने कहा था – “ …हाँ, अय्याषी करने गया था मैं। ……और अक्सर जाता हूँ। कभी लोनावाला, तो कभी खंडाला, …और कभी पुणे। तुझ जैसी लाश के साथ सो-सो कर उकता चुका हूँ मैं। …….तू तो इस लायक़ भी नहीं कि कहीं जाकर अय्याशी कर सके। कुतिया साली,  बस टाँगे छितराकर पड़ जाना जानती है। …….. पर मैं तुझे छोड़नेवाला भी नहीं। मैं भी तुझे कुत्ते की तरह नोचता-खसोटता रहूँगा। चैन से नहीं जीने दूँगा तुझे।………”

     उस रात का बलात्कार, पिछले सारे बलात्कारों पर भारी था। पर उसी रात पहली बार साहस का बीज अँखुआया था उसके सीने में। उस रात वह रोई नहीं। ……और उसके बाद कभी नहीं रोई। रातें बदलती रहीं दिन में और दिन बदलते रहे रातों में। साँझ और सुबह आती-जाती रहीं। हँसना और रोना, दोनों क्रियाओं का उसके जीवन से लोप हो चुका था। बेटियाँ आतीं, तो पता चलता कि सुबह हुई या साँझ आई। वह बेटियों के सुकून और आश्वस्ति के लिए मुस्कुराती। बेटियाँ लौटतीं और वह उनके फिर आने की आस की डोर थामे डोलती फिरती दिन और रात के बीच, …सुबह और साँझ के बीच।

     ऐसी ही एक साँझ मिला था वह। उसके लिए मुम्बई के जनसमुद्र में एक हरे-भरे द्वीप की तरह उभर आया था वह। उसे देखते ही जाने क्यों पल भर के लिए उसकी आँखों में कई दृश्य भर गए थे। उस दुबले-पतले साँवले लड़के की छवि कौंध गई थी। हाॅस्टल के गेट पर हाथ में नोट्स की कापियाँ लिये खड़ा दिखा था वह। ……उसके घर के सामने कदम्ब की ओट में थोड़ी दूर खड़ा बेचैन आँखों से उसे ढूँढ़ता हुआ दिखा था वह। ……यह उसका मतिभ्रम था, पर वह इसमें खोई रही थी कुछ पलों तक।……. छोटी हैदराबाद से आई थी। वह छोटी के साथ एक बुक-शॉप में थी। वहीं मिला था वह पहली बार। क़िताबों की रैक से अपने लिए क़िताबें चुन रहा था कि…….। वह उसे लगातार निहार रही थी। पहले तो झिझका वह। फिर मुस्कुराया। दुबला-पतला, …मँझोला कद, …उमगती हुई बड़ी-बड़ी आँखें, …करीने से सँवारी हुई जुल्फें और चेहरे पर काली-सफ़ेद बेतरतीब घनी दाढ़ी। छोटी क़िताबों के रैक में उलझी थी और वह उसके जादू में। वह पास आया। उसने हैलो किया। वह लरज़ उठी।

     “कौन सी क़िताब ढूँढ़ रही हैं आप?” हौले से पूछा था उसने।

     उसके जी में आया कह दे कि ‘तुम्हें ही ढूँढ़ रही थी। …….कहाँ गुम हो गये थे?”, पर वह चुप रही।

     “मैं आपकी मदद करूँ……क़िताब ढूँढ़ने में?”

“…बेटी के साथ हूँ। वो अपने लिए क़िताबें ले रही है…..वहाँ……वो सामने वाली रैक के पास……” बड़ी मुश्किलों से वह कह सकी।

      “कल मिलते हैं।….यहीं……इसी समय। ….आपके लिए क़िताबें ढूँढ़ कर रखूँगा। मैं तकरीबन रोज़ ही आता हूँ यहाँ।“ उसका स्वर संयत था और दृढ़ भी।

     लरज़ रही थी वह। पता नहीं, यह भय था या रोमांच! डसके होंठ काँपे “नहीं….। कल नहीं।“

     “परसों। ….मैंने कहा न कि तकरीबन रोज़ ही आता हूँ यहाँ।  संडे छोड़ कर।“

     “हूँ” उसने हुँकारी भरी। कंठ में फँसी इस हुँकारी को छाती में उमड़ती…. बेक़ाबू होती धड़कन ने बाहर धकेल दिया था।

     “थैंक्स!” कहते हुए वह आगे निकल गया। वह उसे निहारती रही। उसने पीछे मुड़कर देखा। मुस्कुराया। और एक रैक में लगी किताबों की ओट से उसे निहारता रहा। छोटी उसके पास आ चुकी थी।

     दूसरे दिन छोटी हैदराबाद गई। तीसरे दिन उसने आने के लिए हुँकारी भरी थी, पर गई नहीं। चौथे दिन सन्डे था। पाँचवे दिन वह अपने को रोक नहीं सकी थी। सोचा था कि बस एक मिनट के लिए उस बुक शॉप में जाएगी। अगर वह नहीं रहा, तो इंतज़ार नहीं करेगी। वापस लौट आएगी। ……और अगर मिल गया तो!

…वह गई। वह था। बुक-शॉप के दरवाज़े के पास वाली क़िताबों की रैक में अनमना-सा कुछ ढूँढ़ता हुआ। बार-बार अपनी आँखों से किसी के आने की आहट को टेरता हुआ।

     वे दोनों बुक-शॉप से बाहर निकले। एक कैफे में गए। उसी दिन उसने अपने फोन में उसका नम्बर दर्ज़ किया और नाम की जगह लिखा – “माय लव”। इसके बाद वह लगातार अपने माय लव से मिलती रही। कभी कैफे में, …कभी रेस्तराँ में, …कभी समुद्र तट पर। वह टहलती रही उसकी बाहों में बाहें डाल कर। कभी साथ खाना खाया …..और कभी थिएटर में साथ फ़िल्म देखा। ……..वह सालों पहले उत्तरप्रदेश के एक क़स्बे से मुम्बई आया था। फ़िल्मों के जादू ने उसे इस मायानगरी तक खींच लिया था। वह ख़ूब पढ़ता था। कविताएँ लिखता था। नाटक करता था। वह सेल्युलाइड पर कविताएँ लिखना चाहता था, सो अपना क़स्बा छोड़कर मुम्बई आ गया। वह अब तक तीन अच्छी, पर असफल फ़िल्में बना चुका था। इस बीच बमुश्किल वह अपने लिए एक कमरे का फ्लैट अर्जित कर पाया था।

     माय लव ने उसकी ज़िन्दगी बदल दी थी। वह सपने देखने लगी थी। वह कल्पनाओं के पंख लगाकर निभृत आकाश में उड़ान भरने लगी थी। माय लव को याद करते ही उसकी देह हिंडोले भरने लगती। आज पहली बार वह उसके घर आया था, …उसके बुलावे पर। अकूत धैर्य था उसके पास। यह धैर्य उसने अपनी असफलताओं से अर्जित किया था।

     …आज माय लव का यूँ लौट जाना उसे वेध गया था। अचानक उस युवा कदम्ब के कट कर गिरने से उपजी पीड़ा की तरह यह पीड़ा भी असह्य हो चली थी उसके लिए।… सिगरेट फूँक कर बिस्तर पर वापस आ चुके थे हबि डार्लिंग और खर्राटे भर रहे थे। …….और वह कमरे की नीम रोशनी में उभरते माय लव के चेहरे को निहार रही थी। उसकी साँसें उसके भीतर नई इबारतें लिख रही थीं……. कि वह अब हबि डार्लिंग के ख़ौफ़ से अपने माय लव को विदा नहीं करेगी। बेटियों के ख़ुदमुख़्तार होने में कुछ ही समय शेष है। तब तक सारे छल करेगी और अपने आँचल की ओट में बचाए रखेगी प्यार और लालसाओं की इस लौ को। ……और एक दिन हबि डार्लिंग के मुँह पर थूक कर उन्हें अय्याशी और प्यार का फ़र्क़ बताएगी। ……उसने बगल में पड़ा मोबाइल फ़ोन उठाया। कान्टैक्ट में जाकर हवि डार्लिंग को ढूँढ़ा। एडिट मोड में गई। केवल हबि रहने दिया और डार्लिंग को डिलीट किया।

‘कथादेश’ से साभार

सम्पर्क: 094310 72603,  099734 94477

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One comment

  1. मेरा नाम संदीप है
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    मुझे उम्मीद है कि आप आगे भी अच्छी-अच्छी चीजें लाते रहेंगे
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