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बचपन की मोहब्बत की जवान कहानी

मेरे हमनाम लेखक प्रभात रंजन के उपन्यास ‘विद यू विदाउट यू’ की तरफ लोगों का ध्यान गया. इस उपन्यास की शायद यह पहली ही समीक्षा है. वह भी इतनी विस्तृत और गहरी. लिखी है पंकज कौरव ने- मॉडरेटर
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हाल ही में प्रकाशित लोकप्रिय शैली का उपन्यास विद यू विदाउट यू पढ़ना शुरू करते ही पता नहीं क्यों लता मंगेशकर की आवाज़ के साथ एक पुराना तराना ज़हन में गूंजता रहा, ‘बचपन की मुहब्बत को दिल से न जुदा करना, जब याद मेरी आये मिलने की दुआ करना.’ जो जवानी में भी याद रहे उसे ही शायद बचपन की मोहब्बत कहते होंगे क्योंकि बचपन में कभी किसी को ऐसी टीस वाला प्रेम हुआ भी है भला? पेशे से एक इंजीनियर रहे प्रभात रंजन का यह पहला उपन्यास है और अपनी इसी कोशिश के साथ गैर-साहित्यिक पृष्ठभूमि से आये नए लेखकों के बीच उनकी आवक दर्ज हो गई है.
 
हालांकि विद यू विदाउट यू कुछ मामलों में एक अलग तरह की दस्तक है. इसकी अनदेखी न कर पाने की वजह अव्वल तो यही है कि उपन्यास में किस्सों और किस्सागोई पर ज़ोर न देकर लेखक ने सिर्फ एक कहानी कहने की कोशिश की है. एक ऐसी त्रिकोणीय प्रेम कहानी जो बचपन के उन दोस्तों और प्यार करने वालों को अपनी सी लग सकती है, जो सालों पहले किसी स्कूल में साथ पढ़े हों और फिर अचानक नौकरी करते हुए एक ही दफ्तर में मिल जाएं या कभी दो जिगरी दोस्तो ने एक ही लड़की से प्रेम किया हो और फिर उनमें से किसी एक की नीयत में खोट आ जाये. आसपास देखी सुनी सी इन बातों के बीच जो बात सबसे ज्यादा चौकाती है, वह है इस उपन्यास के ज़रिए पुरूषों के वे तमाम पितृसत्तात्मक झद्म उघड़ते जाते हैं जो कभी स्त्रियों को लेकर यौन सुचिता में उलझे रहते हैं तो कभी साथ सिगरेट या शराब पी लेने वाली स्त्री को सर्वसुलभ मान बैठने की भूल कर जाते हैं.
 
महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे मुद्दे किसी भाषण के तौर नहीं बल्कि उपन्यास के दो ऐसे प्रमुख घटनाक्रमों के माध्यम से सामने आते हैं, जो कहानी की दशा और दिशा में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. हालांकि यह अलग बात है कि विद यू विदाऊट यू की कहानी भी मुकम्मल होने से रह जाती है. कहानी के अपने कमज़ोर पक्ष भी हैं जिनपर आगे बात होगी. पहले संक्षेप में आपको कहानी के उस दिलचस्प मोड़ तक पहुंचा दिया जाये जिसके आधार पर इस उपन्यास का पूरा ताना-बाना बुना गया है. लखनऊ की एक पॉश कॉलोनी में अपने माता पिता और दो छोटे भाइयों के साथ रहने वाले निशिन्द की बचपन की सबसे सुनहरी याद है उसकी चार-पांच साल की हमउम्र दोस्त रश्मि. पड़ोस में रहने वाली रश्मि को वह हमेशा रमि कहता आया है. रमि के साथ वह बचपन की दहलीज़ पार कर किशोरावस्था तक पहुंचा है. रमि के अलावा निशिन्द की यादों में बचपन के एक और दोस्त आदित्य से जुड़ी स्मृतियां भी हैं. खासकर एक ऐसी स्मृति जो शूल की तरह उसके जहन में अब तक गड़ी हुई है. दरअसल वह भले ही रमि को पसंद करता है लेकिन रमि का झुकाव निशिन्द के दोस्त आदित्य की ओर है. आदित्य भी रमि से प्रेम में है और वह अपनी बात रश्मि तक पहुंचाने के लिए निशिन्द को ज़रिया बनाता है. निशिन्द असमंजस में रहते हुए ज़रिया बन भी जाता है, लेकिन ऐन मौके पर उसके भीतर वही कुटिलता जाग जाती है जो अपने तो अपने सबके प्यार को बेज़ार कर देती है. निशिन्द आदित्य का ग्रीटिंग कार्ड वाला प्रेम-संदेश जानबूझकर रश्मि के माता-पिता के सामने उस तक पहुंचाता है, जिससे आदित्य का भेद खुल जाये. परिणाम उसके अंदाज़े से भी भयानक होता है, रश्मि के घरवाले पहले मुहल्ला छोड़ते हैं फिर शहर ही छोड़कर चले जाते हैं. अब सारी कहानी का दारोमदार निशिन्द के अपराध-बोध पर टिका है. इस अपराधबोध में वह तब भी है जब वह मुंबई की एक मार्केटिंग कंपनी में नौकरी कर रहा है, और बॉस के तौर पर उसके सिर पर फिर एक रश्मि देसाई है. क्या यह वही बचपन वाली रश्मि है? इसका भेद जान पाना ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती है. साथ ही अपने अपराधबोध से निकलने के लिए वह आदित्य को दोबारा रश्मि के सामने लाने की बात ठान लेता है. जिन्हें कभी नादानी में अलग करने की उसने कोशिश की थी अब उन्हें मिलाने की कश्मकश कहानी को आगे बढ़ाती है. वह अपनी कोशिश में कितना कामयाब होता है? यही जानने की अकुलाहट इस उपन्यास को आगे पढ़ते जाने के लिए प्रेरित भी करती है.
 
लेकिन पूरी कहानी की राह में कई संकट भी हैं. सबसे बड़ा संकट यही है कि गुनाहों का देवता जैसी भावुकता आज के युवावर्ग को उतना आकर्षित नहीं करती. आज का युवा व्यवहारिक ज्यादा है. हां प्रेम त्रिकोण जरूर पाठक को बांधकर रख पाने में कुछ कामयाब होता है. इस संकट से उबरने के बाद जल्द ही एक दूसरा संकट कहानी को जकड़ लेता है, वह है निशिन्द का बचपन की रमि और अपनी बॉस रश्मि देसाई में अंतर न कर पाना. यह असमंजस कुछ एक अध्याय तक सीमित रह जाता तो शायद आसानी से गुज़र जाता और पाठक के मन में नहीं अटकता लेकिन रमि को पहचाने जाने का इंतज़ार लगभग उपन्यास खत्म होने पर पूरा होता है.
 
निश्चित तौर पर अच्छे संपादन की कमी विद यू विदाउट यू में खूब खटकती है. बेहतर संपादन उपन्यास की लंबाई कम करने के साथ-साथ उसे अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावशाली बना सकता था. अब इसे लोकप्रिय साहित्य छापने के लिए उतावले हो रहे प्रकाशकों की संपादकीय कंगाली ही कहा जाये या कुछ और? जो नए लेखकों को बिकने वाला साहित्य लिखने के लिए तो उकसाते हैं लेकिन वह सब कैसे लिखवाया जाये इस बात की उन्हें तमीज़ नहीं. न तो उनके संपादक मंडल में बाज़ार विशेषज्ञ संपादक हैं और न ही इसे लेकर कोई रणनीति. पहले तो खुद किस्सागोई में किस्सों की भरमार करवाते हैं और न बिकने पर सारा दोष लेखक पर डाल अपना पल्ला झाड़ जाते हैं.
 
खैर इस सब के बावजूद अगर आपने हाल फिलहाल प्रकाशित हुए लोकप्रिय उपन्यास पढ़े और सराहे हैं तो यह किताब आपको निराश नहीं करेगी. विद यू विदाउट यू निश्चित तौर पर एक स्तरीय रचना कही जा सकती है. बोलचाल की आम भाषा के नाम पर अशोभनीय भाषा का प्रयोग कतई नहीं हुआ है और उससे भी अहम बात यह कि आपको किसी तरह की अशिष्ट भाषा की कमी यहां बिल्कुल नहीं खलती.
 
कुल मिलाकर कहानी में तार्किकता की थोड़ी बहुत कमी के बावजूद यह एक पठनीय लोकप्रिय उपन्यास है. क्योंकि प्रेम में तर्क की जगह नहीं होती, जैसे कि दुनिया की तमाम प्रेम कहानियों में तर्क की अनिवार्यता नहीं ही रही है. प्रेम करने की कोई तय उम्र भी नहीं होती, जैसा कि अक्सर हमारे आसपास दिख भी जाता है. पर इतना जरूर है कि अपरिपक्व उम्र में पढ़ी हुई प्रेम कहानियों के रंग अगर बढ़ती उम्र के साथ बरकरार रह पायें या गाढ़े होते चले जायें तो समझ लेना चाहिए कि कहानी अमर प्रेम की दास्तान बनने की राह पर आगे बढ़ गई है. अकारण नहीं है कि धर्मवीर भारती का उपन्यास गुनाहों का देवता परिपक्व हो चुके ज्यादातर लोगों को अब उतना नहीं भाता जितना जवानी की दहलीज़ पर भाता रहा है. दरअसल यही वो फर्क़ है जो प्रेम कहानियों को निरी भावुकता से अलग एक सार्वभौमिक दृष्टि से मूल्यांकन के लिए विवश करता है. अब तक आ चुकीं और आगे आने वाली तमाम दास्तानें इस कसौटी से होकर गुज़रेंगी. गुज़रती रहेंगी.
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पुस्तक – विद यू विदाउट यू
 
विधा- उपन्यास
 
प्रकाशक- स्टोरी मिरर
 
कीमत- 250 रूपये
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