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मनमोहन देसाई और उनका सिनेमा

मार्च महीने की पहली तारीख़ को मनमोहन देसाई का निधन हुआ था. आज महीने की आखिरी तारीख़ पर सैय्यद एस. तौहीद का यह लेख उनकी फिल्मों के कुछ सूत्रों की अच्छी व्याख्या करता है लेकिन सम्पूर्णता में नहीं. एक बार कमलेश्वर ने अपने एक इंटरव्यू में यह कहा था कि मनमोहन देसाई अगर अपनी फिल्मों में यह दिखाते थे कि शिर्डी के साईँ बाबा के दर्शन से आँखों की रौशनी लौट आती है तो वे इस बात में विश्वास करते थे. आम आदमियों तरह विश्वास की यही जमीन उनकी फिल्मों की ताकत थी जो हमें तर्क की जमीन पर उलजुलूल लगती रहीं. खैर, फिलहाल तौहीद का यह लेख- मॉडरेटर

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मार्च में हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय हस्ताक्षर मनमोहन देसाई की पुण्यतिथि पड़ती है। एक ऐसा फिल्मकार जो बहुत जल्दी दुनिया छोड़ गया। फिल्मों को उन्हें अभी बहुत कुछ देना था। एक कसक सी बाक़ी रह गई कि काश कुछ बरस और जिंदा रह पाते। मनमोहन देसाई के चाहने वाले उन्हें ख़ास अंदाज़ के लिए याद करते हैं। आपकी फिल्में Signature treatment के बिना मुकम्मल नहीं थी। मनमोहन देसाई ने प्राथमिकताएं काफी पहले ही बना ली थी। जिसके उदाहरण फिल्म दर फिल्म निखर कर आये, किसी में ज्यादा तो किसी में कम। रचनात्मक कार्य को signature work बनाना उनसे सीखना चाहिए।  उनके कहानी बनाने के स्टाईल को समझने के लिए फिल्मों से गुजरना होगा। सरसरी निगाह में मनमोहन की पहली फिल्म ‘छलिया’ व सत्तर से अस्सी दशक में रिलीज हुई उनकी बडी हिट फिल्मों में बडा अंतर नज़र आता है। श्वेत-श्याम समय में बनी छलिया तीन मुख्य व दो सहायक किरदारों वाली एक त्रिकोणीय कहानी थी। फिल्मकार की बडी लोकप्रिय फिल्मों की तुलना में पहली फिल्म सीमित किरदारों की कहानी कही थी। बाद की फिल्मों में मनमोहन ने प्लाट के भीतर सहायक प्लाट फिर सहायक के साथ उसका सहयोगी प्लाट रचने का कमाल कर दिखाया। छलिया में पचास दशक की फिल्मों की आत्मा थी। इसमें कथा व कथन को सर्वाधिक महत्व मिला। फिल्म में अति नाटकीयता को जगह  नहीं मिली व हास्य प्रसंग भी हवा की झोंके की तरह इस्तेमाल हुए। फिर भी कहना होगा कि मनमोहन देसाई की पहली फिल्म में उनका हस्ताक्षर जरूर था। यह बातें उनकी बाद की लोकप्रिय फिल्मों से गुजरते हुए समझ आती है। छलिया के हृदय में विभाजन की त्रासदी व उसके साथ घटित हुए साम्प्रदायिक संघर्ष का हिस्सा है। हिन्दू युवती शांति (नूतन) विभाजन बाद खुद को पाकिस्तान में पाती है। शांति यहां एक बच्चे को जन्म देती है। लडके का नाम अनवर रखा गया व उसकी परवरिश मुसलमानों की तरह हुई। उस बालक में भी ‘अमर अकबर एंथोनी’ के अकबर समान दो धर्मों का एकाकार था। आप उसकी तुलना ‘नसीब’ के जान जानी जनार्दन से भी कर सकते हैं।  पत्नी के चरित्र पर संदेह करते हुए अनवर के पिता (रहमान) उसे अपनी संतान मानने को राजी नहीं। पत्नी पर नाजायज रिश्तों का इल्जाम लगाते हुए उसे कबूल नहीं करता। अपने घर व दुनिया में जगह नहीं देता। शांति की पीडा में हमें मां सीता का किस्सा याद आएगा। फिल्मों की कहानियों में महाग्रंथों का प्रभाव मनमोहन देसाई को हिंदी सिनेमा की परंपरा में स्थान दे गया। बेघर शांति को छलिया (राजकपूर) में दुख बांटने वाला साथी मिल जाता है। राज साहेब का यह किरदार बहुत हद तक श्री 420 के किरदार ‘राजू’ का विस्तार था।

एक दमदार सीन में साम्प्रदायिक कलह के बडे संकट को बडी बहादुरी से निकाल दिखाया था। बालक अनवर हिन्दू मित्रों की भीड का हिस्सा होकर एक गुजरते हुए पठान पर पत्थरबाजी करता है। वह उस कलह का हिस्सा बन कर अनजाने में पठान में परवरिश करने वाले को घायल कर बैठा। पठान का चेहरा देखकर अनवर को अपने कृत्य पर ग्लानि हुई…क्योंकि इसी आदमी ने उसकी परवरिश  पिता तरह की थी। यही वो इंसान था जिसे वो खुदा से बढकर तस्व्वुर करता था। घायल अकबर खान (प्राण) की हालात देखकर अनवर वहीं से साम्रदायिकता को हराम मान लेता है। इसकी गंभीरता उसके दुखमय विलाप में देखी जा सकती है। मनमोहन की फिल्मों में एक दूसरा अत्यंत भावनात्मक उदयीमान किरदार मां थी। इन कहानियों में मां हमेशा बच्चों से बिछड जाती थी। मां-बच्चे को एक दूसरे की कमी काफी टीस दिया करती थी। इस नजरिए से फिल्म कहानी का एक सुखात्मक समापन आवश्यक मालूम देता था। अनवर बचपन में अपनी मां से बिछड गया था। कहानी के बडे हिस्से में उसे अपनी बिछडी मां की कसक रही। जिस स्कूल में अनवर पढ रहा था वहां उसके असल पिता (रहमान) को संयोगवश अध्यापक दिखाया गया।  एक रिडींग क्लास के दरम्यान अध्यापक उसे मां पर आधारित पाठ पढने को बुलाते हैं। पाठ की संवेदना से गुजरते बालक अनवर टूट कर बिलख पडा…ज़ार ज़ार आंसू था। बालक की पीडा देखकर उसके अध्यापक पिता के दिल में संतान को लेकर हृदय परिवर्तन घटित हुआ । संतान के प्रति पुरानी नफरत को भुलाकर पिता उसे सहारा देने को बाध्य था। लेकिन यहां अनवर में ‘आ गले लग जा’ के राहुल का अक्स नजर आया। वो पिता के प्यार को मां को भी प्यार का हक़ देने की मांग पर ठुकरा गया। उसे खुद से ज्यादा मां का सुख प्यारा था।

मनमोहन देसाई के कुछ हीरो ‘इश्क के मारे बेचारे’ की हद तक रूमानी थे। आप ‘आ गले लग जा’ के प्रेम (शशि कपूर) या फिर ‘धर्मवीर’ के धर्म का यहां जिक्र कर सकते हैं। छलिया की रूमानियत भी बेबाक किस्म की रही। उसमें इंसानियत व वफादारी के मूल्यों के प्रति सम्मान यह रहा कि प्रेमिका की जिंदगी से चुपचाप चला जाना मंजूर था। शांति के विवाहित जीवन में वो किसी भी तरह बाधा बनना नहीं चाहता था। एक खराब पति को फिर से अपनाना शांति को मंजूर हुआ। मनमोहन देसाई की दुनिया में धर्म को आवश्यक रूप से किरदार व कहानी के साथ जोडा गया। फिर व्यक्तिवाद से अधिक परिवार को जगह मिली । बिखरे हुए परिवार का एक होना दिखाया गया…अनवर उसके पिता व मां के बिखराव का एक परिवार में एकत्र होना इस संदर्भ में जरूरी था। ऊंच-नीच व अमीर-गरीब की धुरी के बीच एक सामंजस्य का एक उदाहरण छलिया में भी देखने को मिला। पति-पत्नी दोनों सक्षम परिवारों से ताल्लुक रखते थे। शांति का होने वाला पति पहली बार ही एक लक्जरी कार में मिलने आया। बाद में बेघर हो चुकी शांति को छलिया की कुटिया में रहना पडा…वो अब पुरानी शांति नहीं थी। गरीब-बेघर स्त्रियों के बीच रहते हुए इस तरह घुल-मिल गयी कि मानो जन्म से इसी समाज की थी। देसाई की क्षमता उनकी पहली ही फिल्म से स्थापित हो चुकी थी। सुरीले गानों को बहुत दिलकश तरह फिल्माया गया। गानों में गति लाने के लिए पलों को कट कर फिर दूसरे पलों से अंडाकार जोडा गया। यह एक जादुई प्रयोग की तरह उभरकर आया था। यहां ‘ डम डम डिगा डिगा’ गाना काबिले गौर है। जिस एक शॉट में छलिया की सीढी गिर रही थी, अगले शाट मे उसे किसी के कंधों पर आराम से बैठा दिखलाया गया। यह कुछ यूं था मानो किसी चमत्कार या जादू ने उसे वहां बिठा दिया हो। एक दूसरे बिंदु पर शांति छलिया का नाश्ता के साथ इंतजार कर रही। इंतजार में पलकों का झुकना देखा जा सकता है। अगले शाट में वो सिर उठा रही…लेकिन अब इंतजार का समय बदल गया है। घर से बाहर खडी पति की वापसी के लिए प्रार्थना का शॉट काबिले गौर था। लघु रूप में ही लेकिन शांति के मौजुदा हालात व पति के साथ खुशहाल कल की ख्वाहिश के संघर्ष को जरूर दिखाया गया।

यदि  फिल्मकार मनमोहन देसाई की खूबियां पहले ही फिल्म से नजर आने लगी तो दूसरी ओर कमियां भी खेल बिगाड रही थी। हिन्दी सिनेमा की अधिकांश लोकप्रिय फिल्मों की तरह उन्होंने प्लाट से अधिक व्यक्तिगत दृश्यों को महत्त्व दिया। कहानी की प्रबलता को नजर अंदाज करके उन्होंने काफी मेहनत दृश्यों पर लगा दी। नतीजतन बढिया व्यक्तिगत दृश्यों के होते हुए कहानी में उस किस्म का मजा नही बना। इस वजह से देसाई की फिल्मों से ज्यादा उसके सीन यादगार हुए। आपको इसमें क्रम की कमी महसूस होती है। हालांकि यादगार दृश्य दर्शक को बार-बार जरूर सिनेमाघरों तक लाने में सफल थे। लेकिन कहना होगा कि पटकथा में कमियां पूरी झलक गयी। कुछ सवाल अनुत्तरित बचे रहे और फिल्म समाप्त हो चुकी थी। बाक़ी सामान्य समझ की सीमारेखा से परे खडे मिलें। आप शांति का उदाहरण लें जिसे खुद्कुशी के नाम पर पेट में पल रहे शिशु की याद नहीं रही। फिर पठान अकबर खान (प्राण) को शांति व उसके पति का मिलन कराना चाहिए था। पाकिस्तान में शांति के साथ क्या हुआ, अकबर खान ही को पता था। इस सब के बावजूद अंतिम दृश्य में अकबर खान को बैकग्राउंड तक ही सीमित रखा गया…क्योंकि शायद छलिया को यहां होना ज्यादा जरूरी था। जान पर खेलकर वो शांति को आग से बचा लेता है।  आखिर में शांति को पति का साथ मिलना लाजमी था।

मनमोहन की फिल्मों में पशुओं को कहानी का हिस्सा दिखाया जाता था। फिल्म धर्मवीर में प्रयोग हुए दोनों बाज़ एवं ‘कुली’ में पेश आए बाज़ के पास चमत्कारिक क्षमताएं थी। इस क्षमता की वजह से संकट में घिरे मालिक की सहायता में तुरंत उतर आना मुम्किन था। फिल्मकार ने पालतु जानवरों से लेकर बाघों व सांपों का भी इस्तेमाल किया। वस्तु की ध्वनि के साथ हास्य भाव बनाने का अनोखा प्रयोग भी हुआ था। आलोचकों ने उन पर टाईपकास्ट होने की कमी डाल दी। खुद को रिपीट करना अकेले मनमोहन की बात नहीं थी। महान फिल्मकार हिचकाक ने भी खुद को अनेक बार रिपीट किया। स्टीरियोटाईप खुद के साथ बहुत से नफा-नुकसान लेकर आता है। देसाई के परिप्रेक्ष्य में कह सकते हैं कि वो उनकी फनकारी का स्टाईल था। उनके काम में— Kleidoscope की खूबियां नजर आती है। बेशक उसमें सुधार या परिवर्तन की संभावनाएं भी थी। उस यंत्र में रगीन कांच टुकडों से विविध दिलकश आकारों का मायाजाल आसानी से कायम हो जाता है। कपडा बनाने वाले एक ही कपडे पर अलग-अलग डिजाईन से कपडे को आकर्षक कर देते हैं।

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