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लेखक बनने की पहली कोशिश, मनोहर श्याम जोशी और अमेरिकन सेंटर लाइब्रेरी

आज मनोहर श्याम जोशी जी की 12 वीं पुण्यतिथि है. इस अवसर पर उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए उनके ऊपर  अपनी लिखी जा रही किताब का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ- प्रभात रंजन

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आखिरकार उनके(मनोहर श्याम जोशी) घर बेतकल्लुफी से आने जाने का सिलसिला शुरू हो गया और इसमें बड़ी भूमिका अमेरिकन सेंटर की थी. हुआ यों कि ‘हमजाद’ उपन्यास को उत्तर आधुनिक उपन्यास लिखने के बाद और एक सरकारी पत्रिका में उसके मय मानदेय प्रकाशन के बाद मैं कुछ जोश में आ गया था. इस बात का मलाल जरूर था कि ‘हंस’, ‘इण्डिया टुडे’ या किसी अन्य मुख्यधारा की पत्रिका में उस समीक्षा का प्रकाशन नहीं हुआ लेकिन मेरे लिए यह कम संतोष की बात नहीं थी कि उस उपन्यास की पहली समीक्षा मैंने ही लिखी थी. अभी मैंने ‘उत्तर आधुनिकता और मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास’ विषय पर शोध करना अभी ठीक से शुरू ही नहीं किया और मैंने खुद को उत्तर आधुनिकता और मनोहर श्याम जोशी दोनों का विशेषज्ञ साबित कर दिया था.

मेरे अन्दर खुद को और कुछ साबित करने का जोश भी आ गया था. कहानी लिखकर मैं जल्दी से जल्दी कथाकारों की सूची में अपना नाम लिखवाना चाहता था. मैंने एक कहानी लिखनी शुरू की. अब सोचता हूँ तो लगता है कि कहानी क्या थी मैंने महज कुछ पन्ने भरे थे. कुछ प्रेम कहानी जैसी था जिसमें लड़की लड़के को बहुत पसंद करती है. दोनों को पहली बार एकांत में मिलने का मौका मिलता है. लड़का घबराहट में या अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए सिगरेट निकालकर जला लेता है. उसके सिगरेट जलाते ही लड़की कहती है, ‘छी छी! ऐसे लड़के से मैं नहीं मिलना चाहती जो सिगरेट पीता हो. लड़का मन मसोस कर रह जाता है और अगली बार दोनों के बीच अकेले मिल पाने का अवसर नहीं आता है. लड़का छुट्टियों में अपनी बुआ के घर गया हुआ था. छुट्टियाँ ख़त्म हो जाती हैं, लड़का अपने शहर वापस आ जाता है. मिलने-बिछड़ने में सिगरेट की बाधा को लेकर मैंने कुछ ऐसा लिखने का प्रयास किया था जो अपनी नजर में मुझे उत्तर आधुनिक टाइप लग रहा था.

हाथ से लिखने का ज़माना था. कहानी को दो बार फेयर करने के बाद जब मैं निश्चिन्त हो गया तो मैंने एक दिन उनको फोन मिलाया. उनके फोन पर आते ही मैंने एक सांस में कह दिया कि मैंने कहानी लिखी है और मैं उनको दिखाना चाहता हूँ. उन्होंने उसी दिन शाम का समय दे दिया. उस दिन मैंने दिन भर शाम होने का इन्तजार किया. अपनी बड़ी सी नोटबुक में कहानी के पन्ने दबाये, नोटबुक को अपने बैग में डाला और आइएसबीटी से 601 नंबर की बस में बैठ गया.

उनके घर पहुंचा तो उन्होंने सीधे कहानी की मांग की. वे जैसे पढने के लिए तैयार बैठे थे. मन ही मन मुझे लग रहा था कि कहानी उनको पसंद आने वाली थी और मेरा नाम हिंदी के युवा लेखकों में दर्ज होने वाला था. बस उनके पढने की देर थी.

टेबल कुर्सी पर बैठकर बड़े ध्यान से उन्होंने कुछ मिनट कहानी पढ़ी. पन्नों को समेटा और मेरी तरफ बढाते हुए बोले, ‘ऐसा नायक किस काम का जिसे लड़की से पहली बार एकान्त में मिलने का मौका मिले और वह सिगरेट जलाने में समय गंवा दे. देखो, सिर्फ लिखने के लिए लिखना, छपने के लिए लिखना है तो कोई बात नहीं. हिंदी में हजारों की तादाद में रोज लड़की, फूल, चिड़िया पर कविता लिखने वाले पैदा हो रहे हैं. उसी तरह कहानियां लिखने वाले पैदा हो रहे हैं. इतनी पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं बहुत से लेखक उनमें पन्ने भरने के काम आते हैं. लेकिन कुछ लेखक होते हैं जिनको प्रकाशित करके पत्रिकाएं गौरवान्वित महसूस करती हैं. अब तुम खुद सोच लो. कहानी तुम्हारे हाथ में है. चाहो तो फाड़कर फेंक दो या लिफ़ाफ़े में डालकर किसी सम्पादक को भेज दो. दोनों स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ेगा.’

मैं कुछ देर तो अवाक खड़ा रहा फिर मैंने उनके सामने ही फाड़कर उनके डस्टबिन में फेंक दिया. मेरी पहली कहानी ‘लड़का लड़की और सिगरेट’ का यह दुखांत मुझे कई बार याद आ जाता है. वैसे तो उसकी एक प्रति मेरे पास होस्टल में थी. चाहता तो प्रकाशित करवाने की कोशिश भी करता लेकिन जोशी जी कि यह बात मुझे बार बार याद आती रही कि पन्ने भरने वाला लेखक बनना है या…

अब सोचता हूँ तो कई बार लगता है कि ‘हमजाद’ की समीक्षा भी मैंने बहुत खराब लिखी थी उसे छपवाने में उन्होंने मेरी मदद भी की लेकिन मेरी कहानी के प्रति उन्होंने वैसी उदारता क्यों नहीं दिखाई?

खैर, मैंने तब उनके कहे का अनुपालन किया और उनके सामने सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया. फिर पूछा, ‘इस कहानी में क्या कमी थी सर? और अच्छी कहानी किस तरह से लिखी जा सकती है?’

जवाब में उन्होंने किस्सा सुनाना शुरू किया कि जब वे लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे और वहां के हबीबुल्ला होस्टल में रहते थे तो वे अमृतलाल नागर के यहाँ जाने लगे. नागर जी की आदत थी कि वे अपनी रचनाओं को बोलकर लिखवाते थे. उन दिनों नागर जी ‘बूँद और समुद्र’ उपन्यास लिख रहे थे उसके कुछ पन्ने उन्होंने भी लिखे.

प्रसंगवश, जोशी जी भी बोलकर लिखवाते थे. उन्होंने एक युवक को टाइपिस्ट के लिए बाकायदा नौकरी पर रखा था. शम्भुदत्त सती नामक वह व्यक्ति 90 के दशक में उनके यहाँ काम के लिए आया था. उन दिनों जोशी जी ‘हमराही’ धारावाहिक लिख रहे थे. तब से लेकर उनकी लिखी आखिरी फिल्म ‘हे राम’ तक वही उनके लिए टाइप करने का काम करते रहे. जोशी जी ने अपने एक इंटरव्यू में इस बात का जिक्र भी किया है कि 1966 में जब वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने तब उनको बाकायदा एक टाइपिस्ट सहायक के रूप में मिला और उनके लेखन में गति आई. अन्यथा हाथ से लिखने के मामले में वे इतने काहिल थे कि हिंदी के ज्यादातर काहिल लेखकों की तरह कविताएँ ही लिखते रहे. बहरहाल, शम्भुदत्त सती जोशी जी के इतने लम्बे समय तक टाइपिस्ट रहे कि वे भी लेखक बन गए और कुमाऊनी परिवेश को लेकर उन्होंने एक नावेल भी लिखा ‘ओ इजा’, जो भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ था.

बोलकर लिखवाने की बात चल रही है तो लगे हाथ यह बताना भी मुझे जरूरी लगता है कि वह कंप्यूटर पर लिखने का ज़माना नहीं था. ज्यादातर लेखक हाथ से ही लिखा करते थे. मोहन राकेश के बारे में मैंने पढ़ा था कि 60 के दशक में वे टाइपराइटर पर लिखा करते थे और जहाँ जाते थे अपना टाइपराइटर साथ लेकर जाते थे. 90 के दशक के आखिरी वर्षों में जब मैंने अशोक वाजपेयी के साथ काम करना शुरू किया तो देखा कि वे रोज सुबह टाइपराइटर पर लिखा करते थे. उन दिनों हिंदी के बहुत कम लेखक खुद टाइपराइटर पर लिखते थे. यह टशन था उन दिनों का.

जोशी जी बोलकर लिखवाते थे और उनके समकालीन लेखक कमलेश्वर जी फिल्मों, टीवी, साहित्य हर माध्यम में बेहद सफल लेखक रहे लेकिन वे हाथ से ही लिखते थे. मुझे याद है कि वे अपनी लिखने की उँगलियों में पट्टी बांधकर लिखा करते थे. जिस दिन मैंने पहली बार उनको उंगली में पट्टी बांधकर लिखते हुए देखा तो मैं बहुत चकित हुआ और मैंने उनसे कहा कि सर आप किसी टाइपिस्ट को रखकर बोलकर क्यों नहीं लिखवाते? जोशी जी तो बोलकर ही लिखवाते हैं. डनहिल सिगरेट का धुंआ छोड़ते हुए कमलेश्वर जी ने कहा, हिंदी के लेखकों को संघर्ष बहुत करना पड़ता है. हाथ से लिखने में संघर्ष का वह भाव बना रहता है. जानते हो प्रभात, जिस दिन मैं हाथ से लिखना छोड़ दूंगा मैं लेखन ही नहीं कर पाऊँगा. हिंदी का लेखक कलम का मजदूर ही होता है उसे लेखन का राजा बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए.

मैं उनसे बहस करने के मूड में था. मैंने कहा कि सर मनोहर श्याम जोशी जी बोलकर लिखवाते हैं. सुनकर वे कुछ संजीदा हुए और फिर बोले, देखो हर लेखक का अपना स्टाइल होता है, अपनी विचार प्रक्रिया होती है. जैसे अगर मैं बोलकर लिखवाने लगूंगा तो मेरी भाषा, मेरे संवाद सब विश्रृंखल हो जायेंगे. मैं आज भी जिस तरह से लिखता हूँ खुद मुझे ऐसा महसूस होता है जैसे मेरे सामने पन्नों पर कोई रहस्य उद्घाटित हो रहा हो. अक्षरों, शब्दों के माध्यम से यह रहस्योद्घाटन ही मेरे लिए लेखन का असल आनंद है. इसी कारण से चाहे मैं फिल्म लिखूं, सीरियल्स लिखूं या कहानी-उपन्यास लेखन मुझे आनंददायक लगता है. उसके बाद कुछ देर रुकते हुए उन्होंने कहा कहा- एक बात बताऊँ जोशी के पह्क्ले दो उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ और ‘कसप’ बहुत सुगठित हैं. दोनों उसने हाथ से लिखे थे. कहने के बाद वे फिर से लिखने में लग गए. खैर, मुझे ऐसा लगता है कि कमलेश्वर जी की हस्तलिपि इतनी सुन्दर थी कि हो न हो वे उसी मोह में हाथ से लिखते थे.

अब प्रसंग हाथ से लिखने बनाम टाइपिस्ट को बोलकर लिखवाने का चल रहा है तो एक और किस्सा याद आ रहा है. उन दिनों मैं महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘बहुवचन’ का संपादन कर रहा था. उस पत्रिका के पहले संपादक पीयूष दईया ने अचानक पत्रिका का संपादन छोड़ दिया. तब मैं विश्वविद्यालय की अंग्रेजी पत्रिका ‘हिंदी’ में सहायक संपादक था. उस समय उस विश्वविद्यालय का नाम ‘बहुवचन’ पत्रिका के प्रकाशन के कारण ही था. विश्वविद्यालय निर्माण काल से गुजर रहा था. इसलिए वहां प्रकाशन का काम ही अधिक हो रहा था. अचानक एक दिन अशोक वाजपेयी ने मुझे बुलाकर कहा कि जब तक कोई नया संपादक नहीं मिल जाता है तुम ही इसका एक अंक निकाल दो. मन ही मन मैं जानता था कि उस एक अंक के माध्यम से मुझे ऐसा प्रभाव छोड़ना था कि आगे के अंकों के संपादन का भार भी मुझे मिल जाए. उस अंक में मैंने कई नए काम किए. जिनमें एक मनोहर श्याम जोशी के धारावाहिक संस्मरण का प्रकाशन भी था.

जब अशोक जी ने मुझे बहुवचन के सम्पादन के बारे में कहा तो उसकी सूचना सबसे पहले देने जोशी जी के घर गया. वे बहुत खुश हुए. बोले, देखो अशोक काम तो बहुत अच्छा करना चाहता है लेकिन उसके आसपास भोपाल वालों का,  ऐसा जमघट है कि उनके बीच तुम संपादक बने रह जाओ यह किसी कमाल से कम नहीं होगा. लेकिन कोशिश पूरी करना. मैंने पूछा कि आप क्या देंगे, तो बोले कि अभी हाल में ही रघुवीर सहाय रचनावली का प्रकाशन हुआ है. मैं वही पढ़ रहा था. रचनावली के संपादक सुरेश शर्मा का आग्रह था कि मैं उसकी समीक्षा लिख दूँ. मैंने कहा- समीक्षा? मतलब आप यह कह रहे हैं आप मेरे संपादन में निकलने वाले पहले अंक के लिए एक किताब की समीक्षा लिखेंगे? मैं तो सोच रहा था कि आप कुछ ऐसा लिखे जो यादगार बने और मेरी नौकरी भी बच जाए. जवाब में वे फिर बोले, उसी रचनावली के बहाने कुछ लिखता हूँ. ‘रघुवीर सहाय रचनावली के बहाने स्मरण’ शीर्षक से जब उन्होंने रघुवीर सहाय पर लिखना शुरू किया तो अगले तीन अंकों तक उसका प्रकाशन हुआ. संभवतः हिंदी की वह सबसे बड़ी समीक्षा है जिसका बाद में पुस्तकाकार प्रकाशन भी हुआ. खैर, एक दिन मैं कृष्ण बलदेव वैद के यहाँ उनसे मिलने गया. प्रसंगवश, बता दूँ अपने समकालीन लेखकों में जोशी जी जिस लेखक के पढ़े लिखे होने का खौफ सबसे ज्यादा खाते थे वे वैद साहब ही थे. तो मैंने वैद साहब से पूछा कि सर जोशी जी जो रघुवीर सहाय पर लिख रहे हैं वह आपको कैसा लग रहा है? जवाब में वैद साहब ने हँसते हुए कहा- जोशी बोलकर लिखवाता है न!

बहरहाल, बात लखनऊ के दिनों की हो रही थी तो उन दिनों लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में लखनऊ के तीन मूर्धन्य लेखक यशपाल, अमृतलाल नागर और भगवती चरण वर्मा मौजूद रहते थे. उन तीनों की मौजूदगी में उन्होंने अपनी कहानी ‘मैडिरा मैरून’ सुनाई और उस कहानी से उनकी पहचान बन गई. मैं किस्से सुनता रहा लेकिन किस्सों में मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि इनमें मेरे अच्छे कथाकार बनने के क्या गुर छिपे हुए थे. शायद मेरे चेहरे पर बेरुखी के भाव या कहिये ऊब के भाव को उन्होंने लिया होगा इसलिए सारे किस्सों के अंत में उन्होंने सार के रूप में बताना शुरू किया- ‘हबीबुल्ला होस्टल में रहते हुए मैंने एक बात यह सीखी कि अच्छा लेखक बनना है तो बहुत पढना चाहिए. उन दिनों मेरा एक मित्र था सरदार त्रिलोक सिंह, वह बहुत पढ़ाकू था. दुनिया भर के लेखकों को पढता रहता था. उसने मुझे कहा कि तुम जिस तरह से बोलते हो अगर उसी तरह से लिखना शुरू कर दो लेखक बन जाओगे. इसके लिए उसने मुझे सबसे पहले अमेरिकी लेखक विलियम सारोयाँ की कहानियां पढने की सलाह दी. तो तुम्हारे लिए पहली सलाह यह है कि अमेरिकन सेंटर के पुस्तकालय के मेंबर बन जाओ. वहां एक से एक पुरानी किताबें भी मिलती हैं और समकालीन पत्र-पत्रिकाएं भी आती हैं. तुम्हारा दोनों तरह के साहित्य से अच्छा परिचय हो जायेगा.’

कहानी लिखने की दिशा में आखिर में उन्होंने पहली सलाह यह दी- देखो! दो तरह की कहानियां होती हैं. एक तो वह जो घटनाओं पर आधारित होती हैं, जिनमें लेखक वर्णनों, विस्तारों से जीवंत माहौल बना देता हैं. डिटेल्स के साथ इस तरह की कहानियां लिखना मुश्किल काम होता है. तुम्हारी कहानी को पढ़कर मुझे साफ़ लगा कि अभी इस तरह की कहानियां लिखना तुम्हारे बस का नहीं है. न तो तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई वैसी है न ही लेखक का वह धैर्य जो एक एक कहानी लिखने में महीनों-सालों का समय लगा दे सकता है. दूसरी तरह की कहानियां लिखना कुछ आसान होता है. एक किरदार उठाओ और उसके ऊपर कॉमिकल, कारुणिक रूप से लिख दो. फिर कुछ देर रूककर बोले, उदय प्रकाश को ही देख लो वह दोनों तरह की कहानियां लिखने में महारत रखता है. लेकिन उसको अधिक लोकप्रियता दूसरी तरह की कहानियां लिखने से मिलती  है, जिसमें वह अपने आसपास के लोगों का कॉमिकल खाका खींचता है. मैं यह नहीं कहता कि उस तरह की कहानियां लिखनी चाहिए लेकिन आजकल हिंदी कहानियां इस दिशा में भी बड़ी सफलता से दौड़ रही है. उसके बाद उन्होंने हँसते हुए कहा, और तो और तुम अपनी कहानी में भाषा का रंग भी नहीं जमा पाए. अगर भाषा होती तो कहता निर्मल वर्मा की तरह लिखो.

लेकिन फिलहाल तो कुछ नहीं है. कहानी चर्चा के बाद उन्होंने भाषा चर्चा शुरू कर दी. मनोहर श्याम जोशी कोई शब्द लिखने से पहले कोश जरूर देखते थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि हिंदी लिखने के लिए किस कोश का उपयोग करते हो. मैं बगलें झाँकने लगा क्योंकि कोश के नाम पर तब मैं बस फादर कामिल बुल्के के अंग्रेजी-हिंदी कोश को ही जानता था. उसकी भी जो प्रति मेरे पास थी वह मैंने खरीदी नहीं थी बल्कि मेरे चचेरे भाइयों ने करीब दस साल उपयोग के बाद मुझे दे दी थी. हिंदी लिखने के लिए भी कोश देखते रहना चाहिए यह बात मुझे पहली बार तब पता चली जब मैं हिंदी में पीएचडी कर रहा था. मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी. हिंदी के कुछ मूर्धन्यों से शिक्षा पाई थी लेकिन किसी ने मुझे या किसी को भी भाषा के बारे में कोई ज्ञान नहीं दिया था. हिंदी भाषा के अलग-अलग रूपों के बारे में पहला ज्ञान मुझे हिंदी के एक ऐसे लेखक से मिला जिन्होंने ग्रेजुएशन से आगे पढ़ाई भी नहीं की और ग्रेजुएशन तक उन्होंने जिन विषयों की पढ़ाई की थी उनमें हिंदी नहीं थी.

 उन्होंने बड़ा मौलिक सवाल उस दिन मुझसे किया. तुम हिन्दी पट्टी वाले अपनी अँग्रेजी ठीक करने के लिए तो डिक्शनरी देखते हो लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि हिन्दी भाषा को भी ठीक करने के लिए कोश देखना चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि जोशी जी ने अपने जीवन काल में एक भी उपन्यास या रचनात्मक साहित्य ऐसा नहीं लिखा जो तथाकथित शुद्ध खड़ी बोली हिन्दी में हो। लेकिन आउटलुक, दैनिक हिंदुस्तान में उनके जो स्तम्भ प्रकाशित होते थे और उनमें अगर एक शब्द भी गलत छप जाता था तो वे संपादक से जरूर लड़ते थे। मुझे याद है कि आउटलुक में उन्होंने एक बार अपने स्तम्भ में वह लिखा जिसे उस पृष्ठ के संपादक ने वो कर दिया. बस इतनी सी बात पर उन्होंने तत्कालीन संपादक आलोक मेहता को इतनी बड़ी शिकायती चिट्ठी लिखी थी कि मैं हैरान रह गया था. भला इतनी छोटी सी बात पर भी कोई इतना नाराज हो सकता है.

भाषा को लेकर उनका मत स्पष्ट था. उनका मानना था कि साहित्यिक कृति तो लोग अपनी रुचि से पढ़ते हैं लेकिन पत्र-पत्रिकाओं को लोग भाषा सीखने के लिए पढ़ते हैं इसलिए उनको भाषा की शुद्धता के ऊपर पूरा ध्यान देना चाहिए। लेकिन जब भी भाषा की शुद्धता को ध्यान में रखकर रचनात्मक साहित्य लिखा जाता है तो वह लदधड़ साहित्य हो जाता है। उस दिन उन्होंने कई उदाहरण दिए लदधड़ साहित्य के लेखक के रूप में। वे कहते थे कि भाषा से ही तो साहित्य जीवंत हो उठता है। उदाहरणस्वरूप वे अपने पहले गुरु अमृतलाल नागर का नाम लिया। उन्होंने कहा  कि भाषा की उनको इतनी जबर्दस्त पकड़ थी कि कानपुर शहर के दो मोहल्लों के बोलचाल के फर्क को भी अपनी भाषा में दिखा देते थे। जो भाषा की भंगिमाओं को नहीं जानते वे साहित्य में भाषा की शुद्धता को लेकर अड़े रहते हैं। जबकि हिन्दी का मूल स्वभाव इसका बाँकपन है। यह कभी भी एलिट समाज की भाषा नहीं बन सकती। यह अभी भी मूल रूप से उन लोगों की भाषा है जो एक भाषा ही जानते हैं अर्थात एकभाषी हैं। मुझे याद है कि अब लखनऊ से अखिलेश के संपादन में ‘तद्भव’ नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ तो उसमें मनोहर श्याम जोशी जी ने धारावाहिक रूप से ‘लखनऊ मेरा लखनऊ’ संस्मरण श्रृंखला लिखना शुरू किया. ‘तद्भव’ के हर अंक में प्रूफ की गलतियाँ बहुत रहती थीं. इसको लेकर उन्होंने एक पत्र ‘तद्भव’ संपादक को लिखा जो पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ. उस पत्र में उन्होंने अशुद्धियों को भाषा का ‘डिठौना’ कहा था, जो न हों तो भाषा को नजर लग जा सकती है. उस दिन उन्होंने कहा कि हिंदी जिस दिन पूर्ण रूप से शुद्ध भाषा हो जाएगी, अपने मूल यानी लोक से कट जाएगी और मर जाएगी!

मतलब यह कि उन्होंने मुझे कथ्य, भाषा, शैली हर लिहाज से असफल लेखक साबित किया. मैं बहुत दुखी था और मन ही मन सोच रहा था कि मेरे समकालीनों में इतने लोगों की कहानियां, कविताएँ मार-तमाम छपती रहती हैं. कई पुरस्कृत भी हो चुके थे. उनमें से किसी में उनको किसी तरह की कमी नहीं दिखाई देती थी. बस मेरे लेखन में ही दिखाई दे रही थी. मन में निराशा तो बहुत थी लेकिन यह संकल्प भी मन ही मन लिया कि एक दिन मैं इनसे भी बड़ा लेखक बनकर दिखाऊंगा. लेकिन ऊपर से जी-जी के अलावा कुछ और नहीं कह पाया.

उन्होंने अमेरिकन सेंटर लाइब्रेरी का नाम लिया था. उसी साल से उस लाइब्रेरी में की सशुल्क मेम्बरशिप शुरू हो गई थी. उससे पहले तक अमेरिकन सेंटर लाइब्रेरी की सदस्यता निशुल्क थी. वहां रीडिंग रूप में आकर कोई भी दिन भर पढ़ सकता था. हमारे कॉलेज के कई सीनियर एक जमाने में उसी लाइब्रेरी में बैठकर एसी की सुविधा में यूपीएससी की तैयारी किया करते थे. अचानक सालाना सदस्यता शुल्क 500 कर दिया गया था. जो सदस्य नहीं होते थे उनको हर दिन बैठने का शुल्क देना पड़ता था. उन्हीं दिनों विष्णु खरे ने एक कविता लिखी थी ‘लाइब्रेरी में तब्दीलियाँ’, जो अमेरिकन सेंटर में हुए इन बदलावों को लेकर ही था. बदलाव अमेरिकन सेंटर लाइब्रेरी में हो रहे थे और विरोध एक प्रगतिशील कवि ने किया था.

असल बात जो थी वह यह थी कि जोशी जी ने यह कह तो दिया था कि अमेरिकन सेंटर जाओ और वहां की किताबों से ज्ञान अर्जित करो. लेकिन मेरी मुश्किल यह थी कि सालाना 500 रुपये वाली सदस्यता कैसे हासिल करूं, सदस्य बनते समय तो कुछ राशि कॉशन मानी के रूप में भी देना पड़ता था.

इसका हल खुद उन्होंने ही निकाला. उन्होंने अपना कार्ड देते हुए कहा, ‘यह ले जाओ. खुद भी किताबें पढना और मेरे लिए भी ले आना. उस कार्ड पर एक साथ चार कार्ड इश्यु हो सकते थे. कार्ड पर लिखा हुआ था पैट्रन मेंबर. इसका मतलब यह था कि वे लाइब्रेरी के बहुत पुराने सदस्य थे. इसके एवज में उनको मांगने पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख भी मुफ्त में डाक से घर भिजवाई जाती थी. खैर, मुझे इससे कई सुविधाएँ मिल गई. एक, मेरे 500 रुपये बच गए. दो, मुझे दिल्ली के एक बड़े पुस्तकालय में आने जाने का कार्ड मिल गया. लेकिन सबसे बड़ी सुविधा यह मिल गई कि मुझे अब जोशी जी के घर में किताब पहुंचाने और ले जाने के बहाने जब चाहूं आने जाने का अवसर हासिल हो गया. अब बार-बार फोन करके मिलने का समय लेने की जरुरत नहीं रह गई, न ही हर बार नए नए बहाने बनाने की.

बाद में जोशी जी ने जब रघुवीर सहाय पर लिखते हुए बहुवचन में यह लिखा कि अज्ञेय से जब वे काम मांगने गए तो कुछ दिनों बाद अज्ञेय जी ने उनको पत्र लिखकर यह सूचित किया कि अनुवाद का काम दिलवाने की पेशकश की तो उन्होंने घोर बेरोजगारी के उन दिनों में जब उनके पास रोज खाने के पैसे भी नहीं होते थे और वे नई दिल्ली स्टेशन के पास बैरन रोड पर बने सरकारी क्वार्टरों के बाहर लकड़ी के पार्टीशन से घेर कर बनाए गए जाफरी में रहते थे. तब उन्होंने यह कहते हुए अनुवाद का कम करने से इनकार कर दिया था क्योंकि वह अमेरिकन सेंटर का काम था और उस समय लेखकों के लिए अमेरिका का काम करना अच्छा नहीं माना जाता था. लेकिन दिलचस्प बात यह थी कि अमेरिकन सेंटर के पैट्रन मेंबर होने का मतलब ही यही था कि वह उन्हीं दिनों अमेरिकन सेंटर पुस्तकालय के सदस्य बने थे.

खैर यह किस्सा बाद में…

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5 comments

  1. पीयूष दईया

    प्रभात जी ने पहले भी अपनी विशिष्ट और ललित शैली में जोशी जी के साथ बने अपने सम्बन्ध का सुन्दर आख्यान रचा है और अभी भी उसी आख्यान के विस्तार का पठनीय पाठ रखा है : कमाल की सूक्ष्मदर्शी नज़र और अन्तर्दृष्टिसम्पन्न वर्णनों से। मानो एक उत्कृष्ट कथावाचक अपनी कथा बाँच रहा हो।
    पीयूष दईया

  2. विश्व मोहन

    बहुत प्रेरक लेख!!

  3. रोचक। किताब का इन्तजार रहेगा।

  4. मुकुल कुमारी अमलास

    बेहद प्रभावशाली संस्मरण , पढ़ कर आनंद आ गया। सच, गुरु जब शिष्य को माँजना चाहता है तो कई बार कितना कठोर हो जाता है !

  5. वाकही में बहुत बढ़िया ब्लॉग है हम पिछले कुछ दिनों से आप के ब्लॉग पर रेगुलर आ रहे है क्यों की आप का ब्लॉग के Content बहुत अच्छे है और आशा करते है की आप इसी तरह रोज़ाना लेख लिखोगे | ध्यन्यवाद

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