Home / Featured / किसान आंदोलनों के पीछे षड़यंत्र नहीं किसानों के दर्द को समझिये!

किसान आंदोलनों के पीछे षड़यंत्र नहीं किसानों के दर्द को समझिये!

देश में किसानों के संघर्ष बढ़ रहे हैं. हम उसको समझने के स्थान पर या तो उनके मध्यवर्गीय समाधान सुझा रहे हैं या उसके पीछे किसी बड़े राजनीतिक षड़यंत्र को देख रहे हैं. कुमारी रोहिणी का यह लेख ऐसे ही कुछ सवालों को समझने की एक कोशिश की तरह है- मॉडरेटर

=======================

पिछले दो चार दिनों से देश का रंग लाल हो गया है. यहाँ लाल से मेरा मतलब वामपंथ वाला लाल नहीं है. लाल से मेरा मतलब है उन किसानों के खून पसीने का रंग. उनके झंडे का रंग. उनके माथे पर पहनी उनकी टोपी का रंग और हाँ सबसे जरुरी और सबसे ज्यादा उनकी कमाई का जरिया उनके खेत और उसमें उगने वाले फसलों का रंग.

जी यकीन मानिये, लाल के कई प्रकार हैं. मुंबई में किसान मार्च में निकले किसानों की टोपियों लाल रंग वह लाल नहीं है जिससे आपको डर लगता है या जो आपका प्रतिद्वंदी है. यह वह लाल है जो आपका हमारा और दुनिया भर का पेट भरता है, जीवन चलाता है.

मुझे लगता है कि किसानों के इस विद्रोह को आप राजनैतिक जामा ना ही पहनाएं तो बेहतर होगा, आपके लिए भी और इस समाज के लिए भी. बस विरोध भर कर देने के लिए आप अपने बाप दादा और कई पुश्तों के अस्तित्व का विरोध नहीं कर सकते हैं. यह अन्याय है, यह पाप है जिसे आप ना तो गंगा में नहा कर धो पाएँगे ना ही भाजपा में शामिल होकर. इसलिए चेत जाईये.

आज से ज़्यादा नहीं बस 20 साल पहले के अपने जीवन या अपने परिवार के जीवन का इतिहास पलट कर देखेंगे तो उसमें कम से कम एक इंसान या एक ऐसा रिश्तेदार जरूर होगा जिसका जीवन खेती और उससे जुड़े व्यवसाय से चलता होगा.

मैं एक किसान परिवार से हूँ, यह अलग बात है कि मेरे पिताजी ने मेरे जन्म से पहले ही खेती करनी छोड़ दी थी लेकिन गाँव में रहने वाले मेरे चाचा जी और मेरे भाई लोग आज भी खेती करते हैं. इसलिए जानती हूँ कि खेती करना और उससे घर चलाना कैसा होता है और कितना मुश्किल होता है. लेकिन खेती और किसानी का सबसे नजदीकी परिदृश्य मैंने अपने माँ के परिवार मतलब कि अपने नानी घर में देखा है. मेरी माँ का पैतृक गांव बेगूसराय जिले से 40 किमी अंदर लख्मीनिया क्षेत्र में है जहाँ से बूढी गंडक बहती है. हमलोग पटना में रहते थे और बचपन में (जब तक 8/9 साल की उम्र थी) छुट्टियों में घूमने जाने के नाम पर हम नानी के यहाँ ही जाते थे और इसके अलावा भी किसी त्यौहार या पर्व पर भी वहीँ जाना होता था. इसलिए आज भी जेहन में गांव के नाम पर नानी घर का दृश्य ही बचा है.

नानी का घर गांव से बाहर मुहाने के पास बना हुआ है. घर काफी बड़ा था लेकिन साथ ही पुराना भी था और बहुत हद तक जर्जर भी हो चुका था. उस घर की ज़र्जरता मुझे हमेशा ज़मींदारी की ज़र्जरता का एहसास दिलाती थी.

मेरी माँ अपने भाई बहनों में सबसे बड़ी है और उसके बाद मेरे मामा जी है और उनसे छोटी तीन मौसियां. मेरी माँ और मौसियों में उम्र का ठीक ठाक फैसला है, इसलिए मुझे अपनी सभी मौसियों की शादियां और शादियों की तैयारियाँ सब याद है.

खैर मुद्दे की बात पर आती हूँ. हाँ तो जैसा कि हम सब जानते ही है इस देश में बेटियों की शादियां यूँ ही माँ बाप के लिए बैतरणी नदी पार करने जैसा है. लेकिन उनकी कठिनाइयां और बढ़ जाती हैं जब आय का साधन खेती हो. मेरे नाना जी के पिता जी जमींदार थे लेकिन नाना जी को विरासत में जमींदारी नहीं किसानी मिली थी और मेरे मामाजी जो कि इकोनॉमिक्स के ग्रेजुएट हैं उन्हें तो विरासत में किसानी भी नहीं मिल पाई. मिला तो बस बंजर – उर्वर जमीनों का जत्था जिसमें फसल तो उगते हैं लेकिन रोटियां नहीं उगती. मेरे नाना और मामा जी ने अपने घर के उन तीन बेटियों की शादियां उसी जमीन को आधार बनाकर की. कभी उसे बेचकर तो कभी उसे गिरवी रखकर. जब भी किसी मौसी की शादी की बात शुरू होती उससे पहले जमीन बेचने की कवायद होती. जमीन इसलिए क्योंकि फसल बेचने से तो घर भी ठीक से नहीं चल पाता था. ऐसा नहीं था कि भुखमरी थी, बल्कि मामला यह था कि नकद नहीं हुआ करता था. वहाँ तो रोज़मर्रा के जीवन में भी किसी भी प्रकार के खरीद फरोख्त का जरिया अनाज ही था. बनिए के यहाँ से चीनी लानी हो या घर में पूजा करने आने वाले पंडित को दान देना हो, सबको उसके हिस्से में मुट्ठी भर अनाज से लेकर अनाज की बोरियां तक ही दी जाती थीं. उस स्थिति में शादी जैसे आयोजन का निबटारा बिना ज़मीन बेचे असम्भव ही होता था.

मुझे याद है नाना जी जब भी पटना आते उनके साथ आती कई छोटी – बड़ी बोरियां. अक्सर रात में या अहले सुबह वे हमारे घर पहुँचते तब हम बच्चे सो रहे होते थे. उस दौर में फोन की भी सुविधा नहीं थी कि आने वाली की खबर पहले ही मिल जाय. हमारे पड़ोस में फोन था भी लेकिन नानी के गांव में ऐसी सुविधा नहीं थी कि हम तक नाना या मामा जी के आने की खबर पहुंच सके. इसलिए नानी के यहाँ से किसी का भी आना हमारे लिए सरप्राइज ही होता था. और उससे ज्यादा मुझे सरप्राइज करती थी वे छोटी बड़ी बोरिया और झोले. जिनमें नानी जी सौगात और प्यार के रूप में ना जाने क्या क्या भेज देती थी. कई प्रकार के दाल, हल्दी, लाल मिर्च, धनिया, अजवाईन, तीसी, माढ़ा, चूड़ा, बसमतिया (बासमती) चावल और कभी कभी तो आलू और कद्दू भी होते थे. चूँकि हम और हमारे बड़े चाचा का परिवार एक साथ ही रहते थे तो नानी के यहाँ से आने वाले बोरे और झोलों को मेरी माँ के बदले बड़ी चाची जिन्हें हम अम्मा कहते हैं और जो रिश्ते में मेरे नाना के दूर की बहन भी लगती हैं वही खोलती थी. होता यह था कि जिस दिन नाना जी आते थे मैं इंतजार में रहती थी कि कब यह बोरियाँ खुलेंगी. उस दिन मेरा स्कूल जाने का भी मन नहीं करता मुझे लगता मुझसे वह मनोरम दृश्य छूट जायेगा जब मेरी अम्मा एक एक कर के बोरियां खोलेंगी और नानी का भेजा सामान निकालेंगी. इसलिए मैं सुबह से जाने अनजाने इसी कोशिश में रहती कि अम्मा मेरे स्कूल जाने से पहले ही सब बोरियां खोल दें.

किसान और अनाज और व्यापर का यही जीवन मैंने देखा है. एक तरफ़ नानी की भेजी बोरियाँ देखकर जितनी ख़ुशी होती थी वहीं दूसरी तरफ़ मुझे यह भी आश्चर्य होता कि नाना जी कैसे बसों और ट्रेनों में ये बोरियां उठाकर लाते होंगे. क्योंकि गाडी भाड़े पर करके लाने की उनकी हैसियत शायद ही रही होगी या उन्हें यह फिजूलखर्ची लगती थी. कारण वही था कि उनके पास अनाज तो बहुत था लेकिन नकद नहीं होता था और गाड़ियों पर चढ़ने के लिए नकद लगता है वहाँ किराए के बदले अनाज नहीं दिया जा सकता था.

मैंने यह भी देखा है जब इतना कुछ लेकर आने वाले मेरे मामा जी या नाना जी के पास नकद के नाम पर ज्यादा से ज्यादा हजार या दो हज़ार रूपये होते थे. उस वक़्त मैं आश्चर्य से भर जाती थी कि जब पापा यही सब सामान बाज़ार से लेकर आते हैं तब तो दूकान वालों को कितने पैसे देते हैं. लेकिन यही जब नाना जी के खेत में उगते हैं तो उनके पास पैसे क्यों नहीं होते. उसी समय मैंने यह जाना कि जो उपजाता है उसके पास ही खाने को अनाज और ईलाज कराने को पैसे नहीं होते. मेरे नाना जी के पास भी इसलिए पैसे नहीं होते थे क्योंकि या तो कभी उनकी फसल बाढ़ में डूब जाती थी या सुखाड़ का शिकार हो जाती थी या जिस साल अच्छी फसल हुई उस साल दाम नहीं अच्छे होते थे.

एक किसान की साल भर की मेहनत उसकी फसल होती है. एक किसान के जीवन को चलाने के लिए उसका राशन पानी उसकी फसल होती है. एक किसान का मासिक पगाड़ उसकी फसल होती है. आप सोचिए आप पूरे महीने काम करें और महीने के अंत में आपको आपका मालिक या बॉस बोल दे कि कंपनी के पास फण्ड नहीं है आपकी पगार के लिए या फिर यह कि हमारे सारे पैसे चोरी हो गए हम आपको आपकी तनख्वा नहीं दे सकते. या फिर कम्पनी को नुक़सान हो गया है आपकी तनख़्वाह नहीं मिल पाएगी,  और ऐसा एक बार नहीं बल्कि साल दर साल हो तब आप क्या करेंगे? आप सड़क एकजुट ही होंगे विरोध ही करेंगे. क्योंकि आप आश्वासन से थक चुके हैं. आपको अब यह समझ आ चुका है कि मालिकों द्वारा किये वादे बस भुलावे हैं सब काग़ज़ी झूठ है, मिथ्या है और उन वादों से आपके बच्चों का पेट नहीं भरेगा, आपके बच्चो को शिक्षा नहीं मिलेगी, खेत में लगातर कड़ी मेहनत के कारण आपके पैरों और घुटनों में स्थायी रूप से घर कर जाने वाले दर्द और बिवाइयों का ईलाज नहीं हो पायेगा. आपकी माँ और पत्नी का धान उबालने और कूटने से झुकी कमर को ठीक करने के लिए बेल्ट नहीं आ पायेगा, और सबसे बुनियादी जरूरत आपके घर का चूल्हा नहीं जलेगा, और अगले साल की फ़सल नहीं बोई जा सकेगी. तब आप भी हाथ में झंडे क्या मशालें और तलवार लेकर सड़क से संसद तक पहुँच जायेंगे. देश को जला देंगे, सत्ता को घुटने पर लाने की और अपने हको को पाने की हर संभव कोशिश करेंगे. उस समय आप यह नहीं देखेंगे कि आपके हाथ के झंडे का या मशाल का रंग क्या है. उस समय आपको बस यह याद रहेगा कि भूख से रोते हुए आपके बच्चों का चेहरा लाल है, दर्द से कराहती आपकी पत्नी के आंसू लाल हैं. और तब जब अपनी थेथरई पर उतर कर कोई आपको वामपंथी, क्रांतिकारी, उग्रवादी, आतंकवादी या देशद्रोही का अमलीजामा पहनायेगा तब आप भी उस जबानदराज का मुंह नोच लेंगे और उसे उसी लाल रंग के झंडे में लपेट देने का साहस कर लेंगे. इसलिए अपने अंदर के इंसान को बनाए रखिए, किसानों के साथ हो रहे अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाइए. क्योंकि अगर एक कृषिप्रधान देश में किसान ही सुरक्षित और जीवित नहीं रहेंगे तो अंत में हमें उसी चीन से धान और चावल आयात करने पड़ जाएँगे जिसकी लाइटों का आप दिवाली में विरोध करते हैं.

अंत में बात बस एक ही है कि मुंबई में सात हज़ार किसान हों या सत्तर हज़ार…उससे फर्क नहीं पड़ता है. फर्क उससे पड़ेगा कि उन किसानों में जिस तरह मुझे अपने नाना और नानी दीखते हैं आपको भी अपने रिश्तेदार दिखने लगें और आप उनकी संख्या और उनके पीछे की शक्तियों को देखने के बजाय उनका दर्द और उनकी ज़रूरत दिखेगी. तब शायद आपको यह विरोध राजनैतिक नहीं बल्कि मानवीय लगेगा.

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •   

About Prabhat Ranjan

Check Also

अकेलेपन और एकांत में अंतर होता है

‘अक्टूबर’ फिल्म पर एक छोटी सी टिप्पणी सुश्री विमलेश शर्मा की- मॉडरेटर ============================================ धुँध से …

Leave a Reply

Your email address will not be published.