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अकेलेपन और एकांत में अंतर होता है

‘अक्टूबर’ फिल्म पर एक छोटी सी टिप्पणी सुश्री विमलेश शर्मा की- मॉडरेटर
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धुँध से उठती एक महीन धुन,शाख़ पर खिलता फूल , टूट कर बिखरता चाँद हो या फिर पत्तों की सरसराहट ; दरअसल भाषायी संस्कारों में ये सभी प्रकृति की अद्भुत लीला के प्रतीक भर हैं। इस लीला से साक्षात्कार आपको अपनी और सिर्फ़ खींच ही नहीं लेता है वरन् बिठा लेता है अपने पास और जादू ऐसा कि आप उससे मुक्त ही ना हो पाए। कुछ ऐसा जिसे देख -जी ,शिउली के फूलों की महक सा कुछ , मुरार सा बहुत कोमल कुछ,आप विस्मृति से स्मृति की उस यात्रा में अपने साथ ले आए। कुछ इतना कोमल की जिसे आपने सहजता से व्यक्त नहीं किया तो वो खंडित हो जाएगा क्योंकि वह आपको चुप कर देता है।ऐसे ही किसी सुरूर में हूँ जो रोमावली से होकर रूह तक पहुँचा है । उस आत्मा की प्रकृति के इतना अनुकूल कि वहाँ ही रमा है अब तलक।
निर्मल वर्मा कहते हैं हम प्राय: लेखक के अकेले क्षणों की चर्चा तो करते हैं, कभी पाठक के एकान्त की बात नहीं करते। अक्टूबर इसी सूक्ति का अनुसरण कर दर्शक या पाठक के उस एकान्त पर सीधे दस्तक देती है।कोमल भावों को बनावट की आवश्यकता नही होती । वे जितनी सहजता से खिलते हैं उतनी ही सहजता से झर भी जाते हैं , नि:शब्द। इस प्रक्रिया में बस कुछ शब्दों की प्रतिध्वनियाँ हैं जो स्थायी बनकर रह जाती है। यह स्थायित्व एक दु:ख का कारण तो किसी अन्य अपरिचित सुख का जन्मदाता बन जाता है।(Where is Dainn???)
अक्टूबर को देखना एक ख़ूबसूरत कविता का शब्द दर शब्द खुलना है। इसे अनुभव करना संचारी भाव से स्थायी भाव तक पहुँचने की यात्रा है जो क्षणिक नहीं गहरी चोट करती है आपके मानस पर। हमारा सच , हमारा जीवन वह क़तई नहीं जिसे हम जी रहे हैं ।इससे इतर सच वह है जो नीली चादर ओढ़ लेने पर आँख में पलता है, वह जिसका हम चयन नहीं कर पाए हैं , वह जो हमारे भीतर तो जीवित है; परन्तु जगत् की कृत्रिमता में कहीं खो गया है, यह वह है जिसे हम सुनना तो चाहते हैं पर सुन नहीं पाए हैं। इतना कच्चा कि ठीक से अभिव्यक्त नहीं हो पाया तो टूट कर बिखर जाएगा।
अब तक रजत पटल पर भव्यता देखी, क्रूरता देखी, प्रेम का अतिरेक देखा पर किसी कविता को इतनी ख़ूबसूरती से जीवित होते नहीं देखा । खिड़की पर ठिठका चाँद हो , शीत नीरवता में झरता हरसिंगार हो या फिर वे छोटी -छोटी बातें जो जीवन का ईंधन हैं, जीने के लिए ज़रूरी हैं, इतनी कलात्मक सहजता से अरसे बाद देखी है । रूई के फ़ाहे के अहसास की मानिंद यह कहानी जीवन-अजीवन के महीन फ़र्क़ को सिखाती है।
शब्द आत्मा पर दस्तक देते हैं उनकी कीमिया कुछ ऐसी है कि देह चेरी की तरह उसके साथ हो लेती है , मीरा की ही तरह। कोई शर्त, कोई बात, कोई मुहर वहाँ फिर नहीं बच पाती । प्रेम को अनुभावों की आवश्यकता भी नहीं , वह बस घट जाता है और फिर एक मिसरी सी डली सा कुछ घुलता रहता है सतत।ऐसा कुछ जो साथ रहेगा अक्टूबर में खिलने और बाद मौसम बिखरने के बाद भी।
इसे देखते हुए अनेक साहित्यिक चरित्र बुदबुद से ज़ेहन में उठते-बैठते रहे।चाहे बात चेखव की कहानियों की हो, निर्मल वर्मा की हो या अपने ही कैमरे पर चढ़ी ख़ूबसूरत फ्रेमों की, परदे पर इन्हें हूबहू बिना किसी छेड़छाड़ के आप देख पा रहे हों तो एक चौंक तो उभरती ही है ना!
सुजित सरकार ने इस फ़िल्म को इतनी ख़ूबसूरती और यथार्थ के साथ हम सिरफिरे दर्शकों तक पहुँचाया है कि इसके लिए शुक्रिया कहना औपचारिकता भर है , दरअसल बात उसके कहीं आगे ठहरती है।
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2 comments

  1. Nice article. There is differece b/w alone and being alone.

  2. मुकुल कुमारी अमलास

    इतनी सुंदर फ़िल्म समीक्षा आज तक नहीं पढ़ी । ऐसा लगा कोई सुकुमार सी कविता ही पढ़ रही हूँ । फ़िल्म तो निःसंदेह देखनी पड़ेगी अब।

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