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स्वाति श्वेता की कहानी ‘अपाहिज’

स्वाति श्वेता की कहानियाँ कई पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। पेशे से अध्यापक स्वाति का एक कहानी संग्रह “कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट” और एक कविता संग्रह “ये दिन कर्फ़्यू के” प्रकाशित है। अभी स्वाति गार्गी कॉलेज में स्थाई सहायक प्रवक्ता हैं। आज स्वाति श्वेता की कहानी अपाहिज पढ़िए। — अमृत रंजन

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कितना कुछ यहाँ अजीब है।

सच! मेरे अन्दर और मेरे बाहर कितना कुछ अजीब है।

मैट्रो में बैठी मैं बेचैन हो उठती हूँ। यकायक एक अजीब सी खिन्नता, फिर एक अजीब सी नफ़रत और उसके बाद एक अजीब सी शान्ति मुझे घेर लेती है। सचमुच सब कुछ अजीब है।

मेरे साथ कई युवा युवतियाँ सफर कर रहे हैं। लापरवाह, बेतरतीब, कम-कपड़े, आड़े-तिरछे बाल, बोलने का लहज़ा, संबंधों का जुड़ाव सब कुछ अजीब। माँस के लोथड़े के लिए यह जो खिचाव है वह भी अजीब। रिश्ते मानो दो ईटों के बीच सीमेंट हों, जो आज बालू के कणों से सने हुए हैं। न जाने कब भरभरा कर गिर पड़ें?

हमारी नजरें न जाने क्या टटोलती रहती हैं… यहाँ-वहाँ दिखाई देते छिद्र में से? अब नहीं लगता कि हमारे समाज में ये छिद्र कम होते चले जाएंगे। ध्यान से सूंघें तो इनमें से एक अजीब सी बास आती रहती है। पर आदी हो गए हैं अब हम सब इसके। यही कारण है कि इसका होना न होना अब हर समय हमें अहसास नहीं दिलाता है।

गिरती, धँसती, रौंदती, दूसरों को मसलती पत्थराई आत्माएँ… क्या हो गया है सबको? करणीय और अकरणीय का बोध ही नहीं रहा किसी को। सर फटने को आता है। क्या था यह शहर और क्या हो गया है? हरियाली का धीरे-धीरे बंजरपन में बदलना और फिर बंजरपन का डम्पिंग ग्राउंड में, मैंने इसी शहर में देखा है।

आई.पी. स्टेशन पर मैट्रो का दरवाज़ा खुलता है और बहुत कुछ एक क्षण में फिर बदल जाता है। कुछ रंग बाहर बिखर जाते हैं, कुछ अन्दर और अन्दर कोनों में सरक जाते हैं और देखते ही देखते एक नई रंग-बिरंगी दुनियाँ मेरे आस-पास समा जाती है।

‘अरे बेटा आगे तो बढ़ो।’ अनेक रंगो को चीरती एक आवाज मेरे कानों में अटक जाती है। पर उन रंगीनियों के अपने-अपने संगीत में शायद यह आवाज़ मद्धम पड़ गई। इतने में हरे, पीले, नीले, लाल, चितकबरे, सुर्ख रंगों को चीरता एक सफेद रंग मेरे सामने खड़ा हो जाता है। सर से लेकर पाँव तक पूरा सफेद। बुरी तरह से हाँफता, वह रंग बिना किसी शिकन के आगे बढ़ता गया। मैंने ध्यान से देखा। यकायक उसके मुख पर एक छोटी सी हँसी आई मानों इन सब रंगों के बीच उलझने के बाद बाहर निकल आने की खुशी हो, अपने अस्तित्व को इनसे अलग बचाने की खुशी हो।

उसकी और मेरी आँखे एक दूसरे से टकराती हैं। होंठ एक दूसरे की भाषा में मुस्कुराते हैं। शरीर एक दूसरे शरीर की पहचान जल्द ही कर लेता है और मैं उसे अपनी सीट पर बिठा देती हूँ।

“रब खैर करे। थैंक्यू बच्चे।” साँस फूलती आवाज़ में उस महिला ने मुझसे कहा।

‘बच्चे।’ आस-पास फैले बेतरतीब रंगों के बीच में से कहीं यह शब्द उछला फिर वहीं गिर भी गया। मैंने ध्यान से देखा उस महिला को। वह सिर से पैर तक पूरी सफेद थी और मैं! पूरी काली। आज मेरे कॉलेज में धरना था- ‘प्रोटेस्ट डे’। काले कपड़े पहन कर जाना था। कुछ ही देर में कश्मीरी गेट स्टेशन आ जाता है और कई सीटें खाली हो जाती हैं। इससे पहले कि फिर से सीटें भर जाएँ मैं जल्दी से उस महिला की साथ वाली सीट पर बैठ जाती हूँ।

“नौकरी करती हो ? उस महिला ने मुझसे जानना चाहा।

“हाँ।” मैंने उत्तर में केवल इतना ही कहा।

“कहाँ ?”

“दिल्ली यूनिवर्सिटी।” मैंने फिर केवल इतना ही उत्तर दिया।

कुछ देर बाद वह अपने ऐंठे हुए घुटनों पर हाथ फेरने लगती है।

“क्या हुआ ?” मैंने जानने की इच्छा दिखाई।

“फिटे मुँह गोडियाँ दाँ जिहड़े ए दिन विखाए। बहुत तंग करके रखा है इसने। बड़ी दिक्कत होती है अब। कल डॉक्टर साहब ने बुलाया है। क्या पता कल ऑपरेशन की तारीख पक्की हो जाए” उसने लम्बी साँस छोड़ते हुए कहा।

“आपका ऑपरेशन बढ़िया ढँग से हो जाए यही कामना करती हूँ।”

“हाँ पुत्तर जी इस दुनिया में सब कुछ बढ़िया ढँग से हो जाता है अगर पैसा हो तो। बच्चे की तालीम, उसकी शादी, आपका सपनों का घर और बुढ़ापे में आराम। सब। समझी की नहीं।”

मैंने मुस्कुरा दिया।

मुझसे ज्यादा इस बात को कौन जान सकता है।

और उस एक वाक्य के साथ बीता हुआ समय आँखों के सामने घूम जाता है…

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“अरे शर्मा जी आपने इतनी देर क्यो की ? अब तो केस और भी काम्प्लीकेटेड हो गया है। आप इस तरह लापरवाह कैसे हो सकते हैं।” डॉक्टर डे पापा से कह रहे थे।

“डॉक्टर साहब कोई एक्सरसाइज या फिर इन्जेक्शन।”

“नो।” डॉक्टर ने बीच में ही पापा की बात को काटते हुए कहा था।

“नाओ देअर इज नो अदर ऑपशन लेफ्ट वी हैव टू गो फार बोथ दी नीज़। जस्ट लुक एट द एक्स रे। आठ तारीख को मेरा अगला ऑपरेशन डे है। बुकिंग करा लीजिए।”

“डॉक्टर साहब कुल कितना खर्च आएगा।” मां के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा।

“पाँच तो मान कर चलिए। एक आध ऊपर भी हो सकता है।” इतना कह डाक्टर डे कमरे में से निकल पड़े।

आज भी याद है मुझे उस दिन शाम साढ़े पाँच बजे तक हम सब वही थे। पापा अपने साथ साढ़े तीन लाख लेकर आए थे। इस अनजान शहर में कोई रिश्ता कोई नाता उनका न था सिवाए बड़े भइया और मेरे। मेरी नौकरी पक्की भी न थी और तन्खाह पिछले दो महीनों से मिली भी न थी। बड़े भइया की नौकरी पक्की थी और सरकारी भी। पापा वापस भुवनेश्वर जाते, पैसों का इंतजाम करते तब तक काफी देर हो जाती। जो करना था तुरन्त करना था।

पापा ने बड़े भइया से कहा था पर उन्होंने अपनी असमर्थता दिखाई।

पापा ने उन्हें कहीं से इंतज़ाम करने के लिए कहा कि एक-दो महीनों में लौटा देंगे। उन्होंने अपनी फिर असमर्थता दिखाई। पापा जानते थे कि मुझे कहना उचित नहीं क्योंकि मेरे पास तो पक्की नौकरी भी नहीं थी। और ऐसा ही हुआ। उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं कहा। पर उनका वह मूक और विचलित चेहरा, व्हील चेअर पर बैठी माँ और उसकी आँखों में वह भाव जिससे वह हमें देख रही थी, सब कुछ कह रहा था। माँ की उम्र पिचहत्तर की हो रही थी और पापा अस्सी  पार कर चुके थे। मुझसे देखा न गया और मैं वेटिंग रूम से बाहर आ रोने लगी।”

“हे भगवान ! मैं क्या करूँ ? मुझसे अपनी माँ का दुख और पिता की विवशता देखी नहीं जाती।” मैंने सुनि को फोन लगाया।

“हाँ। बोलो।” दूसरी तरफ सुनि थी।

मैंने सारा का सारा खर्चा उसके सामने रखा। सुनि मेरी सबसे, अच्छी सहेली है। हम दोनों कई सालों से पक्की नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वह अपने पति से अलग रहती है क्योंकि उसका पति उसके लायक नहीं, शराबी है वह। और मैं ! मेरा तो पति मुझसे अलग रहता है क्योंकि शायद मैं उसके लायक नहीं…

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…बात कई साल पुरानी है। शादी को एक महीना ही हुआ था। एक दूसरे को जानने-परखने से पहले ही गोलू मेरी जिन्दगी में आ गई…।

कितना मुश्किल होता है इस बड़े से शहर में अपना और इस नन्ही सी जान की परवरिश करना। एक-एक पैसा जोड़ना। अपनी कितनी ख्वाहिशों को पैरों के नीचे दबा, हर समय, हर दिन आने वाले समय के लिए संचय करना। पापा ने बहुत समझाया कि भुवनेश्वर वापस आ जाओ। पर मैंने यहीं से एक नई शुरुआत करने की सोची।

“…अब क्या करेगी ?” सुनि के उन शब्दों ने मुझे फिर वहीं खड़ा कर दिया  जहाँ अभी कुछ क्षण पहले मैं भोक्ता थी।

“पता नहीं I’’ मै केवल इतना ही कह पाई थी I

मेरे बैंक में तो तीस हज़ार से ज्यादा अभी होंगे भी नहीं। पापा जब तक वापस जाएँगे और पैसों का बन्दोबस्त करेंगे तब तक दस-पंद्रह  दिन और बीत चुके होगें और माँ के दोनों पैर हमेशा के लिए सुन्न पड़ चुके होंगे। फिर तो ऑपरेशन भी उन्हें ठीक नहीं कर पाएगा।

नहीं। मैं माँ को अपाहिज नहीं देख सकती…

“कोई मुझे उधार नहीं दे सकता है क्या सुनि?

“कोई तुझे क्यों उधार देगा ? तेरे पास पक्की नौकरी भी तो नहीं हैं।” सुनि ने जवाब किया था।

और तब उस समय मुझे अपने से घिन्न आती है। इतनी पढ़ाई किस काम की? इस समय जब मेरे माता-पिता को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है तब मैं कुछ भी नहीं कर पा रही हूँ।

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…मैं राघव की पत्नी थी।

राघव ! एक  बड़ा बिजनेसमैन है। मुझे याद है जब गोलू पैदा हुई थी। राघव बहुत खुश थे। उन्हें यह खबर सुनकर ऐसी खुशी हुई थी कि क्या बताऊँ। पर जब गोलू नर्सरी से मेरे कमरे में आई तो डॉक्टर और सिस्टर का गिरा हुआ मुँह आने वाले तूफान से पहले की शान्ति लाया था। गोलू का सीधा हाथ नहीं था। उसका रंग साँवला था और ऊपर से वह लड़की थी। राघव पत्थर सा हो गया था। लड़की होना उसके लिए सदमा न था पर साँवलापन और ऊपर से सीधा हाथ ही न होना। वह मानने को तैयार न था। पर ना मानने से क्या होता है। यथार्थ का सामना तो हमें करना ही था।

गोलू को हम दोनों एक हफ्ते के बाद घर ले आए। हम सब संयुक्त परिवार में रहते थे। घर की हवा धीरे-धीरे बहुत भारी होने लगी थी। न आसानी से खींचते बनती और न ही आसानी से छोड़ते। तानों की बौछारें आने में देर न लगी। क्या-क्या न कहा था माँ ने। मेरी कोई ननद न थी। होती तो शायद माँ ऐसा नहीं करती। जेठ थे। उनकी शादी किन्ही कारणों से नहीं हुई। अक्सर माँ और मेरे जेठ मेरे माँ-पापा और भाई को ताना देते।

“अरे भाग है इसका जो राघव जैसा हीरा मिला ? मैं तो कहती हूँ कि पिछले जन्म में मोती बाँटे होंगे ? जान पहचान थी तभी तो सोचा था कि ठगे नहीं जाएँगे पर हमें क्या पता था कि जिन पर विश्वास कर रहे हैं उन्हीं का भरोसा न रहेगा ? हमें कुछ नहीं चाहिए यही तो कहा था ! पर आपकी बेटी को तो बहुत कुछ चाहिए होगा ?”

माँ भाई साहब से और भी न जाने क्या-क्या कहती रहती और दो-तीन कमरों की दीवारों को फाँद कर आवाज़ें मुझ तक पहुँचती रहती। मेरे घर से आई सभी चीज़ों का मूल्य उनकी नज़रों में शून्य था। मेरी बच्ची, नहीं, मेरी नहीं हमारी बच्ची, साढ़े चार की हृष्ट-पुष्ट पैदा हुई थी। एक हाथ नहीं था तो इसमें मेरा या उसका क्या कसूर। पर घर में बार-बार कहा जाता कि मैं अपने माँ पर गई हूँ। मेरी माँ पाँच बहनें थीं। इसलिए मेरी भी बेटी हुई और रही बात एक हाथ न होने की तो क्या पता मेरे खानदान में ऐसे अपाहिज पैदा हुए हो जिन्हें परिवार वालों ने मार दिया या वे खुद ही मर गए हों…

“नहीं, कभी नहीं, मैं अपनी गोलू को कभी नहीं मारूँगी और न ही मरने दूँगी।” और मैं गोलू को अपने दोनों हाथों में कस कर छिपा लेती।

पर कुछ ही सालों में एहसास होना शुरू हो गया कि गोलू अपाहिज है। अभी वह दो की थी पर धीरे-धीरे उसे अपनी अपाहिजता का बोध होने लगा था। मैं उसे चाह कर भी लोगों के तीखे प्रहारों से बार-बार बचा न पाती। उसकी आत्मा पर कुछ एक घाव तो मैंने भी महसूस करने शुरू कर दिए थे। पर ये वे घाव थे जो मैंने देखे थे। न जाने और कितने घाव होंगे जिसे वह हर पल सहती जा रही थी।

सच कहूँ ! मैंने पिछले नौ वर्षों में बहुत कुछ अपने जीवन में बिना है और आज तक बिनती चली जा रही हूँ। जानते हैं क्यों ? अपनी गोलू के लिए।

गोलू के पैदा होने के तीन वर्षों के बाद यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि गोलू और मेरी अब यहाँ कोई जरूरत न रही है। राघव भी किसी न किसी बहाने मुझसे और गोलू से दूर रहते। और एक दिन माँ ने राघव के सामने ही तलाक के कागज़ रख दिए। राघव ने एक बार भी कुछ न कहा। शायद राघव की भी सहमति थी। अब तो कुछ रहा ही नहीं। मैंने दस्तख्त कर दिए और एक सूट केस में कुछ समान और राघव की कुछ यादों को समेट निकल आई। जाते समय राघव ने मुझे तो दूर गोलू को एक बार देखा भी नही। शायद हम दोनों के कारण वह अपनी जिन्दगी जी भी नहीं पा रहा था। कितने दिन वह हम दोनों से छिपता? शायद इसीलिए तलाक का रास्ता उसे सबसे सही लगा हो।

खैर सात महीनों बाद हमारा आपसी सहमति से तलाक हो गया। लोगों ने मुझे राघव से गोलू के लिए पैसे माँगने के लिए बहुत कहा। पर मुझे यह ठीक न लगा। गोलू को राघव ने कभी अपना न माना था। हम दोनों को वह अपराधी मानता था। एक जघन्य अपराध करने की सजा थी वह तलाक। बाद में पता चला कि एक साल के बाद उसने दूसरी शादी कर ली।

आज सात साल हो चुके हैं पर उसे कोई सन्तान नहीं। इसे भगवान का न्याय या राघव का दुर्भाग्य कहूँ। पता नहीं…

…खैर मैंने भी एक साल के अन्दर-अन्दर नौकरी शुरू कर दी। कब तक भुवनेश्वर रहती। इसलिए दिल्ली में ही काम शुरू किया। एक कमरे का मकान किराए पर लिया और गोलू को स्कूल के बाद क्रेच में डाल दिया। मेरे माँ-पापा का खूब बड़ा मकान था और मुझे इस हाल में देख वह दुखी होते। माँ बार-बार कहती, “बेटा क्या रखा है यहाँ। इस शहर में हमने तुझे ब्याहा था। पर इस शहर ने तुझे कुछ भी सुख न दिया। एक कमरा तो नौकरों का होता है और ऊपर से गोलू को इसमें पालेगी ? ”

पर वह बोल कर थक चुकी थीं और अब तो शरीर से भी थक चुकी हैं। चलती-फिरती मेरी माँ व्हील चेयर पर आ गई। पिछले आठ सालों में मैंने कैसे जीवन जीया है मैं ही जानती हूँ। आगे का सोचने को कुछ नहीं। मैं अपनी बेटी को आगे कैसे पालूँगी यह भी नहीं पता।

“माँ !’ तभी एक स्पर्श मुझे पीठ पर होता है और मैं सिहर जाती हूँ।

“गोलू ! तू यहाँ ! ऊपर क्यों आ गई ? वहीं नानी के पास बैठती न बेटा !”

“माँ, मैं नानी को ऐसे देख नहीं पा रही हूँ।”

कहाँ से लाऊँ पैसे? मेरे पास तो बैंक में तीस हज़ार से ज्यादा हैं भी नहीं। कुछ क्षण हम दोनों के बीच मौन बातें करता है और फिर-

“आप मेरा ‘फिक्स डिपोज़िट’ तोड़ दो माँ।”

“क्या? ” अनायास ही मेरे मुँह से निकल पड़ा। एक बार फिर वही मौन छा जाता है। पर इस बार जब यह टूटता है तो इसकी गूँज दूर तक मेरे व्यक्तित्व में सुनाई देती है।

“माँ, क्या आप चाहेंगी कि घर में एक और अपाहिज रहे? अपाहिज होने का दर्द नानी पछत्तर साल में सह नहीं पाएगी।” इतना कह गोलू नीचे नानी के पास चली जाती है।

गोलू का यह वाक्य मेरे अन्दर न जाने क्या-क्या तोड़ता चला जाता है।

कौन कहता है कि गोलू अपाहिज है ?

मेरी गोलू अपाहिज नहीं।

अपाहिज तो कई रिश्ते हो चुके हैं जिनमें रक्त का संचार अब नहीं होता, जो केवल नाममात्र माँस के लोथड़े हैं, जो पैसों और मतलब के कारण जुड़ते हैं और पैसों और मतलब के कारण ही अपने आपको दूसरों से अलग करते हैं।

छद्म जिह्वा न जाने किस-किस चीज़ से आच्छादित हो हर बार उसी माफी की परम्परा का निर्वाह करती है। पर दूर खड़ी एक मासूम से भी वह अपनी अपाहिजता को छुपा नहीं पाती है।

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अगले दिन माँ अस्पताल में भर्ती हो जाती है। आज चार साल हो चुके हैं। मेरी नन्हीं गोलू की तरह माँ भी चहकती है। दूर-दूर तक चलती है और गोलू को बार-बार कहती है-“मुझे बहुत समय तक अब चलते जाना हो, तब तक जब तक मेरी गोलू जिन्दगी की दौड़ में दौड़ना न सीख जाए।”

और तभी ट्रेन के झटके के साथ मेरी सोच की श्रृंखला टूट जाती हैI

अब  मैं अपने उस अतीत से पुनः वर्तमान में आ गई  हूँ।

मेरे बगल की सीट खाली हो चुकी है।

राजीव चौक आ चुका है और एक बार फिर अनेक रंग डिब्बों में छा जाने के लिए आतुर हो उठते हैं।

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About Amrut Ranjan

कूपरटीनो हाई स्कूल, कैलिफ़ोर्निया में पढ़ रहे अमृत कविता और लघु निबंध लिखते हैं। इनकी ज़्यादातर रचनाएँ जानकीपुल पर छपी हैं।

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2 comments

  1. स्वाति श्वेता की कहानी कैरेक्टर सर्टिफिकेट उन्हीं की जुबानी सुनी थी रमणिका जी के यहाँ कहानी पाठ के एक कार्यक्रम में…
    अभी अपाहिज कहानी जानकीपुल पर पढ़ी … स्वाति श्वेता जी के पास अति नाटकीयता व पात्रों पर बेचारगी की अति नहीं है..न ही वो नकरात्मक पात्रों के प्रति हिंसा रचती हैं.
    न ही वो शिल्प के चमत्कार से चमत्कृत करती हैं..
    उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए लगता है कि हम खुद से ही आत्मसंवाद की एक ईमानदार कोशिश कर रहे हैं.
    क्योंकि आत्मसंवाद की प्रक्रिया में फर्जी चीजें भाषा पर नहीं लादी जाती हैं.. अतः उनकी कहानी की भाषा इन सबको वहन नहीं करती

    उनकी कहानियाँ जीवन की सबसे सामान्य घटनाओं भावना व वेदना का ठाँव है जिसमें थोड़ी देर ठहरकर अपने स्व, स्वत्व व समाज का मिजाज पता चलता है जिन्हें अक्सर सरलीकरण के चलते अनदेखा कर दिया जाता है..

  2. बेहतरीन कहानी उस मध्यमवर्गीय परिवार की और उनसे अनजुड़े रिश्तो जो ताउम्र रिसते हुए से ही प्रतीत होते हैं! एक शानदार कथानक मन को अन्दर तक भिगो गया! लेखिका को बहुत बहुत साधुवाद!

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