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बाज़ार के चंगुल में फंसे भयावह समय का कथानक ‘पागलखाना’

ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास ‘पागलखाना’ पर राहुल देव की टिप्पणी. बहुत बारीकी से उन्होंने इस उपन्यास को हमारे लिए खोला है. एक आदर्श समीक्षा का नमूना. चाहे आप सहमत हों या असहमत लेखक का लिखा प्रभावित कर जाता है- मॉडरेटर

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जब/ ममता, गाय के थनों से निकलकर/ पॉलीपैक में कैद/ और मेहंदी हथेलियों से उतरकर/ कंटीली फेंसिंग में लौट जाए/ वह समय/ जीवन से स्वाद और रंग की विदाई का ख़तरनाक समय होता है

ज्ञान चतुर्वेदी के पांचवे उपन्यास ‘पागलखाना’ को पढ़ते हुए मुझे निरंजन श्रोत्रिय की उपरोक्त काव्यपंक्तियाँ याद आती रहीं | ज्ञान जी उन बिरले लेखकों में से हैं जिन्होंने अपने आपको दोहराया नही है | उनका सम्पूर्ण लेखन नदी की तरह रहा है उन्होंने नहर बनाकर कभी अपने आपको सीमित नही किया | उम्र के इस परिपक्व पड़ाव पर भी वे हमेशा कुछ नया करने को आतुर लेखकों में से हैं | इस उपन्यास में उनका गद्यशिल्प फैंटेसी है | हिंदी व्यंग्य के औपन्यासिक प्रारूप के लिए फैंटेसी एक नया प्रयोग  है | इससे पहले आमतौर पर व्यंग्यकार कहन की सुविधा के लिए मिथकीय रूपकों का प्रयोग करते रहे हैं | वह शिल्प अब पुराना पड़ चुका है | फैंटेसी का अर्थ होता है- स्वप्नचित्र अथवा कल्पना चित्र | रचना में इसका प्रयोग करते समय इसमें यथार्थ में घटित घटनाओं को स्वप्न-चित्र बनाकर प्रस्तुत किया जाता है- ‘The genre of fantasy is an opportunity to dream of reality as we might like it to be.’ जैसे कि इस उपन्यास में भी देखें तो लोगों के सपनों, स्मृतियों का खो जाना, लोगों का नंबरों में तब्दील हो जाना, सपनों की हत्या हो जाना, घड़ी का कलाई पर यथावत बंधे रहना लेकिन उसमें से समय का गायब हो जाना, तालों में आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस का होना, सपनों का मलबा, स्मृतियों का बीमा, कथापात्रों को सबकुछ एक षड्यंत्र लगना, पूरी दुनिया का एक बड़े पागलखाने में बदल जाना और अंत में समय का बाज़ार के खिलाफ विद्रोह कर देना | ‘पागलखाना’ इस अनोखे लेकिन असरदार शिल्प में बाजारवाद के प्रतिरोध की सशक्त व्यंग्यकथा कहता है |

ज्ञान जी का यह उपन्यास उनकी पिछली कृतियों से एकदम अलग है | इसका आभास हमें उपन्यास रचने की उनकी लम्बी रचनाप्रक्रिया पढ़कर ही लग जाता है | जिसमें उन्होंने विषय चयन से लेकर उसके निर्वहन तक की तमाम बातें अपने पाठकों से शेयर की हैं | ज्ञान जी पाठक के विवेक पर भरोसा रखने वाले रचनाकार हैं यह कृति इस भरोसे को और पुख्ता करती है | ‘पागलखाना’ कोई परम्परागत शैली में लिखा गया उपन्यास नही है | इसकी थीम, पात्र और घटनाएँ आपको एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं जहाँ शायद ही आप जाना चाहें | अभिधा में रहते हुए भी, व्यंग्य की ज्यादा गुंजाईश न रहते हुए भी जिस तरह से उपन्यासकार बाज़ार के भयावह हो चुकी कल्पना को यथार्थ से जोड़ता है वह सराहनीय है | हिंदी साहित्य में ऐसी प्रतिभा बहुत कम लेखको में है | ‘पागलखाना’ का व्यंग्य ‘राग दरबारी’ के व्यंग्य से एकदम अलग किस्म का व्यंग्य है | ‘राग दरबारी’ में मुखर हुआ व्यंग्य बाह्य व्यंग्य है जबकि ‘पागलखाना’ में उपजा व्यंग्य अंतर्मुखी व्यंग्य है | वह बाज़ारवाद के प्रभाव की तरह आपको ऊपर से नही दिखेगा बल्कि वह पूरी रचना में नमक की तरह घुला हुआ है | उसका आस्वाद हास्य के नही बल्कि करुणा के ज्यादा पास ठहरता है | यहाँ पर लेखक ने बड़ी ही कुशलता से गंभीर व्यंग्य को कथानक में बगैर किसी अतिरिक्त दखल के समाविष्ट किया है | बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ ज्ञान जी का यह प्रयोग हर दृष्टि से सफल साबित होता दिखता है |

उपन्यास का कथासमय वह है जब जीवन पर एक दिन बाज़ार का पूरा कब्ज़ा हो जाता है | यहाँ तक कि रौशनी और धूप जैसी सर्वसुलभ प्राकृतिक चीज़ों के लिए भी पेमेंट करना पड़ता है | यहाँ कुछ भी मुफ्त नही मिलता | हर निर्णय बाज़ार के अधीन है | हर व्यक्ति उसके लिए सिर्फ एक ग्राहक है इससे अधिक कुछ नही | फिर भी कुछ लोग उसके झांसे में नही आते हैं | वे उसकी पकड़ से भागने के प्रयास करते हैं | ऐसे लोग जीवन को बाज़ार से बड़ा मानते हैं लेकिन अंततः वे बाज़ार के जाल में फंसकर समाज के लिए पागल करार दिए जाते हैं | ‘पागलखाना’ ऐसे पागल हो चुके समय में ऐसे ही कुछ ‘पागलों’ की दास्तान है |

यह उपन्यास अगर ज्ञान चतुर्वेदी के अलावा और कोई लेखक लिखता तो वह निश्चित ही जटिल होकर अपने ही बनाये जाल में उलझ गया होता | ज्ञान जी के पिछले उपन्यासों में पठनीयता एक जरूरी गुण की तरह हरदम उपस्थित रहा है ऐसे में उनके हाथ में पड़कर यह उपन्यास बहुत कुछ इन खतरों के अपने आपको बचा ले गया है | उपन्यास अपने पढ़े जाने के लिए पाठक से एक न्यूनतम बौद्धिक स्तर की अपेक्षा करता है | यह कई बैठको में धीरे-धीरे पढ़ा जाने वाला उपन्यास है | उपन्यास में एक पात्र है जिसे सपने नही आते उसे अपनी आँखों का खालीपन काटता है जिसका ज़िम्मेदार वह बाज़ार को मानता है | उसकी तरह कुछ और पात्र भी हैं जिनकी जिंदगी बाज़ार ने बर्बाद कर दी है और वे उससे बचाव के ‘पागलपन’ भरे तरीके आजमाते हैं | कोई बाज़ार से दूर अलग दुनिया की तलाश में सुरंग खोदता है तो कोई गटर के मेनहोल में जाकर रहना चाहता है | जिनकी कथा जैसे जैसे आप पढ़ते हुए आगे बढ़ते हैं आपके दिमाग के तार झनझना उठते हैं | भले ही यह सब एक विराट फंतासी है लेकिन उसकी सभी जड़ें आज के यथार्थ में निहित हैं | लेखक ने अपने चरित्रों का चुनाव बहुत सोच-समझकर किया है | वे चरित्र समाज के विभिन्न वर्गों से आते हैं | लेखक हर वर्ग की त्रासदी को रचनात्मक ढंग से रेखांकित करता है | सभी पात्रों की कथा समानान्तर चलती हुई एक सूत्र में कसावट के साथ बंधी हुई है | ऐसा लगता है मानो जिसे लिखते हुए न लेखक चैन से रहा हो और पढ़ते हुए न पाठक | पूरा उपन्यास पढ़ते हुए एक संवेदनशील मन पाठक बेचैन हो उठता है | ‘पागलखाना’ बाजारवाद का प्रतिपक्ष रचता है और हमें भयानक भविष्य के प्रति आगाह भी करता है | उपन्यास में वर्णित सभी विसंगतियां प्रवृत्तिगत हैं और सभी चरित्र सर्वनामीय हैं | इस कारण उपन्यासकार किसी सीमित जगह की कोई सीधी कहानी कहने के बजाय एक बड़े फलक की कथा कहने में समर्थ हो सका है | ‘पागलखाना’ एक उद्देश्यपरक रचना है | भाव-भाषा-शिल्प सभी कुछ नयेपन से संयुक्त रहते हुए भी नया नही है | बात सीधी सी है पर फिर भी सीधी नही है | उपन्यास शुरू करते ही आप एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करते हैं जहाँ शायद आप पहले कभी नही गये होंगें | यहाँ आप उस पागलपन की कल्पना में नही उड़ेंगें बल्कि जमीन पर रहते हुए उस पागलपन को महसूस करेंगें | यहाँ ज्ञान चतुर्वेदी एक बहुत डरावनी बनती जा रही दुनिया के निर्माण की कहानी कहते हैं | मेरी दृष्टि में यह कृति लेखक की रचनात्मक सिद्धि का अब तक का सर्वश्रेष्ठ आयाम है |

दरअसल उपन्यासकार बाज़ार को जीवन के लिए एक हद तक ही जरुरी मानता है | उस हद को पार कर लेने के बाद बाज़ार जीवन में घुसपैठ कर क्या क्या करता है यह आज के इस उत्तरआधुनिक समय में किसी से छुपा नही है | बाज़ार मनुष्य के लिए है मनुष्य बाज़ार के लिए नहीं | बाज़ार, पूँजी और सत्ता का खतरनाक गठजोड़ मानवीय सामाजिक निर्मिती को तहस-नहसकर उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल भर करता है | यह समय आगे और कितना विकट हो सकता है इसका पूर्वानुमान आप इस उपन्यास को पढ़कर सहज ही लगा सकते हैं |

बाज़ार मनुष्य ने बनाया है अपनी सुविधा के लिए लेकिन अब वह उसकी चेतना पर हावी होकर उसे अपने जैसा बना रहा है | धीरे-धीरे एक ऐसी व्यवस्था बनती जा रही है जिसमें मनुष्य और उसके जीवनमूल्य खो रहे हैं | हम बाज़ार के गुलाम हो रहे हैं | आज बाज़ार की पहुँच जीवन में इस कदर हो गयी है कि हम उत्तरआधुनिक चकाचौंध से सराबोर किसी कृत्रिम दुनिया में जीने लग गये हैं जबकि वह हमारी नैसर्गिक दुनिया है ही नहीं | हम इस समानान्तर छलावे से बेखबर सो रहे हैं | सपनों का न आना अब हमारे लिए चिंता की बात नही रही | जो यह चिंता कर रहे हैं उन्हें पागल घोषित किया जा रहा है | उपन्यास में लेखक एक जगह पर कहता है, एक बार सामने वाले को पागल भर मान लो तो चीज़ें आसान हो जाती हैं | तब उसके द्वारा कहा सच भी एक चुटकुला माना जा सकता है |’ इस प्रकार बाज़ार के विरोध में उठने वाली हर सार्थक आवाज़ को दबाने या फिर उसे हाशिये पर डालने की साजिशें दरपेश हैं | बाज़ार हमारे ही सपनों को हमसे छीनकर उन्हें सामान के रूप में बदलकर हमें बेचने लग गया है | सोचकर देखिये तो यह पूरे विश्व की ऐसी समस्या बन गया है जिसका वक्त रहते अगर इलाज न किया गया तो निकट भविष्य में इसके परिणाम बड़े ही खतरनाक होंगें | हम इससे जानबूझकर अनभिज्ञ हैं क्योंकि शायद हमें वह आभासी और क्षणिक दुनिया अच्छी लगने लग गयी है | हमारी हर दृष्टि पर बाज़ार का चश्मा चढ़ा हुआ है इसलिए हमें उसमें सुख नज़र आता है | जो उसके खिलाफ हैं वे बाकियों के लिए ‘पागल’ ही तो हैं | जीवन के प्रति आस्था और सपनों की उत्कंठा का यह पागलपन बाजारवाद के ढके सच को ज्ञान जी अपने इस महत्वाकांक्षी उपन्यास के जरिये हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं |

बाज़ार की आंधी में यथार्थ के बदलने की गति बड़ी तेज है | आप देखिये वह पल भर में ही बदल जाता है | कल जो सपना था वह आज हकीकत बन जाता है | अगले दिन वह हकीकत अपने स्वप्न से दो कदम आगे खड़ी मिलती है | ऐसे में उस यथार्थ को रचनात्मक साहित्य में ढाल पाना खासा दुष्कर है | लेखक को एक साथ समकालीन बने रहते हुए अपने समय से संवाद भी स्थापित करते रहना है साथ ही उसे आगे आने वाले बदलावों के दृष्टिगत भविष्यदृष्टि भी रखनी है | यह बात एक छोटी रचना में साधनी हो तो कोई खास मुश्किल नही आती लेकिन जब ऐसी चुनौती को आप उपन्यास जैसी बड़ी रचना में लेते हैं तब आपके अन्दर के लेखक की वास्तविक परख होती है | ज्ञान चतुर्वेदी का यह उपन्यास ‘राग दरबारी’ के बाद हिंदी व्यंग्य उपन्यासों की परम्परा को नई ऊँचाइयों तक ले जाने वाला साबित होगा | यहाँ से उन्होंने व्यंग्य कथासाहित्य एक नए मुहावरे का सूत्रपात किया है | मेरी राय में अपने महत्वपूर्ण विषय चयन और एकदम अलग ढंग के कथा प्रारूप के चलते इस उपन्यास की चर्चा आने वाले लम्बे समय तक रहने वाली है |

‘पागलखाना’ में लेखक सिर्फ ऐसे लोगों की कथा ही नही कहता बल्कि इनके माध्यम से ऐसी भागती-दौड़ती बाजारी व्यवस्था में बदलाव की हिमायत करता है | इसके माध्यम से वह हमें जीवन को जीवन की तरह देखने का विनम्र आग्रह करता है | उपन्यास में जगह-जगह तमाम सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं पर बात की गयी है | तमाम वैचारिक सूत्र कथा और कथापात्रों के माध्यम से स्वयमेव उपजते हैं इसके लिए अलग से लेखक का कोई दखल नही है | इस लिहाज से मैं इस उपन्यास को समस्यामूलक विचारपरक द्वंदात्मक व्यंग्य उपन्यास भी कहा जा सकता है |

हर जगह बाज़ार के कारिंदे घूम रहे हैं | वह किसी अदृश्य मनुष्य की तरह लोगों के पीछे लगा हुआ है | वह उजालों में भी है और अंधेरों में भी- बाज़ार की यही तो विशेषता है | वह खुद ही अँधेरे पैदा करता है और खुद ही उन अंधेरों की चिंता भी करता है |’ जब बाज़ार का कारिन्दा उससे कहता है कि उसे कुछ पागलों की चिंता नही करनी चाहिए तो बाज़ार उसे फटकारता हुआ जवाब देता है, कैसी बातें करते हो ? अरे, आज जिस रास्ते पर एक पागल जा रहा है, कल सारे लोग उस रास्ते पर चल सकते हैं | दुनिया में कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि किसी एक पागल ने रास्ता दिखाया है और लाखों लोग उसके पीछे चल दिए हैं |…हमें पागलों की बातों को कम करके नही आंकना चाहिए |…आज एक शख्स भागने की कोशिश कर रहा है, कल सारे करेंगेंबाज़ार डूब जाएगा |…” उसे लगता है कि उसकी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी में कहीं कोई गड़बड़ी है | इस तरह बाज़ार एक बड़े दैत्य की तरह सबकुछ निगल जाने को आतुर है | ऐसा नही है कि लेखक ने पूरे उपन्यास में केवल बाज़ार के चरित्र के नकारात्मक शेड्स ही दिखाए हैं बल्कि जीवन के प्रति दुर्दम्य जिजीविषा और सकारात्मक आस्था के साथ व्यक्ति की निजता और स्वतंत्रता की रक्षा उसकी एक भावना रही है |

सायकेट्रिक के पास ले जाने पर वह आदमी जिसके सपने गुम हो गये हैं अपने बेटे से कहता है, आदमी अपने सपनों को बेइंतहाँ प्यार करता हो तो सपनों की दुनिया और यह दुनिया आपस में मिल जाती हैं | तब आदमी एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आसानी से आवाजाही कर सकता है | वास्तव में ये दोनों दुनिया समांतर बसी हैं और दोनों के बीच पचासों पुल भी बने हैं | हर घर में एक पुल खुलता है | घर बंद हो या खुला, इससे फर्क नही पड़ता | पुल के रास्ते अपने सपने में घुसा जा सकता है, और वहां से कहीं भी |…वे न जाने ऐसा ही क्याक्या बड़बड़ाते रहे | ऊलजलूल |”

दोनों के बीच होता संवाद और उसके मासूम से तर्क सुनकर दिल करुणा से भर उठता है | डॉक्टर के स्वांग को देखकर वह मुस्कुराता हुआ कह उठता है,

“’सपनों की आवाजें सुनने, समझने वाले कान नही हैं आपके पास, डॉक्टरआप कोशिश भी न करें | आपको कुछ भी सुनाई नही देगा | आपके कानों में बाज़ार का शोर इतना लाउड है कि वहां मेरे सपनों की सिसकियाँ आपके आले से भी आपको सुनाई नहीं देंगीं |… वे बोले |

बाज़ार का शोर ?…मेरा यह कमरा साउंडप्रूफ है जनाब | यहाँ कोई भी आवाज़ नही आ सकती |’ डॉक्टर ने गर्वमिश्रित मुस्कान के साथ कहा |

ऐसे साउंडप्रूफ कमरे बड़े खतरनाक होते हैं डॉक्टर !…इनमें, धीरेधीरे अपनी खुद की आवाज़ भी सुनाई देनी बंद हो जाती है | ध्यान रखिएगा |’ उन्होंने चेतावनी के स्वर में कहा |”

लेखक कहता भी है कि हर क्रान्तिकारी विचार शुरू के अकेलेपन में पागलपन ही तो होता है | हद तो तब होती है जब ‘सुरंग वाले अंकल’ को उनके द्वारा खोदी जा रही सुरंग के बाबत बाज़ार उन्हें एक ‘प्रोजेक्ट’ का ‘प्रपोजल’ भेज देता है | इस तरह वह बड़ा ही ‘मार्केट फ्रेंडली’ होकर उन्हें दबोचने की आखिरी कोशिश करता है | दूसरी तरफ मेनहोल को लेकर एलियन और तमाम तरह की अफवाहें वायरल हो जाती हैं | उपन्यास का अंत जितना मार्मिक है उतना ही सार्थक भी | बाज़ार कुछ ‘पागलों’ को मारने में सफल हो जाता है तो कुछ को उनके न चाहते हुए भी अपने इलाके में जबरदस्ती खीँच लाता है | जैसे कि सुरंग बाबा की क्रांति का आध्यात्मिक अंत | फिर भी उसका चरित्र कमज़ोर नही है | वह भले ही हार गया लेकिन उसे उम्मीद है कि उसकी यह लड़ाई जारी रहने वाली है | पागलों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है | डॉक्टर इस निश्चित पैटर्न के ‘पागलपन’ को समझ नही पा रहे हैं | बाज़ार इन विद्रोहियों से निपटने के लिए नित नए प्लान्स बना रहा है कि तभी समय विद्रोह कर देता है | यह देखकर बाज़ार सकते में आ जाता है | वह तो स्वयं को समय से परे समझ रहा था | उसने खुद को ईश्वर समझने की गलती कर दी थी | वह गलत साबित होता है | इस चरमबिंदु पर उपन्यास समाप्त होता है |

पश्चिमी विचारक एडुवार्डों गैलिआनो लिखता है, ‘साहित्य के लिए सबसे बड़ा काम बेहतर दुनिया की हमारी साझी समझ के खिलाफ बेधड़क और खुलेआम चल रहे सरकारीकरण और बाजारीकरण से शब्दों को बचाना है। क्योंकि आजकल आज़ादी’ मेरे देश की एक जेल का नाम है और तानाशाह सरकारों ने खुद को ‘लोकतंत्र’ घोषित कर रखा है। अब ‘प्यार’ इंसान का अपनी गाड़ी से लगाव और ‘क्रांति’ बाजार में आये किसी नए ब्रांड के धमाकेदार प्रचार के काम आ रहे हैं। अब हमें खास और महँगे ब्रांड का साबुन रगड़ने पर ‘गर्व’ और फास्टफूड खाने पर ‘खुशी’ का एहसास होता है। ‘शांत देश’ दरअसल बेनाम कब्रों की लगातार बढ़ती जाने वाली कतार है और ‘स्वस्थ’ इंसान वह है जो सबकुछ देखता है और चुप रहता है। शायद उसे नही पता कि एक दिन वह स्वयं भी इसका शिकार बनने वाला है।‘ उसके इस कथन के आलोक में कहूँ तो ‘पागलखाना’ अपने समय से आगे का उपन्यास है | यह उपन्यास बाजारवाद का बेहतरीन रचनात्मक विश्लेषण पेश करता है | अगर आप इसे समय लेकर पढ़ेंगें तो यह एक अद्भुत उपन्यास है | इस विश्वस्तरीय कृति को न सिर्फ व्यंग्य बल्कि पूरे समकालीन हिंदी कथा साहित्य की उपलब्धि कहना होगा | श्री चतुर्वेदी के इस उपन्यास को पढ़कर तयशुदा फॉर्मेट में आलोचना के अभ्यस्त हो चुके हमारे कथा आलोचक अपने तय पैमानों से बाहर झांक पायेंगें ? क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब भी किसी रचनाकार ने बंधी बंधाई लीक तोड़ने की हिम्मत की है उसके समय के आलोचक उसका ठीक प्रकार से मूल्यांकन करने में चूके हैं | ‘पागलखाना’ उनके लिए भी कठिन चुनौती पेश करता है |

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9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) सीतापुर उ.प्र. 261203

मो. 9454112975

rahuldev.bly@gmail.com

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3 comments

  1. मेरी पूर्व प्रकाशित समीक्षा इस से बेहतर
    उपन्यास को विश्व स्तरीय बताना ग़लत

  2. बहुत सटीक व महत्वपूर्ण समीक्षा। इससे उपन्यास को समझने में आसानी होगी।

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