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‘बौद्धिक स्लीपर सेल‘, जो पूरा परिदृश्य बदल दे

पुष्प रंजन ईयू-एशिया न्यूज़ के नई दिल्ली संपादक हैं और हिंदी के उन चुनिन्दा पत्रकारों में हैं जिनकी अंतरराष्ट्रीय विषयों पर पकड़ प्रभावित करती है. मेरे जैसे हिंदी वालों के लिए बहुत ज्ञानवर्धक होती है. उनका यह लेख ‘देशबंधु’ में प्रकाशित हुआ था. वहीं से साभार- प्रभात रंजन

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 देश कठुआ में बच्ची के बलात्कार कांड से आहत, उत्तेजित और व्यथित था। इसके साथ उन्नाव में नाबालिग से बलात्कार और पीड़िता के पिता की हत्या को लेकर आग में घी का काम कर रहा था। लगातार बच्चियों से दुष्कर्म व हत्या की ख़बरों ने टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक भक्तों की बोलती बंद कर दी थी। इस व्यूह को एक झटके में बिखेर देने का काम सिर्फ लंदन के एक शो ने कर दिखाया। उससे पहले पूरे देश को इतनी भर जानकारी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नार्डिक देशों के सम्मेलन में स्टॉकहोम जाएंगे, फिर ब्रिटेन में आहूत कॉमनवेल्थ सम्मेलन में भाग लेंगे और जर्मनी होते हुए भारत पधार जाएंगे। लंदन में पीएम मोदी का कोई मेगा शो होगा, लोग जानते तक नहीं थे।

ऐसे शो स्वतःस्फूर्त तैयार नहीं होते, जिसके लिए प्रसून जोशी अपनी कविताओं के साथ मंच पर मॉडरेशन के लिए उपस्थित हो जाएं। हॉल की बुकिंग और टिकटों को बेचने की प्रक्रिया, कोरियोग्राफी-म्यूज़िक-लाइट आदि की तैयारी में हफ्ता तो लगता है। 2400 सीटों की संख्या वाले सेंट्रल हॉल वेस्टमिंस्टर की बुकिंग का खर्चा है 15 लाख रूपये। मेगा शो के आयोजन में, और राॅक स्टार की तरह पीएम मोदी को प्रस्तुत करने में कई करोड़ रूपये किसने ख़र्च किये? इन सवालों पर चुप्पी है। सोचिए, विदेशी मंच पर प्रधानमंत्री मोदी की ग़रीबी को प्रस्तुत करने में कितने करोड़ स्वाहा हो जाते हैं?

ऐसे मेगा मंच से सवाल वही, जो मोदी मन भाये। भारत में बलात्कार, हिंसा, राजनीतिक उत्पीड़न की घटनाओं से जुड़े प्रश्नों से भारतीय मीडिया का बड़ा हिस्सा आंख मूंद ले। उन पोस्टरों, प्रदर्शनों को टीवी पर न दिखाये, तो यही संदेश जाता है कि सब कुछ प्रायोजित है। सेंट्रल हॉल वेस्टमिंस्टर में सवाल पूछने वाले प्रवासियों का प्रवेश निषेध हो, उनके कैंसिल किये टिकट के बारे में लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग यह कहे कि आयोजक ही बताएंगे। तब लगता है, भारतीय राजनीति का रिमोट कंट्रोल अदृश्य हाथों में है।

ये कौन लोग हैं, करोड़ों खर्च करने वाले? बिल्कुल अदृश्य से। एक समर्पित योद्धा की तरह। पब्लिक ओपिनियन को एक झटके में परिवर्तित करने वाले। आग भारत में लगी होती है, अग्निशमन लंदन से होता है। ’मोदी-मोदी’……‘भारत माता की जय’ के गगनभेदी नारे से सारा कुछ ढँक जाता है। लंदन में सिर्फ़ पच्चीस सौ खाये-पीये, अधाये लोग इंडिया में करोड़ों परेशानहाल देसी लोगों की आवाज़ को एक झटके में दबा जाते हैं। करिश्मा ही तो है। इवेंट मैनेजरों और कारपोरेट का करिश्मा! सितंबर 2014 में न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में 22 हज़ार लोगों का हुजूम इकट्ठा करने के पीछे ऐसी ही ताक़तें थीं।

2017 में प्रवासी भारतीयों के बारे में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में जानकारी दी गई कि विदेश रहने वाले भारतीयों की संख्या 17 मिलीयन है। हर साल प्रवासी भारतीयों की संख्या में दस लाख का इजाफा होता गया है। 2010 से ‘एनआरआई-पीआईओ‘ की आबादी में 17. 2 प्रतिशत की दर से बढ़त हो रही है। ये कहने को प्रवासी हैं, मगर इनमें खेमे बंटे हुए हैं। एक, भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान का समर्थक और दूसरा विरोधी। कुछ ऐसे भी जो इस खेमेबाज़ी से दूर अपने काम और परिवार से सरोकार रखने वाले। इंडियन डायसपोरा में यह खेमेबाज़ी मई 2014 के बाद से व्यापक रूप से दिखी है।

जो लोग दुनियाभर में डायसपोरा को मॉनिटर करते हैं, उन्हें भी इस नये ट्रेंड पर हैरानी है। ‘डीआरसी, डीमैक‘ में शोधरत लोगों की प्रतिक्रिया थी, ‘चीनी डायसपोरा की संख्या 50 मिलीयन है, भारत से तीन गुना ज़्यादा। मगर कभी चीनी शासन प्रमुख न तो मेगा शो करते, न रॉक स्टार की तरह प्रवासी चीनियों को संबोधित करते हैं।‘ अनिवासी चीनियों की व्यस्तता अपनी संस्कृति को शेष दुनिया से परिचित कराने, पर्यटन को आगे बढ़ाने, व्यापार करने में रहती है। 3.16 ट्रिलियन डॉलर के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व में पांच करोड़ प्रवासी चीनियों का बहुत बड़ा योगदान है। इसके बरक्स भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व कितना है? 424.361 अरब डॉलर। ये आंकड़े 31 मार्च 2018 तक के हैं।

विदेशों में बसे भारतीय, अखाड़े के रूप में इस्तेमाल किये जाएंगे, इसकी शुरूआत किसने की होगी? मत सोचिये कि पीएम मोदी ने शुरूआत की है। पूर्व कूटनीतिक के.सी. सिंह बताते हैं, ‘9 जनवरी 1915 को महात्मा गांघी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आये। उस घटना को स्मृति में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हर साल प्रवासी भारतीयों के किसी प्रमुख सदस्य को सम्मानित करने का निर्णय लिया। यह भी तय हुआ कि प्रवासी भारतीयों को पदम सम्मान दिया जाए। इसके लिए धनघोर लाॅबी होने लगी। 2002 में मैं यूएई में राजदूत था, मुझसे कहा गया, प्रवासी पुरस्कार के लिए मैं एक नाम भेज दूं। मैने ऐसा किया नहीं। इस आशंका से कि लोग यह न कहें कि मैंने पक्षपात किया। या फिर जो इस सम्मान का पात्र था, वह वंचित रह गया।’

एंबेसडर के.सी. सिंह अब अवकाश प्राप्त हैं। उनकी यह टिप्पणी भारतीय दूतावासों की दुविधा, और अप्रवासी संगठनों के बीच प्रतिस्पर्धा के बारे में बहुत कुछ बता जाती है। भारतीय विदेश सेवा में मेरे कुछ ऐसे सहपाठी हैं, जो बतौर राजदूत कई देशों में हैं। आज की तारीख में उनकी मुश्किल यह है कि उन्हें ऐसे लोगों की सुननी पड़ती है, जो उन देशों में प्रवासी संगठनों के नेता हैं, और प्रधानमंत्री की छवि व हिंदूवादी राजनीतिक माहौल को बनाये रखने के लिए जोड़-तोड़ करते रहते हैं। इन डिप्लोमेट्स की दिक्कत यह है कि ऐसी प्रशासनिक पीड़ा को वे सार्वजनिक नहीं कर सकते। तो क्या हमारे कूटनीतिक मिशन ऐसे काम में लग गये, जो उनके रोज़मर्रा का हिस्सा नहीं था?

हमें यहां रहकर लगता है कि विदेश में रहने वाले सारे भारतीय एक है। कनाडा-अमेरिका की सिख राजनीति को अपवाद मानें, तो 2002 से पहले यह स्थिति थी। आज की ज़मीनी हक़ीकत यह है कि वहां भी धर्म, समुदाय, प्रांतवाद के आधार पर एनआरआई-पीआईओ देश में मौजूदा नेतृत्व के प्रति अपनी निष्ठा बदलने लगे हैं। यह दिलचस्प है कि इंडियन डायसपोरा में गुजरातियों की संख्या 33 फीसदी है। सबसे अधिक गुजराती ब्रिटेन में हैं। साढ़े-छह लाख के आसपास, दूसरे नंबर पर अमेरिका है, जहां पांच लाख से अधिक गुजराती रहते हैं। ये दो ऐसे लोकेशंस हैं, जहां से पूरे यूरोप और उत्तर अमेरिका में भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान के लिए माहौल बनाया जाता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस ऊर्जा को पहचाना है, और इन्हें वक्त ज़रूरत के हिसाब से ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करने लगे। प्रवासी गुजरातियों के दूसरे गढ़ केन्या, कनाडा, ओमान, यूएई, आॅस्ट्रेलिया, पुर्तगाल हैं। देश की कुल आबादी का क़रीब सवा प्रतिशत विदेश में हो, और उसका 33 फीसदी हिस्सा गुजराती समुदाय का हो, तो वह उनके पराक्रम को गायेगा ही। अटल बिहारी वाजपेयी कुनबापरस्ती वाले कारणों से रॉक स्टार के रूप में अवतरित नहीं हो पाये थे। यों ‘शाइनिंग इंडिया’ उन्हीं की देन है, मगर उसका फलक उतना व्यापक नहीं हुआ कि अटल जी विश्व नेता घोषित हो जाते।

एक आम गुजराती अपने में पीएम मोदी का जो अक्स देखता है, कभी डॉ. मनमोहन सिंह के वास्ते कनाडा से अमेरिका में बैठे सिख एनआरआई देखा करते थे। जुलाई 2006 में अमेरिका से जो भारत की न्यूक्लियर डील हुई, उसमें उस इलाके में मज़बूत सिख लाॅबी की बड़ी भूमिका रही थी। कनाडा में भारतीय प्रवासियों में सिखों की संख्या 34 फीसदी है, और हिंदू 27 प्रतिशत हैं। इसी हवाले से प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने तंज़ करते हुए कहा था,‘ हमारे कैबिनेट में जितने सिख हैं, मोदी मंत्रिमंडल में भी नहीं होंगे। क्रमशः ब्रिटेन और अमेरिका ने अपने मंत्रिपरिषद में सिखों को शामिल किया है।‘ यह बात तो हंसी-मज़ाक की थी। मगर, प्रवासियों के बीच समुदाय की राजनीति का साइड इफेक्ट यह हुआ कि कनाडा में सिख बनाम हिंदू की राजनीति आरंभ हुई। यह ठीक है कि इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी ने उठाया, मगर बाक़ी भारतवंशियों की आवाज़ नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई।

संघ के लोग मानते हैं कि यूके से उत्तर अमेरिका तक उसके चालीस लाख समर्थक एक बड़ी ताक़त हैं। भारत में सोशल मीडिया 2014 के बाद जाग्रत हुई है, उससे डेढ दशक पहले यूके से उत्तर अमेरिका तक हिंदू चेतना इंटरनेट के ज़रिये सुलगाई जा चुकी थी। उस लहलहाती फसल को आज प्रधानमंत्री मोदी व्यापक रूप से काट रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज की तारीख़ में ग्लोबल है। ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ‘ (एचएसएस) नाम से 39 देशों में उसकी जड़ें फैली हुई हैं। मार्च 2015 की बात है। न्यूयार्क के कोर्ट में ‘आरएसएस’ को आतंकी संगठन घोषित करने का एक मुकदमा ‘सिख फाॅर जस्टिस’ नामक संगठन ने दायर कर रखा था। अदालती सुनवाई में ओबामा प्रशासन की ओर से कहा गया, ‘फिलहाल हमें ऐसा कुछ नज़र नहीं आता कि इन्हें आतंकी मान लें। अमेरिकी प्रशासन को निष्कर्ष देने के लिए समय चाहिए।’ कुछ दिन पहले एक किताब आई थी, ‘ब्रदरहुड आॅफ सैफ्रन!’ इसे लिखने वाले का नाम है वाल्टर एंडरसन, जो अमेरिका में हिंदू थिंक टैंक के चिरपरिचित चेहरों में से एक हैं। वाल्टर एंडरसन 1980 में नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास में तैनात थे। अब इससे अंदाज़ा लगा लीजिए कि कितना लंबा खेल हुआ होगा। कागज़ पर इसे थिंक टैंक कहेंगे। मगर, जिस तरह की सक्रियता है। सामने वाले विरोघी को धराशायी करने का जो ‘किलर स्टिंक्ट‘ है, वह स्लीपर सेल के तौर-तरीक़े को ताज़ा करता है। जिनकी संख्या होती बहुत कम है। कहीं दिखते भी नहीं। पर अचानक से संगठित होते हैं और हमला कर पूरे परिदृश्य को बदल देते हैं। क्या इस तरह के थिंक टैंक, इंवेट योजनाकारों को हम ‘बौद्धिक स्लीपर सेल’ नहीं कहें ?

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