Home / Featured / मशहूर डिज़ाइनर और रंगनिर्देशक बंसी कौल से व्योमेश शुक्ल की बातचीत

मशहूर डिज़ाइनर और रंगनिर्देशक बंसी कौल से व्योमेश शुक्ल की बातचीत

आजकल बेस्टसेलर की चर्चा बहुत है. अच्छी बात है लेकिन इस बीच हिंदी में जो बेस्ट हो रहा है हमें उसको भी नहीं भूलना चाहिए. नजरअंदाज़ नहीं करना चाहिए. कोई भी भाषा अपनी विविधता से समृद्ध होती है. आज जाने माने रंगकर्मी बंसी कौल से व्योमेश शुक्ल की बातचीत. व्योमेश ने बड़ी मेहनत से पिछले कुछ वर्षों में हिंदी की कुछ विराट कविताओं को मंचित करके एक नया रंग मुहावरा बनाया है. यह बातचीत भी बेहद ज्ञानवर्धक और रोचक दोनों है. पहले ‘रंगप्रसंग’ में इसके कुछ अंश प्रकाशित हैं. यहाँ एक अलग रूप में पढ़िए- मॉडरेटर

===============================================

कलाएँ समवेत प्रतिफल हैं

(मशहूर डिज़ाइनर और रंगनिर्देशक बंसी कौल से व्योमेश शुक्ल की बातचीत)

एक

हमलोग अक्सर मनुष्यों के बारे में बात करते हैं. अलग-अलग व्यक्तित्वों के बारे में. अब यह एक रिवाज़ है. संस्थाओं के बारे में बात नहीं होती. एक विचार के रूप में संस्था – इस पर बात करने का सही मौक़ा आ गया है. व्यक्तिपरक होने का अब कोई मतलब नहीं है. साहित्य के विमर्श में यह चलता है क्योंकि लेखक अंततः एक व्यक्ति ही होता है. लेकिन प्रदर्शनकारी कलाएँ एक समवेत प्रतिफल हैं. यहाँ समूह पहले है.

दो

हमें संस्था के विचार को प्रोजेक्ट और प्रमोट करना होगा. मिसाल के लिए बनारस के दो सौ प्रमुख लोगों की सूची बना लीजिए. उनमें से एक-एक के बारे में अलग-अलग विचार करना शुरू कर दीजिये. प्रेमचंद या प्रसाद  – वह यहाँ कब रहे, कहाँ रहे, कैसे रहे और क्यों रहे आदि. यह एक तरह से उनकी जीवनी लिखना हुआ. ऐसी ज़्यादातर बातें सबको पता भी हो गई हैं. लेकिन उनके यहाँ रहने से बनारस पर क्या असर हुआ और एक संस्थान के रूप में बनारस ने उनकी रचनात्मकता पर क्या असर डाला, इसकी जाँच असल बात है. हिंदू धर्मचेतना का सबसे बड़ा और जीता-जागता संस्थान है बनारस. लाखों लोग यहाँ आते हैं. इस नुक्ते पर लेकिन बात नहीं हो पाती.

तीन

संस्थानों पर बात करना बहुत अर्जेंट हो उठा है, क्योंकि, अगर ये बचेंगे, तभी व्यक्ति भी बचेगा, हमलोग भी बचेंगे. अगर संस्था ख़त्म होगी तो आपकी व्यक्तिमत्ता का भी कोई मोल न रह जायेगा. राजनीति भी एक ऐसा संस्थान है जो ख़त्म हो रहा है. इसलिए वहाँ व्यक्ति तो उभर-उभरकर आ रहे हैं, कोई पार्टी या समूह नहीं दिखाई दे रहा है. आपातकाल में इस संस्थान का ख़ात्मा श्रीमती गाँधी ने किया. वह सिलसिला चलता जा रहा है और अब आपातकाल लगाने की भी कोई ज़रूरत न रही. अब एक पूरा समाज ही अपने संस्थानों को ख़त्म करने पर उतर आया है. यह आत्मविनाश का दृश्य है. हम यही कर रहे हैं.

चार

बनारस के ही एक उदाहरण को समझें : अंदाज़न, कम से कम दस हज़ार नावें होंगी. दस हज़ार नावें तो दस हज़ार मल्लाह. एक-एक नाव पर कम से कम बीस-बीस लोगों का परिवार पल रहा होगा. इस आँकड़े का एक मतलब यह है कि एक संस्थान के रूप में बनारस ने एक बड़ी अर्थव्यवस्था की भी रचना की है. हम हमेशा पारंपरिक तरीकों से सोचते हैं. अर्थव्यवस्था को सोचते हुए हम उद्योगों की बात करते हैं, विदेश व्यापार या कृषि की बात करते हैं. यह भी तो एक अर्थव्यवस्था है, जिसकी रचना बनारस नाम के एक धार्मिक संस्थान ने की है. धार्मिक संस्थान अनोखी इकॉनमी संभव करता है. वैसा कोई और नहीं कर सकता. चाहे फूलवाला हो, भिखारी हो या रोटी बाँटने वाला हो. वह भक्त भी – जिसे लगता है कि उसने बहुत पाप किये हैं, अपने पापबोध से मुक्त होने के लिए बहुत दान करता है. भारत एक विचित्र बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहाँ पापबोध भी उसका हिस्सा है. इस पर बात करने की ज़रूरत है.

पाँच

अगर एक निर्देशक बनारस या कोलकाता में रहकर नाटक कर रहा है तो क्यों कर रहा है और क्यों उसका थिएटर विशेष है ? हमारे थिएटर का इनदिनों जो अजीब बेड़ा गर्क हुआ है, उसका भी हल ऐसे सोचने में दिख सकता है. पहले थिएटर अपने-अपने शहर की नुमाइंदगी करता था. नौटंकी यूपी की होती थी, भवाई गुजरात की होती थी. लेकिन समकालीन रंगकर्म ने अपनी यह विशेषता खो कैसे दी ? थिएटर का स्थानीय वैशिष्ट्य, उसकी अस्मिता कहाँ गई ? थिएटर को अस्मिता से जोड़ना ज़रूरी है. यह क्यों नहीं हो रहा है. आइये इसे समझने की कोशिश करें. नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा समेत देश में नाटक सिखाने वाले अनेक संस्थान हैं. लेकिन नाटक का संस्थान, भौतिकी या रसायन विज्ञान का संस्थान नहीं होता. फिजिक्स का फ़ॉर्मूला जो बनारस में होगा, वही दिल्ली में और यूरोप में भी वही होगा. लेकिन बनारस का ड्रामा स्कूल इलाहाबाद के ड्रामा स्कूल से अलग होगा. भोपाल के नाट्य विद्यालय को दिल्ली के नाट्य विद्यालय से अलग होना होगा. उसे अलग बनाना चाहिए. उस शहर का चरित्र भी विद्यालय में रिफ्लेक्ट होना चाहिये. लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं. हम एक मानक संस्थान की फोटोकॉपी की तर्ज पर दूसरे संस्थान बनाते चले जा रहे हैं. यह विचित्र मानकीकरण है. कलाओं के लिए यह आत्मघात है. क्योंकि फिर एक दिन ऐसा होगा कि यह पहले से तय हो जायेगा कि इस देश के सब मनुष्यों के चेहरे एक जैसे हों. सभी स्त्रियों की लम्बाई एक बराबर हो. इससे बचना होगा. हमारे देश के स्वभाव में यह नहीं है. हमारी प्रकृति वैविध्यमयी है. हम विभिन्नताओं को सहेज नहीं पा रहे हैं. उलटे, एक जैसे संस्थान खोले जा रहे हैं.

मार्केट इकॉनमी यही चाहती है. यह इकॉनमी चाहती है कि सबलोग एक ही टेस्ट की चपाती खायें. वह दस टेस्ट की चपाती नहीं देगी आपको. एक ही आटे की चपाती खानी है हमें. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे एकसाथ, एक ही समय में, एक ही टेस्ट की एक करोड़ चपातियाँ बेचनी हैं. अभी हर मोहल्ले की चपाती का अलग स्वाद है. आने वाले दिनों में अगर यही हाल रहा तो ये सारे स्वाद सब मिटकर एक हो जाने वाले हैं.

छह

क्या कला में भी यही होने वाला है ? सबसे अखीर तक, वैविध्य कला में ही बचा रह सकता है. लेकिन यह भी सच है कि कला की भी अपनी समकालीनता होती है और उसे भी बदलते जाना है. आज बनारस में वही थिएटर नहीं होगा जो सौ साल पहले होता था. वह आजकल के संदर्भों से जुड़ेगा. नदी, घाट और गलियों के आज के हालात से जुड़ेगा. गंगा भी तो सौ साल पहले की गंगा नहीं हैं. यह वही गंगा नहीं हैं, जिसका वर्णन वेदों आदि में है.

सात

कुलमिलाकर यह जान लीजिए कि किसी कला विद्यालय में संस्थान की बजाय व्यक्तित्वों को प्रोजेक्ट करने से हमें कोई लाभ नहीं मिलने वाला है.

आठ

हम प्रायः बाद में रोने लगते हैं कि अरे, हमने तो कुछ डॉक्यूमेंटेशन ही नहीं किया. जबकि अभी सही वक़्त है यह काम करने का. आज़ादी के बाद के संस्थानों को ही लें. लिटिल बैले ट्रूप है. उसपर तो एक मोनोग्राफ़ तैयार कर लो. हो सकता है लिटिल बैले ट्रूप दो-चार बरस में बंद हो जाय. पिछले साठ सालों से लगातार जीवित और सक्रिय देश का अकेला प्रोडक्शन है लिटिल बैले ट्रूप का रामायण. अगर यही नाटक लंदन का होता और पचास साल ज़िन्दा रहा होता तो उसका उत्सव मानाने के लिए वहाँ की पूरी सरकार लग गई होती. वे इस बात को बाज़ार में ले जाते, बेशक़, बेचने के लिए. वे इसे विज्ञापनों की दुनिया में ले जाते. वे इसे हेरिटेज में ले जाते. उसपर किताबें लिखते. बनारस जैसी पुरानी सभ्यता में कई सौ बरस से चल रही रामलीलाओं को जाने दें, यह काम तो आज़ादी के बाद का है और अपेक्षाकृत सरल है. यह कोई क्यों नहीं कर रहा है ? संगीत नाटक अकादेमी को, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को यह काम करना चाहिए. ऐसी बहुत सी चीज़ें करने लायक़ हैं.

नौ

समारोहों को ही लें. उज्जैन का कालिदास समारोह. वह कालिदास अकादमी बनने के पहले से होता आ रहा है. पंडित सूर्यनारायण व्यास ने उसे शुरू किया था. इतने बरसों में उसमें क्या-क्या हुआ ? क्या यह दस्तावेज़ी महत्व की चीज़ नहीं है ? उस समारोह को डॉक्यूमेंट करने का एक मतलब उसे मुमकिन करने वाले समूहों, लोगों और शक्तियों का डॉक्यूमेंटेशन भी है. रूद्रसेन गुप्ता का समारोह ‘नांदिकर’ पिछले लगभग चालीस सालों से हो रहा है. यह ज़रूरी नहीं कि डॉक्यूमेंटेशन आप उस उत्सव का ही गुणगान करते रहें. उसकी ऑडीएंस पर बात हो, शामिल नाटकों पर बात हो, निर्देशकों पर चर्चा हो. रुद्र कहाँ-कहाँ से उसकी फंडिंग करवाते हैं, इस पर बात हो. जब आप फंडिंग पर बात करेंगे तो आप थिएटर की इकॉनमी को भी समझ रहे होंगे. ऐसे ट्रेंड्स को जाने बग़ैर, आख़िर आप कैसे सीखेंगे कि ‘थिएटर इकोनॉमिक्स’ क्या बला है ? मैं कैसा थिएटर करता हूँ, नटों को लेता हूँ कि नहीं, इस तरह की बातें बहुत हो गईं. अब संस्थानों पर, उनके कामकाज पर बात करने का समय आ गया है.

दस

यहाँ तक कि ख़ुद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय पर अब तक कोई किताब नहीं है. एनएसडी के उतार-चढ़ाव के बारे में लिखो. डरकर मत लिखो और पूर्वग्रह के साथ मत लिखो कि वामन का काम अच्छा था, या कीर्ति का या बजाज का; क्योंकि हर आदमी अपने समय में बढ़िया ही करने की कोशिश करता है, अपनी परिस्थितियों का सामना अपने ढंग से करता है. बदला लेने के लिए नहीं लिखना होगा.

ग्यारह

अब बनारस की नागरी प्रचारिणी सभा है. नई पीढ़ी को सिर्फ़ इतना पता है कि वह एक बंद पड़ा संस्थान है. उसे यह तक नहीं पता कि एक ज़माने में यह बहुत फलता-फूलता संस्थान था. दरअसल हम नई पीढ़ी के साथ ज़्यादती कर रहे हैं. हम उसे ‘सभा’ जैसे महान संस्थानों के उत्थान और पतन का इतिहास नहीं बता पा रहे हैं. उसके क्षय के कारणों की मिलजुलकर जाँच नहीं कर पा रहे हैं. हमलोग नई पीढ़ी को साहित्य और रंगमंच में ले आना तो चाहते हैं, लेकिन उसे कुछ बतलाना नहीं चाहते. सच तो यह है कि अपना इतिहास हमें ही ढंग से नहीं पता है. हम कैसे बतायेंगे, जब सभा के बारे में कोई कायदे का शोध या कोई अच्छी किताब हो तब तो.

बारह

अतीत के संस्थानों पर शोध और प्रकाशन का काम हमारे जीवित संस्थानों का है. कोई इंसान किस तरह का थिएटर कर रहा है, इसपर बहुत बात हुई. अब संस्थानों का पुनर्पाठ हो.

तेरह

हो सकता है, आने वाले दिनों में सरकार के पास भी कोई डॉक्यूमेंट हो. आप देख लें, हजारों प्रोजेक्ट्स सरकार के पास जमा होते हैं. उन सारे प्रपोज़ल्स में ज़रूर ऐसे कुछ ब्रिलिएंट प्रपोज़ल होंगे जिन पर हमारा ध्यान न गया हो. क्यों नहीं दो युवा रिसर्चर्स को इन प्रपोज़ल्स पर एक रिपोर्ट तैयार करने का काम दिया जाता. उन प्रस्तावों से यह अंदाज़ लगाया जा सकता है कि हमारा देश कला के क्षेत्र में कैसे स्वप्न देख रहा है ? अन्यथा वे दस्तावेज़ सब कूड़ा मान लिए जाते हैं. लेकिन अगर आप इन फाइलों को फेंक रहे हैं तो आप विचारों को फेंक रहे हैं. मैं फिर से कह रहा हूँ, हमें अपने काम करने की शैली के बारे में बार-बार सोचने और दिशा बदलने की ज़रूरत है.

चौदह

ड्रामा स्कूल में हमारा छात्र जीवन बहुत शानदार मान लिया गया. यह भी एक मिथ है. हमारा देश मिथ बनाने में महारथी है. हमारे यहाँ यही एक चीज़ है जो सनातन है और लगातार बदलती भी रहती है. हम मिथ को वर्तमान भी करते रहते हैं. हर बैच अपने में अद्वितीय होता है. यह समय की बात है, उस दौर में देश के पाँच –दस शहरों में एक नए क़िस्म का शहरी रंगमंच बन रहा था. पाँच-छह नाटककार अचानक चर्चा में आ गये और पाँचेक निर्देशक भी. यह संयोग से कुछ ही अधिक रहा होगा. हमें महत्त्व मिला. हम घूम रहे थे. हमारा घूमना एक मिथ बन गया. लेकिन और लोगों ने भी तो घूमकर नाटक किये.

पंद्रह

इनदिनों मुझे अपना बचपन ज़्यादा याद आता है, क्योंकि बचपन का अनुभव हमारे सबकांशस में चला जाता है. वही अनुभव बड़े हो जाने पर ज़्यादातर रचनाओं का पदार्थ बनता है. मैंने उन अनुभवों को कभी सोचा नहीं था. आज वही अनुभव हमारी क्रिएटिविटी का सबसे बड़ा औज़ार हैं. मैं अपने नाटकों और डिज़ाइन आदि को देखकर कई बार यह याद कर पाता हूँ कि यह चीज़ तो मेरे बचपन से यहाँ आ गई है. मनुष्य की कला, मेरे ख़याल से, उसके दिमाग़ का नहीं, उसके इर्दगिर्द का, उसके परिवेश का कारनामा है. मैं पहाड़ों से आया था. पहाड़ों पर चढ़ने और उतरने के दृश्य अपने आप में एक परफॉरमेंस हैं और हमेशा मुझे प्रभावित करते हैं. मशहूर चित्रकार रामकुमार की सृजनयात्रा में बनारस वैसा ही एक पड़ाव है. उन्होंने बनारस को आत्मसात किया और उसे अभिव्यक्त किया. कलाकार का अतीत उसका कच्चा माल है. उसे बेकार मानना भूल है. हर अनुभव की एक इमेज होती है और कभी न कभी वह अपनी अभिव्यक्ति का रूप पा लेती है. रचना बहुत कुछ उस बीमारी की तरह है जो आपके भीतर छिपी रहती है और सही समय आने पर सामने आती है. हम सबके अपने-अपने पूर्वग्रह होते हैं, अपनी ज़िदें. स्मृति की भी ऐसी ही विडंबनाएँ होती हैं. लेकिन कला का जादू इस बात में है कि अतीत का ट्रैजिक सच अभिव्यक्ति के समय उदार होकर दूसरों के आनंद की वजह बन जाता है. इसीलिए हमारी परंपरा में विध्वंस को ही निर्माण का आरंभ माना गया है, जैसे शिव का तांडव.

सोलह

कई लोग अतीत को ध्यान से देखते नहीं, इसलिए उन्हें एक सपाट नैरेटिव वहाँ दिखता है. वे ग़रीबी आदि का महिमामंडन करते हुए इधर-उधर घूमते हैं. जबकि मैं अगर ग़रीब था, तो बहुत सुखी भी था. मैं श्रीनगर में पैदा हुआ. बचपन वहीँ बीता. मैंने तरह-तरह के काम किये. वाल राइटिंग की, साइनबोर्ड लिखे. आज मुझे वह सब याद करके बहुत मज़ा आता है. वह सब मेरे लिए बहुत फ़ायदे का साबित हुआ. हो सकता है कुछ लोगों का अतीत उनके काम न आता हो.

सत्रह

हिंदी के आधुनिक शहरी रंगमंच की मुख्य बाधा है कि इसके विकास के मूल में नाटककार खड़ा है – भारतेंदु से मोहन राकेश तक. इसके समीक्षक आदि भी, ज़ाहिर है, साहित्य की दुनिया से आये. इसके कारण शब्द का वर्चस्व इस पर शुरू से रहा आया. शब्द के हल्ले में हम यह भूल गए कि परफॉर्मिंग आर्ट सिर्फ शब्द नहीं है. उसकी अनेकानेक भाषाएँ हैं. यहाँ ध्वनि भी एक भाषा है, संगीत भी एक भाषा है, मुद्राओं की भी एक भाषा होती है. रंगमंच भाषाओँ का समूहन है. लेकिन हमें पढाया यह गया है कि भाषा माने शब्द. एकेडमिक्स में अब भी यही चल रहा है. इसकी वजह से डायलॉग हमारे पूरे काम पर हावी हो गया. यह भी कमाल देखिये कि अपवाद छोड़ दें तो पिछले पचीस-तीस साल का हरेक नाटककार गद्यकार है. अगर कवि नाटककार होते तो शायद हिंदी रंगमंच एक अलग चीज़ होता. कवियों का थिएटर एक रूपकात्मक और छविमान थिएटर है. मिसाल के लिए, संस्कृत को देखें. दूसरी ओर, गद्य का थिएटर एक सपाट थिएटर होगा ही. आख़िर हर गद्यकार निर्मल वर्मा नहीं होता. लेकिन सरासर अभिधा को बरतने वाला गद्य का यही नाटककार एक दिन अचानक थिएटर का ब्राह्मण हो गया और हमसब हो गए शूद्र. कम से कम वह ऐसा समझने लगा. वह साक्षर और शिक्षित हो गया और फ्लोर पर काम करने वाला निरक्षर. हमने भी प्रायः यही मान लिया. इससे एक बड़ी फाँक बन गई – नाटक लिखने वालों और नाटक करने वालों के बीच. मेरा ख़याल है कि नाटककार ने ख़ुद को छोड़कर पूरे दृश्य को हिकारत की नज़र से देखा. एक तरह के पढ़ेलिखेपन की सर्वोच्चता बन गई और बाक़ी लोग हीनभावना का शिकार होते रहे. इस विडंबना ने हमारे कामकाज को, हमारे थिएटर को, कुछ हद तक, उसकी बुनियादी ताक़त से दूर करके एक किताबी थिएटर तैयार किया.

अट्ठारह

यह शिकायत बार-बार उठती रहती है कि अभिनेता अनपढ़ है. अरे भाई, वह क्या पढ़े ? आप ही बता दें. अगर उसने बलिया-निवासी फलाँ सिंह की कविता नहीं पढ़ी तो वह अनपढ़ हो गया ? यह कहाँ का विवेक है ? ऐसे निर्बल आरोपों के दम पर उसके कुछ और पढ़ते होने की संभावना का वध किया जाता रहा है. मुमकिन है कि वह प्रेमचंद की कहानी न पढ़े, लेकिन हो सकता है वह अखबार पढता हो, हो सकता है वह जीवन पढता हो, हो सकता है वह कुछ और पढता हो. पढ़ेलिखेपन की अपनी मनमानी कसौटी को अभिनेता पर आयद करना कहाँ की समझदारी है ?

उन्नीस

बहरहाल, इसके दबाव में एक तथाकथित साहित्यिक थिएटर जन्मा. कहानी का रंगमंचनुमा. ठीक है. वह भी एक चीज़ है. लेकिन दूसरी चीज़ों की उपेक्षा मत करो. मैं शब्द का मुरीद हूँ, लेकिन थिएटर में निरे शब्द की सत्ता का हामी न हूँ, न हो सकता हूँ. उसी साहित्यिक, शब्दप्रधान थिएटर के दबदबे में हमलोगों के काम को उछलकूद का रंगकर्म मान लिया गया. ठीक है, लेकिन मेरी उछलकूद कोई बात भी कहती है. दिक्कत है कि इस भाषा को पढ़ने की हमारी, यानी लोगों की आदत नहीं है. ये एप्रोप्रिएशन के तौरतरीक़े हैं. मुझे लगता है कि कबीर के साथ यही हुआ. उनकी बढ़ती लोकप्रियता के असर में साहित्य वालों ने उन्हें अपनाया. अन्यथा कबीर साहित्य की चीज़ थे नहीं.

कुलमिलाकर हमारा थिएटर शहरी साक्षरता से निकली हुई चीज़ बन गया.

इक्कीस

पढ़ते समय मुझे कुछ नहीं पता था कि आगे मेरा क्या होगा ? अब लगता है कि औरों को पता था. वे पढ़कर निकले और सीधे अपने गंतव्य की ओर चल पड़े. हम जिस बैकग्राउंड से आये थे, हमें तो यह तक नहीं पता था कि अगर हम पैदा हुए तो क्यों पैदा हुए ? अब हिन्दुस्तानी मध्यवर्ग यह तय करता है कि उसका बच्चा बड़ा होकर क्या करेगा. संपन्नतर मध्यवर्ग प्रोग्राम्ड बच्चे पैदा करने लगा है. एक सुनियोजित प्रोग्रामिंग के ज़रिये उसकी तर्बियत, उसका माहौल सब तैयार किया जाता है. तब कहीं जाकर वह डॉक्टर या इंजीनियर बनता है. हमारे माँ-बाप तो अपनी ही ज़िंदगियों से जूझ रहे थे. आज तक, राजनीति के नैरेटिव में जिस युवा शक्ति की बात होती रहती है, क्या उसे पता है कि वह क्या करेगा या क्या कर रहा है ? नहीं. ऐसे मुट्ठी भर लोग हैं, जिनके पास योजना है. वह प्रभुवर्ग है.

बाईस

हमलोग अलग-अलग जगहों से आये थे और हमारे पास कोई एक्सपोज़र नहीं था. किसी के पास नहीं था. तब एक्सपोज़र के औज़ार भी अब जितने नहीं थे. अब गूगल मैप से पलभर में आपको पता लग जाता है कि दिल्ली में मंडी हाउस कहाँ पर है. हमें नहीं पता था. हमने आकर जाना कि मंडी हाउस क्या बला है. हमारा युग अपेक्षाकृत भोला कहा जा सकता है. यह कोई तुलना नहीं है. हर दौर की अपनी शक्ति और सीमा होती है.

तेईस

मेरा मानना है कि अल्काज़ी साहब ने ड्रामा स्कूल को एक थिएटर ग्रुप की तरह चलाया, एक राष्ट्रीय संस्थान की तरह नहीं. वही एले थे, जो प्ले करते थे. एक-डेढ़ बजे तक क्लासेज़ होती थीं. फिर तीनों क्लासेज़ को मिलकर एक बड़ा प्रोडक्शन होता था. मुझे लगता है कि यह किसी दूसरे थिएटर ग्रुप जैसा था, जिसमें कुछ ब्रिलिएंट और आत्मसजग लोग थे और थोड़ी-बहुत पढाई भी होती थी – जिसकी फंडिंग भारत सरकार कर देती थी. न जाने क्यों, उस दौर के अन्य अध्यापकों पर बात नहीं होती. हर आदमी उन्हीं पर बात क्यों करना चाहता है. अल्काज़ी साहब मेरे टीचर थे, लेकिन नेमिजी भी थे. पांचाल साहब, दासगुप्ताजी, घोष साहब, शीला भाटियाजी, महापात्राजी. मेरे लिए सब मेरे गुरु हैं और सबका बराबर ऋण है मुझपर. दुस्संयोग से, मैं एक्टर था नहीं, तो बाक़ी अल्काज़ी साहब के मुक़ाबले दुसरे अध्यापकों से ही मैंने ज़्यादा सीखा. अल्काज़ी साहब के चहेते लोग एक्टर हैं. बेशक़ वह बढ़िया अध्यापक थे. लेकिन मैं तो यही मानता हूँ कि वह मेरे डायरेक्टर थे. स्टूडेंट मैं बाक़ी टीचर्स का था.

चौबीस

मैं फिर संस्थानों वाली बहस पर लौटूंगा. एक संस्थान को एक व्यक्ति अकेले नहीं चलाता, उसे इंसानों का एक समूह चला रहा होता है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय भी इसका अपवाद नहीं था. वह अच्छे नाटक करना चाहते थे, इसलिए उनका पूरा रुझान अभिनेताओं की तैयारी की ओर रहता था. रीता कोठारी म्यूजिक पढ़ाती थीं. कोई उनका नाम नहीं याद करता. यह वैसा ही है कि जब तक हमारे साथ काम करो, कहो कि बंसी जी हमारे गुरु हैं. एनएसडी में दाख़िले के बाद अपना गुरु बदल लो. पास होते ही अल्काज़ी साहब अभिनेताओं को रंगमंडल में रख लेते थे. लेकिन हमारे जैसे लोग – जो अभिनेता नहीं थे, कहाँ गए ? हम तो निकलते ही घूमने लगे. तो अभिनेताओं का स्वर्ग था. अगर बाहर जाकर हमने अपनी निजी क्षमताओं की अभिव्यक्ति न की होती तो यह तय है कि इस स्वर्ग ने हमें भुला दिया होता. पूरे सम्मान के साथ, लेकिन, यह तो कहना ही होगा कि कुछ मूर्धन्यों का भारतीय रंगमंच में योगदान इतना-भर है कि वह ड्रामा स्कूल से निकले तो रेपर्टरी में आये और वहाँ से निकले तो फिर ड्रामा स्कूल पहुँच गए. वे प्रतिभाशाली लोग थे, लेकिन उनके बरक्स जो घुन-घूमकर काम कर रहे थे, उनका क्या ? वैसे लोगों की सबसे ज़्यादा मदद नेमिजी ने की. उनका संज्ञान लिया. उनके कामकाज, उनके संघर्ष और प्रयोगों को नटरंग के पन्नों और अपनी समीक्षाओं में जगह दी. नेमिजी की नज़र सबलोगों पर थी और दूर तक जाती थी. नदी के रूपक का इस्तेमाल करूँ तो नाव पर बैठे लोगों को अल्काज़ी साहब देख रहे थे और पानी में तैर रहे लोगों को नेमिजी. नाव पर बैठे लोग सबको दीखते हैं, पानी में देखने के लिए गहरे जाना होता है. वह सबकुछ को आलोचना के दायरे में लाये. एकेडमिक कॉन्ट्रिब्यूशन तो नेमिजी का ही है. गोवर्धन पांचाल की पूरी किताब है कुतम्बलम पर – उस कलारूप का पहला डॉक्यूमेंटेशन.

पचीस

अंततः, अल्काज़ी साहब का दौर एक मिथक ही है. दिक्कत हममें है. हम एक व्यक्ति चुनते हैं, उसकी परिक्रमा करने लगते हैं और संस्थान का विचार पीछे छूट जाता है. इतिहास का विश्लेषण करते हुए किसी युग-विशेष को ज़रुरत से ज़्यादा तवज्जो देने से विचित्र समस्याएँ सामने आने लगती हैं. अल्काज़ी के दौर के बाद ब्रिलिएंट लोगों का, निर्देशकों का पूरा समूह खड़ा है. सत्तर के दशक से कहीं ज़्यादा काम आज होता है. एक-एक शहर में बीस-बीस समूह हैं. अच्छे-बुरे को छोड़ दें तो कई गुना ज़्यादा वैविध्य है. इसका हिसाब कब होगा ?

छब्बीस

आकलन एकांगी न हो. एक निर्देशक को या एक अभिनेता को उसकी एक ही प्रस्तुति से याद न किया जाय. हम उसे बंदी न बना लें. नए लोगों में अपार संभावनाएँ हैं – संजय उपाध्याय, कन्हैया, भोपाल में फ़रीद – और भी लोग हैं. लंबी सूची है. बंगाल, तमिलनाडु और केरल के लोग.

  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

ऐसी-कैसी औरत है जिसका होना इतना सुंदर है!

अनुकृति उपाध्याय का पहला उपन्यास ‘नीना आँटी’ जब से आया है उसकी चर्चा लगातार बनी …

One comment

  1. योगेश कुमार पाण्डेय

    बहुत बढ़िया साक्षात्कार 👍👍 रंगमंच के विभिन्न पहलुओं पर बंसी कौल साहब के विचारों से अवगत कराता

Leave a Reply

Your email address will not be published.