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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और असगर वजाहत का उपन्यास ‘कैसी आगी लगाई’

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के बीच असगर वजाहत के उपन्यास ‘कैसी आगी लगाई’ की याद आई. इसका परिवेश एएमयू ही है. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास का एक अंश, जो संयोग से किसी ज़माने में हुए ऐसे ही सामाजिक तनाव को लेकर है- मॉडरेटर
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ये नई बात है। आमतौर पर सायरन सुबह पौने आठ बजे बजता है। क्लास आठ बजे से शुरू होते हैं। लेकिन आज कोई साढ़े दस बजे सायरन बजने लगा। और बजने भी इस तरह लगा जैसे करुण आवाज में कोई दैत्य रो रहा हो। सायरन की आवाज सुनकर जो जहाँ था वहाँ से निकलकर भाग रहा था। पता नहीं, कहाँ ? मैंने किसी से पूछा कि ये क्या है और सब किधर जा रहे हैं तो जवाब मिला था जल्दी करो, ये इमरजेन्सी का सायरन है, सब लोग एस.एस. हॉल की तरफ जा रहे हैं। और ज्यादा पूछने का मौका नहीं था क्योंकि बताने वाला भी बहुत जल्दी में था। वह शायद कोई सीनियर लड़का था जिसे यूनीवर्सिटी के क़ायदे-कानून पता थे। मैं तो पिछले ही साल आया था।

एस.एस हॉल में अन्दर जानेवाला लोहे का बड़ा फाटक बन्द था और छोटीवाली खिड़की खुली थी। सब उसी खिड़की से अन्दर जा रहे थे। फाटक के बाहर प्राक्टर और कुछ सीनियर प्रोफेसर खड़े थे, वे सबसे जल्दी अन्दर जाने के लिए कह रहे थे। मुझे पता न था कि अन्दर क्या हो रहा है या होगा ? लेकिन मैं भी अन्दर घुस गया। अन्दर जाकर पता चला कि लगभग पूरी यूनिवर्सिटी के लड़के यहाँ मौजूद हैं। मुझे अहमद जल्दी ही मिल गया। वह लॉन में कुछ लड़कों के साथ बैठा था। मुझे देखकर वह मेरे पास आ गया।
‘‘ये क्या है यार ?’’ मैंने उससे पूछा।
‘‘पता नहीं, लोग कह रहे हैं कि यूनिवर्सिटी पर हमला होनेवाला है ?’’
‘‘हमला ? कैसा हमला।’’
‘‘शहर से हिन्दू गुंडों का एक बड़ा गिरोह आ रहा है।’’

‘‘ये तुम्हें किसने बताया ?’’
‘‘सब यही बातें कर रहे हैं।’’
उन दिनों शहर में हिन्दू-मुस्लिम फसाद की फिजा़ बनी हुई थी। दो दिन पहले चाकू मारकर किसी हिन्दू की हत्या कर दी गई थी। उसके बाद मुसलमानों की कुछ दुकानें लुटी थीं। शहर के एक इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया था और शहर यूनीवर्सिटी के लड़कों के लिए ‘आउट ऑफ बाउंड’ हो गया था। प्राक्टर का ऐसा नोटिस मैंने देखा था।
फिर अचानक कुछ लड़के छत तक पहुँच गए और ये खबर तेज़ी से फैल गई कि शमशाद मार्केट के ऊपर से धुआँ उठ रहा है। शमशाद मार्केट जल रही है और लूटी जा रही है, ये सुनते ही डर, खौफ़ और ‘न जाने क्या हो’ वाली भावना एकदम गुस्से में बदल गई थी। लड़के बड़े फाटक को खोलने पर जोर दे रहे थे। फाटक के बाहर दूसरी तरफ वाइस चांसलर, प्राक्टर और दूसरे लोग उन्हें समझा रहे थे कि फाटक क्यों नहीं खोला जा सकता। ज़ाहिर है कि अगर कई हज़ार लड़के गुस्से में बाहर निकलते तो उन्हें कौन क्या करने से रोक सकता था ? यह भी नहीं तय था कि बाहर निकलने पर वे सिर्फ़ शमशाद मार्केट तक ही जाएँगे और आगे नहीं बढ़ेंगे।

‘अथारटीज़’ और लड़कों में बातचीत लड़कों की तरफ से इतनी गर्म हो गई थी कि वे वाइस चांसलर को मोटी-मोटी गालियाँ देने लगे। वाइस चांसलर किसी भी कीमत पर फाटक खुलवाने के लिए तैयार नहीं थे। दूसरी तरफ शमशाद मार्केट के ऊपर से उठने वाला धुआँ एक काला विशाल बादल जैसा बन गया और छत पर जाए बगै़र ही नज़र आने लगा।
कुछ ही देर में पता चला कि लड़कों ने एक कमरे की खिड़की की सलाखें तोड़ डाली हैं और बाहर जाने का रास्ता बन गया है। ये खबर फैलते ही लड़के उस तरफ झटके। मैं और अहमद भी आगे। कमरे के अन्दर की खिड़की से कूद-कूदकर लड़के बाहर निकल रहे थे। हम लोग भी बाहर आ गए। सब शमशाद मार्केट की तरफ भाग रहे थे। अचानक हमें रास्ते में जूलॉजी के लेक्चरर मिले। वे हमें पढ़ाते थे। हम दोनों को देखकर चीखे-खाली हाथ मत जाओ।’ फिर उन्होंने पता नहीं कहाँ से मच्छरदानी का एक बाँस हमें पकड़ा दिया जिसे तोड़कर हमने दो कर लिए। एक टुकड़ा मैंने ले लिया और एक अहमद ने झपट लिया।

शमशाद मार्केट में खालू का होटल धुआँधार जल रहा था। खालू सामने खड़ा था। हमें देखकर बोला-‘तुम लोग अब आए हो। देखो, सारे बर्तन तोड़ गए। कुर्सियाँ बेंचे अन्दर डालकर आग लगा दी। मैं तो कसम से बर्बाद हो गया।’ खालू के होटल के बाद ‘नगीना रेस्टोरेंट’ भी जल रहा था।

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One comment

  1. Bahut hi accha likhte hai aap

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