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स्त्री विमर्श की नई बयानी की कहानी ‘लेडिज सर्किल’

हिंदी के स्त्रीवादी लेखन से एक पाठक के रूप में मेरी एक शिकायत है कि अब यह बहुत प्रेडिक्टेबल हो गई हैं. लिफाफा देखते ही मजमून समझ में आने लगता है. ऐसे में गीताश्री की कहानी ‘लेडिज सर्किल’ चौंकाती है. शुरू में मुझे लगा था कि इसमें भी वही शोषण, क्रांति, रोना-धोना होगा. लेकिन कहानी पढ़ते पढ़ते एक नए अनुभव से साक्षात्कार हुआ. इसी नाम से यह संग्रह ‘राजपाल एंड संज’ प्रकाशन से आया है. पहले कहानी पढ़िए. अच्छी लगे तो संग्रह लीजिये- मॉडरेटर

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उनकी पलकों पर अब भी नींद का बसेरा था। रतजगा उनकी आंखों से झांक रहा था। रात उनकी पलको से कभी जाती ही नहीं। मुझे हमेशा लगता कि एक मिनट की शांति मिले तो ये आंखें कहीं भी सो लें। कहीं भी दीवार के सहारे ओठंग जाएं, पल भर ही सही, एक नींद मार लें। देर रात सोना और तड़के जगना इस घर का रिवाज तो पहले से ही थी लेकिन ये सुबह कुछ अलग-सी थी।

मर्दविहीन घर में बीती रात भर धूमगज्जर मचा था। रिश्ते के भतीजे की बारात विदा करने के बाद सारी औरतें, घुटने तक साड़ी उठा कर आंगन में पसर गईं थीं। आंचल कहीं, पैर कहीं, सिर कहीं । बड़की भाभी अपने भारी वक्षों को खटिया में धंसा कर खिलखिला रही थीं। घुल्टनवा की पत्नी उनका पैर पकड़ कर नीचे बैठ गई थी। धीरे धीरे उनके पैरो को मसाज दे रही थी। आंगन की ही नइकी चाची फिराक में थीं कि घुल्टनवा बहू बड़की भाभी से मुक्त होकर उनका कमर दबा दे। मन हो रहा था कि किसी को कहे, कमर पर खड़ा हो जाए और पैरो से ही दबा दे। कोई मिल नहीं रहा था। बच्चे भी बाराती में चले गए थे। इन सबका रात को धमाल करने से पहले का विश्राम था। खाना बनाने का तनाव खत्म था। बाहर हलवाई पिछले चार दिन से सबका खाना बना रहा था। औरतें सिर्फ गाना गा रही थीं, हर रस्म में साड़ियां बदल रही थीं या हंसी ठिठोली करती घूम रही थीं। बारात को विदा करने के बाद सबने आंगन में खटिया पकड़ ली या कोई जमीन पर बिछी चटाई पर फैल गईं। आंगन पूरा औरतों के हवाले था। कोई परदेदारी नहीं। बुजुर्ग औरतें दालान पर जम गईं थीं, वहां भी सन्नाटा था। बाहर उनकी गप गोष्ठियां शुरु हो गई थीं और अंदर आंगन में भाभियों, ननदों की छेड़छाड़, गप सड़ाका।

मैं सालो बाद इस तरह का विचित्र नजारा देख रही थी। बड़ी तमन्ना थी कि गांव-कस्बे की टिपिकल शादी में शरीक होना ही है। मां और बाबूजी के नहीं रहने पर गांव घर दोनों, सालो पहले छूट चुका था। सब अपने परिवारो में रम चुके थे। मैं इस दुनिया से बहुत दूर जा चुकी थी। जैसे ही अपने आंगन में शादी की खबर मिली, न्योता पहुंचा, मुझसे रहा नहीं गया। बड़े भतीजे के शादी में मौका ही नहीं मिला।

बड़की भाभी ने फोन पर रोते रोते बताया था कि कैसे भतीजा एक दिन अचानक एक लड़की को दुल्हन के वेश में लेकर घर पहुंचा और बोला – “इसको अपना लें, ये आपकी बहू है। इसके घरवाले मान नहीं रहे थे, सो ऐसा करना पड़ा।“ भैया भाभी के सामने कोई चारा नहीं था। सो वे बहुत कम उम्र में सास ससुर बन गए। भाभी तो एक गीत का दस बार अभ्यास करके बैठी थी कि बहू आएगी तो सुर में गाएंगी-

“दुल्हिन धीरे धीरे चलिअउ ससुर गलिया…

दुल्हिन सासु से बोलिअउ, मधुर बोलिया…”

मौका ही नहीं मिला, अपनी मधुर गायकी का प्रदर्शन करने का। गीत कंठ में ही गूंजता रह गया। दुल्हिन धड़ल्ले से बेटे के साथ घर में प्रवेश कर गई। ये तो अच्छा हुआ कि बिना गाना गाए भी दुल्हिन की मधुर बोलिया निकली। एक अरमान पूरा हुआ। जिन अरमानों पर पानी फिरा था, उस पानी में यदाकदा छप छप करती रहतीं। मगर दुल्हिन से रार न ठानती थी। जो आई सो मायके लौट कर न गई। रात दिन का संग साथ था। निभा रहे थे दोनों।

आंगन में उनकी दुल्हिन भी सिर से आंचल उतारे चैन से बैठी हुई थी। बड़की भाभी ने आदेश जारी किया- “सबलोग आराम कर लो…दस बजे सब लोग वेश बदल के तैयार रहना, डोमकच के लिए निकलेंगे गांव में। तब तक गांव का बचा खुचा मरद सब सुत जाएगा, जादा मरद तो बाहरे मिलेगा, ओसारा में सोया हुआ, खेला कर देना है…”

सारी स्त्रियां ठहाके लगा रही थीं। सबको रात के संभावित खेला के बारे में सोच कर हंसी आ रही थी। डोमकच का खेला देर रात तक चलता है। पूरे गांव-टोले-मोहल्ले में, पुरुष वेश या बहुरुपिया बनी हुई औरतें, बाहर सोए हुए, जागे हुए मर्दों को सताती हैं। उनसे कुछ नेग वसूल कर ही जान छोड़ती है। इस स्वांग में बड़े, छोटे, बहू सास, ससुर का लिहाज खत्म होता है। देर रात तक गांव में स्त्रियों का आतंक मचता रहा। बाराती में जो मर्द न जा पाए, वे पछताते रहे। जेब भी कटी और मजाक के पात्र भी बने। टोला, मोहल्ला का चक्कर लगा कर जब आंगन में पहुंची तो वहां देर तक आपस में विश्वस्तरीय गालियों, अश्लील मजाको, गाली गीतों से एक दूसरे को नवाजती रहीं। सबसे ज्यादा गाली सुनने वालो में मैं थी। एकमात्र शहरी ननद, जो सिंगल थी। दुल्हिन लिहाज भूल गई कि फुआ जी हैं…बहुरुपिया बन कर, नाचती हुई मुझे गाली सुना रही थी-

“हाजीपुर के गलिया, उताल चल गे ननदी

देख लेतौ सोनरा भतार

भागलपुर बजरिया में मत जो गे ननदी

देख लेतौ रेसमी भतार…”

सब एक दूसरे को गाली सुना कर, सुन कर निहाल थीं, मानो आकाश से आशीर्वचन झर रहे हों। उनके उन्मुक्त ठहाके गगनभेदी थे। घर-आंगन-खेत तक गूंज रहे थे। मुझे लाज आती और मैं कान बंद कर लेती।

“उफ्फ…हद होती है बेशर्मी की। सबकुछ खोल कर रख दोगे क्या।..गीत गाओ…सप्रसंग वर्णन तो बंद करो…”

कोई माने तब ना। पूरे कूंए में भांग पड़ गई थी। किसी को नींद कहां। उत्तेजना, उल्लास और सिसकारियों से कोना कोना भर गया था। मर्द का वेश धरी हुई औरतें, दूसरी औरतों को मर्दो की.तरह छेड़ रही थीं, दैहिक छेड़छाड़ भी चल रही थी। मुझ तक आतीं तो मैं उठ कर भाग जाती। नकली मूंछे लगाए, हाथ में पतली लाठी ठकठकाती हुई सबकी साड़ियां उठा देतीं। मैं सख्त थी, मगर लाठियां बेजान कहां मानेगी। पूरे आंगन में भागमभागी, दौड़ा दौड़ी…छेड़छाड़…अश्लील गालियां…और सेक्सी किस्से…किसने किसका क्या देखा, किसने कैसे चुंबन लिया, कौन पेटीकोट में निकल कर बाथरुम भागा…

मेरे लिए यह सब अदभुत नजारा था। मैं किसी और ग्रह पर थी, जहां परदे में जीने वाली ये सारी औरतें एलियन थीं। जिनके सामने अपनी लाज बचाना मुश्किल था। बूढ़ी औरतों को नहीं छोड़ रही थीं तो मुझे क्या बक्खशती। भोर तक ड्रामा चलता रहा। जब जैतपुर वाली चाची बोलीं कि “ उधर सेन्नुर पड़ गया होगा…चलो, खत्म करो ये सब। सुबह जल्दी तैयारी में भी लगना है…” तब जाकर यह उत्पात बंद हुआ।

उल्लास की थकान भी कम नहीं होती। सुबह किसी की पलकें ना खुले, तो किसी की आंखे लाल। किसी की सूजी हुई आंखें, तो कोई पानी के छींटे मार मार कर हलकान। मैं उन सबकी अपेक्षा देर से जगी थी, भाभी अगर गुनगुनाती नहीं तो नींद न खुलती- “उठिए हे गिरिराज कुमारी…बन में पंछी बोलत है…।“ अलसाती हुई मैं भी उनकी जमात में शामिल हो गई।

पास पड़ोस और आंगन की सारी स्त्रियां मिट्टी के बड़े से चूल्हे के पास घेरा बना कर बैठने की तैयारी कर रही थीं।

मैंने पटोरी वाली भाभी को छेड़ा- “रात का नशा अभी…आंख से गया नहीं…”

“अरे क्या नशा बउआ…भैया तो गए बाराती, नशा केकरा संग…?”

“क्या भाभी, खाली नशा वहीं होता है क्या ?“ मैंने एक आंख दबाई।

“और क्या…हमारा नशा तो वही है छोटी ननदी…” पिपरा वाली भाभी छमक के बोल पड़ी। ब्लाउज से बीड़ी निकाली और कोने में खिसक गईं। बीड़ी की गंध उनकी स्थायी देह गंध थी। मैंने गौर किया, दुल्हिन भी पीछे पीछे दबे पांव उनके साथ लग लग गई। ओ…तो ये सांठगांठ चल रही है। मेरा मन हुआ- एक सुट्टा मार लूं लेकिन याद आया कि सिगरेट के एक कश में ही तेज खांसी उठ जाती है। मैंने पीछे से अपने वाक्य उछाल दिए…

“आप लोग शुरु हो गए सुबह सुबह…और कुछ सूझता ही नहीं आप लोगो को…गजब है…कोई बात हो, घुमा फिरा के वहीं ले आती हैं…सारी कामुक और नशेबाज औरतें इसी घर में…”

मैं हंस रही थी, नकली ढंग से माथा ठोकते हुए।

थोड़ी ही देर में चूल्हे के आसपास सारी औरतें जमा हो चुकी थीं। फरवरी महीने का उतरता हुआ जाड़ा था, फिर भी आग भली लग रही थी।

शाम तक बारात वापस आने वाली थी, उसके पहले दलपूरी और गुड़ की खीर बन जाए ताकि दुल्हन के आने के बाद टोले मोहल्ले में बैयना बंटाए। बड़की भाभी ने चने के दाल उबालने रख दिए और कुछ औरतें आटा गूंधने लगीं। सब अलग अलग कामो में। मैंने दाल भरने का काम ले लिया, ताकि बीच बीच में मुंह में दाल के भरवां मसाले डालती रहूं। दिल्ली में कई बार बनाने की कोशिश की, ऐसा स्वाद कभी नहीं मिला। मंडली मग्न थी, बड़ा कड़ाह में तेल खौल रहा था। पूड़ियां बनाई जाने लगी थी। केले के पत्ते एक तरफ रखा था और बड़ी बड़ी कठौतियां भीं जिनमें पूरियां बाद में रखी जातीं। पहले केला के पत्ते पर, ताकि तेल सूख जाए। उनींदी आंखों से मंडली ने काम शुरु किया।

बूढ़ी औरतें बार बार झांक जाती। दरवाजे पर चिलम भर कर गुड़गुड़ाती हुई बड़की चाची बार बार आवाज लगातीं- “गीत गाओ न रे सब…चुपचाप कहीं बयना बनता है का…मुंह में दही जमा ली हो का तुम सभ…”

“पिपरावाली भाभी चैला को चूल्हे में भीतर तक ठूंसती हुई ठहाके लगाईं – आग अइसे लहकता है, देख लो तुम लोग…”

“आयं दीदी…आप आग अइसे लहकाती हैं का ?” बड़की भाभी ने आंख मारी।

थोड़ी दूर पर आटा गूंध रही नईकी चाची बोलीं- जैतपुर वाली तो अइसे ही लहकाती हैं…हम देखे हैं…

“अच्छा…सब एक साथ बोल पड़ी..कब देखीं ? हमें भी तो बताइए…”

“सुनिए…हम लहकाते नहीं हैं…बूझीं…हमको संकेत मिल जाता है, त का जरुरत है लहकाने का। लहकाए पीपरा वाली जो छुपती फिरती हैं।“

सारी अब पीपरा वाली के पीछे पड़ गईं –  “क्या दीदी, हो जाए। बता ही दीजिए…”

“अरे क्या बताएं…इनके तो माथे पर ही सवार रहता है।“

“जब बाहर से आते हैं, कहेंगे खाना लेकर आओ, हम कहते हैं- बाहर आकर खा लीजिए, तो कहेंगे, खाना अंदर ही ले आओ, थक गए हैं, हम जैसे ही खाना लेकर अंदर जाते हैं, खाना छोड़ कर बिछौवना पर खींच लेते हैं। अब हम समझ गए हैं…जब भी बाहर से आते हैं, हम पूछ लेते हैं-“

“ऐ जी…खाना खाओगे कि पहिले करोगे…”

जोरदार ठहाका लगा। किसी के हाथ से लोई छूटी, किसी के हाथ से दाल भरवां। नईकी चाची हंसके हंसते वहीं लोट गईं। मेरा पेट पकड़ के बुरा हाल…

उनका सुनाने का तरीका इतनी नाटकीय था कि मुझे लगा- कहीं मंच पर कोई प्रस्तुति चल रही हो।

“मेरा हो गया, अब आप लोग अपना सुनाओ…खाली हमारा ही खिस्सा नहीं सुनना है…दो पसेरी आटा का पूरी बनना है, बहुत समय लगेगा, सब खोलो अपना कच्चा चिट्ठा…हो जाए…”

बाहर से बुढिया फुआ की आवाज आई- “खाली तुम लोग ठी ठी करोगी कि झूमर भी गाओगी?”

“लाफिंग गैस सूंघ ली है औरत सब…”

मेरे इतना कहते ही फिर ठहाका लगा। मैं मोढ़े पर ठाठ से बैठी गपशप का आनंद ले रही थी। इतनी खुली बातचीत मैंने कहीं नहीं सुनी थी। पीपरा वाली की बात सुनने के बाद अचानक सबके होठ फड़फड़ाने लगे…लेकिन सब पहले दूसरे को सुनना चाहती थीं। जैतपुर वाली भाभी लडा रही थीं। पीपरा वाली ने उनका संकोच तोड़ा- “बता दो बता दो…बाराती से आने के बाद बारात की सारी खुमारी कैसे उतारेगा, बता दो…।“

“भाभी….”

गीले हाथ पीपरा वाली के गाल पर सटा दिए जैतपुर वाली ने। पड़ोसन शीला भाभी की तरफ घूम कर पीपरा वाली बोली-

“तुम्हारे भी तो बारात से लौटेंगे, काहे नही बताती हो कि कल तुम्हारे ओसारे पर चादर जरुर सूखेगा…”

“हो हो हो हो…” दीवारे हिल गई घर की। बाहर खांसी उठी।

झूमर नहीं गाना है तो ननद को दो चार गाली ही सुना दो…दुल्हिन के आने के बाद तो गाना बजाना बंद न होगा जी, गा लो, भाई…

फुआ का दबाव बढ़ गया था।

“ईहां एतना बढ़िया खिस्सा कहानी चल रहा है, फुआ को गीत की पड़ी है। दो चार गीत गा दो, फिर गपशप चलेगा…”

मैंने सबको समझाया।

बड़की भाभी जो देर से सिर्फ हंस रही थीं- उन्होने गाली गीत शुरु किया-

“पनिया भरन हम न जइबे हे चाची

ग्वारा के बेटा मरद देलक छाती…”

गीत शुरु होते ही दूर आंगन बुहार रही जोखन बहू झाड़ू छोड़ कर उठी और उनके पास आकर ठुमकने लगी। मुझे अचानक ध्यान आया। दौड़ती हुई कमरे में जाकर पर्स से मोबाइल उठा कर लाई और गीत और नाच का वीडियो बनाने लगी। रात को इतना अंधेरा था मोहल्ले में कि वीडियो सही नहीं आया था। दुल्हिन उठी, वह भी नाचने के मूड में थी। मुझे झकझोरा कि मैं भी साथ दूं। लेकिन मैं वीडियो बनाना चाहती थी। मैं इनके उल्लास अपने साथ हमेशा के लिए कैद करके ले जाना चाहती थी ताकि अपनी तन्हाई में सुन कर उसे गीतिल शोर से भर सकूं। बहुत रस था इनकी बातों में। पति के साथ अपने सेक्सुअल संबंधों पर कितना कुल कर बोल रही हैं। एक दूसरे की खिंचाई भी कर रही हैं। एक दूसरे का भेद भी जानती हैं।

एक गीत जैसे ही खत्म हुआ, शीला भाभी दुल्हिन के पीछे पड़ गई।

तनि नईकी दुल्हिन का भी सुन लो…नया लड़का सब कइसे…

बड़की भाभी ने हस्तक्षेप किया- अरे, बच्चे को तो छोड़ दो, थोड़ा तो पतोहू को लिहाज करो…

जैतपुर वाली चीखी- अच्छा, अपनी बहू का बचाव कर रही हो, बेटे के बारे में सुनने में शरम आ रही है, अभी तो आपकी कहानी भी सुनेंगे…बारी आने दीजिए, पहिले अपनी बहू का सुन लीजिए…

नाच की मस्ती में डूबी हुई बहू ने सास के प्रतिवाद पर ध्यान दिया ही नहीं- हमारे ई, जब गरम गरम अंडा लेकर आते हैं, तब हम समझ जाते हैं कि आज ई अंडा फोड़बे करेंगे…

जिस अदा से ये बात कही गई थी, मैं तो मोढ़े से नीचे लुढ़क कर हंस रही थी। पीपरा वाली सूखा आटा उड़ा उड़ा कर हंस रही थीं। बड़की भाभी खिसियानी हंसी हंसते हुए बोली- “ई बेशरम सब…बेटा पूतोह को भी न छोड़ेगी…ई दुल्हिन को देखो…बेचारा बेटा, उसको उसीना हुआ अंडा पसंद है, बाहर से लौटते हुए ले आता है, इसका दूसरा ही मतलब निकालती है….हद है भाई…”

मुझे तो अपने भतीजे की शक्ल याद आ गई- हाथ में उबला हुआ अंडा लेकर कैसे प्रणय निवेदन करता होगा…

हंसते हंसते मुझे लगा कि अब मैं उबले हुए अंडे को दुनिया के किसी भी कोने में देखूंगी तो सहज नहीं रह पाऊंगी।

बड़की भाभी ने दुल्हिन को किसी और काम में लगा दिया। वह वहां से जाना नहीं चाहती थी, मन मार कर वहां से उठ कर गई। देवता घर सजाने के काम में लगा दिया। उसके बाद बड़ी भाभी मुखातिब हुई। पूरी छानने का काम उनके हाथ में आ गया था। पीपरा वाली टांग फैला कर भरवां मसाला बनाने लगीं थीं। जोखन बहू को और चइला ( जलावन) लाने के लिए आवाज लगाई नईकी चाची ने।

“हम न सुनाएंगे किस्सा, कोनो नया बात है का…कितना मजा आ रहा है सबको…चिरई के जान जाए, लइका के खिलौना. तुम लोग बहुत खुश हो रही हो..रोज रोज के काम से ऊबती नहीं हो का। रोज एक ही काम…हमारी उम्र हुई, हमको अब मुक्ति चाहिए…”

चूल्हे से आग की लपट बाहर तक आ रही थी। बड़की भाभी ने पानी का हल्का छींटा मारा। बाहर तक लपटें आना बंद हुईं।

मेरे अलावा उनकी बात का किसी पर असर नहीं पड़ा। सब एक दूसरे की खिंचाई में लगी थीं। बीच बीच में गाली गीत की दो लाइन गा लेतीं। पहली बार पिपरा वाली भाभी का नाम लेकर जैतपुर वाली ने गाली गाई….”निशी, इम के चलइछअ, छिम के चलइछअ गाड़ी में…।“ तब मुझे पता चला कि इनका नाम निशी है। कितना सुंदर नाम। कभी किसी ने पुकारा नहीं था। मैंने पुकारा- “निशी भाभी…”

वे हंसी…”अब क्या पुकारती हो छोटकी ननदिया…गाली सुनने का मन है क्या…गाऊं…?”

मैंने हाथ जोड़ लिए.

वे पूरी बेलने में लग गईं।

बड़की भाभी का चेहरा चूल्हे के ताप से भभक रहा था। बीच बीच में आग मंद पड़ जाती तो फूकना उठा कर फूकने लगतीं। फिर हांफ जाती। आग के लहकते ही चेहरा दमक उठता। आग और स्त्री का चेहरा कभी कभी परस्पर जुड़े लगते हैं। आग लहकेगी तो चेहरा दमकेगा। मैं उठ के बड़की भाभी के पास बैठ गई।

“लाइए..मैं पूरी छानती हूं…आप डालते जाइए…” मेरे आग्रह के वाबजूद भाभी ने मुझे काम नहीं दिया। निर्विकार भाव से करती रहीं, मानों अपनी डयूटी निभाता हो कोई।

जैतपुर वाली धीरे धीरे कोई गीत गा रही थीं। बाकी भी सुर मिला रही थीं। बड़की भाभी ने धीरे से मेरे कान के पास कहा- “आप अकेली कैसे रह पाईं बउआ ? एकांत तो दुश्मन होता है औरत का।“

मन हुआ अपना रेडीमेड जवाब सुना दूं जो अक्सर मैं ऐसा सवाल पूछने वालों को बौखला कर देती हूं…”मुझे जिसको अपनी देह नहीं छूने देना था, उसे तलाक दे दी। जिसके साथ सोने का मन था, वह मिला नहीं।“

मगर मैं भाभी से ये सब नहीं कह पाई। उनके चेहरे पर मेरे लिए मिले जुले भाव उभर रहे थे जिन्हें मैं पकड़ नहीं पा रही थी।

“आपकी जिंदगी बहुत अच्छी है बउआ… “

“हां, मैं उन औरतों से बेहतर हूं जो एक पति का लेबल माथे पर लगा कर छत्तीस के साथ सोती हैं।“

“आप उन औरतों से भी बेहतर हैं जो एक ही आदमी का आतंक सारा जीवन झेलती हैं…”

भाभी मुस्कुराईं।

जैतपुर वाली आंख मारते हुए बीच में बोल पड़ी- “घी और आग साथ साथ रहेंगे तो पिघलना घी को ही पड़ेगा ना। बड़ी दीदी का घी ज्यादा ही पिघल पिघल कर बह रहा है…, पानी का छींटा मारने से क्या होगा… “

मुझे घी और आग वाली बात पर हंसी आ गई।

“अब मुझे बहुत शर्म आती है। इच्छा भी नहीं होती। बहू घर में आ गई है। उनको शर्म तो आती नहीं, बहू के सामने से भी खींच ले जाते हैं…हम लाज से मरे जा रहे हैं…”

मैं अकबका गई। बातचीत ने कोई और मोड़ ले लिया था।

भाभी ऐसी बातें शेयर करेंगी, सोच भी नहीं सकती थी। वे मेरी जिंदगी जानती थी कि कितनी पुरुषविहीन है। मैं बर्फघर में रहती हूं जिसे मैंने चुना है। जिंदगी के चालीस साल निकल गए, मेरी ख्वाहिशों के सुरंग से। यहां आ कर थोड़ी गरमाई लौटी थी जीवन में। लेकिन बड़की भाभी क्या कह रही हैं। मेरा माथा घूम गया। अभी तो सबकुछ इतनी हसीन चल रहा था। सबके पास अपने अपने रति के किस्से थे। गोपन कुछ नहीं रहा।

भाभी ने पूरियां केले के पत्ते पर फेंका और कच्ची पूरियां डालीं कड़ाही में।

“तेल खत्म होने तक पूरियां तली जाती रहेंगी…मन कर रहा, तेल ही फेंक दूं…न रहेगा तेल न तलने का झंझट…”

मैं चुप थी। उनके चेहरे की तरफ देख रही थी।

“आप मेरा एक काम करेंगी बउआ…?”

मेरी आंखों के सवाल भयातुर हो उठे।

“दिल्ली जाएंगी न, तब नामर्दी की दवा हमको भेज दीजिएगा। यहां हम इंतजाम नहीं कर पाएंगे। आपका भैया अभी ही हर दवाई को संदेह से देखते हैं, मुझे ऐसी दवा भिजवाइए जिसे खाने में मिला कर दे दूं…बहुत गिज्जन हो गया, मेरी देह को अब आराम चाहिए…।“

मैं झटके से उठ खड़ी हुई। बड़की भाभी अभी भी पूरियां तलने में ऊबाऊ ढंग से लगी हुई थीं। जैतपुर वाली ने मेरा दामन पकड़ा- “थोड़ा ज्यादा ही भिजवाइएगा…हम सब बांट लेंगे, सबके काम आ जाएगा…”

थोड़ी देर सन्नाटे के बाद जैतपुर वाली ने गीत शुरु किया…फिर उसमें सबकी आवाजें मिल गईं थीं…बाहर से खांसी का कोरस बंद हो गया था।

“सब रे पुरुष लोगे

एके लेखा खोटे रामा

बुढ़ियों में हरिया के नित ही

खसोटे रामा…

देहरि के भीतरी कलपते बितउली रामा

धरती से भारी तन

मनवा के चोटे रामा…”

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