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थियेटर ओलंपिक्स: मंजरी श्रीवास्तव का पुनरावलोकन

 

आठवें थियेटर ओलंपिक्स के समाप्त हुए एक महीने से ऊपर समय बीत चुका है. लेकिन इक्यावन दिन चले इस महोत्सव को लेकर चर्चाओं का दौर अभी नहीं थमा है. इसका एक आकलन कवयित्री, रंग समीक्षक मंजरी श्रीवास्तव द्वारा- मॉडरेटर

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8 अप्रैल को भारत में चल रहे आठवें थिएटर ओलंपिक्स का समापन हुआ. विभिन्न शहरों में हुए इक्यावन दिन के इस महोत्सव पर नज़र डालें और विशेष रूप से दिल्ली की बात करें तो दिल्ली में हुए नाटकों में इटली ने बाज़ी मार ली. इटली के सारे नाटक एक से बढकर एक रहे. जैसे नाटक नहीं कोई तिलिस्म.  अगर थिएटर ओलंपिक्स में हुए सर्वोत्तम पांच नाटकों की बात की जाए तो पांच में से तीन या चार तो इटली के ही होंगे.

इस श्रृंखला में पहले स्थान पर रखा जा सकता है नाटक ‘ला गिओइया’ को. थिएटर ओलंपिक्स के अबतक के सभी नाटकों की समीक्षा की जाए तो तमाम नाटकों में पहले नंबर पर रहा ‘ला गिओइया’.

नाटक की अवधारणा और निर्देशन इटली के मशहूर युवा निर्देशक पिपो देल्बोनो का था. शब्द ‘ला गिओइया’ का अर्थ होता है ‘आनंद’. नाटक आनंद की तलाश के साथ शुरू होता है और विभिन्न कहानियों और कविताओं द्वारा अपने साथ दर्शकों को ख़ुशी की तलाश की यात्रा पर ले चलता है पर आश्चर्य की बात यह है कि आनंद की इस तलाश के दौरान बार-बार दर्शकों की आँखें भर आती हैं, गला रुंध आता है और नाटक के अंत में दर्शक नम आँखों से प्रेक्षागृह के बाहर निकलते हैं. दरअसल निर्देशक पिपो दर्शकों के सामने विकल्प छोड़ देते हैं कि दर्शक अपने-अपने हिसाब से आनंद की व्याख्या करें, अपने हिसाब से ख़ुशी को परिभाषित करें और यही इस नाटक की सार्थकता है.

नाटक कई कहानियों और कविताओं पर आधारित है और इसमें एक अंश ‘वेटिंग फ़ॉर गोदो’ से लिया गया है. कुछ कवितायें एर्री द लूका माइग्रंट्स की हैं जिनमें ‘नन्हीं नावें’ शीर्षक कविता को ८१ वर्षीय मूक-बधिर इतालवी कलाकार बोबो की उस कथा के साथ बेहद ख़ूबसूरती के साथ पिपो ने पिरोया है जिसमें यह बताया जाता है कि बोबो ४७ या ४९ वर्ष के बाद पागलखाने से लौटा है. वह अकेला उदास बैठा है काग़ज़ की इन नन्हीं नावों से घिरा और खुद में एक तारीपन, एक उदासी को महसूसता हुआ. निर्देशक पिपो यह दिखाने में सफ़ल हुए हैं कि एक ही लम्हे में बोबो कितना भरा हुआ है, कितना कुछ है उसके भीतर जो छलकने को बेताब है और उसी एक लम्हे में वह बिलकुल ख़ाली है. बोबो की यह बेताबी और उसका यह खालीपन उसी एक लम्हे में दर्शक बिलकुल उतना ही महसूस कर सकते हैं जितना बोबो खुद.

निर्देशन, प्रकाश व्यवस्था, संगीत और सबसे बढ़कर ८१ वर्षीय मूल-बधिर इतालवी कलाकार बोबो (जिनका असल नाम भी बोबो है) का कमाल का अभिनय दर्शकों को बोबो की ख़ुशी और वेदना दोनों का एहसास कराने में शत-प्रतिशत सफल रहा है. खासकर अपने जन्मदिन वाले दृश्य में बोबो ने अपनी अद्भुत भाव-भंगिमाओं पर आधारित जो मौन ‘बर्थडे स्पीच’ दिया वह स्पीच आंखों में आंसू ला देनेवाला था। अद्भुत कलाकार हैं बोबो। बोबो का अभिनय और पिपो का निर्देशन भारत के नाटक प्रेमियों को हमेशा याद रहेगा।

नाटक की पहली कहानी थोड़ी छोटी पर डरावनी है पर पिपो प्रकाश, संगीत, वेशभूषा इन सबसे कुछ देर के लिए प्रेक्षागृह में ऐसा वातावरण उत्पन्न कर देते है कि दर्शकों की रूह तक काँप जाती है. फिर उस डरावने दृश्य के बाद एकाध दृश्य ‘पासिंग रेफरेंस’ की तरह आते हैं और तीसरा दृश्य या तीसरी कहानी बोबो की है जो अंत तक बोबो के ही इर्द गिर्द घूमती है. लगभग डेढ़ घंटे के इस नाटक में ४५ मिनट बोबो ही मंच पर बिना कुछ बोले अपना जादुई प्रभाव उत्पन्न करते रहे हैं.

अंतिम दृश्य दर्शकों को रुला जाता है जहाँ बोबो एक बेंच पर बैठे हैं और उनके चारों ओर सूखे पत्ते हैं और मंच के एक कोने में फूल खिले हैं, फूलों की झालरें हैं और फिर बोबो की बेंच भी चारों ओर फूलों से भर जाती है पर वे फूल बोबो के मन की उदासी को दूर नहीं कर पाते हैं. बोबो की यह उदासी दर्शकों के लिए यह सन्देश है कि सबके लिए खुशी की अपनी –अपनी परिभाषा और व्याख्या होती है. ज़रूरी नहीं कि आपकी ज़िन्दगी में चारों ओर फूल ही फूल हों, बहारें हों तो आप आनंदित ही महसूस करें.

पिपो के इस नाटक की एक और खास बात यह थी उन्होंने अपने नाटकों में अपने पात्रों के नाम बदले नहीं हैं. सारे पात्रों के नाम उनके असल नाम हैं. इस बारे में पिपो का कहना है कि – “मुझे नाम बदलना पसंद नहीं. अगर मैं पिपो हूँ तो मुझे पिपो ही जाना जाए, अगर ये बोबो हैं तो इन्हें बोबो के नाम से ही पुकारा जाना चाहिए. हम अपना नाम और चेहरा क्यों बदलें चाहे वह किसी नाटक के लिए ही क्यों न बदलना पड़े.” पिपो यह भी कहते हैं कि – “यह शब्द ‘ला गिओइया’ (आनंद) मुझे भयभीत करता है क्योंकि दरअसल जो चीजें आनंददायक दिखती हैं दरअसल वे धोखा हैं.” और यही धोखा उन्होंने अपने इस नाटक में विभिन्न कहानियों और कविताओं द्वारा, विभिन्न चरित्रों द्वारा दिखाने की कोशिश की है. पतझड़ के बीच बैठे बोबो की बेंच का अनायास फूलों से भर जाना और फिर भी बोबो का उदास ही रह जाना इसी धोखे का प्रतिध्वनन है.

दूसरे स्थान पर भी इतालवी नाटककार एवं निर्देशक पीनो दी बुदुओ का नाटक ‘द सस्पेंडेड थ्रेड’ रहा. दरअसल यह नाटक नहीं कोई जादू था. एक ऐसा तिलिस्म जिसकी गिरफ़्त से दर्शक अबतक नहीं निकल पाए हैं. नाटक चल रहा था और ऐसा लग रहा था कि मंच पर हमारे सामने कोई पेंटिंग बना रहा है, कोई व्यक्ति समय के पार जाकर कोई जादुई, कोई तिलिस्मी कविता लिख रहा है और निस्संदेह वह पेंटर, वह कवि, वह जादूगर, वह व्यक्ति हैं नाटककार और निर्देशक पीनो. ७ मार्च को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का अभिमंच प्रेक्षागृह पीनो के तिलिस्म की गिरफ़्त में था. पीनो ने काव्य, प्रेम और मृत्यु तक को इस कोमलता के साथ मंच पर रचा कि उनके इस नाटक को देखते समय प्रसिद्द भारतीय रंग निर्देशक रतन थियाम (जो खुद ही भारतीय रंगमंच के जादूगर हैं) की वह कविता बरबस जेहन में चलने लगी थी कि –

समय को चौबीस घंटों ने जकड़ रखा है

मुझसे बात करना है तो

चौबीस घंटों के बाहर के समय में तुम आओ

मैं वहीँ तुम्हारा इंतज़ार करूंगा…

दरअसल पीनो का यह नाटक समय से बाहर की कथा है. यह काव्य, प्रेम, मृत्यु और आकाश से बेहद कोमलता के साथ गिरते हुए एक मृदु और कोमल हिमकण की कथा है और कलात्मक भिडंत है अभिनेत्री नथाली मेंथा (जो पीनो के नाट्य समूह तिएत्रो पोत्लाश से है) और जापान की परंपरागत कमिगाता मेई नृत्यशैली की सर्वश्रेष्ठ जापानी कलाकार कीइन योशिमुरा की.

नाटककार और निर्देशक पीनो के अनुसार इस नाटक का उद्भव पश्चिमी और पूर्वी संस्कृतियों के मिलन और विशेष रूप से महान जापानी कमिगाता मेई कलाकार कीइन योशिमुरा और स्विट्ज़रलैंड में जन्मीं और फ्रेंच मातृभाषी अपनी दीर्घकालीन पोत्लाश अभिनेत्री नथाली मेंथा के साथ मंच पर उपस्थित तिएत्रो पोत्लाश के बीच मिलन से होता है. दर्शकों के समक्ष ये दो महान अभिनेत्रियाँ एक ऐसी कथा को प्रस्तुत करती हैं जो कि ज्ञान, वेशभूषा और भाषाओं को पारस्परिक अंतर्गुन्थित करती हुई समय में स्थगित हैं.

हमारे समय की त्रासदी को एक फ़्रांसीसी, तनी रस्सी पर चलनेवाले किसी नट या नटी और एक जापानी समुराई के माध्यम से मूर्त रूप दिया गया है जो प्रेम की शक्ति और सत्ता को सामने लाना चाहते हैं चाहे उसका अंत त्रासद ही क्यों न हो. यह कहानी है एक युवा जापानी कवि, एक अंधे वृद्ध चित्रकार की और एक अद्भुत रज्जुनर्तक की. यूको, एक युवा जापानी कवि, सोसेकी, एक वृद्ध चित्रकार जो अंधा हो गया है; स्नो, एक अद्भुत रज्जुनर्तक नाटक के ये तीन चरित्र हैं जिनके भाग्य एक तनी रस्सी पर करतब दिखानेवाले के उस अभ्यास के प्रतीक के रूप में दो पहाड़ों के बीच फैले, एक महीन धागे से परस्पर बंधे हैं, जिसे कार्यान्वित कर पाना असंभव है.

यह हतप्रभ कर देने वाला नाटक था. प्रकाश-व्यवस्था से लेकर कलाकारोँ की देहभाषा और आख्यान (नरेटिव) तक, सब कुछ एक कविता की तरह लग रहा था. अपने नाटक ‘सस्पेंडेड थ्रेड’ पर प्रकाश डालते हुए निर्देशक पीनो कहते हैं कि, “मेरा नाटक दुखांत है। जब दो संस्कृतियाँ मिलती हैं, दो लोग मिलते हैं, और दोनोँ एक-दूसरे में समान रुचि विकसित करते हैं। लेकिन जब भाषा की बाध्यता के चलते दोनोँ एक-दूसरे के साथ उपयुक्त संचार नहीं कर पाते हैं तब यह एक त्रासदी बन जाती है और यही मैंने अपने नाटक में दिखाने की कोशिश की है. मेरे नाटक में भी दो संस्कृतियाँ मिलती हैं पर अंत त्रासद होता है. इस नाटक को एक शब्द में व्याख्यायित करना हो तो वह शब्द है – ‘अद्भुत.’

इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसके निर्देशक पीनो द बुदुओ इटली के हैं, अभिनेत्रियाँ नथाली मेंथा और कीइन योशिमुरा क्रमशः स्विट्ज़रलैंड और जापान की हैं और प्रकाश-परिकल्पक गुस्ताव ऑस्ट्रिया के हैं. दरअसल पीनो द्वारा विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित कलाकारों का यह चुनाव नाटक को बेहतरीन और वैश्विक बनाने के लिए था जिसमें वह पूर्णतः सफल हुए हैं.

तीसरे स्थान पर इटली के ही नाटक ‘तिशिना’ को रखा जा सकता है.

तिशिना एक ऐसी लड़की है जिसका अपना एक रहस्मय संसार है और वह उस संसार में अकेली मस्त रहती है. उसका यह घर-संसार प्रकट होने और फिर विलुप्त हो जानेवाली वस्तुओं, अजनबी ध्वनियों और रहस्यमयी प्राणियों से घिरा हुआ है. तिशिना अकेली है पर निराली और मस्त है और अन्य लोगों से भिन्न भी पर औरों की तरह उसे भी किसी दोस्त की तलाश है. तिशिना अपना झुर्रियों भरा चेहरा और पपड़ी पड़े हाथ लेकर पूरे शहर में घूमती रहती है जिससे लोग भयभीत होते रहते हैं. अपने चेहरे पर मृत्यु के भाव लिए या मृत्यु लिए उसके लगातार घूमते रहने से पूरा शहर भयभीत रहता है और कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो उसके साथ रहना चाहता हो. अपनी यात्राओं के दौरान वह धीरे-धीरे अपने वरदान को जो उसके लिए अभिशाप भी है, लोगों के सामने व्यक्त करती है और लोगों को यह बताती है कि कोई भी चीज़ जिसे वह भूलवश या जानबूझकर छू ले, वह सूख जाती है, टूट जाती है और विलुप्त हो जाती है. लेकिन वह एक दिन कृतज्ञ होती है उस छोटे से प्रकाश-बिंदु या उस पतली सी प्रकाश-रेख की जो उसकी प्रयोगशाला में परित्यक्त पड़े या शीशियों, पुराने कपड़ों और भूले-बिसरे पदार्थों के बीच से जन्म लेता है और उसका साथी बनता है. तिशिना अब उतनी भी अकेली नहीं है. कुछ अप्रत्याशित, भयावह और अद्भुत उसकी प्रतीक्षा कर रहा है. और सचमुच अभिनेत्री सिमोना द मेयो ने अपने शानदार अभिनय से इस नाटक को अद्भुत बना डाला है. इस नाटक को अद्भुत बनाने में सिमोना का साथ दिया है जीना ओलिवा की वेशभूषा और पाचो समोंत की कमाल की प्रकाश अभिकल्पना ने. इस नाटक के नाटककार हैं लूका दी तोमेसो और निर्देशक हैं सोबिस्तियानो कोतिचेली और खुद अभिनेत्री सिमोना द मेयो.

निर्देशकों के अनुसार यह नाटक, अतीत के कुछ महान  विदूषकों, मूक फिल्मों, प्रच्छन्न प्रसन्नचित्तता और टिम  बर्टन के बेतुके वातावरणों से प्रेरित एक पूरी तरह से शब्दहीन भाषा का प्रयोग करता है. दरअसल यह रंगमंच है विदूषक का रंगमंच…आकृतियों का रंगमंच, मुखौटों और पदार्थों का रंगमंच…अभिनेता का रंगमंच.

वाणीरहित आभिव्यक्तिक शब्दावली का प्रयोग करते हुए निर्देशक अभिनेता की देह को, आकृतियों के विविध प्रकारों और एक बहु क्रियात्मक दृश्यावली के लिए, एक सजीवता अवलंब के रूप में प्रयोग करते हुए, पदार्थों के तिलिस्मी रूप परिवर्तन को पुनर्स्थापित करते हैं और यह पुनर्स्थापन जड़ता से गति की ओर, मृत्यु से जीवन की ओर और विपरीत क्रम में भी हुआ है और निस्संदेह मंच पर एक जादू, एक तिलिस्म स्थापित करने में यह पूरी टीम कामयाब रही है. सब कुछ दर्शकों की दृष्टि में रखते हुए, बिना कुछ भी छिपाए, झिलमिलाते हुए घटनाक्रम को बिना अलग किये हुए निर्देशकद्वय, अभिनेत्री और पूरी टीम ने रहस्य को बनाये रखा है और दर्शकों पर उनका यह रहस्य, यह तिलिस्म जैसे सर चढ़कर बोल रहा था कल शाम कमानी ऑडिटोरियम में.

इस गैर-शाब्दिक नाटक के जादू के पीछे हाथ था ‘मिमिक-कॉमिक रंगमंच,  दैहिक रंगमंच, विशेषकर माइम, पैण्टोमाइम, विदूषक, कामेदिया देल आर्ते और मुखौटों के साथ प्रयोग पर केन्द्रित रंगमंच का जिसमें सिद्धहस्त हैं इसके दोनों निर्देशक और नाटककार भी.

चौथे स्थान पर रहा जापान के नाट्य समूह कमिगातामेई- तोमोनोकेई द्वारा प्रस्तुत किया गया नाटक ‘सकुरा’ (हिरोशिमा-नागासाकी का शोक गीत). इस नाटक की निर्देशक, नर्तकी और अभिनेत्री थी कीइन योशिमुरा. नाटक जापानी कवि संगिची तोगे की छह कविताओं पर आधारित था जिसका शीर्षक है “जेनबाकू शीशू”. इन कविताओं का पाठ भी स्वयं कीइन ने किया था.

इन कविताओं के साथ निर्देशक और अभिनेत्री कीइन कहती हैं विश्व शान्ति मेरा मिशन है और मैं चाहूंगी, प्रार्थना करूंगी कि इस धरती पर कभी हिरोशिमा और नागासाकी जैसी दुर्घटना दुबारा न हो. मैं विश्व भर के सभी मनुष्यों के सच्चे सुख की आशा और प्रार्थना के साथ अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता करना पसंद करूंगी.

इस नाटक का निर्माण हिरोशिमा और नागासाकी के ७०वीं वर्षगाँठ पर किया गया है. निर्देशक कहती हैं कि जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बरसे परमाणु-बम के हृदयविदारक अनुभव से हम जापानी अभी भी गुज़र रहे हैं और पूरे विश्व में शान्ति चाहते हैं. शान्ति की इसी प्रेरणा ने मेरे इस नाटक की पृष्ठभूमि तैयार की.

७० वर्ष पूर्व, द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान ने हार और महाविनाश का सामना किया. तब से हम जापानियों ने दिल की गहराइयों से वैश्विक शांति लाने का प्रयास किया है. युगों से जापानियों के मन-मस्तिष्क की शक्ति प्रकृति की संगति में जी रही है, जो कि हमारे चार मौसमों की बानगी है. हमारे लिए प्रकृति ईश्वर का जन्म है. जापानी संस्कृति, ब्रह्मांड के सर्वस्व शुद्धिकरण के लिए ईश्वर से प्रार्थना है और हमारी पारंपरिक संस्कृति, जो कि हमारे जीवन का मर्म है, प्रकृति को ‘वा नो कोकोरो’ के रूप में प्रतिबिंबित करती है, जिसका अर्थ है, सद्भाव की आत्मा. अपने इस कार्य ‘सकुरा’ के साथ मैं विश्व भर में सौन्दर्य, सद्भाव और शान्ति की आधारशिलाओं में से एक होने की आशा करती हूँ.

कीइन योशिमुरा जापान की परंपरागत कमिगाता मेई नृत्यशैली की सर्वश्रेष्ठ जापानी कलाकार हैं और कीइन का जादू दर्शक ७ मार्च को पहले ही अभिमंच में इतालवी निर्देशक पीनो द बुदुओ के नाटक ‘द सस्पेंडेड थ्रेड’ में देख चुके थे, इसलिए सकुरा के दिन कीइन के नाम पर ही एलटीजी प्रेक्षागृह दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था.  हमेशा की तरह ही अपनी इस नाट्य-नृत्य संरचना से एक घंटे तक उन्होंने हिरोशिमा और नागासाकी के उस दारुण दुःख से दर्शकों को रूबरू कराया जिससे जापानी आज भी गुज़र रहे हैं. नाटक की शुरुआत से अंत तक मंच सज्जा ऐसी थी जिसने दर्शकों को सर्वप्रथम जैसे बम विस्फ़ोट के बाद के वीरान हिरोशिमा और नागासाकी में ले जाकर खड़ा कर दिया था, फिर धीरे-धीरे उसी वीरानी से उद्भूत होती शान्ति में दर्शक अंत तक उतरते रहे, इस शान्ति को आप नर्तकी और अभिनेत्री कीइन के साथ चलते हुए बिलकुल वैसे ही महसूस कर सकते थे जैसे कलिंग विजय के बाद चक्रवर्ती सम्राट अशोक युद्ध से विरक्त हुआ हो और उसके चारों ओर शांति का प्रभामंडल बन रहा हो और वह अपने साथ-साथ आपको भी उसी अपूर्व शान्ति में लपेटे युद्धभूमि से निकल रहा हो. कीइन की यह विशेषता है कि वे दर्शकों को अपने साथ मंच पर लिए चलती हैं. दर्शक शरीर से प्रेक्षागृह में बैठे होते हैं पर उनका मन कीइन के साथ विचरण कर रहा होता है. कीइन की भाव-भंगिमाओं और नृत्य के साथ दर्शक भी उसी सुर-लय-ताल में थिरकते हैं. यही हुआ ९ मार्च को एलटीजी प्रेक्षागृह में. कीइन दर्शकों को युद्ध और वीरानी से शान्ति की ओर लेती चली गईं और दर्शक भी मंत्रमुग्ध से खिंचे चले गए उनके पीछे-पीछे.

पर, अफसोसजनक बात यह है कि भारतीय दर्शकों ने कीइन के उस निवेदन पर ध्यान नहीं दिया जो उन्होंने नाटक की शुरुआत में दर्शकों से किया था. उन्होंने निवेदन किया था कि नाटक की समाप्ति पर ताली न बजाएं और प्रकाश ख़त्म होने पर न सिर्फ हिरोशिमा और नागासाकी के पीड़ितों के लिए बल्कि वैश्विक शांति के लिए आँखें बंद करके तबतक प्रार्थना करें जबतक दुबारा मंच पर प्रकाश वापस न आये और नाटक ख़त्म होने पर अपने दिल की गहराइयों में सकुरा की एक पंखुड़ी (जापानी भाषा में चेरी ब्लॉसम के फूल को सकुरा कहते हैं) समेटकर शांत मन से अपनी जगह पर वापस जाकर बैठ जाएँ और सकुरा की उसी पंखुड़ी को मन में लेकर वैश्विक शांति की कामना के साथ घर लौटें. पर अफसोसजनक था यह देखना कि नाटक ख़त्म होने और मंच पर दुबारा प्रकाश आने के बीच पूरा प्रेक्षागृह खाली हो चुका था. गिनकर चार-पांच दर्शक बचे थे. एक भारतीय होने के नाते यह देखकर मेरा सिर शर्म से झुक गया. हिरोशिमा-नागासाकी के पीड़ितों के प्रति हृदय से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, विश्व-शान्ति और विश्वबंधुत्व की कामना करते हुए मैं यह भी कहना चाहूंगी कि भारतीय जनमानस में अभी भी नाटक देखने की तमीज का विकास होना बाक़ी है.

पांचवें स्थान पर रखा जा सकता है नीना माजूर द्वारा रचित और एव्जेनिया बोगिन्स्काया द्वारा निर्देशित नाटक ‘इट्’ज़ मी, एडिथ पियाफ़’. यह नाटक द्विभाषी था, जर्मन और रूसी भाषा का इस्तेमाल इसमें किया गया था.

यह नाटक फ्रेंच संगीत की प्रतीक प्रतिमा और किम्वदंती बन चुकी मशहूर गायिका एडिथ पियाफ़ के जीवन पर आधारित है. दरअसल यह नाटक एडिथ पियाफ़ के रचना-भंडार के मूलभाषा के गीतों के साथ, जर्मन या रूसी (या फिर संभवतः दोनों) भाषा का एकल नाट्य है. उनके जीवित रहते हुए, उन्हें ‘फ्रेंच राष्ट्र की आत्मा’ कहा जाता था और मृत्यु के बाद वे ‘फ्रेंच संगीत की प्रतीक प्रतिमा’ बन गईं. उनके भंडार के गीत पूरे विश्व में आज भी लोकप्रिय हैं. किम्वदंती बन चुकी गायिका ने, जिसने अपने करियर की शुरुआत पेरिस की कच्ची गलियों से की, अपने जीवन के बारे में पूछे गए प्रश्न का उत्तर दिया था – ‘प्रेम, और क्या ?’ एडिथ ने ऐसा इसलिए कहा था क्योंकि बचपन में अपनी दादी के साथ ब्रोथेल में बिताए बचपन की यादें हमेशा एडिथ के मन में चुभती रहीं जहाँ उसने यह देखा था कि एक औरत की अपनी कोई मर्जी नहीं होती. यदि कोई पुरुष इशारा करता था तो स्त्री की मजाल नहीं थी कि वह उसके साथ जाने और उसकी मर्जी के हिसाब से खुद को उसके सामने परोसने से इंकार कर दे. और इस सारी प्रक्रिया में यदि कोई चीज़ स्त्री-पुरुष के बीच से बिलकुल गायब थी तो वह था प्रेम.

दादी के पास कुछ वर्षों तक रहकर वहां से वापस लौटने के बाद एडिथ ने पिता के साथ पेरिस की गलियों में गाया. 14 वर्ष की उम्र में एक दिन जब वह पिता के साथ निकली और गली-गली भटक रही थी तो उसने पाया कि उसके पिता जो कि एक एक्रोबेट थे उनकी भाव-भंगिमाओं पर किसी ने एक रूपया भी नहीं दिया. उसके पिता जब थक गए तो उसने बड़ी मायूसी से गाना शुरू किया और वह गीत था फ़्रांस का राष्ट्रगान. इसके अलावा एडिथ को कोई गीत आता ही नहीं था. पर इस गीत और एडिथ की आवाज़ ने उसकी झोली भर दी. फिर उसके गाने का सिलसिला चल निकला और भविष्य में वह फ़्रांस की सबसे मशहूर गायिका बनी. क्या विडम्बना रही कि पति को त्यागने और २ साल की बेटी की मौत के बाद एडिथ के संगीत के कैरियर में उछाल आया और वह अपने समय की सबसे बड़ी गायिका, गीतकार और कैबरे गायिका बनी.

चूंकि एडिथ के गायन में गोरैया की चंचलता, बुलबुल की चपलता और कोयल की कूक थी अतः अपने करियर के बीसवें वर्ष में जाकर एडिथ को ‘स्पैरो’ के नाम से पुकारा गया.

एडिथ के जीवन पर बना यह नाटक एडिथ का पूरा निजी और सांगीतिक जीवन मंच पर जीवंत कर देता है. अभिनेत्री अनास्तासिया वीनमार ने मंच पर एडिथ को जीवंत कर दिया है. संगीत-संचयन नतालिया स्मोत्रित्काया का है और दृश्यबंध एवं वेशभूषा है इल्शात विल्दानोफ़ की. नाटक के विभिन्न दृश्यों में अभिनेत्री अनस्तासिया ने जर्मन-रूसी संगीत, ऑपेरा और कैबरे का ऐसा सम्मिश्रण प्रस्तुत किया जो अद्भुत था. दर्शक एक सेकंड को असमंजस में थे कि अनास्तासिया गा रही हैं मंच पर या स्वयं एडिथ पियाफ़. एक यादगार प्रस्तुति, एक कभी न भूलनेवाला नाटक रहा एडिथ पियाफ़.

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