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सिंगापुर डायरी: 2: एक देश की जीवनशैली दूसरे देश की ज़रूरतमन्दी पर टिकी है

अनुकृति उपाध्याय हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखती हैं. उनका एक अंग्रेजी उपन्यास अगले साल प्रकाशित हो रहा है. एक अंतर्राष्ट्रीय वित्त संस्थान में काम करती हैं और उनकी कहानियों में समकालीन जीवन स्थितियों के कथानक हैं. इन दिनों सिंगापुर डायरी लिख रही हैं. यह उसकी दूसरी क़िस्त है- मॉडरेटर
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#७

हॉलैंड विलेज का रिहायशी इलाक़ा। सिंगापुर का लघु यूरोप, सैलानी और बाशिंदों में एक सा लोकप्रिय। सड़क किनारे छोटे फैशनेबल रेस्तराँ, पानगृह और कहवाघर। नृत्य विद्यालय, हिप्नोथेरेपी, रेकी, टैरो और पिलाटेज़  के स्टूडियो।  दीवारों पर  रंग बिरंगे भित्ति चित्र। रात को वाहनों के लिए यहाँ की गलियाँ  बन्द कर दी जाती हैं और मेज़-कुर्सियाँ फुटपाथ और सड़क को छेक लेती हैं, इटली या फ्रांस या स्पेन के किसी प्लाज़ा का सा माहौल बनाने की कोशिश में। कोनों अंतरों में धँसे छुपे, छोटे लेकिन बड़े ही नफ़ीस रेस्तराँ और उससे भी नफ़ीस पसन्दों वाले लोग। और इतनी नफासत के बीच पीले कंक्रीट की चौखूँटी ठस्स सी दीखने वाली इमारत में बसा ‘हॉकर्स मार्केट’, आस-पास की चमक दमक से निरपेक्ष, अपनी लोहे की मेज़-कुर्सियाँ निःसंकोच पसारे। छोटी छोटी दुकानों में तरह तरह के चीनी भोजन की बहार है – सब्ज़ियों या मांस भरे डिमसुम, किस्म किस्म के नूडल, कोयले पर पके चीन के सुप्रसिद्ध चार स्यू मांस-खण्ड, वोनटोन सूप। सब कुछ हॉलैंड विलेज के दामी रेस्तराँ से एक-चौथाई दाम पर। एक वृद्ध जोड़ा इस बाज़ार से निकलता है। सन से सफ़ेद बाल और झुर्रियों में झूलती खाल। महिला के होंठों पर लाल लिपस्टिक है और पुरुष के खाकी पतलून पर चाकू-धार सी क्रीज़। वे ट्रैफिक बत्ती पर ठिठकते हैं। पैदल-बत्ती लाल से हरी होते ही वे एक दूसरे का हाथ थाम रास्ता पार करने लगते हैं।

#८

सिंगापुर की सड़कों और फ़ुटपाथों पर मोटराइज़्ड स्कूटरों की बहार है। दो छोटे चक्कों पर कसी धातु की सँकरी पट्टी पर पैर आगे- पीछे साधे दफ़्तर-कर्मी, विद्यार्थी, गृहणियाँ ऑर्चर्ड रोड और स्कॉट्स रोड की पण्य वीथियों में आते जाते दिखाई देते हैं। ये स्कूटर असल पैर-गाड़ियाँ हैं। देह को पैरों पर संतुलित कर गति और दिशा नियंत्रित करना उतना आसान नहीं जितना लगता है। क्लूनी रोड की ओर जाने वाली  टेमान सरसे गली में पैरगाड़ी सवार निकट से गुज़रता है। मैं चिहुँक पड़ती हूँ। मुड़ कर देखती हूँ, एक नहीं दो  सवार! युवक स्कूटर के हैंडिल थामे है और युवती उसकी कमर में बाँहें डाले नर्तकी की सी लावण्यमयी भंगिमा में सधी है।

#९

सेरंगून का लिटिल इंडिया और लिटिल इंडिया का मुस्तफ़ा, जैसे बारात में दूल्हा। सिंगापुर के तमिल निवासियों का गढ़ है सेरंगून। उनकी परचून और भाजी, कपड़ों और आभूषणों की दुकानें, ब्यूटी पार्लर और बाल-कटाई की पणियाँ भारतीय ग्राहकों से भरी हैं। लेकिन सबसे अधिक भीड़ है मुस्तफ़ा सेंटर में। छः मंज़िलों और आमने-सामने की दो इमारतों में पसरा, चौबीस घण्टों खुला रहने वाला विशाल स्टोर। जो मुस्तफ़ा में नहीं, वह कहीं और नहीं।  पूजा की सामग्री चाहिए या अल्फांसो आम, दालचीनी या साबुन, सब्ज़ा या दूध-पाउडर, सब मिलेगा। अजब बेतरतीबी है, भूलभुलैया सी सँकरी ‘आइल्स’, जगह-बेजगह लगे ‘कैशियर्स काउंटर’ लेकिन ख़रीददार जानते हैं कौन सी चीज़ कहाँ है। एक महिला एक के बाद एक आम की पेटियाँ खोल आमों को दबा दबा कर देख रही है। मनपसन्द आम चुन चुन कर एक पेटी में रखती जाती है। मुझसे आँखें मिलने पर भवें उठा कर कहती है -“देखना तो पड़ेगा क्या ख़रीद रहे हैं…” मैं हल्का मुस्कुरा देती हूँ। वह आश्वस्त हो फिर आम चुनने में जुट जाती है। कैशियर काउंटर पर मेरे सामान में कचरापात्र और कपड़े टाँगने के हैंगर देख कर पास खड़े वृद्ध सज्जन कहते हैं – “सिंगापुर में नई आई हो? घर जमा रही हो?” मैं हँस देती हूँ। पास से निकलती युवा माँ ने सामान के थैले बच्चे के ‘प्रैम’ के हैंडिल पर लटका रखे हैं। उनसे मीठे नीम और ताज़ा धनिये की सुगंध आ रही है।

#१०

आकाश सलेटी साँवले बादलों से ढँका है  सुबह से धारासार बरस रहा है। बालकोनी के गिर्द घिरे आम और टेम्बुसु और पाकड़ की पत्र-भरी डालें बूँदों से बोझिल हैं। बेचारी गिलहरी परेशान है। भीग कर उसके नर्म रोएँ चिपक गए हैं, पूँछ लटक आई है। फुनगियों में यहाँ वहाँ दौड़ती वह आख़िर एक पुराने सूने घोंसले की छाया में सुस्ता रही है। बूँदें बारीक़ तीलियों सी झर रही हैं, बालकोनी की रेलिंग पर आँसुओं सी अटकी हैं। ईवलिन फिलीपींस देश की है। हमारे घर में काम करती है। काँच के पट सरका वह बालकोनी की ओर खुलने वाले द्वार बंद कर रही है। खुले रहने दो, मैं कहती हूँ। बहुत मीठी हवा आ रही है। मेरा मरु-जन्मा मन मोर है या शायद मेंढक। दो बूँदें भी गिरें तो भीग जाता है। ईवलिन पट पूरे खोल देती है, कहती है – फ़र्नीचर में नमी पैंठ जाएगी। वह बारह साल से सिंगापुर में काम कर रही है। दो साल में एक बार परिवार से मिलने जाती है। दो बेटे हैं। उसकी अनुपस्थिति में जवान हुए हैं और पति बूढ़ा। पिता कैंसर से और भाई गुरदे के रोग से चल बसे हैं। सब ख़र्च उठाया है उसने, यहाँ सिंगापुर में औरों के घरों में खट कर। लेकिन वह सदा हँसती रहती है, फुर्ती से घर के काम निबटाती, गुनगुनाती। उसके और उसकी बान्धवियों के सहारे सिंगापुर के नाज़ुक-मिज़ाज समृद्ध निवासी और प्रवासी अपने सुखकर जीवन जी रहे हैं। एक देश की जीवनशैली दूसरे देश की ज़रूरतमन्दी पर टिकी है।

#११

सिंगापुर में शामें बड़े रंगो-रौनक़ से ढलती हैं। आकाश में बादलों के लच्छे, फाहे, बड़े थक्के रंगों में डूब जाते हैं, कभी दहकते नारंगी-सिंदूरी, कभी कोमल गुलाबी-कसूमल। आज क्षितिज पर पाल वाली नावों से  बादल बैंगनी-मैजेंटा हैं। एक स्कूल के कृत्रिम घास के खेल-मैदान में तीन समूहों में फुटबॉल का खेल चल रहा है, तीन भिन्न आयु-वर्गों के बच्चों के लिए। मैदान के एक कोने में हलचल हो रही है बच्चे आपस में उलझ गए हैं। एक ने दूसरे को धकेल दिया, दूसरा रो पड़ा। पहले बच्चे का पिता दूसरे के पिता से माफ़ी माँगता है। दूसरे का पिता गर्दन हिलाता है। उसका मुँह भारी है। वह बिना मुस्कुराए अपने बेटे से जर्मन भाषा में कुछ कहता है। पहले का पिता कुछ क्षण असमंजस में खड़ा रहता है फिर अपने नन्हें बेटे का हाथ पकड़ कर चल देता है, उसके कंधे कुछ झुके हैं, चेहरा उतर गया है। जाते जाते बच्चा मुड़ कर अपने दोस्त की ओर हाथ हिलाता है। कल मिलेंगे, वह कहता है। दोस्त के आँसू सूख गए हैं। कल धक्का मत देना, वह हँसता है। मैदान बिजली की बत्तियों से जगमग है। रात का मुँह उजला गया है।

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