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श्री श्री रविशंकर की पहली आधिकारिक जीवनी वेस्टलैंड से प्रकाशित

वेस्टलैंड बुक्स से श्री श्री रविशंकर की आधिकारिक जीवनी ‘गुरुदेव शिखर पर अचल’ का प्रकाशन हुआ है. इसे लिखा है उनकी बहन भानुमति नरसिम्हन ने- मॉडरेटर

 

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श्री श्री रविशंकर की बहन भानुमति नरसिम्हन ने गुरुदेव: शिखर के शीर्ष पर शीर्षक से श्री श्री रविशंकर की जीवनी का लोकार्पण किया.  आर्ट ऑफ़ लिविंग के आध्यात्मिकगुरु और संस्थापक  गुरुदेव श्री श्री रविशंकर की ये सबसे पहली आधिकारिक जीवनी है|

इस पुस्तक में उनके बचपन से लेकर बड़े होने तक की यात्रा पर प्रकाश डाला गया है, एक बेफ़िक्र बालक से युवावस्था में साधुओं की संगति में रहने वाले युवकतक,  एक युवा ध्यान शिक्षक से परमपूज्य आध्यात्मिक गुरु तक|

ये उस जीवन के विषय में है जिसने मानवीय प्रयासों के प्रत्येक क्षेत्र में एक गहन बदलाव किया–कला से संरचना तक, स्वास्थ्य सेवा से पुनरोद्धार तक, आत्म-शांतिसे बाह्य उत्साह तक|

भानुमति कहती हैं,”गुरुदेव खुली किताब के समान हैं और हालांकि लोग उन्हें जानते हैं पर दरअसल कोई वास्तविक 

रूप से उन्हें नहीं जानता |जब मैंने येपुस्तक लिखनी शुरू कीमैंने इस बात का ख्याल रखा कि ये नए पाठकों के लिए उपयुक्त होकिताब लिखने का मेरा उद्देश्य सिर्फ अपने पाठकों को ख़ुश करना होता  हैमुझे आशा है कि ये पुस्तक  पाठकों के जीवन को समृद्ध 

बनाने में सहायक होगी|”

इस पुस्तक को लिखने के अलावा गुरुदेव की छोटी बहन होने के नाते भानुमति नरसिम्हा उत्थान संबंधी कई प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व भी करती हैं, जिसमें आर्ट ऑफ़लिविंग का स्कूल संबंधी प्रोजेक्ट भी शामिल है| इसके अंतर्गत देश के दूर-दराज़ के क्षेत्रों में क़रीब पचास हज़ार विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है|आप विश्व में हर धर्म और राष्ट्र के लोगों को ध्यान सिखाने के लिए यात्राएं भी करती हैं|

   

  भानुमति नरसिम्हन के विषय में:

भानुमति नरसिम्हन गुरुदेव श्री श्री रविशंकर की छोटी बहन हैं| पहले मासूमियत में और बाद में समझते हुए उन्होंने सहर्ष अपने भाई, अपने गुरु का आजीवनअनुसरण करने का फैसला लिया| आप विश्व के प्रत्येक प्राणी के मुख पर मुस्कान लाने के उनके सपने को साझा करती हैं|

गुरुदेव कहते हैं, ‘ख़ुद पर मुस्कराना ही ध्यान है|’  भानुमति खुद भी ध्यान की शिक्षक हैं| आपकी कार्यशालाओं में विश्व के हज़ारों लोगों को गहन आत्म-शांति काअनुभव हुआ है| इस शांति का बाहरी रूप जनमानस की सेवा है|

आपने संस्कृत में स्नातकोतर की डिग्री प्राप्त की है| आप कर्नाटक संगीत में पारंगत गायिका हैं और विश्व में लोग आपके द्वारा गाए गए मंत्रों और मधुर भजनों कीआवाज़ से जागृत होते हैं| आप तेजस्विनी और ललिता नामक किताबों की लेखिका हैं जो हिंदू ग्रंथों और प्रथाओं के आध्यात्मिक महत्व की व्याख्या करती हैं|

पुस्तक के विषय में :

यह वो समय था जब योग विद्या सदियों से चली आ रही रिवाज़ों की परंपरा में गहरे दब गई थी, जब धर्म मानव मूल्यों पर भारी पड़ने लगा था, जब खेलों ने युद्ध काआकार ले लिया था और युद्ध खेलों की भांति लड़े जाने लगे थे| उसी समय में, दक्षिण भारत के एक छोटे से गांव में एक युवक गहन ध्यान मुद्रा में पाया गया| वोकहता था,’ मेरा परिवार सब जगह है| लोग मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं|’

उसकी बात पर तब किसी ने विश्वास नहीं किया|

समय ने उन असंख्य लोगों का भाग्योदय किया जो आत्मखोज के लिए उनकी शरण में आए| इन वर्षों में उनकी प्रभावशाली उपस्थिति और व्यवहारिक शिक्षा नेविश्वभर में आनंद, शांति और प्रेम के महत्त्व को प्रोत्साहित किया| सुदर्शन क्रिया, श्वासों पर नियंत्रण की कला, एक पारिवारिक प्रथा बन गई| जीवन जीने का एकवैकल्पिक तरीका जिसने लोगों को आत्मबोध के लिए प्रेरित किया| वे गुरु बन गए, जिन्होंने अलौकिक को स्पर्श्य बना दिया, जिन्होंने मानवीय प्रयासों के प्रत्येक क्षेत्रमें एक गहन बदलाव किया–कला से संरचना तक, स्वास्थ्य सेवा से पुनरोद्धार तक, आत्म-शांति से बाह्य उत्साह तक|

बेफिक्र बालक से युवा तक, अक्सर साधुओं की संगति में पाए जाने वाले, युवा ध्यान शिक्षक से लेकर परमपूजनीय आध्यात्मिक गुरु तक, ये पुस्तक गुरुदेव श्री श्रीरविशंकर की आतंरिक और स्नेहमयी जीवन का लेखा-जोखा है, जिसे उनकी बहन भानुमति नरसिम्हा ने लिखा, जिन्होंने उनके आध्यात्मिक जीवन को करीब सेबनते देखा है|

गुरुदेवशिखर के शीर्ष पर, एक कोशिश है सागर को गागर में भरने की और पाठकों को असीमता का अहसास दिलाने की|

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