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मिथिलेश कुमार राय की टटकी कविताएँ

मिथिलेश कुमार राय मेरे प्रिय कवियों में एक हैं. इनकी कविताओं को पढ़ते हुए मुझे अपने जीवन में छूटे हुए ग्रामीण-कस्बाई दृश्य, शब्दावली याद आ जाती है. वे बहुत सहजता से हाशिये के जीवन का काव्यात्मक वृत्तान्त रच देते हैं. आज उनकी मन भर कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर

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पिता से बातें
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पिता ने पूछा कि क्या तुम परवल की लता में रोज सुबह पानी देते हो
मैंने हाँ कहा
कहा कि काम पर निकलने से पहले मैं जड़ों को रोज सींचता हूँ
उसमें बहुत सारे फूल आए हैं
परसों बारह परवल भी तोड़े गए थे
उसकी सब्जी बहुत स्वादिष्ट बनी थी

पिता मुदित भाव से यह सब सुनते रहे
उन्होंने आह्लादित स्वर में यह पूछा
कि अब तो करेले में भी फूल आने लगे होंगे
मैंने कहा हां-हां
बहुत सारे फूल आए हैं
पीले-पीले
इस महीने के बाद से वे भी खूब फलेंगे

पिता ने मिर्ची के पौधों के बारे में पूछा
मैंने बताया कि काली मिर्च में फल आ गए हैं
हरी वाली अभी फलने की तैयारी ही कर रही हैं

पिता ने धूप की चर्चा की
और कहा कि अब पौधे को प्यास ज्यादा लगेगी
उन्हें बिना नागा सींचा जाना चाहिए

फिर पिता ने टिकोले के बारे में पूछा
उनका अनुमान था कि वे दिनभर झड़ते रहते होंगे
मैंने उन्हें बताया कि हवा कभी भी जोर-जोर से बहने लगती है
तो वे अपना अनुभव सुनाने लगे
कि जिस साल मंजर अधिक आते हैं
उस साल हवा भी बैरी हो जाती है
तब हमें उसे बचाने के लिए
अधिक जतन करने पड़ते हैं

फोन रखने से ठीक पहले पिता अपने पोते को याद करने लगे
कि उसकी यादों में तो मैं  बहुत ज्यादा होऊंगा
हां-हां, बहुत
शाम होते ही वह आपको रटने लगता है
कहता है कि कंधे पर बैठकर
बहुत दूर घूमने जाएगा

पिता ने यह भी पूछा कि कोई दिक्कत हो तो बोलो
मैं यह कैसे कहता कि दरवाजा बड़ा सूना लगता है
कि मेरी लापरवाही से अक्सर नमी मारी जाती है
और बच्चा अगर ज्यादा तंग करता है तो उसे डपट देता हूँ

प्रत्यक्ष में मैंने यही कहा कि यहाँ सब ठीक है
आप जब तलक चाहे बेटियों की खिलखिलाहट की गूंज में रहें

सवारी
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एकदिन मैंने सोचा कि मैं साइकिल चलाते हुए अपनी एक फोटो उतरवाऊंगा
साइकिल चलाना मैंने बचपन में ही सीख लिया था
कोई सीखने निकलता था तो मैं उसकी मदद कर दिया करता था
वह थक जाता तो जब तक वह तरोताजा होता मैं सीखने लग जाता
अब तो अपने पास भी है साढ़े सात सौ में लिया था परसाल

मोटरसाइकिल चलाते हुए जब भी किसी को देखता हूँ बड़ी हैरत होती है
कि ये कौन लोग हैं जो फर्राटे से चला लेते हैं
मैंने सिर्फ छूकर देखा है अबतक
मेरे एक रिश्तेदार एकदिन जब मोटरसाइकिल से आया मुझसे मिलने
मैंने यह सोचा था कि उस पर बैठकर एक फोटो उतरवा लूं
लेकिन बहुत डर लगा कि कहीं गिर पड़ा तो फिर क्या होगा
कुछ टूट गया तो दंड भरना होगा
इससे पहले कभी उस पर बैठा होता तो साहस थोड़ा साथ जरूर देता

कार चलाने वाले आदमियों को मैं कभी मामूली आदमी नहीं समझता
उसकी पोशाक भी तो कितनी शानदार होती है
उसके चेहरे पर पैदल चलने के कोई चिह्न भी नहीं होते
मेरा एक साथी है हरखू
कह रहा था कि वे बड़े लोग होते हैं
धूप में दो मिनट ठहरते हैं तो पसीने से नहा जाते हैं
दस कदम चलते हैं तो उनकी सांसें चढ़ आती हैं
हरखू ने ही कहा था कि वे इतने नाजुक होते हैं कि जोर से कभी नहीं हंसते
हौले-हौले मुस्कुराते रहते हैं हमेशा

कभी किसी कार को देखकर यह ख्याल नहीं आया
कि उस पर कुहनी टिकाऊँ एक फोटो उतरवा लूं

इच्छा
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अभी हम थोड़ी सी बारिश चाहेंगे
मसलन इतनी कि रंग हरा को तनिक प्यार मिले
और पगडंडी थलथल न हो
न भी होगी उतनी सी बारिश जितनी हम चाहेंगे
तब भी हम मुस्कुरायेंगे और निबाह करेंगे

इस मौसम में हम धूप को अपनी बातों में शामिल करेंगे
उसे जब भी निहारेंगे नेह में निहारेंगे
जेठ को हम उसके तीखेपन के लिए धन्यवाद कहेंगे

मूसलाधार बारिश चाहेंगे तो हम वह सावन में चाहेंगे
तब रास्ते थलथल भी हो जाएंगे तो
इसके लिए हम किसी को नहीं गरियाएँगे

तब हम धरती पर बूंदों को गिरते हुए देखेंगे
और मोर की तरह नाचेंगे

छप्पन-भोग
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इस पृथ्वी पर हम नमक रोटी को जानते हैं
और साग-भात को

सिर्फ जानने के लिए तो हम
यह भी जानते हैं
कि गुजरे जमाने में
जब इस पेट को भरना इतना आसान नहीं हुआ करता था
तब भोजन के छप्पन प्रकार हुआ करते थे

नहीं पुख्ता जानकारी कुछ भी नहीं है
हम जब यह कहते हैं तो एक अनुमान से ही कहते हैं
कि वह दूध-मलाई का समय रहा होगा
घी और दूध में डूबे रहने के मुहावरे जब गढ़े जा रहे होंगे
यह तब की बात रही होगी
जब एक बड़ी आबादी अल्हुआ खाता होगा
या मडुवे की रोटी
वही जमाना कौनी की खिचड़ी का भी जमाना होगा
पेड़ की छाल खाने की ललक उसी जमाने में पहले पहल उठी होगी

खाने की चीजों पर हमारे बीच ये सब बातें
उस समय शुरू हुई
जब भूख से हमारी आंतें ऐंठ रही थीं
हालांकि हम यह जानते थे कि वह जमाना कब का लद चुका है
अब चाहे तो कोई
सैकड़ों तरह की डिश का मजा ले सकते हैं
लेकिन इन सब में सबसे ताज्जुब की बात हमें यह लगी
कि न तो हमें तब कुछ पता था
और न ही अब का कुछ पता है
कि आखिर वे कौन-कौन से व्यंजन हैं
जिनका हम अब तक नाम तक नहीं रट पाए हैं

कहने को तो हमने हंसते हुए ये बातें भी कही
कि हो सकता है कि यह सब ग्रंथ की बातें हो
और भोजन के इतने प्रकार
ईश्वर के लोक में पाए जाते हो

वैसे भी हम आदमियों पर कभी कोई इल्जाम नहीं लगाते
सारा दोष ईश्वर के मत्थे जड़कर
संतोष कर लेते हैं

गरमी के बारे में
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गरमी के बारे में
मैं कुछ नहीं बता सकता
आप भी नहीं बता सकते
इस गरमी के बारे में

मौसम वैज्ञानिक सिर्फ यह बता सकते हैं
कि आज पारा चालीस के पार चला जाएगा

इस गरमी के बारे में
ठीक-ठीक जानकारी चाहिए तो
हमें हाथ-रिक्शेवाले से पूछना होगा
गृह-निर्माण में
जो राज-मिस्त्री और मजदूर लगे हुए हैं
उनसे पता करना पड़ेगा

या अपनी कमर झुकाकर
खेतों में जो मूंग तोड़ रहे हैं
या कोई गीत गुनगुनाती
अंगीठी के पास बैठी
जो स्त्रियाँ रोटी सेंक रही हैं

गरमी के बारे में वे बता पाएंगे

सुनो ईश्वर
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(भोर हमेशा प्रार्थनाओं के स्वर में लिपटी मिलती है मुझको)

हे ईश्वर
तुम अच्छे लोगों के साथ रहो हमेशा
उन्हें उन्नति दो
उनके जीवन में शांति भरो

उनके बच्चों को सद्बुद्धि प्रदान करो हे ईश्वर

तुम्हें सबसे अधिक भले लोग ही पुकारते हैं
वही थकते हैं
कभी-कभी तो वे इतने हताश हो जाते हैं
और इतने उदास
कि वे तुम से रूठ भी जाते हैं
जैसे तुम कोई ईश्वर नहीं
उनके घनिष्ठ संबंधी हो
और इतने मनुहार के बाद भी उनकी बात न मानी हो

हे ईश्वर
तुम इतनी-इतनी पुकार के बाद
किसी को निराश न किया करो
यह ध्यान रखो
कि तुम्हारी कृपा की आस में
किसी की प्राण न छूटे
तुम्हें पुकारते-पुकारते कोई इतना जर्जर न हो जाए
कि उसके पास तुम्हारे स्मरण के लिए
एक सेहतमंद दिमाग भी न बचे

हे ईश्वर
तुम भले आदमियों के पास समय से पहुंचो
कि वह भी मुस्कुरा सके
तभी तो ठहाकों पर विराम लगेगी
और मुस्कुराहटों से यह दुनिया सजेगी

हे ईश्वर तुम भले लोगों से अब
धैर्य की परीक्षा मत लिया करो
देखो, कितने युग बीत गए
अच्छे लोग अब तक अच्छे ही बने हुए हैं

तुम इन पर रहम करो हे ईश्वर

कंडक्टर एक हीरो होता है

जैसे कि मैं ट्रक के ड्राइवर को
कभी मामूली आदमी नहीं समझता
मैं जब भी कभी उन्हें साक्षात देखता हूँ
कुछ देर तक अपलक देखता ही रहता हूँ
कि यही मनुष्य राष्ट्रीय राजमार्ग पर
चौदह चक्के की गाड़ी दौड़ाता है
और मौका मिलते ही ठठा कर हंसता है
सोता है तो खर्राटे लेता है

जैसे कि मुझे प्राइवेट बस का कोई कंडक्टर
एक हीरो की तरह लगता है
अगर मैं यहां से वहां तक के स्टॉपेज को
एक संपूर्ण जिंदगी मान लूं
तो मुझे ऐसा लगता है
कि वे इस छोटे से सफर में
जीवन के सारे भावों को जी लेता है
जिसमें फजीहत का पलड़ा सबसे भारी होता है

जैसे कि मैं जब भी कभी हाट में गया हूँ
वहां मैंने सब्जी बेचने वाली बुढ़िया के चेहरे पर
डंडी मारने की चालाकी पकड़ने की कोशिश की है
हालांकि मुझे हर बार
एक मनौति का चिह्न ही मिला है वहां
जो सारी सब्जी बिक जाने के लिए मांगी गई थी
यह कहते हुए कि
सड़ जाने के घाटे को उसके अलावे और कोई नहीं महसूसना चाहता

गुजरना
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या तो कुछ हो रहा होता है
या नहीं हो रहा होता है
लेकिन समय है कि वह बीतता जाता है

वही बीतता हुआ समय एक चिह्न बनाता है
एक पहचान
और दूर से भी वह दिखता रहता है
सदियों तक

बाद के लोग उसे देखते हैं
और यह बातें करते हैं
कि समय बीत कर
एक शिलालेख में तब्दील हो गया
लेकिन कुछ भी नहीं हुआ
वे हिकारत से ऐसा बोलते हैं
और समय की किताब से
उस पन्ने को याद करने लगते हैं
जब कुछ हुआ था

ऐसा उन्हें अपने चेहरे से
हिकारत का चिह्न मिटाने के लिए करना पड़ता है

धूप के लिए
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बारिश के प्रति आभार कोई भी जता सकता है
जैसे काम पर निकले लोग
कि तब वह सच बोल सकता है
और उसके फंस जाने पर
किसी की आंखें लाल-पीली भी नहीं हो सकती हैं

बारिश का शुक्रिया अदा सबसे ज्यादा वे करते होंगे
जिन्हें बूंदों के गिरते ही नींद आ जाती होंगी
और वे चादर तान कर जब सो जाते होंगे
उन्हें कोई भी नहीं जगाता होगा

बारिश के लिए
अगर वे लोग धन्यवाद के बोल नहीं कह पाते होंगे
तो भी उनकी आंखों में कृतज्ञता का भाव जरूर उभर आता होगा
जो बंद कमरे में सात घंटे से जुते हुए होते होंगे
आखिर का एक घंटा
उनका बड़ा मजेदार साबित होता होगा

मैं सोचता हूँ कि धूप को धन्यवाद कौन देता होगा
कौन जताता होगा उनके प्रति आभार
क्या कोई धूप के लिए भी कृतज्ञता ज्ञापित करता होगा
उन्हें शुक्रिया कौन बोलता होगा

मैं खेतों में जूट के पौधे की ओर देखता हूँ
वे लगातार बड़े हो रहे हैं
मूंग में फूल आ रहे हैं
उनमें फलियाँ लग रही हैं
मैं मेड़ पर खड़े कंकाल को
उन्हें निहारते हुए मुस्कुराते हुए देखता हूँ तो
ऐसा लगता है
जैसे कि वे धूप के लिए शुक्रिया का कोई गीत गा रहे हैं

उनका शुक्रिया
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जिस एक ही टेम्पो से गया
लगातार डेढ़ महीने तक काम पर
कभी उसके ड्राईवर के नाम तक से मतलब नहीं रखा
जब भी कुछ कहा
अपनी बातें बिना किसी संबोधन से शुरू की

एक दिन उसी ने बताना चाहा वैसे ही अपना नाम-
पिंटू महतो
और कहा कि जब भी लौटते बखत अंधेरा हो जाए
और किसी तरह की कोई परेशानी नजर आए
आप मुझे पूछ लें
उसने यह भी कहा कि यह इलाका अपना है
चाहे तो आप मेरा मोबाइल नंबर भी रख सकते हैं
बुलाएंगे तो रात के बारह बजे भी हाजिर हो जाऊंगा

जिस पान की दुकान की बेंच पर बैठकर
मैंने सालों इंतज़ार किया था अपनी बस का
और इसके एवज में कभी-कभार ही एकाध बीड़ा पान का खाया
मुस्कुरा कर कभी हल्की-फुल्की कोई बात न की
उसने हँस कर पूछा था एक दिन
कि क्या आप मेरा नाम जानते हैं
भूलन महतो नाम है हमारा
सड़क के उस तरफ जो बस्ती दिख रही है
वही अपनी एक झोंपड़ी है
कभी देर-सवेर हो जाए और यह दुकान बंद मिले
तो आप बेहिचक आ जाना

सब जानते हैं
एक बच्चा से भी पूछेंगे तो
वह मेरे दरवाजे तक आपको छोड़ आएगा

अंत में उसने यही कहा था
कि अंधेरी रातों में
एक-दूसरे के मुस्कान से ही रोशनी होती है

इन फूलों में कुछ कविताएं रहतीं हैं
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फूल
जैसे खीरा के फूल
और करेले के फूल
मिर्ची के फूल
जैसे कद्दू के फूल

जैसे भिंडी के फूल
जैसे परवल के फूल
बैगन के फूल
जैसे नेनुआ के फूल

इन फूलों में कुछ कविताएं रहतीं हैं

जैसे भूख की कविताएं
जैसे स्वाद की कविताएं
जैसे तुष्टि की कविताएं

जैसे एक आस की कविताएं

अनशन
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नहीं जनता कि सबसे पहले
इतना आक्रोश किस आदमी को आया होगा
और किन लोगों ने दिया होगा उसका साथ
लेकिन अनुमान लगता हूँ तो
यह बात स्पष्ट होती जाती है
कि यह सब अंत में सोचा गया होगा
पहले उसका निर्वाह किया गया होगा
जिसका कोई भी बेचारा आदमी करता है

कहानी प्रार्थनाओं से शुरू हुई होगी
इसके लिए चक्कर लगाये गए होंगे
कागज पर लिखकर कई बार मिन्नतें की गई होंगी
हरेक उस व्यक्ति के आगे जिसके चेहरे पर दंभ पसरा रहता है
चिचौरी की गई होगी
उसके आगे-पीछे टहल लगाया गया होगा

थकने के क्रम में कभी-कभी गुस्सा भी आ जाता है
दरअसल यही आक्रोश होता है
तब आक्रोश में ही रटे गए होंगे कुछ नारे
जब एक ही शक्ल के मिलते-जुलते कुछ आदमी एकट्ठा हुए होंगे
तो उस नारे को दुहराते हुए
जुलूस निकालने के बारे में तय किया गया होगा

आश्चर्य के क्षणों में
कई बार हमारा गुस्सा चरम पर पहुँच जाता है
उन्हीं क्षणों में लिया गया होगा यह निर्णय
इससे आगे का और कोई क्या सोच सकता है भला
कि वह अन्न-जल को त्याग कर बैठ जाए
और अपने मरने तक की घोषणा कर दे

अभी कौन कह रहा था यह
और जोर-जोर से हंस भी रहा था
कि अब मरने का भी फर्क नहीं पड़ता

बड़े लोग
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कहते हैं कि बड़े लोगों की बात जुदा होती है
वे सुनते कम सुनाते ज्यादा हैं
कहते हैं कि जब वे बोलना शुरू करते हैं
तो शेष सारे चुप हो जाते हैं
किसी और के नहीं बोलने से
वातावरण में उन्हीं की आवाजें गूंजती रहती हैं अहर्निश

बड़े लोग ऐसे दृश्यों की ओर देर तलक नहीं देखते
कि उनके चेहरे पर उदासी की लकीर खींच आये
या दुख जो दफन हो गया है वो
कब्र फोड़कर बाहर निकलने लगे
बड़े लोगों को एक ही समय में
कई जगहों पर जाने की जल्दी होती है
वे वहीं तनिक ठहरते हैं
जहाँ उनके कहकहों को गति मिलती हो

कहते हैं कि दुख सबको याद रहता है
वह सबको माँजता भी है
लेकिन कहते हैं कि बड़े लोग इसमें अपवाद की तरह प्रयुक्त होते हैं
दुख सिर्फ उसे याद रहता है
जो उसे निरंतर भोगते हैं
बड़े लोग तो बचपन में देखे दुख को भी कब के बिसर चुके होते हैं
उन्हें वो दृश्य कभी नहीं कुरेदता
कि वह अधेड़ आदमी देर शाम तक रिक्शा खींचा करता था
और रात के कलेजे में उसकी खांसी
कील ठोंका करती थी

कहते हैं कि बड़े लोगों को हवाई जहाज में
बड़ी अच्छी नींद आती है
वह यह सिर्फ सुनता है
कि ट्रेनों में आदमी
भेड़-बकरियों की तरह ठूंसे
अपने घर तक पहुंचने की
प्रतीक्षा करता मरता रहता है

कहते हैं कि मसनद बड़े लोगों के लिए किया गया एक आविष्कार है
जिस पर पसरकर जब ये ऊंघते हैं
तब बाहर पहरेदार तैनात कर दिए जाते हैं
ताकि किसी खटके से इनके सपने
बीच ही में न टूट जाए

धूप
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यह जो रंग काला होता है
यह असल में धूप की तरफ से एक सौगात होता है
इनकी देह के लिए एक परत जैसा
एक लेप की तरह
जैसे बर्तन पर चढ़ाती है माँ
उसे आग पर चढ़ाने से ठीक पहले

कि रंग काला धूप से तिलमिलाने से बचने का
ओढ़ाया गया एक चादर होता है

अभ्यास एक त्योहार की तरह होता है
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जो भूखे होते हैं वे कैसे अकुलाते होंगे
उनके चेहरे पर कौन सा भाव पसर जाता होगा
भूखे व्यक्ति को कोई भाषण पिलाता होगा
तो क्या वह उस भाषण को पी लेता होगा
या कि कोई बोलता होगा तो वह सिर्फ एकतरफा बोलता होगा
भूखा आदमी उस वक्त सिर्फ रोटी के बारे में सोचता होगा
भाषण के सारे शब्द उसके सामने भात के दाने की शक्ल में आते होंगे
क्या भाषणबाज उसे खाना परोसते आदमी की तरह नहीं दिखता होगा
जरूर ही भूखा आदमी न तो कुछ सुनता होगा और न ही उसकी तरफ देखता होगा

कोई बहुत प्यासा आदमी नदी की ओर किस तरह बढ़ता होगा
उसकी व्याकुलता को मापने का कोई पैमाना तो बना नहीं है अब तक
जब वह कुएं की तरफ दौड़ता होगा
तो क्या उसके कदम लड़खड़ा जाते होंगे
पीछे से टोके जाने पर वह रूकता होगा कि नहीं रूकता होगा
या वह सरपट भागता ही रह जाता होगा
क्या वह कुएं के पास पहुंचकर पछाड़ खाकर गिर पड़ता होगा

कहते हैं कि भूखे आदमी की अकुलाहट
और प्यासे लोगों की व्याकुलता को देखकर
बहुत कुछ नोट नहीं किया जा सकता
वैसे ही जैसे अच्छा देखने और अच्छा सोचने के बारे में सिर्फ रटकर ठीक-ठीक कुछ भी नहीं सीखा जा सकता
कि इससे कितनी शांति उतरती है
और तृप्ति कैसे इस रास्ते अंदर प्रवेश कर जाती है

अभ्यास एक त्योहार की तरह होता है
जहां से बंद रास्ते खुलते हैं
और आदमी आदमी की तरह नजर आने लगता है

नींद
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बीती रात नींद नहीं आई

सवेरे दुख बीबी को बताया तो
वह मुस्कुराने लगी
उसका कहना था कि
मैं दो दिनों से रईश बना बैठा हूँ
मुझे नींद कैसे आएगी

फिर मुझे याद आया
कि परसों से मैं मजूरी पर नहीं लौटा हूँ
उस दिन मेरे पैर में मोच आ गई थी

तब से मैं सिर्फ खा रहा हूं
और गप्पे हांकता हूँ
या तो मैं लेटा रहता हूँ
या मसखरी करता रहता हूँ

माँ का नाम
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माँ का नाम
सहवाजपुरवाली है
मंझली काकी का भद्रेश्वरवाली
छोटकी चाची को चाचा
बेलावाली के नाम से पुकारते हैं
मैंने पूछा तो बताया कि
मेरी दादी का नाम भरफोड़ीवाली था

शुरू-शुरू में पिता ने माँ को
उनके नाम ही से पुकारा था
लेकिन पिता पुकारते थे माँ को
ठहर पूरा आँगन जाता था
असहज होकर पिता को
तब माँ का नाम भूल जाना पड़ा
तभी लौट पायी सहजता
और तभी आँगन ने ठिठकना बंद किया

कुरेदने पर पता चलाता है
कि माँ काकी चाची
और दादी के पास
अपना एक सुंदर सा नाम है
जैसे ऊषा मनोरमा
सरिता और तुलकनामा देवी
जिसकी गूँज नैहर में कदम रखते ही
उनके कानों में सुनाई देने लगती हैं
लेकिन ससुराल की ओर निकलने से पहले
इन्हें अपने-अपने नामों को
वहीं कहीं रख देना पड़ता है
यहाँ परिचय के लिए
समूचे गाँव को
ये साथ लिए चलतीं हैं

दिहाड़ी
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सवेरे जो कमर कसता हूँ तो दिन ढले तक उसे कसा ही रखता हूँ
जिस दिन हार जाता हूँ उस दिन फिर कभी नहीं ढीला पड़ने की कसम खाता हूँ उसे बुदबुदाता हूँ नींद में भी
आधी रात को जगता हूँ और आसमान में सूरज की पदचाप को आँखों से सुनता हूँ
कि अब तक वह कहाँ तक आ पहुँचा होगा
कुछ भी तय नहीं करता हूँ और सबसे पहले वहाँ पहुँचूँ यही सोच कर दौड़ लगा देता हूँ

सिपाही की तलाश में आए राजा को विश्वास दिलाता हूँ
कि बिना हांफे खोद सकता हूँ देर तक जमीन
अंधेरा होने तक बिना थके ईंट ढो सकता हूँ
इससे पहले भी कई घरों में रात-रात तक जगकर रंग का लेप चढ़ाया है
विश्वास न हो तो ये हाथ देख लें
नाखूनों में फंसा चूना इसकी गवाही देगा

सबसे खतरनाक लड़ाई यही होती है
कामचोरी को चेहरे से मार कर भगाना पड़ता है
कि दिखूं ऐसे जैसे कोई मशीन होऊं
धूप में भी खटता रहूं तो चेहरे पर पसीने की बून्द आए भी तो उसमें थकावट न दिखे
जैसे चाभी से चलूं और हँसने के लिए भी क्षण भर न रुकूँ
सुरती की तलब लगे तो ढोते हुए ही उसे शांत करूँ

शाम ढले लौटूं गिरूं निढाल होकर
सपने में फिर सूरज की बाट देखूं
नींद टूटे तो लगे कि कमर कसा है इतना
कि चाहूँ तो बिना पानी पीए ही दौड़ जाऊं

सिर दर्द के बारे में
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सिर दर्द के बारे में डॉक्टर का कहना था कि ऐसा गैस बन जाने के कारण भी होता है
गैस का कमाल बताते हुए उन्होंने यह भी बताया था कि यह सौ तरह की समस्याओं को जन्म देने की कूबत रखता है
उन्होंने सिर दर्द को बड़ी मामूली बात बताते हुए
रंग-रंग की कई गोलियां दी थी
और जाते बखत आराम करने की सलाह

एक का तो यह कहना था कि गर्मी इन दिनों बहुत बढ़ गई है
तुम इतनी दूर से आए हो पांव-पैदल
देखो तो पसीने में नहाए लगते हो
कभी-कभी सिर में दर्द गर्मी से भी हो जाता है
ऐसा करो ये लो पंखा
इसे झलो
राहत मिलेगी और सिर का दर्द भी जाता रहेगा

इसी आदमी ने सर्दी के दिनों में कुछ और बात कही थी
कहा था कि अपनी आवाज सुनो
वह भारी है
आंखें भी लाल हो गई हैं
कुछ नहीं यह ठंड का असर है
सर्दी भागेगी तभी माथे का दरद कम होगा

उसी डॉक्टर ने पिछली बार यह समझाया था
कि कई बार एलर्जी के कारण भी यह होता है
और कोई दूसरी ही दवाई खिलाई थी
एलर्जी क्या होता है वह क्यों हो जाता है डॉक्टर ने यह नहीं बताया था

एक ने तो हंसते हुए आंख के डॉक्टर से भी मिलने की सलाह दी थी
कि कई बार आंखें अपनी परेशानी
सिर दर्द से प्रकट करती हैं

लेकिन घरनी ने सिर दर्द के बारे में
कभी नहीं बदला अपना मत
हरेक बार एक ही तरह से डपटा
कि बेटी बांस की तरह बढ़ रही है जल्दी-जल्दी
और बेटा कहता है कि अब वह कमाने भाग जाएगा परदेश
तो इसमें इतना सोचने की क्या बात है
यह तो मुझे भी पता है
कि डेढ़ बीघे के भरोसे नहीं होंगे हाथ पीले
खेतों में कब उपजी हैं सोने की गिन्नियां
फसल पहले बाढ़ में बहती थीं
और अब सुखाड़ की भेंट चढ़ रही है
तो इसमें कोई क्या कर सकता है

भूखे पेट भी गुनगुनाते रहो अपना वह गीत
सिर का दर्द उसे सुनकर वैसे ही भाग जाएगा

जैसे वस्त्र
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पुराने हो जाने पर फेंक देने के बारे में हम कभी नहीं सोचते
तब देखभाल और ज्यादा बढ़ जाती है
जब-तब उसे सूखने के लिए रस्सी पर टांग दिया जाता है
बड़े जतन से रगड़े जाते हैं साबुन
फिर हौले-हौले फिंचते हैं
ऐसे कि जैसे सुलाने के लिए किसी बच्चे को थपकी दे रहा हो

सबसे पहले किसी एक जगह से टूटती हैं सूतें
वह जगह हमेशा नजर में रहता है
कि नाजुक है कहीं ज्यादा जोर न पड़े
कि दूसरी जगह भी न हो जाए वैसे ही कोई गड्ढे

छोटी सी सुई कितनी मदद करती है
वह उस खरोंच को भर देती है

चिंदी-चिंदी होने पर भी मोह कहीं नहीं जाता
कुछ दिनों तक उसी जगह टांगते हैं
जहां रखे जाते हैं पहनने लायक कपड़े
फिर याद से वहां धर दिए जाते हैं
जहां शाम को लालटेन का शीशा साफ करने के लिए
कोई नियम से बैठती हैं

या वहाँ जहां भात पकाने का काम होता है
या चूल्हे के ऊपर से केतली उतारने का

नहीं-नहीं कभी नहीं
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बुर्के में ढंकी स्त्री
एकदम सट कर बैठ गईं हैं
घूंघट लिए स्त्री का मुँह अब उनके सामने है
आस-पास कोई नहीं
सिर्फ कुछ चिड़िया हैं
वे अपने में मग्न पेड़ पर फुदक रही हैं

दोनों स्त्रियों की गोदी में एक-एक बच्चा है
बच्चे नींद में हैं
उन स्त्रियों की जांघें कोई झूला हो जैसे
बच्चे अपने-अपने झूले पर झूल रहे हैं
एक का बच्चा नींद में मुस्कुरा रहा है
वह जरूर कोई अच्छा सपना देख रहा होगा

स्त्रियां आपस में क्या बातें कर रही हैं
यह वही जाने
लेकिन घड़ी-घड़ी उनकी खिलखिलाहट से
यह अनुमान लगाया जा सकता है
कि वे अपने-अपने मरद के बारे में बातें कर रहे हैं
या गोदी में पड़े बच्चों की आदतों के बारे में
कि जब यह जगा रहता है तो नाक में दम किया रहता है

या यह भी हो सकता है कि
वे अपने लड़कपन की बातें कर रही हो
कि कैसे वे तितली बन जाती थीं
जो भी हो
इतना तो तय है कि वे इतनी मीठी बातों में मग्न हैं
कि उनके होंठों से हँसी छूट नहीं रही हैं

जब भी दंगा हो रहा होगा
क्या किसी मुसलमान स्त्री ने
किसी हिन्दू स्त्री के सीने में चाकू उतारा होगा
या कोई हिन्दू स्त्री
किसी मुसलमान स्त्री पर तलवार लेकर झपटी होगी

क्या कभी कोई दंगा हिन्दू-मुसलमान स्त्रियों के कारण हुआ होगा

यह सवाल मेरे एक दोस्त का था
जो उन दोनों की खिलखिलाहट सुनकर
जवाब में खुद ही कह उठा था कि नहीं

नहीं-नहीं कभी नहीं

ओ प्रेम!
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जैसे कोई बीज
जो किसी वृक्ष से धरती पर गिरा
उसे नमी मिली
और उसमें अंकुर फूटे
फिर सावन जैसा कोई मौसम आया
हवा ने धुन छेड़ी
बूंदें बजने लगीं

कोंपल निकला
चिड़िया ने उसे देर तक निहारा
आँखों में एक बिम्ब उभरा
फिर जब तितलियां ठहरीं
तो वह पुलकित हुआ
रोम-रोम स्पंदित
उसमें फूल लगे
हवा बही तो सुगंध भरी एक गंध भी फैली

सब कितना धीरे-धीरे हुआ
बहुत धीरे-धीरे
बज्रपात की तरह पलक झपकते कुछ भी नहीं
न चमक न आवाज

यह ऐसे पला
जैसे गर्भ में बच्चा पलता है
ऐसा लगा
कि इस जीवन में
कोई और जीवन सांस लेता है

जैसे स्त्रियां नइहर लौटती हैं
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जैसे स्त्रियां नइहर लौटती हैं
और बिना घूंघट के घूमती हैं पूरा गांव
वे खेत तक बेधड़क जाती हैं
वहां कोई चिड़ियां फुर्र से उड़ती है
तो उसे वे देखती हैं
दूर तक आकाश के उस छोर तक

जैसे वे बात-बात पर मुसकाती हैं
और किसी भी बात पर खिलखिलाने लगती हैं

नइहर लौटते ही जैसे
देह को लगने लगता है पानी
फेफड़े को स्वच्छ हवा मिलने लगती है
और भूख बढ़ जाती है इतनी
कि दिन में तीन-तीन बार खाने का मन करने लगता है

कि जैसे पीलापन झड़ने लगता है
और कोंपलें फूट पड़ती हैं
जैसे वे मनपसंद गहने बनवाने के लिए
सुनार के पास बैठ जाती हैं घंटों
कि जैसे शाम की चिंता उन्हें
उतना नहीं सताती
चेहरे पर पसर जाती हैं निश्चिंतता
वे बेफिक्र हो जाती हैं

ठीक ऐसे ही लौटता है परदेसी
कि वह लौटता है तो उसके साथ ही
घर की मुस्कुराहट भी लौट आती हैं
और देह का हरापन भी लौट आता है
कि लौटता है परदेसी
तो सड़क से सूनापन भाग जाता है
और तब रात भी आती है तो
कोई डर नहीं रह जाता है

ऐसे ही लौटता है परदेसी
कि जब भी वह लौटता है
बिना बात के कोई त्योहार हो जाता है

अच्छे दिनों में
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अच्छे दिनों में
जैसे कई पंख लगे होते हैं
कोई जादू होता है उनमें
कि वे पलक झपकते उड़ जाते हैं

अच्छे दिनों में कोई भाव
स्थाई भाव बनकर चेहरे पर टिकता ही नहीं
होंठों पर पहले थोड़ी सी मुस्कुराहट आती है
फिर वही फैलकर खिलखिलाहट में बदल जाती है
खिलखिलाहट ठहाके में बदलकर
माहौल को एक खुशनुमा भ्रम में डाल देती है

अच्छे दिनों में
मन रुई के फाहे की तरह उड़ता है
दुख देखने की आदत छूट जाती है
कभी भूले से नजर पड़ती भी है
तो चेहरे पर वो सिकुड़न नहीं पसरती
आंखें कोई खिला हुआ फूल ढूंढ़ लेतीं हैं
तब नथुने में समाने लगती हैं एक अद्भुत गंध
और उस दृश्य के लिए
शब्द दिव्यता के बखान में लग जाते हैं

कहीं कुछ अच्छा नहीं हो रहा होता तब भी
अच्छे दिनों में
सतत एक आभास का जन्म होता रहता है

हम उसी में सम्मोहित हुए रहते हैं

किसी की डायरी में दर्ज कर्ज का ब्यौरा
———————————————

पंद्रह सौ बुढ़िया दादी को देना है
बड़े बखत पर उसने दिया था
पचीस सौ चाची को
उनसे ज्यादा मांगा था
लेकिन जानता ही हूँ कि चाचा की पूरी कमाई
इलाज के ही भेंट चढ़ जाता है
कहने पर आज दो हजार फिर दिया
जबकी काकी का छह हजार पहले से है
कुल मिलाकर उन्हें आठ हजार लौटाना है

मंझले काका ने जो दिया था चालीस हजार
उसे अब चार साल से अधिक हो गए
बीस हजार तब लिया था
जब किसी ने भी नहीं दिया था
भैया ने कब कितना दिया
तरतीब से कभी लिखा नहीं
जब जितना मांगा मिला
उन्हें कम से कम पचास हजार तो लौटाऊंगा ही

चार साल पहले आठ हजार लिया था
और बाद में मामा ने फिर चालीस हजार दिया
ब्याज पर सिर्फ दस हजार है महाजन का
पांच रुपए सैकड़ा पर बही में अंगूठा लगाया था
सारा कर्ज सूद पर होता तो
उसमें डूब कर कब का मर-खप गया होता

जिंदा हूँ तो इनके कारण
और थोड़ा सा उनके कारण

मंझले ससुर ने
जब जिंदगी की गाड़ी फंस गई थी
एक बार चालीस हजार और दूसरी बार
दस हजार से धक्का मारा था
कहने पर प्रशांत ने पंद्रह
और राहुल ने दस हजार भेज दिया था
भैया खुद फंसे थे इसलिए
शर्माते हुए सिर्फ दो हजार दे गए
लेकिन वे अच्छे आदमी हैं
उनकी बातों से जीने का हौसला मिलता है

दोस्त दो हजार एक बार
और पाँच हजार एक बार हाथ में थमा गया था
मंझले काका चाहते तो कुछ अधिक दे सकते थे
लेकिन सिर्फ तीन हजार ही दिया
ससुर जी का मैंने पैंतीस लौटा दिया है
अब सिर्फ दस लौटाना बाकी है

तीन सौ जो छोटे भाई से लिया था
और पचास रुपए बहन से
कितने दिन हो गए
वे टोकते तो मैं जरूर किसी से लेकर दे देता
अब जब भी गांठ में कुछ पैसे आएंगे
सबसे पहले इन्हें ही दूंगा
इन्होंने बेइज्जत होने से कई बार बचाया है

गाँव
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वे प्रार्थना में
कौन सा मंत्र बुदबुदाते होंगे
जिस गाँव में नहर नहीं होता होगा
वहाँ के किसान
पानी के बारे में किस तरह सोचते होंगे

उस गाँव की यात्रा कैसी रहेगी
जहाँ बड़े लोगों की बड़ी आबादी से कुछ दूर
छोटे लोगों की छोटी सी आबादी बसी होगी
वहाँ कुछ दिन ठहरना कैसा रहेगा
वहाँ मैं क्या-क्या देख सकता हूँ

ऐसा एक गाँव जहाँ सिर्फ
छोटे लोग बसे हो
वहाँ की सड़कें कैसी होगी
क्या अब भी वहाँ लालटेन से भेंट होगी
मैं जाउंगा तो यह भी देखूंगा
कि स्कूल के समय में वहाँ के बच्चे
कहाँ जाते हैं

वे गाँव जो
नदी में बसे हुए हैं
वहाँ धान की फसल किस तरह लहलहाती होगी
वहाँ के लोगों को भागना पड़ता होगा तो वे
किस तरफ भागते होंगे

मैं कुछ दिन
शहर से सटे गाँव में बीताना चाहता हूँ
मैं वहाँ की गालियों पर गौर करना चाहता हूँ कि
वे शहरी हो गए हैं या
उनमें कुछ अब भी शेष है

शहर से दूर के गाँव
रौशनी देखकर क्या विचार करते होंगे
कुछ दिन वहाँ ठहरकर
मैं यह भी पढ़ना चाहता हूँ

जैसे कि झाड़ू
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जीवन के कुछ अर्थ बंद थे
तुम्हारी अनुपस्थिति ने उसे खोला
बताया कि इसमें तुम्हारा होना
एक रंगरेज को मुस्तैद रखता है

जैसे कि मैं तुम्हें झाड़ू की बात बताता हूँ
कि जब भी उठाया इसको
जाना कि धवलता के लिए कई बार झुकना पड़ता है
कि झुकने से कभी कोई बिगाड़ नहीं होता
चीजें चमकती हुई और सुंदर हो जाती हैं

जैसा कि मैं समझता था कि इस्त्री करना एक जादू है
या कोई मजाक
लेकिन नहीं, कपड़े की धारियों को आकार देना
एक अभ्यास की तरह होता है
कि वहीं से आता है सहेजने का जतन
और मुलामियत की पहचान
महत्वपूर्णता की परख कहाँ से आती है
वहीं से

जमे मैल को बाहर निकालने बैठा तो
तुम्हारी याद आई
कि तुम पलक झपकते कैसे पकड़ लेती हो झूठ
चेहरे पर खिलखिलाहट देखकर कह देती हो कि सब अच्छा है
फिर कहती हो कि मैं एक जादूगरनी हूँ
सब जान जाती हूँ अपने जादू से

सूनेपन से लड़ने के लिए जो खिलखिलाहट जरूरी है
वो तुम्हारे पास है
और होंठों पर धीमे-धीमे गुनगुनाया जाने वाला गीत भी

घर एक गाड़ी होता है
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घर एक गाड़ी होता है
गाड़ी का मतलब चलना होता है
कहते हैं कि घर भी चलता है
घर अपने ही स्थान पर चलता रहता है घर के पास भी चलने के लिए पहिए होते हैं

लेकिन घर चलता है तो कैसे चलता है
कहते हैं कि घर को चलाना पड़ता है कुछ घर तो दौड़ते भी हैं
जो घर दौड़ते हैं वे बड़े और बड़े आलिशान घर होते हैं
उन दौड़ते घरों के आसपास चलते-चलते हांफने लगने वाले घर नहीं रहते

ठेलकर चलानेवाले और चलते-चलते हांफने लगने वाले घर दूसरे छोर पर रहा करते हैं
इस तरह के घरों के पास इतनी रोशनी नहीं होती
कि दूर से कोई इनकी मंथर गति को देखकर कुछ नोट कर सके
इस तरह के घरों को ठेलकर कुछ दूर तक ले जाया जाता है
और जब हंफनी शुरू हो जाती है
तब वहीं रोक दिया जाता है
जहाँ रोक दिया जाता है
वहाँ से देखने पर पता चलता है
कि दौड़नेवाले घर अब तक चाँद तक पहुंच चुके होते हैं
और तारे की तरह टिमटिमा रहे होते हैं

चाँद की तरह चमकना और तारों की तरह टिमटिमाते रहना
रूके-खड़े घरों का सपना होता है
लेकिन सपना तो खैर सपना होता है
जो सपना ही होता है

लेकिन इससे क्या
घर तो घर होता है

मौसम से बात शुरू करते हैं
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हम मौसम से बात शुरू करते
फिर हवा की बातें करते
उसे महसूसते

हम आसमान को बड़ी देर तक निहारते
और बारिश की बातें करने लगते

कुछ समय के बाद
जब हमारी बातें खेतों में उतरतीं
हम पौधों की बातें करते
तब हमारी बातों के बीच कुछ वृक्ष आ जाया करते
हम उनकी डालियों को देखते
अगर हमें उस पर कोई चिड़िया दिख जातीं
तो हम पहले कुछ देर चहक लेते
फिर उड़ने की बातें करते

पकने पर फसल का रंग सुनहरा होता है
मंजर जो होता है दरअसल वो वृक्ष का फूल होता है
हमारी बातों में जब कभी फूलों का जिक्र आता
हम प्यार की बातें करने लगते

गर प्यार की बातें छिड़ जातीं
तो जैसे कोई जादू हो जाता
बस हम मुसकाते
और देर तलक चुप रहते

फिर हम कुछ भी न बातें करते

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4 comments

  1. चंद्रेश्वर

    मिथिलेश कुमार राय अच्छी कविताएँ लिख रहे हैं |उनको बधाई |

  2. Very beautiful poems…Simple and touching!

  3. राम कुमार सोनी

    बहुत सुंदर कविताएं…
    मैं मुग्ध होकर, पढ़ता गया…
    पढ़ता ही गया…

  4. सुंदर कवितायें, जीवन्त बिम्ब, अद्भुत पाठकीय आनंद से भरपूर। कवि को अशेष शुभकामनाएं।

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