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कुछ-कुछ सीखना और बहुत कुछ न सीख पाना: व्योमेश शुक्ल

कवि व्योमेश शुक्ल ने अपनी रंग-यात्रा पर बहुत अच्छा लिखा है. इससे किसी भी कलाकार की यात्रा, उसकी जद्दोजहद, उसके संघर्ष को समझा जा सकता है. ‘रंग प्रसंग’ से साभार- मॉडरेटर

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कभी-कभी अपनी जाँच ख़ुद ही करनी होती है. दूसरों के मुँह से अपनी और अपने कामकाज की तारीफ़ और बुराई सुनने के अभ्यस्त आदमी के लिए यह कुछ मनहूस बात है. इसमें धोखा भी हो सकता है. लेकिन धोखा तो कहीं भी हो सकता है. यानी ऐसी कोशिश में कोई हर्ज भी नहीं है.

मैं बनारस में पैदा हुआ. यहीं जवान हुआ और यहीं चुपचाप बूढ़ा हो रहा हूँ. मरूंगा भी यहीं. इस चीज़ का नाम है संस्थापन. एक ही जगह रहने की पस्ती. यह विस्थापन का सौतेला भाई है. बुद्धि के बाज़ार में विस्थापन की क़ीमत बहुत ज़्यादा है और संस्थापन मिट्टी के मोल मिलता है. मैं भी बेमोल हूँ, लेकिन चिर संस्थापित हूँ.

इस कमबख्त संस्थापन ने मेरा सबकुछ बिगाड़ दिया और बदले में दिया एक दो कौड़ी का हौसला, कि मैं एक महान सभ्यता का प्रतिनिधि हूँ और मेरे कियेधरे को उसी की रौशनी में देखा जाय. ध्यान दें, यह हौसला मेरी कमाई नहीं है. प्रतिभा और मेहनत से मैंने इसे हासिल नहीं किया है. यह बस यहाँ रहते-रहते मुझे मिल गया है. जैसे किसी भाग्यशाली को पुश्तैनी संपत्ति विरासत में मिल जाती है. वज़नदार अतीत बहुत बड़ा झमेला भी है. मशहूर संस्कृतिकर्मी, कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने आईएएस की अपनी नौकरी में यूपी कैडर इसीलिए नहीं लिया कि इस प्रदेश के विगत वैभव में अपनी क्षमता से कुछ नया जोड़ पाना उन्हें असंभव लगा था. यहाँ रहकर आप जो भी करेंगे, वह पहले ही हो चुका होगा. यह स्लेट पहले ही इबारतों से भरी हुई है. उस पर खड़ी पाई के बराबर ज़मीन भी ख़ाली नहीं है. कबीरचौरा मुहल्ले की एक गली में थोक के भाव पद्म पुरस्कार-प्राप्त कलाकारों का घर है. सिद्धेश्वरी देवी, सितारा देवी, गोपीकृष्ण, किशन महाराज, सामता प्रसाद और राजन-साजन मिश्र पड़ोसी हैं. थोड़ी दूर रविशंकर, बिस्मिल्लाह खां और छन्नूलाल मिश्र की रिहाइश है. पुलिस थाने के पीछे जयशंकर ‘प्रसाद’ की सुंघनी की दूकान है. बग़ल में, बर्तन और साड़ी के बाज़ार में भारतेंदु हरिश्चंद्र की हवेली है. पड़ोस में महाश्मशान है. कहीं आगा हश्र का जन्म हुआ है, कहीं प्रेमचंद की मौत हुई है. गनीमत है कि मेरी नज़र सौ-दो सौ साल पीछे तक ही जा रही है और सोलहवीं सदी के छज्जे पर खड़े होकर कबीर, तुलसी और रैदास नीचे, यानी आगे की ओर झाँक  रहे हैं.

इस महान भूगोल के बादल मुझ पर हमेशा घिरे ही रहते हैं. लेकिन सभ्यता में महज़ शिखर ही नहीं होते, गहरी खाइयाँ भी होती हैं और होते हैं दूर-दूर तक फैले समतल मैदान. मेरा जीवन मैदान का जीवन है और मेरे जैसे लोग इस सभ्यता का खाद-पानी हैं, लेकिन ग़ौर कीजिए, खाद-पानी भी जितना बनारस में है, उतना कहीं और मिलना मुश्किल है. मसलन, ठीक है कि एक किशन महाराज, तबले जैसे साज़ में, सौ साल में एक पैदा होते हैं, लेकिन ठीक-ठाक तबला बजाने वाले औसत तबलावादक जितनी बड़ी संख्या में आपको बनारस में मिलेंगे, देश के किसी और शहर में नहीं. यही हाल कथक नृत्य, सितारवादन, अभिनय, चित्रकला, यहाँ तक कि लेखन का भी है. मझोले कलाकार और औसत क़िस्म की अभिव्यक्तियाँ यहाँ ख़ूब हैं. इसी बात से माहौल बनता है. बहुत से लोग माहौल के दबाव से कलाकार बन जाते हैं. अगर आस-पास के दस घरों में अल्लसुबह वैदिक उच्चारण हो रहा है, तो आप अपनी नींद के टूटने से झल्ला-झल्लाकर भी वेदज्ञ बन जायेंगे. अगर किसी का बड़ा भाई गायक है, तो झख मारकर वह तानपुरा और तबला मिलाना सीख जायेगा. दूसरी सभ्यता में जो उपलब्धि है, बनारस में वह मजबूरी है. ख़ुद मुझे दुर्गा सप्तशती कब कंठस्थ हुई, तबला बजाना कब आया, नहीं याद. ज़ाहिर है, इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं.

यों, मैंने यहीं रहकर कुछ-कुछ सीखा और बहुत कुछ नहीं सीख पाया. हवा और पानी बहुत बड़े शिक्षक होते हैं. वे सीखने वाले की नसों में घुल जाते हैं. यहाँ विद्या, प्रतिभा, अभ्यास, व्युत्पत्ति, आत्मविश्वास, विनय और औद्धत्य के जल एकदूसरे में हिले-मिले हैं और इस शहर का ख़मीर सदियों की साधना से तैयार हुआ है.

बनारस में रहना ही अनंत और सनातन का कीर्तन है और कोई भी कला इन दो तत्वों के बिना प्रबल नहीं बनती. इन चीज़ों के बग़ैर वह निरी समकालीन होकर रह जाती है, उसकी साँस बहुत छोटी हो जाती है और उसकी आवाज़ अतीत के गुम्बदों से टकराती नहीं. बिना शाश्वत को पैमाना बनाये कला में क्षणिक सनसनी या तत्काल का विमर्श तो संभव है, आनंद मुमकिन नहीं है और कला में आनंद नहीं है तो है क्या ?

लेकिन यही आनंद विद्वानों की राह का रोड़ा है. समझदार आदमी इस ज़मीन पर पैर रखते हिचकिचाते हैं, लेकिन मैं बेवकूफ़ों की तरह इस फ़र्श पर दौड़ा. मैं समझता भले ही कम हूँ, आनंद की इस ज़मीन को चाहता बहुत हूँ.

इसी बुखार में जेएनयू छोड़कर वापस आ गया. जिन कवियों को, जिन कविताओं को, आलोक धन्वा, पाश और चेराबंडा राजू को, मैं बहुत प्यार करता था, अब भी करता हूँ, ताउम्र करता रहूंगा, उन्हीं कविताओं और उन्हीं कविताओं को प्यार करने की तमीज़ मुझे वहाँ के माहौल ने सिखाने की कोशिश की. एक जैसे पोस्टर्स, एक जैसी वालराइटिंग, एक जैसे झोले और एक जैसे चश्मे और एक जैसी विश्वदृष्टि. मैं सात वार और नौ त्यौहार वाली सभ्यता का चिर संस्थापित नागरिक और वहाँ साँस भी एक लय में लेनी थी.

वापस आकर कुछ बरस राजनीतिक-सांस्कृतिक सक्रियता, समकालीन हिंदी कविता और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की तिकड़म और उठापटक में मौज लेकर बिताने के बाद मेरे मन में थिएटर का पुराना भूत फिर से जी उठा.

मैं बचपन से ही थिएटर के समुद्र में तैर रहा था. शहर की प्रतिष्ठित अंतर्विद्यालयीय नाट्य प्रतियोगिता में दो बार सर्वोत्तम अभिनेता का पुरस्कार पाकर दस साल की उम्र में मैं दिग्गज था. लेकिन पढाई आदि की वजह से वह रास्ता बीच में ही रुक गया. 2011 में, बचपन बीत जाने के पंद्रह साल बाद, एक मंद्र अर्जेंसी बिलकुल सामने आकर खड़ी हो गई और हमउम्र अभिनेता दोस्तों के साथ हमने आषाढ़ का एक दिन खेलने का फ़ैसला किया.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की एक कार्यशाला में हमने इस नाटक के कुछ महत्त्वपूर्ण मंचनों की वीडियो रिकॉर्डिंग्स देखीं थीं. कृति के कालजयित्व से कभी कोई इनकार नहीं है, लेकिन उस पर मोहन राकेश, यहाँ तक कि कालिदास के भी क्रियेटिव और रोमैंटिक पर्सोना की अत्यंत गहरी छाप पड़ी हुई है. रही सही कसर ओम शिवपुरी के अभिनय के मिथक ने पूरी कर दी. इससे समझ का विचित्र स्टीरियोटाइप तैयार हुआ और बड़े सवाल पीछे हो गए. एक लेखक का सत्ता-प्रतिष्ठान से क्या संबंध होता है और कहाँ तक जाने के बाद तंत्र उसे एप्रोप्रियेट कर लेता है ? क्या तंत्र का हिस्सा बन जाना अच्छे लेखक की मजबूरी है ? उसकी नियति ? क्या तंत्र की मीमांसा तंत्र के बाहर रहकर नहीं की जा सकती ? ऐसे सवाल इस नाटक के निर्देशकों ने उठाये नहीं. अगर प्रयोग करने की कोशिश हुई भी, तो टेक्स्ट के बाहर जाना पड़ा. टेक्स्ट को अपराजेय मान लिया गया और उस पर अभिनय और डिज़ाइन के फूल चढ़ाये जाने लगे.

यह बात बहुत बेचैन करती थी. वह नाटक पढ़ते हुए मेरे मन में दिवंगत श्रीकांत वर्मा जैसे बहुत से समकालीन कवि आते थे, जो सत्ता-प्रतिष्ठान से एक आलोचनात्मक दूरी को लम्बे समय तक बरत नहीं सके और व्यवस्था ने उन्हें हजम कर लिया. उनकी जीवन-कथाओं के विवरण इस महान नाटक में दाख़िल होना चाहते थे. दूसरी ओर राजसत्ता के भीतर अधिग्रहण का जो चरित्र छिपा हुआ है, उसको देखने और दिखाने का भी मन था. प्रतिकार की नयी किस्म भी एक पुराने नाटक के ज़रिये खुले, यह भी कामना थी.

तो हमने नाटक के कालिदास को मज़दूर नेता बना दिया. वह जींस और कुरता पहनता था, लेकिन संवाद बिलकुल राकेशीय तत्सम हिंदी में बोलता था. संघर्ष और समकालीनता के रूपक का निर्वाह करने के लिए बहुत सी चीज़ें बदलनी पड़ीं. कई बार वे किसी जादू की तरह अपने आप भी बदल गयीं. असल नाटक में जो आहत हिरन शावक है, हमारी प्रस्तुति में वह छात्रों और मज़दूरों का एक समूह है. मूल नाटक में उस घायल हिरन के बच्चे को उठाकर कालिदास अपनी प्रिया मल्लिका के घर जाता है. राजपुरुष वहाँ पहुँचते हैं और उससे वह हिरण शावक ले लेने की कोशिश करते हैं, क्योंकि वह हिरन शावक राजकुमार के तीर से छलनी हुआ है. कवि कालिदास हिरन का बच्चा दे देने से इनकार कर देता है और आमने-सामने की नौबत आ जाती है.

हमारी प्रस्तुति में हिरन तो था नहीं, उसकी बजाय छात्रों और मजदूरों का जत्था था, क्योंकि हमें भूमि अधिग्रहण और ग़रीब किसान के विस्थापन से इस दृश्य को जोड़ना था. एक पूरा समूह ही मेरे लिए हिरण शावक था. घायल और बेघरबार होकर मानो वह एक आंदोलनकारी हिंदी कवि के साथ-साथ उसकी प्रिया के घर जान बचाने चला आया था. यह पूरा समूह भयाक्रांत होकर कालिदास से बिलकुल चिपका हुआ था. एक आदमी से चिपके हुए एक दर्जन आदमी. ऐसा अतियथार्थवादी कोई दृश्य मोहन राकेश के इस महान नाटक में नहीं है, लेकिन ऐसी अनगिन दृश्यावलियाँ इस महाजीवन में रोज़ बन-बिगड़ रही हैं. क्यों नहीं इसे किसी नाटक में होना चाहिये ? इस दृश्य के इर्द-गिर्द संघर्ष और विस्थापन की दूसरी कहानी, उपन्यास या नाटक रच डालने से बात बहुत सपाट और स्थूल हो जायेगी. बहुत प्रभावशून्य पैटर्न पर ऐसा हमारे यहाँ हुआ भी है. दरअसल, यह बात ही अपने आप में इतनी लाउड है कि इसे बहुत सूक्ष्म और कलात्मक छंद में नाटक आना चाहिये. आषाढ़ का एक दिन में ऐसी संभावना थी. ठीक है कि मैंने नाटक को अतिरिक्त ढंग से पढ़ लिया था और बाद में बनारस में उस पर पर्याप्त विवाद भी हुआ, लेकिन अतिपाठ भी तो एक पाठ ही है.

इसके बाद राजपुरुषों के आ जाने पर जो आमना-सामना मूल नाटक में कालिदास और उनके बीच हुआ है, हमारे नाटक में एक जनसमूह और सत्ता में होता दीखता है. इससे प्रस्तुति के विज़ुअल में एक समकालीन उत्तेजना आ गई और मुझे भी काम में मन लगाने का एक बहाना मिला. इसके बाद, जब कालिदास उज्जयिनी के शासन के क़रीब जाकर अपनी ज़मीन और प्रिया से दूर हो जाते हैं और उनका व्यक्तित्व एक राजपुरुष में अवमूल्यित हो जाता है तो मैंने उन्हें पारंपरिक वेशभूषा में दिखाया. यों, परंपरा राजसत्ता और समकालीनता जनभावना का प्रतीक बन गई और असल ज़िंदगी का कन्फ्रंटेशन एक प्रेमकथा के भीतर संभव हो पाया. बाद में एक विशद थीसिस में अग्रणी रंग निर्देशक देवेंद्र राज अंकुर ने इस प्रस्तुति की सराहना की और इसे आषाढ़ का एक दिन की सर्वोत्तम प्रस्तुतियों में शामिल किया.

लेकिन यह प्रस्तुति आगे नहीं जा सकी. हममें कमियाँ थीं. मैं एक समूह को रंगमंडल की तरह विकसित नहीं कर पाया. हमउम्र अभिनेता दोस्तों से अपनी सही-ग़लत हर बात मनवा पाना मुश्किल था और मुझे ऐसा ही अनुशासन चाहिए था. भावोच्छ्वास से मेरा काम न चलना था. मुझे मेरी शर्तों पर चलने वाला एक फिदायीन दस्ता चाहिए था, जिसे नाटक करने के अलावा संसार का कोई और काम न करना हो.

यह खोज आने वाले दो सालों में पूरी हुई. मुझे एक विद्यालय में नाटक सिखाने का मौक़ा मिला और मिले दर्जन-भर किशोर-किशोरियाँ. उस विद्यालय की प्रधानाध्यापिका मेरी माँ थीं. उन्होंने मंचन के बाद हाईस्कूल और इंटर की कक्षाओं में हिंदी और अंग्रेज़ी पढाने का मौका भी मुझे दे दिया. इस अवसर का इस्तेमाल मैंने उस समूह के मन में अच्छी कविता की समझ और प्यार पैदा करने के लिए किया.

वह समय नशे में गुज़र गया. हमने सरहपा से लेकर गीत चतुर्वेदी तक की कविता से मुहब्बत की. एक घंटे की क्लास तीन घंटे तक चलती. वर्तनी की एक भी ग़लती आत्मघात के बराबर थी. हर विद्यार्थी क्लास में बोलने लायक़ बनाने की कोशिश करता. हर छात्र  सुलेख लिखने का प्रयत्न करता. सब मेरी आँखों में झाँकते हुए न जाने कौन सी व्यंजना की तलाश करते. कभी हम सब प्रसादजी के उजाड़ घर चले जाते, कभी भारतेंदु की ड्योढ़ी की धूल माथे पर लगाते. थिएटर दूर-दूर तक नहीं था तो ज़ाहिर है हम पर किसी प्रतिस्पर्धा का दबाव भी नहीं था. यह अपनी पूर्वज कविता को चाहे जैसे सेलिब्रेट करने का युग था. रंगकर्म उसका एक औज़ार बना. 1936 में कामायनी की रचना हुई थी और 2011 में उसके पचहत्तर साल पूरे हुए थे. इस कविता के माहात्म्य पर बहुत दिनों से नज़र थी.

यह सच है कि इस बीच कामायनी को दूर से देखा गया है. वह बातचीत, आदत और अभिव्यक्ति में नहीं है. यह समकालीनता की हद है. हमलोग कदम-कदम पर भारी मुआवज़ा देते हुए आगे निकले और उत्तराधिकार खंडित हो गया. सवाल रचना के विराट को पूरा-पूरा धारण कर लेने का नहीं था – वह संभव नहीं है, ज़रूरी भी नहीं है – उसके लिए कोई और ही मौसम, दूसरी ही धातु चाहिए – लेकिन उसे आरंभ, हमसफर, चुनौती या दायित्व मानने में क्या हर्ज़ है ? घबराने की भी कोई बात हमारे लिए नहीं थी. अंततः प्रसाद पड़ोसी हैं। बनारस में उनका घर, अवदान और संततियाँ बर्बाद और अभिशप्त हैं। कॉपीराइट खत्म हो गया है तो पुस्तकें एक-एक करके पेशेवर प्रकाशकों के पास जा रही हैं और कीमती भौतिक संपदा भू-माफियाओं के पास कभी भी पहुँच सकती है. कामायनी सहित सभी कृतियों का कोई क्रिटिकल एडिशनअब तक तैयार नहीं हुआ. विभिन्न संस्करणों के पाठ में अनेकानेक अंतर हैं. कई जगहों पर पूरी-पूरी पंक्तियाँ बदली हुई हैं. छात्र संस्करण कुछ और कहता है, भारती भंडार वाला हस्तलिपि संस्करण कुछ और. कविपुत्र रत्नशंकर प्रसाद ने यथाशक्ति और प्रामाणिक पाठ तैयार किया, लेकिन उसे अंतिम मान लेना ठीक नहीं है. जन्मशती के मौक़े पर प्रकाशित रचनावली अनुपलब्ध है. महान रचनाकार के घर से कुछ दूर स्थित दूकान तक आन-जाने के रास्ते पर आबादी का कब्ज़ा है. पुश्तैनी ज़र्दे का कारोबार ठप है. शहर में दूसरी चीज़ों का हल्ला है और शालीन नागरिकता चुप रहती आई है. वह दृश्य में है और नहीं दिख रही है. तब भी नहीं दिख रही थी.

ऐसे अभाग्य के साथ शुरुआत कुछ कम मुश्किल हो गई. यहाँ से शोक की बजाय उत्सव का वरण भी मुमकिन था. एक अवसर बन रहा था और हम इसी में से प्रसाद का स्पर्श करना चाहते थे – हम नौजवानी  की ओर से रचनाकार का अभिषेक करना चाहते थे, इसलिए कामायनी के मंचन का फैसला हुआ. हमारा ख़याल था कि ऐसी कोशिशों से भौतिक दिक्कतों को टाला या भूला जा सकता था. इसी राह पर चलकर कभी-कभी उन उलझनों को अपदस्थ भी किया जा सकता है.  अब भी हम इस नज़रिये पर कायम हैं.  

 जो पंक्तियाँ कामायनी के काव्य में निहित कहानी को ज़ाहिर करती थीं, अपने नाट्यालेख में हमने सिर्फ़ उन्हीं को लिया गया. यह चालाकी थी और विवशता, लेकिन एक अनुभवहीन आत्मविश्वास भी कहीं काम कर रहा था कि कामायनी की कहानी जिन पंक्तियों से बनती है महज़ उनसे भी महाकाव्य में शामिल बड़ी दार्शनिक समस्याओं की झाँकी मिल जाएगी. बाक़ी कविता भी अनिवार्य है और हमारे चयन में वह आलोकित ही होती है. ऐसे ही, पंक्तियों के क्रम में भी कहीं-कहीं कुछ उलटफेर हमने किया. प्रसादजी ने मनोविकारों के आधार पर सर्गों की रचना की है। हमने कहीं उन मनोविकारों को स्वाधीन चरित्रों की तरह विकसित किया – कहीं वे दूसरे चरित्रों में घुल गये और कहीं उन्हें पूरा छोड़ भी दिया गया है। यों, हमारा नाट्यालेख भले ही मूल कविता-पंक्तियों के स्तंभ पर खड़ा हुआ, उससे पूरी तरह स्वायत्त भी बना रहा और पढऩे की मेज़ की जगह रिहर्सल के फ्लोर पर – मंचन के लिहाज़ से तैयार हुआ.

 इस आलेख को नृत्य और संगीत में विन्यस्त होना था. मैं बनारस घराने के शास्त्रीय संगीत को थिएटर की बीच में ले आना चाहता था. दरअसल, हम संगीत के ज़रिए अपने रंगकर्म में कुछ और परिष्कार और बारीक़ी भी पा लेना चाहते रहे हैं. दृश्य में जो रंगसंगीत ‘लाइव कंटेंट’ की तरह मौजूद है, ज़्यादातर लोकसंगीत है और उसका मज़ा इसी बात में है कि वह तत्काल उपजे. वह शास्त्रीय संगीत का अपभ्रंश है. हमारा काम इससे न चलता. हमने अपने बहुत से महीने और साल अपनी एक-एक प्रस्तुति का संगीत तैयार करने में स्वाहा किये हैं. हमारे संगीत का काम सर्वोत्तम संगीतकारों के बिना भी नहीं चलता और सर्वोत्तम संगीतकार रोज़ की रिहर्सल्स और मनमानी तारीख़ों पर शो के लिए न मिलते. इसके अलावा अभिनेताओं के बीच रिकार्डेड म्यूज़िक के साथ काम करते हुए आप लयगति और ‘इमोशनल बिहेवियर’ की लगातार खोज में बहुत गहरे जा सकते हैं. मिसाल के लिए, तबले पर एक छोटी सी चक्करदार तिहाई आप पचास बार बजाकर अभिनेता के साथ पसीना बहाएँ. अगर तबलावादक साक्षात सामने बैठा हुआ है तो उससे एक ही तिहाई पचास बार बजवाने की कल्पना भी असंभव है. तब परिष्कार के साथ समझौता करना होगा.

 कविता अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक खास क़िस्म की कोरियोग्राफी की माँग करती है. वह यथार्थवादी अभिनय-रूपों में सँभल नहीं पाती.

यथार्थ का गैरज़रूरी दबाव उनके अमूर्तनों को समतल करने लगता है और सबसे कोमल अंतर्ध्वनियाँ गुम या अवमूल्यित हो जाती हैं.

 कामायनी की शास्त्रीयता के अलग से भी कुछ आह्वान थे. हमने अपनी प्रस्तुति में तीन नृत्यरूपों – छऊ, भरतनाट्यम और कथक की ब्लेंडिंग के भीतर से एक आधुनिकतर देहभाषा की खोज की कोशिश की. इस तरीके से असहमत और भिन्न भी हुआ जा सकता है.

 इस कृति में शिल्प की, अभिव्यक्ति के अलग-अलग मॉडल्स की, व्याख्या और बहस के अंतरालों की खोज की अशेष संभावनाएं हमेशा हैं. ऐसी अनेकांत चीज़ ही हमारी फेवरिट हो सकती थी. शुरूआत में बचकानी और अपरिपक्व कुछेक प्रस्तुतियों के साथ हमारा काम हिचकोले खाता हुआ आगे बढ़ा. हमें बहुत दूर तक संदेह और संभावना का लाभ मिला है. इसीलिए हिंदी के साहित्य और संस्कृति-संसार के बारे में एक राय मेरी यह भी है कि यह चाहे जैसा हो, हमें तुरंत मान्यता दे देता है. हमें पहचान और मौक़े मिलने लगे, जबकि हमारे कलाकार किशोर और अप्रशिक्षित थे, ख़ुद मैं एक कवि के रूप में पर्याप्त प्रशंसित और पुरस्कृत था, लेकिन रंगमंच तो दूसरी ही बला थी. आज यह तय करना मुश्किल है कि पहले से कवि होने के तथ्य ने  मेरे रंगकर्म का फ़ायदा ज़्यादा किया या नुक़सान. मेरी कविता के बहुत से प्रशंसकों को यह लगने लगा कि नाटक-नौटंकी आदि के चक्कर में पड़कर मैं अपने लेखकीय व्यक्तित्व को चोट पहुँचा रहा हूँ, लेकिन यहाँ तो धुन सवार थी. हम देश-भर में घूम-घूम कर प्रदर्शन कर रहे थे, जबकि ईमान की बात यह है कि मुझे अपनी रिहर्सल्स से ज़्यादा ख़ुशी किसी चीज़ में नहीं मिल रही थी. हम उस मोर्चे पर अंधाधुंध मेहनत कर भी रहे थे.

 कामायनी के वज़न की ही एक और कृति ‘राम की शक्तिपूजा’ के मंचन का समय आया. शक्तिपूजा का मंचन मेरी माँ डॉक्टर शकुंतला शुक्ल का स्वप्न था. उन्होंने इस प्रोजेक्ट में अपनी सीमाओं के पार जाकर हमारे समूह की मदद की. अपनी ही शर्तों पर हमने इस प्रस्तुति का भी पार्श्व संगीत तैयार किया. यह सारा काम बहुत महँगा था.

 इसका  बोझ भी महसूस होता था. अब अतीत की यात्रा करने की बारी थी. शक्तिपूजा अपनी अंतर्वस्तु में एक आधुनिक रचना है, लेकिन उसके शिल्प में तुलसीदास की रामलीलाओं तक चले जाने की क्षमता भी है. मुझे यह बात थोड़ी-बहुत इसलिए समझ आ गई कि बनारस की संसार-प्रसिद्ध मौनीबाबा रामलीला में मैं बचपन में राम बन चुका था. मैंने लीला की कई सुन्दरताओं को अपने इस नाटक में शामिल कर लिया. कविता की पिछली पढाई अब हमारे अभिनेता-अभिनेत्रियों के काम आ रही थी. वे इस कठिन कृति में रम पा रहे थे. एक बार फिर कुछ नालायक़ मंचनों के साथ यह यात्रा भी शुरू हुई. हमलोग कछुए की चाल से आगे बढे. शक्तिपूजा के पास रामलीला के वैभव का समर्थन था, इसलिए भी यह प्रस्तुति ज्यादा सफल हुई. हम एक ओर नृत्य और संगीत के समारोहों में शिरकत कर रहे थे तो दूसरी तरफ़ थिएटर फेस्टिवल्स में भी जा रहे थे, लेकिन दोनों ही संसारों ने हमें अपनाया नहीं. हमसे दूरी बरती गई. हमारे नाटक में संवाद नहीं थे. सबकुछ प्रीरिकार्डेड था. उसकी वजह की ओर इशारा हम पहले ही कर आये हैं. वहीँ नृत्यरूप भी तीन थे. हम विशुद्ध नाटक और विशुद्ध नृत्य की अवधारणा के शिकार हुए. हमारा काम मिलावटी था. अब भी है. शायद आगे भी रहे. इसलिए हमें अपनाया नहीं गया. यह बात हमारे पक्ष में ही गई. हम सबसे अलग हैं, यह साबित हो गया.

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2 comments

  1. सुजीत कुमार सिंह

    बहुत ही सुन्दर!

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