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प्राचीन भारत में गुप्तचर-व्यवस्था : एक संक्षिप्त शोध

त्रिलोक नाथ पाण्डेय, जो अभी हाल में ही भारत सरकार के गुप्तचर ब्यूरो से लम्बी सेवा के बाद उच्च पद से रिटायर हुए हैं, ने गुप्तचरी की प्राचीनता और महत्ता पर बड़ा शोधपूर्ण लेख लिखा है. प्राचीन भारत में जासूसों की रहस्यमयी दुनिया और उनके जटिल व कुटिल कारनामों को सरल शब्दों में व्यक्त कर श्री पाण्डेय ने एक अनोखे विषय को सामने लाया है. आज श्री पाण्डेय के जन्म की साठवीं सालगिरह है. उन्हें सुदीर्घ जीवन की अनन्त शुभकामनायें- मॉडरेटर 

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 कहा जाता है कि दुनिया का सबसे पुराना पेशा है देह-व्यापार. देह-व्यापार से उत्पन्न परिस्थितियों में ईर्ष्या-द्वेष बढ़ा. ऐसी हालत में खुद को महफ़ूज़ रखने के लिए इन्सान अपने दुश्मन की खोज-खबर लेने लगा. इसके लिए उसे जरूरत पड़ी खुफिया ख़बरों की जो वक्त रहते उसे खतरों से आगाह कर सके. खुफिया खबरों को जुटाने वाले गुप्तचर या जासूस कहलाये और उनका पेशा जासूसी. इस तरह, दुनिया का दूसरा सबसे पुराना पेशा जासूसी हुआ.

   दुनिया की सबसे पुरानी किताब ऋग्वेद में जासूसी की जोरदार चर्चा आई है. गुप्तचरों के अधिष्ठाता देवता वरुण से प्रार्थना की गयी है कि वह अपने गुप्तचरों, जिन्हें स्पश या चर कहा गया, को सर्वत्र नियुक्त करे ताकि वे हर जगह सब पर नजर रख सकें. वरुण के चर सावधानी से सब कुछ देखते रहते थे, सूचनाएँ एकत्र करने के लिए दूर-दूर तक यात्रा करते थे, और कोई भी क्षेत्र उनकी पहुँच के बाहर नहीं था. वरुण की सरमा नाम की महिला गुप्तचर अपराधियों की खोज में घूमती रहती थीं. इन्द्र ने भी उसकी सेवाओं का लाभ उठाया था. वरुण के गुप्तचरों की प्रशंसा में ऋषियों ने मुक्तकंठ से गीत गाया, “शीघ्र गमन करने वाले, दुष्टों को बाँधने वाले गुप्तचर स्थान-स्थान पर हैं. उनकी पलकें कभी नहीं झपकतीं. मधुर जिह्वा वाले, किसी से न मिल जाने वाले वे गुप्तचर, राष्ट्र के सहस्त्रों पुरुषों की सुरक्षा करने वाले हैं और विविध व्यवहार के केन्द्रों में दुष्टों को उपतप्त करते हैं.”1

   ऋग्वेदकालीन वरुण के चरों की परम्परा परवर्ती संहिताओं में अविछिन्न रही.अथर्ववेद में वरुण को सहस्त्रनेत्र कहा गया. अथर्ववेद के अनुसार सोम के अनेक सचेत और सर्वनायक गुप्तचर थे. जब वैदिककालीन राजा स्वर्गिक देवताओं के गुण और वैशिष्ट्य अपने चरित्र में आत्मसात् कर लेता था, तो उनके गुप्तचर पृथ्वी पर प्रतिबिंबित हो जाते थे.2

   महाकाव्यों का समय आते-आते तो गुप्तचरों का खूब प्रयोग होने लगा. रामायण में राम भरत से जानना चाहते हैं कि क्या उन्होंने अपने पन्द्रह उच्च राजपदाधिकारियों और अन्य राजाओं के अठारह उच्च राजपदाधिकारियों पर नजर रखने के लिए गुप्तचर नियुक्त किये हैं.3

रावण की लंका में गुप्तचर-व्यवस्था अपेक्षाकृत ढीली-ढाली थी. लगता है रावण अपने बल के अभिमान में गुप्तचरों को महत्व न देता था. तभी तो, नाक कट जाने पर उसकी बहन शूर्पणखा ने उसे धिक्कारते हुये कहा था, “भैया, तुम बदतमीज और बेवफा मंत्रियों से घिरे बैठे हो. इसलिए तुम्हें गुप्तचर नियुक्त करने की सुध नहीं है. यही वजह है कि तुम्हारे रिश्तेदार मारे जा रहे हैं और तुम अनजान बने बैठे हो.”4 फिर, उसने रावण को चेतावनी दी, “जो राजा अपनी प्रजा की सुरक्षा की जानकारी के लिए गुप्तचर नहीं नियुक्त करता, प्रजा उसे वैसे ही त्याग देती है जैसे नदी के कीचड़ में फंसे हुए हाथी को.”5 रावण सोचने को मजबूर हो गया, “जो राजा अपने शत्रु की ताकत और कमजोरी का पता अपने गुप्तचरों द्वारा लगा लेता है, उसे युद्धभूमि में शत्रु को पराजित करने में बहुत कम श्रम की आवश्यकता होती है.”6 परिणामस्वरूप, उसने तुरंत अपनी गुप्तचर-व्यवस्था सुदृढ़ किया और राम के पीछे अपने जासूस लगा दिये.

राम की गुप्तचर-व्यवथा कहीं ज्यादा मजबूत थी. उनकी गुप्तचर-व्यस्था के प्रमुख थे महावीर हनुमान जो स्वयं एक मजे हुए गुप्तचर थे. किष्किन्धाकांड में राम लक्षमण को आते देख हनुमान सुग्रीव के आदेश पर ब्राह्मण का वेश बना कर आगंतुकों के बारे में पता करने पहुँच गये. वेश बदल लेने की हनुमान की इस प्रतिभा को देख कर ही राम ने उन्हें गुप्तचर कार्य सम्हालने की जिम्मेदारी सौंपी. यही कारण है कि रामदूत के रूप में वह लंका में एक गुप्तचर की भांति प्रवेश किये और पूरे नगर का त्वरित सर्वेक्षण कर लिया. उसी दौरान वह विभीषण में संपर्क-सूत्र बनने की सम्भावना देखकर उन्हें राम का स्थानिक गुप्तचर बना लिया.

युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व रावण ने अपने कई गुप्तचर लंका के बाहर डेरा डाले राम की सेना की शक्ति का अनुमान लगाने के लिए भेजा. ये लोग भालू-बन्दर का रूप बना कर राम की सेना में घुस गये और गुप्तचरी का कार्य शुरू कर दिए. लेकिन, सुक और सर नामक दो प्रमुख गुप्तचर विभीषण द्वारा पहचान लिए गये और पकड़ कर राम के सामने लाये गये. राम ने इन गुप्तचरों को न सिर्फ माफ़ कर दिया, बल्कि अपनी सेना की कुछ मुख्य विशेषताएँ भी उन्हें बतायीं ताकि वे रावण को राम की शक्ति का बोध करा सकें.

रणभूमि में लक्ष्मण जब घायल हो गये, तो विभीषण के बताये हुए पते से ही लंका से सुषेण वैद्य लाये गये. बाद में, विभीषण की दी हुई गुप्त सूचना कि रावण की नाभि में अमृत है के आधार पर ही राम रावण का वध कर पाये. किन्तु, अयोध्या में राजा बनने पर गुप्तचर द्वारा दी गयी सूचना ने राम के जीवन में भूचाल ला दिया और उन्हें अपनी पत्नी सीता का त्याग करना पड़ा.

महाभारत का काल छल-छद्म और रक्तपात से भरा हुआ था. यही कारण है कि इस काल में गुप्तचरों की महत्ता और बढ़ गयी. वेदव्यास ने शांतिपर्व में गुप्तचरों का महत्त्व सेना के आठवें अंग के रूप में स्वीकार किया, वहीँ उद्योगपर्व में उन्हें राजा की आँखें कहा गया. कृष्ण के गुप्तचर कौरवों की सेना में थे और दुर्योधन के गुप्तचर पाण्डवों की सेना में. कोई भी स्थान गुप्तचरों की उपस्थिति से बाहर न था. वे उद्यानों, मनोरंजनस्थलों, मदिरालयों, राजदरबारों, घरों, दुकानों, विद्वत्परिषदों और सामान्यजन के वासस्थानों – सभी जगह हाजिर रहते थे. वे नगरों और प्रदेशों में राजा की नीति के प्रति जनता की प्रतिक्रिया का पता लगते थे. शत्रु के गुप्तचरों, दूतों और संदेशवाहकों के मन की बातें पता करने का काम भी इन्हीं के जिम्मे था. किन्तु, पाण्डवों के अज्ञातवास की अवधि में दुर्योधन के गुप्तचर पाण्डवों का पता न लगा पाए. वहीँ, कृष्ण के गुप्तचर महाभारत युद्ध के दौरान दुर्योधन के धिक्कारने पर भीष्म की प्रतिज्ञा कि कल पांच बाणों से पाँचों पाण्डवों को मार डालूँगा, का पता लगा लिए. गुप्तचरों की यह पूर्वसूचना पाण्डवों द्वारा व्यूहरचना में बड़े काम आयी.

  भारतवर्ष में गुप्तचरों की उपस्थिति के ऐतिहासिक प्रमाण सर्वप्रथम चौथी शताब्दी ईसा पूर्व चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में मिलता है. चन्द्रगुप्त का गुरु चाणक्य एक उच्चकोटि का कूटनीतिज्ञ, रणनीतिकार, प्रशासक और गुप्तचरतंत्र का कुशल संचालक था.

   चाणक्य ने पूरे गुप्तचर तंत्र को दो भागों में बांटा था – ‘संस्था’, जिसके गुप्तचर राज्य से वित्तपोषित संस्थाओं में सक्रिय थे, और ‘संचार’, जिसमें वे गुप्तचर सम्मिलित थे जो आवश्यकता के अनुसार विभिन्न स्थानों में घूम-फिर कर सूचनाएँ एकत्र करते थे. ‘संस्था’ में पांच प्रकार के रूपधारी गुप्तचर थे – कापटिक (कपटवृत्ति छात्र), उदास्थित (उदासीन सन्यासी), गृहपतिक (गृहस्थ), वैदेहक (बनिया), और तापस (तपस्वी)A ‘संचार’ में चार प्रकार के रूपधारी गुप्तचर थे – सत्रिन (अनाथ व्यक्ति), तीक्ष्ण (झगडालू प्रवृत्ति का व्यक्ति), रसद (विष देने में प्रवीण व्यक्ति), और भिक्षुकी या परिव्राजिका (निर्धन विधवा या ब्राह्मणी सन्यासिनी).

   चाणक्य के गुप्तचर विभिन्न छद्मवेशों में काम करते थे. वे छत्रवाहक, पानपात्रवाहक, जलवाहक, पादुकावाहक, आसनवाहक आदि रूप में सक्रिय रहते थे. वे भृत्य, केशप्रक्षालक, शैय्या-सज्जक, नापित, परिचारक आदि रूप में लक्षित व्यक्ति के इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे. विषकन्यायें बहुतायत से प्रयुक्त होती थीं. कुछ चतुर व्यक्ति अन्धा या वधिर का छल करके सूचनाएं एकत्र करते थे. मनोरंजन करने वाले – यथा नर्तक, अभिनेता, मदारी, जादू दिखाने वालों का रूप धर कर भी गुप्तचर सूचनायें जुटाते थे.

चाणक्य ने कौटिल्य उपनाम से ‘अर्थशास्त्र’ नाम के एक अद्भुत ग्रन्थ की रचना की, जिसमे अन्य बातों के अलावा गुप्तचरतंत्र की विस्तार से चर्चा की गयी. चाणक्य द्वारा स्थापित गुप्तचरों के आदर्श लगभग २४०० वर्षों बाद भी आसूचना प्रणाली में प्रासंगिक माने जाते हैं.

तमिल साहित्य के महान ग्रन्थ तिरुक्कुरल, जिसकी रचना महान संत कवि तिरुवल्लुवर ने लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में की थी, में १० कुरलों (दोहों) में गुप्तचरी पर अत्यन्त सारगर्भित बातें कही गयीं हैं. इनमें से पांच प्रमुख कुरल का भावार्थ इस प्रकार है :

  1. एक गुप्तचर द्वारा दी गयी सूचना को दूसरे गुप्तचर के माध्यम से जांचना एवं पुष्ट करना चाहिए.
  2. साधु या तपस्वी का रूप धारण कर गुप्तचर को सूचना एकत्र करना सबसेउत्तम है. ऐसे गुप्तचर को किसी भी हालत में अपनी असलियत जाहिर   नहीं करनी चाहिए.
  3. गुप्तचर को ऐसा रूप धारण करना चाहिए जो संदेह से परे हो. गुप्तचर को निर्भीक होना चाहिए और हर हालत में गुप्त सूचना को छिपाये रखने में समर्थ होना चाहिए.

चौथी शताब्दी आते-आते भारत में जासूसी अत्यंत विशिष्ट कौशल के रूप में विकसित हो चुकी थी. रामायण, महाभारत और पुराणों के अलावा, विभिन्न साहित्यकार अपनी रचनाओं में जासूसी की चर्चा विशेष रूप से कर रहे थे. पूरा पुराण-इतिहास युद्ध, कूटनीति, षड्यन्त्र और गुप्तचर्या के विवरणों से भर गया.

मनु, कामन्दक और याज्ञवल्क्य जैसे स्मृतिकारों के अलावा भास, कालिदास, माघ और बाण भी अपने-अपने साहित्य में गुप्तचरों का उल्लेख करने में पीछे न रहे. यही नहीं, दक्षिण भारत के तमिल संगम साहित्य में भी जासूसों की जोरदार चर्चा होती रही.

अर्थशास्त्र की रचना के कोई आठ सौ वर्षों बाद चौथी शताब्दी में, संस्कृत के महान नाटककार विशाखदत्त ने ‘मुद्राराक्षस’ नामक नाटक में बड़ी कुशलता से चन्द्रगुप्त के संरक्षक चाणक्य और मगध साम्राज्य के महामात्य राक्षस के प्रतिस्पर्धी जासूसी कारनामों को नाटक का विषय बनाया. चाणक्य अपने कुशल जासूसों की मदद से राक्षस की खोई हुई अंगूठी को हथियार बना कर उसे मात दे देता है.

छठीं शताब्दी के संस्कृत कवि भारवि के महाकाव्य ‘किरातार्जुनीयम’ में युधिष्ठिर का गुप्तचर उन्हें सचेत करता है, “गुप्तचरों की सूचना उचित और विशिष्ट होने पर भी महत्वहीन हो जाती है, यदि उसके आधार पर तुरंत और सशक्त कारवाई न की जाय. ”7आठवी शताब्दी के महान कवि माघ ने “शिशुपालवधम” नामक महाकाव्य में गुप्तचरी की प्रसंशा में लिखा है कि जैसे व्याकरणविहीन भाषा प्राणहीन होती है उसी प्रकार गुप्तचररहित राजनीति निर्जीव होती है।8

बाद के राजाओं ने कौटिल्य के सिद्धान्तों और प्रणाली को आधार बना कर अपने-अपने शासन काल में विभिन्न सूत्रों से मिली सूचनाओं की सत्यता परखने और अपने राजकर्मचारियों एवं अन्य विशिष्ट व्यक्तियों पर नजर रखने के लिए गुप्तचरों का प्रयोग किया. कल्हण ने राजतरंगिणी में उल्लेख किया है कि कश्मीर का राजा यशस्कर अन्य स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं के सत्यापन में गुप्तचरों की सहायता लेता था.

   मध्यकाल आते-आते भारतीय वांग्मय और अभिलेखों ने गुप्तचर्या पर मौन साध लिया.

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सन्दर्भ

  1. सहस्र्धारेऽव ते समस्वरन्दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः
    अस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवः 
     

                                                              ऋग्वेद 9]73]4

  1. उतेयं भूमिर्वकणस्य राज्ञउतासौ द्यौवृंहती दूरे अन्त।
    उतो समुद्रौ वरूणस्य कुक्षी उतास्मिन्नल्प उदके निलीनः।।

    अथर्ववेद 4.16.3

    सर्वतद्राजा वरूणों वि चष्टे यदन्तरा रोदसी यत्परस्तात।

    संख्याता अस्य निमिषो जनानामक्षानिव स्वध्नी नि मिनोति तानि।।

    अथर्ववेद 4.16.5

    3.     काच्चिदष्टा दशन्येषु स्वपक्षे दश पंचन।

    तिभिस्त्रिभिरवि ज्ञातै वैत्सि तीर्थनिचारणेः।।

    रामायण, अयोध्याकांड

    4.     अयुक्तचारं मन्थेत्वां म्राकृतैः सचिवैयुर्तः।

    स्वजनं च जनस्थानं निहतं नावबुध्यसे।।

    रामायण, युद्वकांड

    5.     अयुक्तचारं दुदर्शमस्वाधीनं नराधिपम।

    बर्जयन्ति नरा दरान्नदीपंकमिव भिवाः।।

    रामायण, युद्वकांड

    6.     चारेण विदितः शत्रुः पण्डिततैर्वसुधाधियैः।

    युद्वे स्वत्येन यत्नेन समासादय निरस्यते।।

    रामायण, युद्वकांड

7-    तदाशु कर्तुं त्वयि जिह्ममुद्यते विधीयतां तत्र विधेयमुत्तरम् ।
परप्रणीतानि वचांसि चिन्वतां प्रवृत्तिसाराः खलु मादृशां धियः ।।

                                           किरातार्जुनीयम, 1-25

  1. अनुत्सूत्रपद्न्यासा सदवृति: सन्निबन्धना ।

शब्दविद्यैव नो भाति राजनीतिरपस्पशा ।।

                               शिशुपालवधम

 

 

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3 comments

  1. बहुत ही सटीक एवं तथ्य परक जानकारी है! यह लेख जनमानस को एवं सत्ता एवं प्रतिपक्ष के लिए ज्ञान परक सिद्ध होना, समय समय हम कुछ प्रयोग करते रहते हैं इससे और अधिक प्रयोग करने का मार्गदर्शन मिला! आभार

  2. प्रवीण झा

    यह तो अद्भुत् लेख है। संग्रहणीय। धन्यवाद।

  3. ग़ज़ब की जानकारी है…. धन्यवाद!

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