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दुनिया की सबसे नीरस किताब कौन सी होगी?

नॉर्वे-प्रवासी डॉक्टर प्रवीण झा के लेखन से, लेखन की धार से हम सब अच्छी तरह परिचित हैं. न उनके पास लिखने के लिए विषयों की कमी पड़ती है, न कभी भाषा में झोल पड़ता है. बस एक बात और कि इस बार जानकी पुल पर उनकी चिट्ठी बहुत दिनों बाद आई है- मॉडरेटर

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दुनिया की सबसे नीरस किताब कौन सी होगी? मुझे याद है कि हमारे घर में एक काव्य-मीमांसा थी, जो इस कदर नीरस थी कि वयस्क एक पन्ना और बच्चे आधा पन्ना पढ़ कर सो जाते।हालात इस कदर हुए कि हर व्यक्ति अपने सिरहाने पर यह किताब जरूर रखता। किसी नींद की गोली की जरूरत नहीं, काव्य-मीमांसा सुला कर रहेगा। कई लोगों ने इसकी परीक्षा ली, और परीक्षा लेते-लेते मूर्च्छित हुए। डॉक्टर इसे रामबाण की तरह प्रयोग करने लगे।जब किसी मरीज पर तमामनींद की गोलियाँ असर करनी बंद कर देती, वो किसी औघड़ की तरह काव्य-मीमांसा का एक पन्ना उच्चारण कर देते। कुछ ही देर में मरीज और चिकित्सक दोनों सुसुप्तावस्था में होते।इस पर बाद में शोध हुआ, और कई शोधार्थियों ने सोते-जागते इसकी शब्द-संरचना पर गौर किया। यह एक नया रस था।नीरस रस। इसकीव्याख्या किसी ने कभी की ही नहीं, जबकि यह एक सार्वभौमिक रस है।जब यह प्रचुर मात्रा में हो तो यह मारक होता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें तत्सम के उपयोगों के साथ अर्थपूर्ण लंबे वाक्य लिखे जाते हैं, जो इस कदर गद्य को जकड़ते हैं कि पाठक इस चक्रवात में अपना चेतन खो देता है। मुझे प्रतीतहोता है कि मात्र तत्सम से भी बात नहीं बनेगी, शब्दों का मायाजाल बुनना होगा, जैसे पुराने कला फ़िल्मों में  दीप्ति नवल आठ मिनट तक सलवार-कमीज में समंदर के किनारे चले जा रहीं हो और आप बस उनकी पीठ देख रहे हों। यह देखते-देखते कब आठ मिनट गुजर गए, कब नींद आ गयी, यह एक रहस्य है। यह संभव है कि डायरेक्टर जब यह शॉट ले रहे होंगे तो उनको नींद आ गयी हो। वो ‘कट’ कहना भूल गए।दीप्ति नवल चलती रह गयीं हो। जो भी हो, इन प्रकरणों से सिद्ध होता है कि नीरसता भी एक रस है, जैसे नास्तिकता भी एक धर्म है।

हिंदी साहित्य और विश्व साहित्य में ही कई नीरस लेखक हुए।कमाल की बात है कि उन्हें लोकप्रियता भी मिली, पुरस्कार भी मिले। एक वक्त आता है जब आप रस से उकता जाते हैं, नीरसता ढूँढते हैं। आम से उकता गए, एवोकैडो खाने लगे। भिंडी से उकता गए, लौकी पर आ गए। यह मात्र उदाहरण दिया है, भारत के योग गुरू हों या पश्चिम के फ़िटनेस गुरू, लौकी और एवोकैडो की तारीफ करते रहे हैं।रस व्यक्ति को मदान्ध बना देता है, नीरसता उसे धरातल पर रखती है।पाँच-छह सौ पृष्ठ की किताब, और उसमें चींटीओं जैसे छोटे अक्षर, और व्यक्ति लड़खड़ाते झेलते पढ़ गया। और जब वो साबुत निकला, तो उसने यह किताब दूसरे पर थोप दी कि पढ़ लो, इसी में जीवन का सार है। दूसरे व्यक्ति ने भी आँख में दवाई डाल, हज़ारों नींद पर विजय पाकर एक योद्धा की तरह किताब पर विजय पायी और मूर्च्छित होने से पहले झंडा दूसरे को पकड़ा दिया। देखते-देखते किताब दिग्विजय कर गयी, कल्ट बन गयी। रस पर नीरसता की विजय हुई।

इन कथाओं की एक ख़ासियत यह भी है कि यह कभी खत्म नहीं होती। यह बच्चों को नींद के वक्त सुलाने वाली परी-कथाओं जैसी है जिसमें कथा एक के बाद एक जुड़ती चली जाती है जब तक बच्चा सो नहीं जाता। एक महान् नोबेल पुरष्कृत साहित्यकार इसी तर्ज पर किताब पर किताब लिखते गए। हम पढ़ते गए। कथा चलती रही। हम पार्थिव सोते-जागते रहे, इस इंतजार में कि कथा खत्म होगी। और कथा कभी खत्म नहीं हुई। वो शाश्वत थी। ब्रह्म थी।

एक शातिर पाठक के हाथ जब भी यह किताब आती है, वो उसे उल्टा पढ़ना शुरू करता है।किंतु नीरसता का क्या प्रारंभ, क्या अंत? उसकी गिनती वसुदेव के आठवें पुत्र की तरह है। जो अंत नजर आता हो, क्या पता वो शुरूआत हो? नीरसता का परचम तभी फहराता है जब प्रारंभ से अंत तक नीरस ही हो, और व्यक्तिरस ढूँढता बड़े इमामबाड़े में घुस कर खो जाए। जब निकले तो शब्द न फूटे। उसकी आह औरों को वाह सुनाई दे और किताब का डंका बज जाए।

मुझे एक अंग्रेज़ ने कभी कहा कि बाइबल से नीरस कोई किताब नहीं और वो किताब मुझे पकड़ा दी। उस दिन से बाइबल भी सिरहाने पर रखी किताबों में जुड़गया। शनै:-शनै: नीरस-संग्रह बन गया।कोई एक अध्याय में सुला दे, तो कोई महज एक अनुच्छेद में। कुछ इतने शक्तिशाली भी हैं कि बस छाती पर डाल लो,और गहरी नींद में चले जाओ। ‘ऐटलस श्रग्ड’ नामक भारी-भरकम किताब एक मित्र ने इसी टोटके के नाम पर पकड़ाई थी। शीर्षक से ही पृथ्वी हिल जाए, हम-आप क्या चीज हैं? यह मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण किताबों में रही, जिसके कुछ पन्ने अब भी बचे हैं। हर रोज दृढ़ निश्चय करता हूँ कि आज खत्म कर केरहूँगा। यूँ ही दो दशक निकल गए। जल्दी क्या है? कुछ किताबें आपकी अर्थी तक जाएगी, और याद रहे कि उन किताबों को दुनिया नीरस कहेगी। रसभरीकिताबें तो आदमी एक बैठकी में पढ़ जाए, समीक्षा लिख पटक दे। दुबारा नजर भी न डाले। इस रस भरे ‘वन नाइट स्टैन्ड’ वाली किताबों से बेहतर है नीरसजीवन-संगिनी जो मरते दम तक साथ रहे।

हर लेखक को यह प्रयत्न अवश्य करना चाहिए कि इस रस में पारंगत बने। जब काव्य-मीमांसा के लेखक को मैंने एक बार पूछा कि आपकी किताब पूरी पढ़नेवाला आज तक कोई हुआ? उन्होंने कहा कि उनका एक साथी था, अब दुनिया में नहीं रहा। मैंने आगे पूछना उचित न समझा। मनुष्य तो नश्वर है किंतु लेखक कैसे चिरंजीव बने घूम रहे हैं? मैंने उनसे स्वस्थ और दीर्घायु कम ही देखे। हज़ारों को नींद में सुलाने वाले इस महात्मा को स्वयं यह रचना करते वक्त पलक भी नझपकी? ये साक्षात् विष्णु हैं।मैंने उनके चरण छू लिए। उनके आशीर्वाद का प्रतिफल जब भी मिले, पर एक नीरस महाकाव्य की प्रबल इच्छा मन में है। कि मेरी किताब भी दुनिया के तमाम सिरहानों पर विराजमान हो। लेखक का कर्तव्य समाज को जागृत करना नहीं, समाज को एक गहरी चिंता-मुक्त नशीली नींद मेंडालना है। कई लोग यह भी कहते हैं कि लेखन जब अफीम बनेगी, तभी तो लत लगेगी। वो लोग नीरसता की व्याख्या में मिलावट करते हैं। अफीम बनाना अस्थाई हल है, नीरसता लाना स्थाई हल है। कलम को गौर से देखिए। कलम में न धार है, न मिठास है, कलम में एक स्याह खोखलापन है। यही कलम का चरित्रहै।

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One comment

  1. लाख कोशिशों को बावजूद लेख को नीरस नहीं बना पाए, पढ़ते हुए चेहरे की मुस्कान बनी ही रही! 👌

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