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दो रंगों के बीच की रेखा, खजुराहो और सीरज सक्सेना का कला-कर्म

सीरज सक्सेना समकालीन चित्र कला, सिरेमिक आर्ट का जाना-पहचाना नाम है. अपने इस संस्मरणात्मक लेख में चित्रकार-लेखक राजेश्वर त्रिवेदी ने सीरज जी के कला-कर्म के आरंभिक प्रभावों को रेखांकित किया है. बेहद आत्मीय और जानकारी से भरपूर गद्य- मॉडरेटर

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अठारह साल के लंबे अंतराल में मैंने सीरज को लगभग तीन बार खजुराहो के मंदिरों की पृष्ठभूमि में देखा, जहां वह हर बार पत्थरों में उत्कीर्ण स्थापत्य के देहराग को अपनी ही तरह से अनुभूत कर रहे थे। लगभग दो दशक पहले पहली बार खजुराहो के अद्वितीय शिल्प सौंदर्य से रूबरू होना सीरज के लिए  अपनी शिल्प निर्मिती में संभवत: एक नई दृष्टि का मिलना भी था। खजुराहो के शिल्प को देखते हुए लगता है कि हम उस तरह के एक अनूठे संसार में रहते हैं जहां सुंदरता के बिना जीवन की कल्पना करना बेहद मुश्किल है। इसी सौंदर्य से साक्षात होते हुए पहली बार जब सीरज ने अपने रेखांकनों को शुरू किया था तब शायद उन्हें भी इस बात की कल्पना नहीं रही होगी कि खजुराहो के स्थापत्य से उनका रिश्ता इतना प्रगाढ़ होगा कि वे भविष्य में  बार-बार आकर इस अद्वितीय शिल्प सौंदर्य  को अपने रेखांकनों में खोजेंगे।

मुझे याद है अपनी अकादमिक शिक्षा के दौरान सीरज पहली खजुराहो यात्रा से लौटकर बेहद अभिभूत थे। सीरज जैसे युवा और विचारशील कलाकार के लिए निश्चित रूप से यह एक सृजनात्मक यात्रा थी। यही वह यात्रा थी जिसने उन्हें उत्तरोत्तर अपने कलाकर्म को विविध आयामों को स्थापित करने के रास्ते सुझाए। खजुराहो की इस यात्रा के बाद सीरज अपने साथ खजुराहो की असंख्य छवियां लेकर आए थे, जिन्हें उन्होंने दूल्हादेव, वामन, जवारी, जैन आदि मंदिरों के मूर्ति-शिल्पों की रेखाओं को अपने कागज पर महसूस किया था, अगर संख्या में बात करें तो लगभग 200 से ज्यादा रेखाचित्रों की अपार संपदा को सीरज ने इस यात्रा में उकेरा था।  ‘‘मैंने खजुराहो को पहली बार इस रूप में देखा था और शायद बहुतों ने भी। ’’

जिस कलात्मक निष्ठा और आत्मविश्वास के साथ सीरज ने यह विन्यास रचा था वह उनके चित्रों और शिल्प संसार में एक स्थाई भाव की तरह अनुभूत होता है। खजुराहो को इस तरह अपनी रेखाओं में समेटे सीरज ने अपने लिए अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति की राह को प्रशस्त किया। यह वह राह थी जिसने उन्हें भविष्य में शिल्प निर्मिती की तरफ आहुत किया। कला की अकादमिक शिक्षा के बाद सीरज ने खुद को (सिरेमिक) मृतिका शिल्प जैसे माध्यम में बरताने का प्रयास किया, शायद उनका यह प्रयास आज भी जारी है। मुझे याद है भारत भवन की सिरेमिक कार्यशाला में सीरज मंथर गति से मिट्टी को अपने हाथों में महसूस करते-करते उसे ऐसे आकार में परिवर्तित कर देते जो दूसरों की दृष्टि में ‘आकारहीन’ होता। संभवत: वे खजुराहो में देखे हुए शिल्प सौंदर्य पर लगातार विचार करते हुए उसे अपने नवाचारी ढंग से रचने का प्रयास कर रहे थे।

रेखांकन का महीन रियाज सीरज के शिल्प व चित्रों के अंतस में समाहित एक ऐसा तत्व है जो उन्हें सर्वमान्य कलागत मुहावरों में सबसे अलग लक्षित करता है। Homage to unknown Sculptors of Khajuraho जैसे शीर्षक वाले सीरज के शिल्प, संस्थापन और चित्रों की शृंखला को देखकर यह सहज ही अनुभूत होता है कि सीरज अपने में किन प्रभावों को लेकर व्यस्त रहे हंै। जाहिर तौर पर इन सब में खजुराहो की असंख्य प्रतिछवियां अपनी मौजूदगी दर्ज करवाती हैं।

खजुराहो के भूदृश्य में फैले मंदिरों की विशाल शृंखला के मध्य सीरज को अपने पूर्ण मनोयोग के साथ रेखांकन करते हुए देखना हर बार एक तरह का आत्मीय अनुभव रहा। ‘कर्णावती’ की सहायक ‘हुडर’ नदी के किनारे सीरज ने पश्चिम मंदिर समूह के अपने पसंदीदा ‘दूल्हादेव’ मंदिर परिसर में फैली हरितिमा में हजारों साल से खामोश खड़े सौंदर्य को देखते हुए ही अपनी इन रेखाओं को रचने का प्रथम प्रयास किया था। सीरज के रेखांकनों की संख्या में सबसे ज्यादा इसी ‘दूल्हादेव’ की दीवारों पर अवस्थित पाषाण देह पाषाण प्रणय की संख्यातित मुद्राओं के ही किए थे। मंदिरों पर छाई रतिमग्न प्रतिमाओं और गर्भगृह में अवस्थित देवताओं के ये रेखांकन अपने स्वछंद बोध में लक्षित होते हैं। किसी शिल्प या स्थापत्य के सौंदर्य को व्यक्त कर पाना हमेशा शायद संभव नहीं होता पर उसे देखते हुए आप अपनी कल्पनाओं के कई प्रतिमान जरूर रचते हैं।

रंग, रेखा और आकार को लेकर सीरज की धारणा है कि जहां दो रंग मिलते हैं वहीं रेखा बिन बुलाए मौजूद रहती है। दो रंगों के मध्य ही रेखा प्रस्फुटित होती है। रंग और अवकाश के मध्य रेखा भ्रमण करती है। अवकाश ही आकार का जनक है। हर आकार अपना निजी अवकाश अपने साथ लाता है। यह रेखांकन अवकाश और आकार की एक ऐसी धारणा पर रचे प्रतीत होते हैं जहां कोई स्वरूप स्वत: इनमें विलीन सा महसूस होता है। सौंदर्य से साक्षात्कार कि परिणिति सीरज की इन रेखाओं में ध्वनि और अनुभूति की तरह मौजूद है।

ये रेखांकन हमारी उस दीर्घ परंपरा को संबोधित है जिसमें गहरी कलात्मक अवधारणा हजारों साल से शामिल रही है। मुझे याद है सीरज ने खजुराहो शृंखला के  शुरुआती रेखांकन को पहली बार लगभग डेढ़ दशक पहले अपने कला महाविद्यालय की बेहद सुंदर कला दीर्घा में प्रदर्शित किया था। संयोग से उन दिनों मकबूल फिदा हुसैन इंदौर के प्रवास पर थे। एक दिन अचानक उन्होंने सीरज के इन रेखाचित्रों की प्रदर्शनी में अपनी मौजूदगी से सबको चकित कर दिया था। हुसैन बहुत देर तक इन रेखाचित्रों को देखते रहे और फिर उन्होंने एक हल्की सी मुस्कराहट के साथ सीरज को अपनी गजगामिनी शृंखला का एक रेखाचित्र कला दीर्घा में बनाकर दिया था। अपनी कला-शिक्षा के दौरान प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार केके हेब्बर के रेखांकन से सीरज प्रभावित रहे हंै, वे उन्हें अब भी प्रभावित करते हैं। बकौल सीरज उनकी रेखाएं इतनी सशक्त होती हैं कि सामने खड़ी जड़ देह को भी तांडव नृत्य कराने का सामर्थ्य रखती हैं। दो या तीन मिनट में रेखांकन करना आसान नहीं। एक तरह का आत्मविश्वास किसी भी कलाकार के पास होना बहुत जरूरी है और यह ऊर्जा कलाकार की दृष्टि पर निर्भर है, जैसी आंखें, वैसा चित्र। अपनी तीसरी यात्रा में सीरज ने करीब चालीस रेखांकन किए, उनके अनुसार मुझे किसी भी पुरुष या स्त्री का चेहरा याद नहीं। यह यात्रा आलिंगन से उपजी पाषाण रेखाओं से मिलने की थी। रेखाओं की बारीकियों में उलझकर न तो चेहरे दिखते हैं, न इनके शरीर और न आभूषण। दिखता है तो रेखाओं का चमत्कार, जो इनकी देह के धरातल पर सूर्य की रोशनी के साथ घुलकर हर सुबह यहां नृत्य करता है। इस सौंदर्य में अपनी आस्था सीरज उत्तरोत्तर नई दृष्टि के साथ प्रकट करते हंै।  हर बार वे ही संख्यातित मुद्राएं मगर हर बार रेखाओं के नए धरातल पर।  संभवत: अठारह साल के लंबे अंतराल के बाद ये रेखांकन पुन: खुद को नए रूप में उद्घाटित कर रहे हंै। सीरज अपनी रेखाओं में लय और गति को तलाशते हुए पाषाण देह के इस उन्मुक्त सौंदर्य को अनेकार्थों में रच रहे हैं। संभव है भविष्य में उनकी रेखाएं इस सौंदर्य को एक अंतहीन विस्तार में परिवर्तित करेंगी।

                                                                           -राजेश्वर त्रिवेदी

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