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मैं उनका शबाब ले बैठी…

शिव कुमार बटालवी आज होते तो 81 साल के होते. पंजाबी के इस अमर कवि को याद करते हुए युवा लेखिका अणुशक्ति सिंह का लेख- मॉडरेटर

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माये नी माये मैं एक शिकरा यार बनाया

उदे सर दे कलगी, ते उदे पैरी झांझर…

इन पंक्तियों को लिखने वाला मेरा वह यार भी शिकरा ही था. जग घूमे हुए उस यार ने हर उस दिल में जगह बना ली जिसने भी उसको कभी जाना, मगर वह कलगीदार, पैरों में झांझर पहनने वाले यार मोह में पड़ने वाला शख्स नहीं था. ऊँचे उड़ते हुए जब भी वह बुरांश के फूलों से भरे ऊँचे चट्टानों पर ठहरता, दो पल को साँस भरता और पैरों की झांझर को बजाते चला जाता.

उसके पैरों के झांझर से धुन निकलती, ‘कि पुच्छ दे ओ हाल फकीरां दा, साडा नदियों विछड़े नीरां दा .’ और वह गाता जाता ‘तकदीर ता अपनी सौंकन सी,तदबीरा साथो न होइया…’

१९७३ में ऊपरवाले के घर रुखसत करने वाला मुहब्बत का वह दीवाना आज कुल इक्यासी साल का हो गया है. पिछले पैंतालीस सालों से वह पैंतीस साल का है और अगले हजारों-लाखों सालों तक वह इसी उम्र का रहेगा.

सात आसमानों के ऊपर उड़ता हुआ, इन्द्रधनुष से अटखेली करने वाले उस यार को किसी की तलाश थी शायद. यह तलाश उस कुड़ी की थी, जिसका नाम मुहब्बत था. जिस मुहब्बत से वह बड़े प्यार से इसरार किया करता,

“आज दिन चढ्या तेरे रंग वरगा, तेरे चुम्मन पिछली रंग वरगा.’

जब मुहब्बत अपना रास्ता बदल कर चल लेती तो कभी वह सुबह की धूप में प्रेम की चाह को तड़पते हुए लिख देता ,

“है किरना विच नशा जिहा, किसी चिम्बे सांप दे डंग वरगा’.

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शिव कुमार बटालवी महज़ किसी पंजाबी कवि का नाम नहीं है. यह उस सुल्तान की पहचान है जिसके पास उसके हर भाव के लिए एक गीत था, और अपने लिखी हर इबारत से आगे बढ़कर कुछ उससे भी ख़ूबसूरत लिख देने की कला भी.

पंजाब के किसी सुदूर गाँव में पैदा हुआ वह दीवाना भरपूर प्यार करना जानता था, और हर बार प्यार से आगे बढ़ जाना भी. वह अपने गुम प्यार को याद करते हुए उसके हाल में पैदा हुए पहले बच्चे के बारे में सोचता है और लिख बैठता है,

“तीझा ओजा रंग गुलाबी, हो किसे गोरी माँ दा जाया.”

वह अपने दर्द को शब्दों में उकेरता है, उन शब्दों को अपनी धुन और अपने भाव देता है मगर अपनी यात्रा ज़ारी रखता है, नीड़-विहीन बाज़ की तरह, इसलिए जब पत्रकार का सवाल उनकी ओर आता है कि आपकी भूतपूर्व प्रेमिका दूसरी बार माँ बनीं हैं, आपने इस बार क्या लिखा तो वह हँस देते हैं और कहते हैं कि “क्या मैंने तय किया है कि हर बार जब उसे बच्चा हो, मैं कुछ लिखूँ.”

ये बोल उसी शख्स के थे जिसने  पहली प्रेमिका मैना की मौत पर ‘मैना’ गीत रच दिया था.

यही तो खूबसूरती थी उस कवि की. वह हमेशा यात्रा में होता था, ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पर जीता हुआ, अपनी खुशियों को अपनी तरह से तलाशता हुआ. उसकी यात्रा मैना से शुरू हुई, अरुणा तक गयी और अपने हर पड़ाव को उसने अपने हर्फों के ज़रिये अमर कर दिया.

वह अपनी इस यात्रा में अकेला नहीं था. शराबनोशी की उसकी आदत उसके साथ थी. वह शराब से लगभग उतना ही इश्क़ करता था जितनी मुहब्बत गुम कुड़ी से की थी. शराब बुरी आदत होगी, शिकरे यार की बला से. उसने तो दिन-दहाड़े कहा –

मैनु तेरा शबाब ले बैठा,
रगं गौरा गुलाब ले बैठा,

किन्नी- बीती ते किन्नी बाकी है,
मैनु एहो हिसाब ले बैठा,

मैनु जद वी तूसी तो याद आये,
दिन दिहादे शराब ले बैठा,

चन्गा हुन्दा सवाल ना करदा,
मैनु तेरा जवाब ले बैठा,

सोने वरगा रंग वाले उस कवि को आज भले ही सबसे कम उम्र के साहित्य अकादमी पुरस्कार  विजेता के नाम से जाना जाता है मगर लोक का वह कवि अपने गीत सालों तक सजाकर नहीं रखना चाहता था, वह बस पंछी हो जाना चाहता था. वह कहता है कि,

ऐ मेरा गीत किसे ना गाना, ऐ मेरा गीत किसे ना गाना,
ऐ मेरा गीत मैं अपे गाके पलके ही मर जाना

कितनी अजीब बात है कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोग उसके इसी गीत को गाते हुए पंछी हो जाना चाहते हैं, जिसके ज़रिये उसने अपना लिखा भुला दिए जाने की गुज़ारिश की थी.

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