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हिंदी साहित्य के प्रारंभिक इतिहास : एक तुलनात्मक अध्ययन

योगेश प्रताप शेखर दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं. प्रखर और मुखर वैचारिकता के साथ लिखते हैं. उनका यह लेख ‘तद्भव 37’ में प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने हिंदी साहित्य के आरंभिक इतिहास-लेखन के पीछे की राजनीति को टटोलने का प्रयास किया है. लेख बहुत रोचक शैली में लिखा गया है और विचारोत्तेजक भी है. आप भी पढ़िए. हिंदी साहित्य की आरंभिक राजनीति के बारे में बहुत सी जानकारियाँ हैं- मॉडरेटर

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    यह विचित्र किंतु सच है कि हिंदी साहित्य का पहला इतिहास एक फ्रांसीसी व्यक्ति गार्सा द तासी द्वारा फ्रांसीसी भाषा में लिखा गया | इस विचित्र सच की प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाना जरूरी है | क्या इस सच का एक सिरा भारत जैसे देशों में इतिहास की अवधारणा से तो दूसरा सिरा उपनिवेशवाद से नहीं जुड़ता ? आखिर क्या वजह रही होगी कि एक व्यक्ति जो कभी भारत नहीं आया वह भारत की भाषाओं के साहित्य का इतिहास लिखे ? वह भी पेरिस में रह कर !  गार्सा द तासी ने ‘इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐंदूई ऐ ऐंदूस्तानी’ किताब लिखी जो पहली बार दो भागों में क्रमश: 1839 ई. और 1847 ई. में प्रकाशित हुई | इस किताब का परिवर्धित संस्करण तीन भागों में 1871 ई. में छपा था | इस किताब पर विचार करने से पहले यूरोप खासकर अंग्रेजों की भारतीय भाषाओं और साहित्य में रुचि का जायजा लेना ठीक होगा |

     दरअसल वारेन हेस्टिंग्स(भारत में गवर्नर जनरल के रूप में 1772 ई. से 1785 ई. तक) के जमाने से भारत के अतीत के प्रति अंग्रेजों की दिलचस्पी शुरू हुई | ऐसा इसलिए था कि अंग्रेजों को यह लग रहा था कि बिना भारत को जाने यहाँ शासन करना संभव नहीं | इसी उद्देश्य ने इस पूरी परियोजना, जिसे ‘प्राच्यवाद( ORIENTALISM)’ कहा जाता है, को संचालित किया | चूँकि इस का उद्देश्य ही शासन की प्रभुता और नियंत्रण1 से जुड़ा था इसलिए इस परियोजना में उन्हीं बातों पर ध्यान दिया गया | पर ऐसा नहीं था कि यूरोप की भारत में रुचि की यह पहली स्थिति थी | आखिर कोलंबस और वास्कोडिगामा की भारत को खोजने की प्रक्रिया इस से पुरानी ही है | भारतीय भाषाओं और साहित्य में यूरोप की दिलचस्पी का इतिहास भी पुराना है | इटली के पादरी रॉबर्टो दि ऑबिलि ( Jesuit Roberto Di Obilii ) पहले यूरोपीय थे जिन्होंने संस्कृत पर अधिकार किया |2  यहाँ तक कि वे ब्राह्मणों की वेश-भूषा में भारत में रहते थे |3 ठीक इसी प्रकार फादर थॉमस स्टीवेंस( Father Thomas Stevens ) पहले अंग्रेज थे जो 1579 ई. में भारत में गोवा में आए | वे तीस साल यहाँ रहे | उन्होंने पुर्तगाली भाषा में कोंकणी का व्याकरण लिखा जो किसी भी भारतीय भाषा का किसी भी यूरोपीय जबान में लिखा पहला व्याकरण है |4  फादर पॉलिनस(Father Paulinus) 1774 ई. में भारत आए और 14 साल रहे | उन्होंने 1790 ई. और 1804 ई. में संस्कृत व्याकरण लिखे जो रोम में प्रकाशित हुए | फादर पॉलिनस ने संस्कृत के प्रसिद्ध कोश ‘अमरकोष’ का अनुवाद लैटिन में किया | इन्होंने पूरे यूरोप का ध्यान संस्कृत और भारतीय भाषाओं की तरफ खींचा |5  इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय भाषा और साहित्य में यूरोप की रुचि बहुत पहले से चली आ रही थी |

     25 सितंबर 1783 ई. को विलियम जोन्स(1746 – 1794 ई.) नामक एक अंग्रेज कनिष्ठ न्यायाधीश( Pusine Judge Of The Supreme Court Of Judicature At Fort William In Bengal) के रूप में सालाना छह हजार पाउंड के वेतन6 पर कलकत्ता ( अब कोलकाता ) आए | विलियम जोन्स ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पढ़े-लिखे थे | कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही विलियम जोन्स की रुचि भारतीय और एशियाई भाषाओं में हो गई थी | विलियम जोन्स सही मायने में एक बहुभाषाविद थे | वे लगभग 28 भाषाएँ जानते थे | वे जब ‘क्रोकोडाइल(Crocodile)’  युद्ध-पोत से भारत आने की यात्रा कर रहे थे तब उन्होंने 12 जुलाई 1783 ई. को भारत आकर किए जाने वाले कामों की एक सूची बनाई | उन में एक काम एशियाई संगीत, कविता, वक्तृत्व और नैतिकता( Asiatic Music, Poetry, Rhetoric And Morality) की जानकारी एकत्र करना भी था |7 विलियम जोन्स के प्रयासों से 15 जनवरी 1784 ई. को ‘एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल’ की स्थापना हुई | सर रॉबर्ट चैंबर्स( Sir Robert Chambers) तीस सदस्यों की इस बैठक के अध्यक्ष थे | इस बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि ‘एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल’ के अध्यक्ष गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स हों | पर वारेन हेस्टिंग्स ने अपनी व्यस्तता की वजह से इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया | 5 फरवरी 1784 ई. को सदस्यों की फिर एक बैठक बुलाई गई जिस में वारेन हेस्टिंग्स की उक्त चिट्ठी पढ़ी गई और विलियम जोन्स को ‘सोसायटी’ का अध्यक्ष बनाया गया | यहाँ से बाकायदा भारत के अतीत की खोज शुरू होती है |

     विलियम जोन्स ने संस्कृत,लैटिन, ग्रीक, गॉथिक, केल्टिक और पुरानी फारसी भाषाओं को एक ही परिवार के होने की बात की | इस भाषा परिवार का नाम ‘भारोपीय भाषा परिवार’ रखा गया | इस के पीछे यह सिद्धांत काम कर रहा था कि दुनिया की सबसे महत्त्वपूर्ण नस्ल आर्यों की रही है और जिस की प्राचीनता भारत और एशिया में भी खोजी जा सकती है | विलियम जोन्स ने 2 फरवरी 1786 ई. को एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल की तीसरी वर्षगाँठ पर एक व्याख्यान कलकत्ता में दिया था | उसी व्याख्यान में उन्होंने इन भाषाओं के शब्दों की तुलना कर यह सिद्ध करने की कोशिश की थी कि ये भाषाएँ एक ही परिवार की हैं |8  हालाँकि यह भी ध्यान देने की बात है कि विलियम जोन्स के कलकत्ता आने से पहले भी भारतीय भाषाओं के साहित्य और व्याकरण का अध्ययन किया गया था | उदाहरण के लिए गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के करीबी नैथेनियल हॉलहेड(Nathaniel Halhed) ने 1778 ई. में बँगला भाषा का व्याकरण लिखा था | फ्रांसिस ग्लैडविन( Francis Gladwin) ने अंग्रेजी-फारसी शब्दकोश का निर्माण किया था जो मालदा से 1780 ई. में छपा था | ग्लैडविन एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल के संस्थापक सदस्यों में से एक थे | इन्होंने अबुल फज़ल की प्रसिद्ध किताब ‘आईन-ए-अकबरी’ का अनुवाद अंग्रेजी में दो भागों में किया था | एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल के एक दूसरे संस्थापक सदस्य चार्ल्स विलकिन्स( Charles Wilkins) ने गीता का अंग्रेजी में अनुवाद 1785 ई. में किया था | चार्ल्स विलकिन्स के दौर से ही पश्चिम ने भारत और इस की संस्कृति को महत्त्व देना शुरू किया | ओ. पी. केजरीवाल ने अपनी किताब ‘द एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल एंड द डिस्कवरी ऑफ इंडियाज पास्ट ( The Asiatic Society Of Bengal And The Discovery Of India’s Past)’  में यह बताया है कि पश्चिमी दुनिया की भारत में रुचि के तीन चरण हैं | पहला चरण जिस में बल भारत की विचित्रता और रहस्यमयता पर था | दूसरा चरण जिस में भारत को समझने में केवल कुछ निहित स्वार्थ शामिल थे | तीसरे चरण में भारत से कुछ सीखने के लिए भारत को जाना-समझा जाने लगा | इसी बीच विलियम जोन्स ने कालिदास के नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ का अपने द्वारा किए गए अनुवाद को  8 अक्टूबर 1789 ई. को प्रकाशित कराया | इस अनुवाद की समीक्षा प्रसिद्ध नारीवादी चिंतक मेरी वोल्सटनक्राफ्ट( Mary Wollstonecraft ) ने 1790 ई. में की | इस समीक्षा में उन्होंने ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ में व्याप्त सुकुमारता, सुरुचि की परिष्कृति और पवित्र नैतिकता को रेखांकित किया जिसे विलियम जोन्स हिंदू संस्कृति की प्रस्तुति में उभारना चाहते थे |9 इस ‘पवित्र नैतिकता’ को भी रेखांकित किया जाना चाहिए क्योंकि इस ने आधुनिक हिंदी साहित्य और मध्यकालीन हिंदी साहित्य के संबंध को प्रभावित किया | इसी नैतिकताबोध के कारण हिंदी के रीतिकाल का साहित्य उपेक्षित रहा |  यह सूचना भी रोचक है कि माइकल जे. फ्रैंकलिन ( Michael J. Franklin ) ने विलियम जोन्स पर लिखी अपनी किताब ‘ओरियंटलिस्ट जोन्स ( Orientalist Jones)’ में ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के इस अनुवाद को महत्त्व देते हुए अध्याय का शीर्षक ही रखा है – यूरोप फाल्स इन लव विद शकुंतला ( Europe Falls In Love With Sakuntala) |  विलियम जोन्स ने इस से पहले फारसी का व्याकरण 1771 ई. में लिखा था जिस का फ्रांसीसी में अनुवाद गार्सा द तासी ने किया था | 1845 ई. में इस अनुवाद का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ था |

     1798 ई. में लॉर्ड वेलेजली भारत के गवर्नर जनरल बने | उन्हें यह बात शिद्दत से महसूस हुई कि कर्मचारियों की शिक्षा, योग्यता और अनुशासन का कोई प्रबंध नहीं है | बहुत कम आयु में ही इंगलैंड से कर्मचारी भारत भेज दिए जाते थे | भारत आने पर उन्हें ऐसे देश के शासन में व्यस्त कर दिया जाता था जहाँ की भाषिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से वे बिलकुल ही अपरिचित रहते थे | इसलिए अंग्रेज कर्मचारियों की शिक्षा के लिए एक कॉलेज खोलने का निर्णय लिया गया | लॉर्ड वेलेजली से पहले 1783 ई. में जॉन बौर्थविक गिलक्राइस्ट ( 1759 – 1841 ई. ) ईस्ट इंडिया कंपनी में सहायक सर्जन हो कर भारत आए |  यों तो राजनीतिक कारणों से कंपनी 1837 ई. तक फारसी का इस्तेमाल राज-काज के लिए करती रही | पर गिलक्राइस्ट को लगा कि अब देश की परिस्थिति बदल गई है और फारसी का प्रचलन घट गया है | दिल्ली के दरबार में भी फारसी का प्रयोग कम गया था और उस की जगह हिंदुस्तानी का प्रचलन हो गया था | इस कारण उन्होंने हिन्दुस्तानी सीखना शुरू कर दिया | इतना ही नहीं 4 जून 1787 ई. को उन्होंने कलकत्ते के  तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस को एक चिट्ठी लिखी | इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि “ इन पिछले तीन वर्ष से मैं जिस ग्रंथ ( इंग्लिश—हिंदुस्तानी डिक्शनरी) की रचना करने में लगा हुआ था उस के प्रथम भाग की पांडुलिपि समाप्त हो गई है | आप की आज्ञा से अब मैं दूसरे और तीसरे भागों की रचना करना चाहता हूँ | … अपने अध्ययन की सुविधा और कार्य में सहायता मिलने की दृष्टि से मैं श्रीमान् से बनारस की जमींदारी में, और आवश्यकता हुई तो सूबा अवध में, जाने की आज्ञा चाहता हूँ | मुझे पूर्ण आशा है कि सरकार की जैसी कृपा-दृष्टि अब तक मुझ पर बनी रही है वैसी ही इस कार्य के समाप्त होने तक बनी रहेगी | इससे न केवल मुझे वरन् साधारण रूप से सब को लाभ पहुँचेगा | इस देश में इतने बड़े ग्रंथ की छपाई में व्यय अधिक होने की आशंका से आर्थिक लाभ होने की कम संभावना है | इसलिए साथ ही मैं श्रीमान् से यह प्रार्थना करने का लोभ संवरण नहीं कर सकता कि मुझे वहाँ नील की खेती करने की आज्ञा दी जाए |  वेस्टइंडीज में कुछ वर्ष रहने से मैं यह काम अच्छी तरह जानता हूँ और पूर्ण आशा है कि मैं अपना पारिश्रमिक उससे निकाल लूँगा; विशेष रूप से यदि सौभाग्यवश श्रीमान् की यह सम्मति हो कि इस देश में नील की खेती से ऑनरेबुल कंपनी को अंत में अत्यधिक लाभ पहुँचेगा | मैं मन, वचन और कर्म से वर्तमान शासन की दीर्घायु और अपने ऊपर उसकी छाया की सदैव कामना करता रहूँगा | अब मैं अत्यंत विनम्रता के साथ यह प्रार्थना करने का साहस करता हूँ और आशा करता हूँ कि श्रीमान् और बोर्ड इसे स्वीकार करेंगे |” 10  बाद में गिलक्राइस्ट ने अफीम की खेती भी करने लगे | इस से यह पता चलता है कि उपनिवेशवादी दौर में ज्ञान और संसाधनों पर किस प्रकार वर्चस्व कायम किया जा रहा था | नील और अफीम की खेती ने भारत की पारंपरिक खेती की रीढ़ ही तोड़ दी थी | गिलक्राइस्ट धीरे-धीरे अपनी परियोजना में आगे बढ़ते हुए हिंदुस्तानी को कंपनी के लिए फायदेमंद सिद्ध कर पाए |

     लॉर्ड वेलेजली ने गिलक्राइस्ट के प्रयासों की सराहना की और यह व्यवस्था की कि कर्मचारी भारत आएँ तो साल भर गिलक्राइस्ट के पास हिंदुस्तानी और फारसी सीखें | कलकत्ते के राइटर्स बिल्डिंग का एक कमरा भी इस काम के लिए गिलक्राइस्ट को दे दिया गया | लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने अपनी किताब ‘फोर्ट विलियम कॉलेज’ में यह बताया है कि वेलेजली ने 21 दिसंबर 1798 ई. को एक सरकारी सूचना निकाली जिस के अनुसार बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की सफलता के लिए यह जरूरी है कि आगे उत्तरदायित्व के पदों पर वैसे ही लोग नियुक्त हों जिन्हें देश की एक या उस से अधिक भाषाएँ आती हों | इतना ही नहीं अलग-अलग जगहों पर न्याय, माल और व्यापार विभागों के लिए अलग-अलग भाषाओं का ज्ञान जरूरी समझा गया | जैसे, बंगाल, बिहार, उड़ीसा या बनारस में न्याय-विभाग के अफसरों के लिए हिंदुस्तानी और फारसी भाषाएँ, बंगाल या उड़ीसा प्रांत के मालगुजारी इकट्ठा करनेवालों कलक्टरों, या चुंगी के या व्यापार के, या नमक के एजेंटों के लिए बँगला भाषा और बनारस या बिहार प्रांत में मालगुजारी इकट्ठा करनेवालों कलक्टरों, या चुंगी के या व्यापार के, या अफीम के एजेंटों के लिए हिंदुस्तानी भाषा |11  जाहिर है कि ऐसी परिस्थिति में बड़े पैमाने पर भारतीय भाषाओं को सिखाने की व्यवस्था करनी पड़ती | इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर वेलेजली ने एक कॉलेज खोलने का निर्णय कर लिया |

     फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना 1800 ई. में हुई | इस की स्थापना में ईस्ट इंडिया कंपनी के हितों और यश के संरक्षण का भाव छुपा था | जूनियर सिविल कर्मचारियों को ब्रिटिश राज्य के सुशासन के लिए साहित्य, विज्ञान और ज्ञान की उचित शिक्षा के लिए इस कॉलेज की स्थापना हुई | इस में हिंदुस्तानी भाषा विभाग भी स्थापित किया गया जिस के अध्यक्ष गिलक्राइस्ट थे | यहाँ एक बात स्मरणीय है कि भले भारत या पूर्वी ज्ञान की जानकारी देना कॉलेज का उद्देश्य था पर कर्मचारियों और प्रोफेसरों को ईसाइयत तथा ब्रिटिश संविधान के प्रति निष्ठावान बने रहने की कसम भी खानी पड़ती थी | ईसाई धर्म, इंगलैंड के चर्च, ब्रिटिश संविधान और कॉलेज के परिनियमों के खिलाफ निजी या सामाजिक तौर पर विरोध नहीं करने की शर्त भी उक्त कसम में शामिल थी |12  इस कॉलेज से ही हिंदी और उर्दू का विवाद भी शुरू हुआ | कहीं-न-कहीं यहीं से यह बात निकली कि हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू या हिंदुस्तानी मुसलमानों की भाषा है |13 यही कारण है कि इन दोनों भाषाओं में अलग-अलग पाठ्य-पुस्तकें तैयार कराई गईं | इन पुस्तकों के निर्माताओं को ‘मुंशी’ या ‘पंडित’ कहा गया | उदाहरण के लिए ‘भाखा मुंशी’ के रूप में लल्लूलाल की नियुक्ति हुई तो मीर अम्मन को उर्दू में किताबें तैयार करने को कहा गया | इस से पहले दो भाषाओं की बात नहीं थी |  और न ही यह था कि हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की | यहीं से उर्दू गद्य और खड़ी बोली हिंदी गद्य की शुरुआत होती है | हिंदी और उर्दू के बीच यह भेद किस प्रकार पैदा हुआ और इस की क्या जटिलताएँ रहीं इसे पाकिस्तान के प्रोफेसर तारिक़ रहमान (Tariq Rahman) की महत्त्वपूर्ण किताब ‘फ्रॉम हिंदी टू उर्दू अ सोशल एंड पॉलिटिकल हिस्ट्री   ( From Hindi To Urdu A Social And Political History) में विस्तार से देखा जा सकता है | प्रोफेसर तारिक़ ने यह लक्षित किया है कि किस प्रकार इन दोनों भाषाओं की पहचान बनाई गई ? किस तरह से इन दोनों भाषाओं के मानक तय किए गए ? इसी से एक सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत भी भारत में हुई |14

     उपर्युक्त संक्षिप्त विवरण से यह स्पष्ट हो गया होगा कि गार्सा द तासी के ‘इतिहास-लेखन’ के पहले की परिस्थितियाँ क्या थीं ? इन परिस्थितियों का असर गार्सा द तासी के लेखन पर दिखता है | गार्सा द तासी ( 1794 – 1878 ई.) का पूरा नाम जाजेफ एलीदोर साजेस्स वैर्त्यू गार्सा द तासी था | गार्सा उन के पिता का और तासी उन की माँ का उपनाम था | बीस साल की उम्र में उन्होंने बोलचाल की अरबी एक मिस्रदेशीय गैबराइल और रैफलद मोनाची से सीख ली |15 बाद में फारसी और तुर्की भी पढ़ी | वे 1817 ई. में पेरिस आते हैं और प्रसिद्ध ‘प्राच्यविद’(Orientalist) सिलवेत्र द सेसी      ( Silvestre De Sacy) के निर्देशन में अरबी, फारसी और तुर्की पढ़ते हैं | 1822 ई. में पेरिस में ‘सोसायती एशियातिक’ की स्थापना भी होती है और वहीं से एक पत्रिका ‘जर्नल एशियातिक’(Journal Asiatique)  भी निकलनी शुरू होती है | तासी इस संस्था के संस्थापक सदस्य बनते हैं और फिर सहायक सचिव और पुस्तकालयाध्यक्ष भी | बहुत बाद में यानी 1876 ई. में तासी इस के अध्यक्ष (President) भी बनते हैं | 1822 ई. में ही तासी ‘कॉलेज डे फ्रांस’ में  अपने गुरु सिलवेत्र द सेसी के कार्यालय में सचिव की हैसियत से काम करने लगे | सिलवेत्र द सेसी ने उन्हें हिंदुस्तानी सीखने के लिए प्रेरित किया | हिंदुस्तानी यूरोप में उर्दू का एक दूसरा नाम था |16  तासी ने अपने गुरु की सलाह मानकर स्वाध्याय कर यह भाषा सीख ली | सिलवेत्र द सेसी हिंदुस्तानी के महत्त्व से परिचित थे इसलिए उन्होंने तासी के काम को सुचारु रूप से चलाने के लिए फ्रांसीसी सरकार को एक याचिका दी जिस में यह माँग की गई थी कि फ्रांस में हिंदुस्तानी पढ़ाने के लिए एक ‘चेयर’ की स्थापना हो | पर पी. एल. डु. चौमे ( P. L. Du. Chaume) नामक एक व्यक्ति ने इस का विरोध किया | 1828 ई. में उन्होंने एक पत्र एक पत्रिका के संपादक को लिखा | इसे उन्होंने अलग से ‘पम्फलेट ( Pamphlet)’ के रूप में भी वितरित किया था | इस में उन्होंने ‘हिंदुस्तानी’ नाम पर ही आपत्ति दर्ज की थी | उन का कहना था कि ‘हिंदुस्तानी’ का मतलब ‘हिंदुस्तान की भाषाएँ’ होता है | उन्होंने तीन प्रकार की ‘हिंदुस्तानी’ की चर्चा की | पहले को उन्होंने ‘हिंदी’, ‘उर्दू जबान’ और ‘रेख्ता’ कहा जो ‘अरबी अक्षरों’ ( Arabi Character) में लिखी जाती है | दूसरी को उन्होंने ‘हिंदवी’ कहा जो नागरी अक्षरों में लिखी जाती है और जिस में अरबी-फारसी के बदले भारतीय शब्दों का इस्तेमाल होता है | तीसरी को उन्होंने ‘मूर और मौर’ कहा जो यूरोपियों के द्वारा बंबई ( अब मुंबई ) एवं कलकत्ता (अब कोलकाता ) में अपने नौकरों को समझाने के लिए बोली जाती है | चौमे ने अत्यंत सरलीकरण करते हुए हिंदवी के साहित्य को संस्कृत साहित्य का अनुवाद और हिंदुस्तानी के साहित्य को अरबी-फारसी के साहित्य का अनुवाद बताया |17  उन्होंने भी हिंदुस्तानी को मुसलमानों की भाषा करार दिया | उन्होंने एक और तर्क प्रस्तुत किया कि ब्रिटिश लोगों ने इसे इसलिए सीखा कि उन के प्रशासनिक कर्मचारी ज्यादातर मुसलमान थे | इन सब तर्कों के बाद भी 29 मई 1828 ई. को हिंदुस्तानी का ‘चेयर’ बना और गार्सा द तासी उस के पहले पदाधिकारी नियुक्त हुए |

     1829 ई. में तासी ने Rudimens de la Langue Hindoustanie लिखा | यह हिंदुस्तानी का व्याकरण था | उनके कोर्स को काफी लोकप्रियता मिली और 1830 ई. में उन का पद स्थायी कर दिया गया | यहाँ हिंदुस्तानी का अर्थ उर्दू है क्योंकि बाद में उन्होंने हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में रुचि ली | उन का यह ‘चेयर’ भी उर्दू के लिए ही बना था | 1847 ई. में तासी ने  Rudimens de la Langue Hindouie लिखा जो हिंदी का व्याकरण था | इन सब के साथ-साथ तासी 1850 ई. से 1877 ई. तक ( बीच में 1857 ई. में विद्रोह के कारण एक साल छोड़कर ) लगातार हर साल उर्दू भाषा और साहित्य पर व्याख्यान देते रहे | इस में साल भर में उर्दू भाषा और साहित्य की हुई प्रगति का जायजा और महत्त्वपूर्ण साहित्यिकों की मृत्यु का समाचार रहता था | लगभग 100 पृष्ठों का एक भाषण होता था | यह प्राय: शोध-आलेख के रूप में लिखा होता था |

     गार्सा द तासी का ‘इतिहास’  ‘इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐंदूई ऐ ऐंदूस्तानी’ ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड की कमिटी ऑफ ओरियंटल ट्रांसलेशंस की सहायता से प्रकाशित हुआ था | 1828 ई. में लंदन में ओरियंटल ट्रांसलेशंस फंड की स्थापना हुई थी | इसी फंड से इस किताब के प्रकाशन में सहायता मिली | इस की छपाई पेरिस के सरकारी प्रेस में हुई थी | यद्यपि इस कमिटी के नियम इस के प्रकाशन के अनुकूल नहीं थे पर सर गोर आउजले ने इन नियमों के बावजूद इसका प्रकाशन कराया |18  यही कारण है कि पेरिस में लिखे जाने के बाद भी यह ग्रंथ इंगलैंड की महारानी विक्टोरिया को समर्पित है | महारानी विक्टोरिया की खुद दिलचस्पी हिंदुस्तानी में थी | बाद में उन्होंने अपने लिए मुंशी अब्दुल करीम को भारतीय शिक्षक के रूप में नियुक्त किया था | तासी इस समर्पण में लिखते हैं  :

                                  ग्रेट ब्रिटेन की सम्राज्ञी को

देवि,

यह नितांत स्वाभाविक ही है कि मैं सम्राज्ञी से एक ऐसा ग्रंथ समर्पित करने का सम्मान प्राप्त करने की प्रार्थना करूँ जिसका संबंध भारतवर्ष, आपके राजदंड के अंतर्गत आए हुए इस विस्तृत और सुंदर देश, और जो इतना खुशहाल कभी नहीं था जितना कि वह इंगलैंड के आश्रित होने पर है, के साहित्य के एक भाग से है | यह तथ्य सर्वमान्य है; और, इसके अतिरिक्त, हिंदुस्तानी-लेखक इस बात का प्रमाण देते हैं : जिस ब्रिटिश शासन के अंतर्गत न तो लूट का भय है और न ही देशी सरकारों का अत्याचार है, उसका उनकी रचनाओं में यश-गान हुआ है |

हिन्दुस्तान के प्राचीन शासकों में, एक महिला ही थी जिसने अपने व्यक्तिगत गुणों के कारण ही संभवत: अत्यधिक ख्याति प्राप्त कर ली थी | कृपालु सम्राज्ञी की भाँति गुणों से विभूषित राजकुमारी के मंगल सिंहासनारूढ़ होने का समाचार सुनकर, देशवासियों को अपनी प्रिय सुल्ताना रज़िया का स्मरण करना पड़ा | वास्तव में, विक्टोरिया रानी में उन्होंने रज़िया का तारुण्य और उसके अलभ्य गुण फिर पाए हैं; और केवल यही बात उनका उस देश के साथ संबंध और भी दृढ़ बना सकती है जिसके उनका अधीन होना ईश्वरेच्छा थी |

     मैं हूँ, अत्यधिक आदर सहित,

     देवि,

     सम्राज्ञी,

     अत्यंत तुच्छ और अत्यंत आज्ञाकारी दास,

     पेरिस, 15 अप्रैल 1839                                                                  गार्सा द तासी19  

     तासी के इस समर्पण का विश्लेषण किया जाए तो यह पता चलता है कि वे औपनिवेशिक मानसिकता से बहुत गहराई तक प्रभावित थे | उन का यह कहना कि भारत इंगलैंड के आश्रित होने के पहले कभी उतना खुशहाल नहीं था, आज सही नहीं लगता है | एक-दो तथ्य ही पर्याप्त होंगे | अंग्रेजी राज में भारत को ज्ञान, इतिहास, शासन-व्यवस्था के पैमाने पर सदा हीन साबित करने का प्रयास होता रहा | संसाधनों पर कब्जा जमाने की कोशिशें बढ़ती गईं | देश के उद्योग और शिल्प को नष्ट किया गया | इतना ही नहीं देश को केवल खेती पर निर्भर बनाने का प्रयास किया जाने लगा | तासी के ‘इतिहास’ के प्रकाशन के एक साल बाद यानी 1840 ई. में माटगोमरी मार्टिन ने संसदीय जाँच समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत की | इस में उन्होंने कहा था कि “ मैं यह नहीं मानता कि भारत एक कृषि प्रधान देश है | भारत जितना कृषि प्रधान देश है, उतना उद्योग प्रधान भी है, और जो उसे कृषि प्रधान देश की स्थिति तक लाना चाहते हैं, वे सभ्यता के पैमाने पर उसका स्थान नीचे लाने की कोशिश करते हैं |”20  अंग्रेजों के शासन के पहले पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत की थी और अंग्रेजों के जाने के बाद यह मात्र 3 प्रतिशत रह गई |21 इसी तरह यह बात भी  समझ में नहीं आती कि 1839 ई. में हिंदी या उर्दू के ऐसे कौन-से लेखक थे जो अपनी रचनाओं में ब्रिटिश शासन का गुणगान कर रहे थे | हिंदी में कालक्रम के अनुसार उस समय ‘रीतिकाल’ चल रहा था | उस के अंतिम दौर के कवि पद्माकर( 1753 – 1833 ई.) का एक छंद मिलता है जिस में ग्वालियर के राजा दौलतराव सिंधिया से ‘फिरंगियों’ को भगाने का निवेदन या कहना चाहिए ललकार है | पद्माकर लिखते हैं :

     मीनागढ़ मुंबई सुमंद करि मंदराज बंदर कों बंद करि बंदर बसावैगो |

     कहै पद्माकर कटाकै कासमीरहू को पिंजर सो घेरिकै कलिंजर छुड़ावैगो |

     बाँका नृप दौलत अलीजा महाराज कबौं साजि दल दपटि फिरंगिन दबावैगो |

     दिल्ली दहपट्टि, पटनाहू कों झपट्टि करि कबहुँक लत्ता कलकत्ता को उड़ावैगो |22

ठीक इसी प्रकार उर्दू साहित्य में भी अंग्रेजी राज की तारीफ़ में उस समय कुछ भी नहीं मिलता | तासी एक बात और कहते हैं कि भारत की गुलामी ईश्वर की इच्छा थी | इस से यह भी ध्वनित होता है कि वे भारत में प्रचलित नियतिवाद  ( जिस के अनुसार सब कुछ पहले से तय होता है | संसार में जो भी घटित होता है वह ईश्वर की इच्छा का परिणाम      है | ) का सहारा अंग्रेजी राज को मजबूत करने में ले रहे हैं |  अपने-आप को वे महारानी विक्टोरिया का अत्यंत तुच्छ एवं आज्ञाकारी दास कहते हैं | इस से उनकी राजभक्ति साफ-साफ दिखाई पड़ रही है | राजभक्ति का यह रूप गिलक्राइस्ट द्वारा लॉर्ड कार्नवालिस को लिखे पत्र, जिस की चर्चा ऊपर आई है, में भी दिखता है |  इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक शासन में सत्ता को बरकरार रखने की कोशिश ज्ञान की पूरी प्रक्रिया में रही है | अतः यह कहा जा सकता है कि तासी के ‘इतिहास’ का यह समर्पण औपनिवेशिक मानसिकता से न केवल ग्रस्त है बल्कि उसे पुष्ट करने की भी कोशिश कर रहा है |

     तासी के ‘इतिहास’ में एक विचारणीय बात यह दिखती है कि उन्होंने ‘हिंदी’, ‘हिंदुई’ और ‘हिंदुस्तानी’ में अंतर किया है | प्रथम संस्करण ( 1839 ई. ) की पहली जिल्द की भूमिका में वे लिखते हैं कि “ भारत के प्राचीन साम्राज्य में जिसका विकास हुआ उसे सामान्यत: ‘भाषा’ या ‘भाखा’ और विशेषत: ‘हिंदवी’ या ‘हिंदुई’ ( हिंदुओं की भाषा – langue de Hindous23 ) के नाम से पुकारा जाता है |”24 तासी भी इसी मान्यता को मानते हैं कि हिंदुस्तानी लिखने के लिए फारसी अक्षरों का प्रयोग किया जाता है और हिंदू लोग अपने पूर्वजों की तरह देवनागरी अक्षरों का इस्तेमाल करते हैं | वे दूसरे संस्करण की पहली जिल्द की भूमिका में अपनी इस धारणा को और पुष्ट करते हैं | वे लिखते हैं कि “ यद्यपि शब्दों के चुनाव में हिंदी और उर्दू एक दूसरे से भिन्न हैं, वे वास्तव में, उचित बात तो यह है कि अपनी-अपनी वाक्य रचना-पद्धति के अंतर्गत आंशिक दृष्टि से विभिन्न तत्त्वों से निर्मित, एक ही भाषा हैं, भाषा जिसे यूरोपियनों ने सामान्य नाम ‘हिंदुस्तानी’ दिया है, जिसके अंतर्गत वे हिंदुई और हिंदी, उर्दू और दक्खिनी को शामिल करते हैं; किंतु यह नाम भारतवासियों ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वे देवनागरी, या अधिकतर नागरी में लिखित हिंदू बोली को ‘हिंदी’ शब्द से, और फारसी अक्षरों में लिखित, मुसलमानी बोली को, ‘उर्दू’ नाम से अलग-अलग करना अधिक पसंद करते हैं | अब तो स्वयं यूरोपियन बड़ी खुशी से इन दो नामों का प्रयोग करते हैं |”25 इसी भूमिका में तासी आगे लिखते हैं कि “ 1831 में, लोगों के हित के लिए, विभिन्न प्रांतों की सामान्य भाषाओं को स्थान दिया, और स्वभावतः उर्दू उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम प्रांतों के लिए अपना ली गई | यह सुंदर कार्य सबको पसंद आया, और अगले तीस वर्षों तक इस व्यवस्था को पूर्ण सफलता मिली है तथा कोई शिकायत सुनने में नहीं आई; किंतु इन पिछले वर्षों में भारत में प्राचीन जातियों से संबंधित वही आंदोलन उठ खड़ा हुआ है जिसने यूरोप को आंदोलित कर रखा है, अब मुसलमानों के अधीन न होने के कारण हिंदुओं में एक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो गई है, अपने हाथ में शक्ति न ले सकने के बाद, वे कम-से-कम मुसलमानों की दासता के समय की अरुचिकर बातें दूर कर देना और स्वयं उर्दू को ही अवरुद्ध कर देना चाहते हैं, अथवा केवल उचित रूप में रखते हुए फ़ारसी अक्षरों को जिसमें वह लिखी जाती है, जिन्हें वे मुसलमानों की छाप समझते हैं | अपनी इस प्रतिक्रियावादी अजीब बात के पक्ष में वे जो तर्क प्रस्तुत करते हैं वे बिल्कुल स्वीकार करने के योग्य नहीं हैं | बिना इस बात की ओर ध्यान दिए हुए कि जब कि हिंदी जिसे वे राष्ट्रीयता की संकीर्ण भावना से प्रेरित हो पुनर्जीवित करना चाहते हैं, अब साहित्यिक दृष्टि से लगभग लिखी ही नहीं जाती, जो हर एक गाँव में, वस्तुतः प्रदेश के लोगों की तरह, बदल जाती है, जब कि उर्दू का सुंदर काव्यात्मक रचनाओं द्वारा रूप स्थिर हो चुका है, वे कहते हैं कि देश की  (अर्थात् गाँवों की ) भाषा हिंदी है, न कि उर्दू | … स्पष्टत: यह जातिगत और धर्मगत विरोध है, यद्यपि दोनों में से कोई यह बात स्वीकार करने के लिए राजी नहीं है | यह बहुदेववाद का एकेश्वरवाद के विरुद्ध, वेदों का बाइबिल जिसके अंतर्गत मुसलमान आ जाते हैं, के विरुद्ध संघर्ष है |”26  इस लंबे उद्धरण पर ठहरकर विचार करने की जरूरत है | तासी भाषा के विवाद को पहले धर्म तक ले जाते हैं और फिर उसे नस्ल तक | साहित्यिक धरातल पर ऐसा था ही नहीं कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है और हिंदी हिंदुओं की | अगर ऐसा होता तो 1830 ई. में गुज़र गए नजीर अकबराबादी ने कृष्ण पर कविता नहीं लिखी होती | जहाँ तक लिपि की बात है तो हिंदी का बहुत सारा मध्यकालीन साहित्य नागरी लिपि के साथ-साथ फारसी लिपि में भी पाया जाता है | उदाहरण के लिए ‘रामचरितमानस’ और घनानंद की कृतियाँ | ‘बिहारी सतसई’ के बारे में भी यही बात है | इतना ही नहीं तासी के बाद इतिहास ग्रंथों में जिसकी गिनती होती है यानी ‘शिवसिंह सरोज’ के प्रथम संस्करण में किताब का नाम फारसी लिपि में भी है | साहित्य की इन परिस्थितियों में भाषा और लिपि को निर्णयात्मक रूप से हिंदू या मुसलमान घोषित करना संभव ही नहीं है | ‘फूट डालो, राज करो’ की मानसिकता इस के पीछे जिम्मेदार है | उक्त उद्धरण की अंतिम पंक्ति नस्लीय टिप्पणी के साथ-साथ यह प्रस्तावित करती है कि चूँकि मुसलमान और ईसाई एकेश्वरवाद को मानते हैं इसलिए हिंदुओं का विरोध दरअसल अपने बहुदेववाद से प्रेरित है | यह बात समझने की है कि भारत में बहुभाषिकता के साथ-साथ बहु-लिपिकता भी रही है | ऐसा नहीं होता तो दक्षिण में संस्कृत साहित्य वहाँ की स्थानीय भाषाओं की लिपियों में नहीं पाया जाता |

      तासी के ‘इतिहास’ की एक प्रमुख विशेषता यह है कि उन्होंने कवयित्रियों पर अलग से विचार किया है | इस के लिए वे अवश्य प्रशंसा के पात्र हैं | उन्होंने 1854 ई. में ‘भारत की महिला कवयित्रियाँ’ शीर्षक लेख भी लिखा था | उनकी इस सूची में कई अलक्षित कवयित्रियाँ हैं | उन्होंने कई कवयित्रियों के उपनाम यानी तखल्लुस का विवेचन किया है | इन सब के साथ उन्होंने भारत में प्रचलित लोक गायन या कविता की लोक प्रसिद्ध शैलियों की भी चर्चा की है | इस का विवेचन भी उन के ‘इतिहास’ में सुंदर बन पड़ा है |

      तासी के इस ‘इतिहास’ में काल-विभाजन पर भी विचार है | इस में भी वे यह तर्क देते हैं कि हिंदुई लेखकों का समय निश्चित नहीं है | उन्होंने कहा है कि यदि काल-क्रम वाली पद्धति अपनाई जाती तो अनेक विभाग करने पड़ते | ऐसा इसलिए कि सबसे पहले वे लेखक आते जिनका काल अच्छी तरह ज्ञात है | फिर जिनका काल संदेहास्पद है वे और अंत में जिनका अज्ञात है वे लेखक शामिल होते | इसलिए तासी हिंदू कवि, हिंदुस्तानी कवि और दक्खिन के लेखकों का काल-क्रम बनाते हैं | यह तीन प्रकार का वर्गीकरण शताब्दी के आधार पर भी है | तासी फिर लिखते हैं कि “ अब हमें इन लेखकों के वर्ग निर्धारित कर लेने चाहिए | सर्वप्रथम स्थापित होनेवाली विभिन्नता, जो अत्यंत स्वाभाविक प्रतीत होती है, उन्हें हिंदुओं और मुसलमानों में अलग-अलग करना है, तो भी ऐसा करते समय यह देखने को मिलेगा कि किसी भी मुसलमान ने हिंदुई या हिंदी बोली में नहीं लिखा, जब कि बहुत – से हिंदुओं ने चाहे उर्दू, चाहे दक्खिनी में लिखा है; साथ ही उन्होंने बहुत पहले से फारसी में लिखा था, जैसा कि सैयद अहमद ने भी उस उद्धरण में कहा है जो मैंने उनके ‘आसार उस्सानादीद’ से दिया है | किंतु जब कि मेरे द्वारा उल्लिखित तीन हजार भारतीय लेखकों में से दो हजार दो सौ से अधिक मुसलमान लेखक हैं; तो हिंदू लेखक आठ सौ हैं, और इन पिछलों में भी केवल दो सौ पचास के लगभग हैं जिन्होंने हिंदी में लिखा है |”27 आश्चर्य होता है कि अपने ‘इतिहास’ में खुद तासी ने अमीर खुसरो, जायसी, नवाज आदि अनेक लेखकों का जिक्र किया है जो मुसलमान हो कर ‘हिंदुई’ में लिखते हैं | तब उन्होंने ऊपर के उद्धरण में यह कैसे लिखा कि किसी भी मुसलमान ने हिंदुई या हिंदी बोली में नहीं लिखा ? इस से यह भी प्रमाणित होता है कि तासी की दृष्टि एकांगी थी | पर औपनिवेशिकता से प्रभावित उन की दृष्टि ने तथ्यों की प्रस्तुति में भी न्याय नहीं किया है | उन पर हावी औपनिवेशिक मानसिकता उन के ‘इतिहास’ के अनुवादक लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय पर भी शायद हावी रही कि उन्होंने केवल हिंदी के लेखकों से संबद्ध हिस्से का अनुवाद हिंदी में किया | गार्सा द तासी का यह महत्त्वपूर्ण ‘इतिहास’ आज तक हिंदी और अंग्रेजी में संपूर्ण अनुवाद की राह देख रहा है | अगर इसे केवल संग्रह ग्रंथ भी माना जाए तब भी इस में ‘साहित्य के इतिहास’ के लिए भरपूर सामग्री है |

     गार्सा द तासी के ‘इतिहास’ के बाद प्राय: शिवसिंह सेंगर की लिखी किताब ‘शिवसिंह सरोज’ की चर्चा हिंदी साहित्य के इतिहास के ग्रंथ के रूप में होती है | पर भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास ने 1901 ई. में नागरीप्रचारिणी सभा, बनारस की पत्रिका ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ में एक लेख लिखा था | इस लेख में उन्होंने 1873 ई. में प्रकाशित एवं पंडित महेशदत्त शुक्ल रचित ‘भाषा काव्य-संग्रह’ की सूचना दी | इस लेख में बाबू राधाकृष्ण दास ने यह लिखा था कि “ इसमें संग्रह – कर्ता ने पहले कुछ प्राचीन कवियों की कविता संग्रह की है, फिर उन्हीं कवियों का जीवनचरित्र तथा समय आदि संक्षेप से दिया है और अंत में कठिन शब्दों का कोष दिया है | कवियों का समय – निर्णय इस ग्रंथ में जैसा किया है वैसा कहीं देखने में नहीं आता, विशेष कर अवध प्रांत के कवियों का समय – निर्णय बहुत ही निश्चय के साथ किया है | यदि इसमें दिया समय ठीक हो ( जिसके ठीक न मानने का कारण हमें नहीं दिखाई पड़ता ), तो बहुत से कवियों के समय – निर्णय का मार्ग अत्यंत परिष्कृत हो जाता है |”28  रामकुमार वर्मा ने अपनी किताब ‘हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’ में महेशदत्त शुक्ल का जिक्र किया है | महेशदत्त शुक्ल की यह पुस्तक नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ से छपी थी | इस की सूचना नवलकिशोर प्रेस पर अलराइक स्टार्क ( Ulrike Stark ) के अत्यंत परिश्रमपूर्ण शोध ‘ऐन अंपायर ऑफ बुक्स द नवल किशोर प्रेस एंड द डिफ्यूजन ऑफ द प्रिंटेड वर्ल्ड इन कोलोनियल इंडिया’ ( An Empire Of Books The Naval Kishore Press And The Diffusion Of The Printed World In Colonial India) से भी मिलती है | हालाँकि इस किताब में महेशदत्त शुक्ल की उक्त किताब का प्रकाशन वर्ष 1874 ई. दिया गया    है |29 अफसोस है कि महेशदत्त शुक्ल की यह किताब अभी तक देखने में नहीं आई |

     ऊपर यह कहा जा चुका है कि गार्सा द तासी के ‘इतिहास’ के बाद ‘शिवसिंह सरोज’ को हिंदी साहित्य का इतिहास माना जाता है | इस किताब का पहला संस्करण 1878 ई. में प्रकाशित हुआ और 1883 ई. तक इस का तीसरा संस्करण छापना पड़ा | 1926 ई. में इसका सातवाँ संस्करण प्रकाशित हुआ | इस से इस किताब की लोकप्रियता का अंदाज लगाया जा सकता है | इस की भूमिका में शिवसिंह सेंगर ने लिखा है कि “ हमने सोचा कि अब कोई ग्रंथ ऐसा बनाया चाहिए जिसमें प्राचीन औ नवीन कवि लोगों के जीवन – चरित्र सहित सन् संवत् औ जाति औ निवास औ कबिताई के ग्रंथों समेत विस्तारपूर्वक होवैं | … पहिले हम सोचे हुए थे कि एक छोटी – सी संग्रह बनावैंगे पर धीरे – धीरे ऐसा भारी ग्रंथ हुवा कि १००० कवि लोगों के नाम सहित जीवन – चरित्र इकट्ठा हो गए, जिनमें ८३६ की कविता हमने इस ग्रंथ में लिखी और विस्तार के भय से केवल इतने ही कवि लोगों की कविता पर लिखने पर ग्रंथ को समाप्त कर दिया | हमको इस बात के प्रगट करने में कुछ संदेह नहीं है कि ऐसी संग्रह कोई आज तक नहीं रची गई |”30  शिवसिंह सेंगर ने अपनी किताब को ‘इतिहास’ न कहकर ‘संग्रह’ कहा है | इस से यह पता चलता है कि वे इतिहास के वर्तमान अर्थ से जरूर परिचित रहे होंगे | ‘संग्रह’ में जोर रचनाओं पर हो जाता है जबकि ‘इतिहास’ में बल काल – क्रम, काल – विभाजन और मूल्यांकन पर होता है |

     ‘शिवसिंह सरोज’ में कवियों के परिचय के साथ उन की रचनाएँ भी संकलित की गईं हैं | इस तरह के संग्रह ग्रंथों की परंपरा हिंदी में पहले से चली आ रही थी | ‘कालिदास हजारा’ (लगभग 1718 ई.) ‘राग सागरोद्भव – राग कल्पद्रुम’ ( लगभग 1843 ई. ) आदि संग्रह ग्रंथ पहले से बनते आ रहे थे | नई बात यह थी कि ‘शिवसिंह सरोज’ में कवियों के जीवन और उन की रचनाओं पर भी विचार था | शिवसिंह सेंगर के बारे में हिंदी के साहित्येतिहास ग्रंथों में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती | पर इतना अवश्य पता चलता है कि उन्न्नाव जिले के रहनेवाले थे और ‘इंस्पेक्टर पुलिस’ थे | इस पद पर रहते हुए वे निश्चय ही अंग्रेज अधिकारियों और उन की ज्ञान-परंपरा के संपर्क में आए होंगे |

     पंडित महेशदत्त शुक्ल रचित ‘भाषा काव्य-संग्रह’ या ‘शिवसिंह सरोज’, इन दोनों किताबों के ढाँचे पर विचार करने से यह पता चलता है कि अंग्रेजों या यूरोपियों के संपर्क में आने के बाद भारत में आज के अर्थ वाले इतिहास का प्रचार बढ़ा | भारत में ‘इतिहास’ का वर्तमान अर्थ कभी नहीं रहा | यों भारत में ‘इतिहास’ शब्द का प्रयोग अथर्वेद, महाभारत और संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में हुआ है | यूरोपीय अर्थ में इतिहास का जोर तथ्यों पर रहा है | पर यदि इतिहास का काम या क्षेत्र अतीत से संबंध की विवेचना है तो भारत में यह प्रस्तावित किया गया कि जीवन का मूल मूल्य है | कहने का मतलब यह कि भारत में इतिहास की तथ्यपरक अवधारणा नहीं रही बल्कि इसके स्थान पर मूल्यपरक इतिहास सदा रचा जाता रहा | इसीलिए भारत में ‘काल’ की भी अवधारणा अलग किस्म की रही है | आधुनिक इतिहास में जिस प्रकार ‘काल’ को ‘हिगराकर’ विचार किया जाता है उस तरह से भारत में करना अच्छा नहीं माना गया | इसी से जुड़ा एक रोचक प्रसंग यह है कि एक बार प्रसिद्ध शायर फ़िराक गोरखपुरी ने एक व्यक्ति को अपने पास बुलाया | उन्हें आने में देर हो गई | फ़िराक साहब चिर-परिचित अंदाज वाली अपनी झल्लाहट में बोले कि आप लोगों को समय का ध्यान ही नहीं रहता, और रहे भी कैसे, क्योंकि ‘महाकाल के उपासक को खंडकाल से क्या मतलब ?’ हिंदी के ‘पारसमणि आचार्य’ हजारीप्रसाद द्विवेदी अपनी किताब ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’ में भारत में प्रचलित ‘इतिहासबोध’ के बारे में लिखते हैं कि “ वस्तुतः, इस देश में इतिहास को ठीक आधुनिक अर्थ में कभी नहीं लिया गया | बराबर ही ऐतिहासिक व्यक्ति को पौराणिक या काल्पनिक कथानायक बनाने की प्रवृत्ति रही है | कुछ में दैवी शक्ति का आरोप कर पौराणिक बना दिया गया है; जैसे राम, बुद्ध, कृष्ण आदि और कुछ में काल्पनिक रोमांस का आरोप करके निजंधरी कथाओं का आश्रय बना दिया गया है; जैसे उदयन, विक्रमादित्य और हाल | जायसी के रतनसेन, और रासो के पृथ्वीराज में तथ्य और कल्पना  का — फैक्ट्स और फिक्शन का — अद्भुत योग हुआ है | कर्मफल की अनिवार्यता में,  दुर्भाग्य और सौभाग्य की अद्भुत शक्ति में और मनुष्य की अपूर्व शक्ति-भांडार होने में दृढ़ विश्वास ने इस देश के ऐतिहासिक तथ्यों को सदा काल्पनिक रंग में रँगा है | यही कारण है कि जब ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी चरित्र लिखा जाने लगा, तब भी इतिहास का कार्य नहीं हुआ | अंत तक ये रचनाएँ काव्य ही बन सकीं, इतिहास नहीं | फिर भी, निजंधरी कथाओं से वे इस अर्थ में भिन्न थीं कि उनमें बाह्य तथ्यात्मक जगत् से कुछ-न-कुछ योग अवश्य रहता था | कभी-कभी मात्रा में कमी-बेशी तो हुआ करती थी, पर योग रहता अवश्य था |”31 इन परिस्थितियों में पंडित महेशदत्त शुक्ल रचित ‘भाषा काव्य-संग्रह’ या ‘शिवसिंह सरोज’ या दूसरे ‘काव्य-संग्रहों’ से वर्तमान अर्थ में प्रचलित ऐतिहासिकता की उम्मीद व्यर्थ है | इसीलिए नलिनविलोचन शर्मा ने अपनी किताब ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ में ‘शिवसिंह सरोज’ के बारे में लिखा है कि “ जहाँ तक साहित्येतिहास के रूप में सरोज के महत्त्व का प्रश्न है, यह ग्रंथ सही अर्थ में कवि-वृत्त-संग्रह भी नहीं कहा जा सकता, साहित्यिक इतिहास तो दूर की बात है; क्योंकि कवियों के जन्म-काल आदि के संबंध में जो विवरण हैं, वे भी अत्यंत संक्षिप्त और बहुधा अनुमान पर आश्रित हैं |”32 इस से यह स्पष्ट है कि वर्तमान अर्थ इतिहास की शुरुआत भी भारत में औपनिवेशिक काल में ही होती है | इस प्रक्रिया में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ( Jeorge Abraham Grierson ) द्वारा लिखित ‘द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ ( The Modern Vernacular Literature Of Hindustan) महत्त्वपूर्ण है |

     जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ( 1851 – 1941 ई.) मूलतः गणित के विद्यार्थी थे पर उन्होंने राबर्ट एटकिंसन से संस्कृत और मीर औलाद अली से हिंदुस्तानी सीखी थी | वे 1871 ई. में भारतीय सिविल सर्विस की परीक्षा पास कर 1873 ई. में भारत आए | बंगाल के जैसोर जिले में नियुक्त हुए | कुछ ही दिनों बाद उन की बदली अकाल के महकमे में हो गई और बिहार भेज दिए गए  |  वे भारत में लगभग 24 साल रहे | 1877 ई. में उन्होंने अपना पहला लेख कालिदास पर   लिखा |33 1885 ई. में ग्रियर्सन ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘बिहार पीजेंट लाइफ (Bihar Peasent Life ) लिखी | इस किताब ने उन्हें पूरे यूरोप में मशहूर कर दिया | 1886 ई. में वियना में प्राच्यवादियों का एक अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन हुआ | इस में ग्रियर्सन ने तुलसीदास के संदर्भ में मध्यकालीन साहित्य पर एक पर्चा पढ़ा | इसी सम्मलेन में यह भी विचार किया गया कि भारत में कुल कितनी भाषाएँ हैं ? अंदाजा लगभग बीस, साठ से लेकर 250 तक का था | इसी सम्मलेन में यह प्रस्ताव पास किया गया कि भारत की भाषाओं का एक सर्वेक्षण होना चाहिए | प्रस्तावकों में प्रसिद्ध प्राच्यवादी व्हूलर, मैक्समूलर, मोनियर विलियम्स और ग्रियर्सन थे |34 1898 ई. में यह सर्वेक्षण शुरू हुआ और ग्रियर्सन को इस काम के लिए शिमला में नियुक्त किया गया | 1902 ई. में वे वापस अपने वतन लौट गए | उन्होंने 1903 ई. में भारतीय सिविल सर्विस से अवकाश प्राप्त कर लिया और अपने देश में ही रहकर भाषा सर्वेक्षण का काम करते रहे | इस सर्वेक्षण को पूरा होने में लगभग तीस साल लगे और यह भारतीय भाषाओं का एकमात्र सर्वेक्षण था | इधर जी. एन. डेवी  ( G. N. Devy ) नामक प्रसिद्ध विद्वान ने 2016 – 2017 ई. में भारतीय भाषाओं का दूसरा सर्वेक्षण किया है | रामकथा पर आधिकारिक काम करनेवाले दिनेशचंद्र सेन ने ग्रियर्सन को ‘द एम्परर ऑफ लर्निंग ( The Emperor Of Learning) कहा था |

     ग्रियर्सन की किताब ‘द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ ( The Modern Vernacular Literature Of Hindustan) पहले ‘जर्नल ऑफ द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल ( Journal Of The Asiatic Society Of Bengal ) में 1888 ई. में प्रकाशित हुई थी | 1889 ई. में यह पुस्तकाकार छपी |  इस किताब में लक्ष्य करनेवाली पहली बात तो यही है कि यह किसी को समर्पित नहीं है | दूसरी बात यह कि इस में बतौर आदर्श – वाक्य विख्यात लेखक गेटे की दो पंक्तियाँ रखी गईं हैं | पंक्तियाँ मूल जर्मन में हैं | इस का अच्छा विश्लेषण इरा सर्मा ( Ira Sarma ) ने हंस हार्डर ( Hans Harder ) द्वारा संपादित किताब ‘लिटरेचर एंड नेशनलिस्ट आडियोलॉजी ( Literature And Nationalist Ideology ) में संकलित अपने लेख में किया है | इन पंक्तियों का मतलब यह था कि “ जो चारण को समझता है उसे चारण की भूमि भी खोजनी होगी |” इरा सर्मा ने अपने लेख में यह स्पष्ट किया है कि गेटे ने पश्चिमी पाठक और पूर्वी लेखक के संबंध को व्याख्यायित करने के संदर्भ में उपर्युक्त पंक्तियाँ कहीं थीं |35 दरअसल ग्रियर्सन के जमाने में उस भारत को जानने की कोशिश हो रही थी जो रहस्यमयी और अज्ञात था | इस प्रक्रिया में ग्रियर्सन और उन जैसे अनेक लोगों, जिन में गेटे भी शामिल हैं, ने अपने-अपने कार्यों से यह प्रस्तावित किया था कि भारत को जानने के लिए यहाँ की संस्कृति में रमना होगा | अकारण नहीं है कि जब ग्रियर्सन 1877 ई. में दरभंगा जिले के मधुबनी के सब – डिविजनल ऑफिसर बने और वहाँ तीन साल रहे तब वे देशी पंडितों की सहायता से मैथिली का एक व्याकरण रचा | इस प्रक्रिया में अपने से मिलने आनेवाले पंडितों को ग्रियर्सन ‘एक जोड़ा धोती और दो रुपया नकद’ बतौर विदाई देते

 थे |36 विदाई में कपड़ा और कुछ पैसा देना हिंदू ब्राह्मणों का एक रिवाज रहा है | ग्रियर्सन ऐसा कर के उस रिवाज में अपनी सहमति के साथ – साथ भागीदारी भी सुनिश्चित कर रहे थे |

     ‘द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ ( The Modern Vernacular Literature Of Hindustan) में ग्रियर्सन ने नाम में आए ‘हिंदुस्तान’ की चौहद्दी तय करते हुए स्पष्ट करते हैं कि उन के लिए हिंदुस्तान का मतलब, राजपुताना और गंगा – जमुना की घाटी जो कोशी नदी के किनारे तक फैली है, से है | वे साफ – साफ कहते हैं कि इस में वे पंजाब और बंगाल के निचले हिस्से को शामिल नहीं कर रहे हैं |37 बतौर भाषा वे ‘मारवाड़ी’, ‘हिंदी’ और ‘बिहारी’ को इन सब की विभिन्न ‘बोलियों और उप – बोलियों’ के साथ अपने इस अध्ययन का विषय बनाते हैं | इरा सर्मा ने उपर्युक्त लेख में ठीक ही लक्ष्य किया है कि ग्रियर्सन के जमाने अर्थात् 1880 ई. के आस – आस ‘हिंदी’ का वह अर्थ नहीं लिया जाता था जो बाद में यानी हिंदुस्तान के राष्ट्रवादी दौर में लिया जाने लगा | ‘हिंदी’ से उस समय किसी क्षेत्र विशेष का भी बोध नहीं होता था | पर यहाँ विचारणीय यह है कि ग्रियर्सन ‘मारवाड़ी’, ‘हिंदी’ और ‘बिहारी’ को किन अर्थों में इस्तेमाल कर रहे हैं ? उन्होंने जिन 952 कवियों को अपनी इस किताब में जगह दी है उन में ज्यादातर अवध या ब्रज क्षेत्र के हैं | ‘हिंदी’ को ग्रियर्सन एक ‘संकर’ और यूरोपीय लोगों द्वारा आविष्कृत भाषा मानते थे | वे यह भी साफ – साफ लिखते हैं कि यह आविष्कृत भाषा ‘हिंदुओं की संपर्क – भाषा ( lingua franca of Hindus ) बन गई क्योंकि इसका अभाव था | वे हिंदी को ले कर गार्सा द तासी की यह मान्यता भी दोहराते हैं कि ‘हिंदी’ कभी भी कविता की भाषा नहीं रही |38

इन बातों से पता चलता है कि ग्रियर्सन के लिए भी ‘हिंदी’ हिंदुओं की भाषा थी | सवाल यह है कि अगर ग्रियर्सन ‘हिंदी’ का अर्थ ‘खड़ी बोली’ कर रहे हैं तो अपनी किताब में अवधी और ब्रजभाषा के लेखकों को कैसे शामिल कर रहे हैं ? ऐसा इसलिए कि ‘मारवाड़ी’ से राजस्थान की भाषाओं का बोध और ‘बिहारी’ से बिहार की भाषाओं का संकेत होता है | इतना ही नहीं उन के भाषा सर्वेक्षण के जिल्द 5 के दूसरे भाग में बिहारी और उड़िया भाषाओं को तो जिल्द 9 के भाग 1 में पश्चिमी हिंदी और पंजाबी को रखा गया है | भाषाई स्तर पर यह विसंगति तासी में भी थी और ग्रियर्सन में भी दिखाई पड़ती है | इरा सर्मा ने यह स्पष्ट किया है कि ‘वर्नाक्युलर भाषाओं’ के अध्ययन का उद्देश्य ही यह था कि शासित जनता पर नियंत्रण स्थापित किया जाए और विभिन्न राष्ट्रीयताओं को जन्म दिया जा सके |

     ग्रियर्सन ने अपनी इस किताब को ‘इतिहास’ नहीं कहा है | इस का कारण बताते हुए वे कहते हैं कि उन्होंने सारी सामग्री को पढ़ा नहीं है और न ही भाष्य के अभाव में समझ सके हैं | अत: इसे भी वे ‘सामग्री – संग्रह’ के रूप में ही मानते हैं | पर ध्यान से देखने पर यह पता चलता है कि ग्रियर्सन ने इस किताब में ‘इतिहास’ का आधुनिक अर्थ सामने रखा है और काल – विभाजन करने की कोशिश की है | लेकिन उन के काल – विभाजन में कोई एक सम्यक दृष्टि नज़र नहीं आती | कभी वे साहित्यिक धरातल पर काल का नामकरण करते हैं, जैसे रीतिकाल ( The Ars Poetica ) तो कभी राजनैतिक सत्ता के आधार पर ‘कंपनी के शासन में हिंदुस्तान ( Hindustan Under The Company )’ | फिर सोलहवीं और सत्रहवीं सदी के भारतीय साहित्य को ‘स्वर्ण युग ( Augustan Age ) कहते हैं | दूसरी तरफ वे लेखक केंद्रित ‘इतिहास’ को भी प्रस्तावित करते हैं |

     ग्रियर्सन ने जायसी और तुलसीदास को बहुत महत्त्व दिया है | उन की इस किताब में यही दो ऐसे लेखक हैं जिन पर अलग – अलग स्वतंत्र अध्याय हैं | आश्चर्य होता है कि कबीर को उन्होंने कोई महत्त्व नहीं दिया | उन के जीवन और उन के नाम पर चलने वाले ग्रंथों का उल्लेख कर छोड़ दिया है | जिन गार्सा द तासी से उन्होंने अपने लिए सामग्री लेने की बात कही है वहाँ भी कबीर के बारे में इन से अधिक बातें कहीं गई हैं | ठीक इसी प्रकार ग्रियर्सन उर्दू के शायर नजीर अकबराबादी को भी इस किताब में स्थान देते हैं | इन के अलावा किसी और उर्दू शायर का उल्लेख तक नहीं है | इन तथ्यों से यह निष्कर्ष निकालना क्या उचित होगा कि ग्रियर्सन में हिंदू संस्कार कहीं – न – कहीं प्रबल थे ? या फिर वे ऐसे मुसलमानों को बढ़ावा दे रहे थे जो हिंदू ढाँचे में फिट बैठ सकें ? ऐसा इसलिए कि नजीर को क्या इस कारण उन्होंने शामिल किया कि उन्होंने कृष्ण पर कविताएँ रची हैं ? जायसी को भी महत्त्व देने के पीछे क्या यही बात है ? तुलसीदास और ‘रामचरितमानस’ को तो वे इतना अधिक महत्त्व देते हैं कि वे लिखते हैं कि “ हिंदुस्तान की पढ़ी – लिखी या अनपढ़ जनता की नैतिकता का प्रतिमान रामचरितमानस ही है ” |39 यह वही नैतिकता है जिस का विलियम जोन्स ने ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के अपने अनुवाद में विवेचन किया था | ग्रियर्सन का यह असर रामचंद्र शुक्ल पर भी दिखता है जब वे जायसी और तुलसीदास को अपने अध्ययन के लिए चुनते हैं | वे जायसी की इस बात के लिए तारीफ़ करते हैं कि उन्होंने हिंदू घरों में प्रचलित कहानी को अपने काव्य का विषय बनाया |  यह बात अब छुपी हुई नहीं है कि अंग्रेजों की नीति भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के भीतर ‘हिंदूपन’ और ‘मुसलमानत्व’ को बरकरार रखने की थी ताकि वे विभेद की राजनीति जारी रख सकें | तुलसीदास द्वारा प्रस्तुत आदर्श और नैतिकता की भूरि – भूरि प्रशंसा ग्रियर्सन करते हैं | यही आदर्श और नैतिकता सत्ता के पूरे स्वरुप को कायम रखती है | ग्रियर्सन को भी परिवर्तनकामी शक्तियाँ पसंद नहीं थीं इसीलिए वे ‘महारानी विक्टोरिया के शासन में  हिंदुस्तान  ( Hindustan Under The Queen )’ वाले अध्याय में लिखते हैं कि “बँगला पत्रकारिता को कलंकित करनेवाले राजद्रोही और कटुभाषी समसामयिकों की तुलना में हिंदी समाचार – पत्र नियमत: और सामान्यत: कहीं अधिक अच्छे हैं |”40

     गार्सा द तासी और जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा प्रारंभिक ‘इतिहास’ का लेखन औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त  था | इस मानसिकता में विभेदीकरण, सांप्रदायिक राजनीति को प्रश्रय दिया गया | चूँकि बुनियाद ही गड़बड़ हो गई इसलिए हिंदी साहित्य के इतिहास के सामने कई समस्याएँ आज भी खड़ी हैं | साथ ही औपनिवेशिक इतिहास – लेखन के प्रतिकार में जो राष्ट्रवादी इतिहास – लेखन की परियोजना चली उस ने भी अलग तरह की समस्याएँ खड़ी कीं | उदाहरण के लिए अगर हिंदी साहित्य के इतिहास में मध्यकालीन हिंदी साहित्य के अंतर्गत अवधी और ब्रजभाषा के साहित्य को स्वीकार किया जाता है तो आधुनिक काल में इन का साहित्य क्यों नहीं शामिल किया जाता ? इतना ही नहीं बाकी भाषाओं जैसे बघेली, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली के साहित्य का उल्लेख भी हिंदी साहित्य में नहीं होता | ठीक इसी प्रकार आधुनिक हिंदी नाटक के विकास में भिखारी ठाकुर का ज़िक्र अब जा कर शुरू हुआ है | उर्दू को तो बहिष्कृत कर ही दिया गया | यह बात समझी ही नहीं गई कि हिंदी क्षेत्र नहीं बल्कि वह हिंदी – उर्दू क्षेत्र है | शब्दों और लिपियों के बदलाव से ये दो क्षेत्रों की भाषाएँ नहीं हो जातीं | भाषा की पहचान उस की क्रिया, कारक और वाक्य – संरचना से होती है | इन कसौटियों पर हिंदी – उर्दू में उस तरह का भेद नहीं है जैसा कि बताया जाता है | भारत – विभाजन में भाषा की इस राजनीति का बहुत गहरा योगदान रहा है | हजारीप्रसाद द्विवेदी ने औपनिवेशिक ज्ञान प्रक्रिया परविचार करते हुए लिखा है कि “ मौका देखकर इन्होंने दरार पर आघात किया, पहले से अलग हिंदू और मुसलमान दूर से दूरतर होते गये | मौका देखकर विदेशी राजा बन बैठे और अपूर्व अध्यवसाय और लगन के साथ दोनों जातियों को समझने की कोशिश करते गये | जितना ही उन्होंने समझा उतना ही भेद – भाव को उत्तेजित किया | आज हम प्रत्येक बात को हिंदू दृष्टिकोण और मुसलमान दृष्टिकोण से देखने के आदी हो गये हैं, मानों ऐसा कोई दृष्टिकोण ही नहीं है जिससे हिंदू और मुसलमान साथ ही देख सकें |”41

     औपनिवेशिक इतिहास – लेखन में प्रश्न केवल भाषा की अवधारणा का ही नहीं था बल्कि साहित्यिक प्रतिमान का भी था | गार्सा द तासी 1839 ई. में ‘राजभक्ति’ को वांछित समझते हैं और ग्रियर्सन जायसी, तुलसी और बिहारी को श्रेष्ठ कवि के रूप में स्थापित करते हैं | मीरा पर चर्चा करते हुए ग्रियर्सन उन की प्रेम – भावना का ही उल्लेख करते हैं उन की विद्रोह भावना का नहीं | इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि औपनिवेशिक इतिहास – लेखन ने साहित्य की दुनिया को किस तरह प्रभावित किया है ? यह प्रभाव आगे के इतिहासकारों पर भी बना रहा | उपनिवेशवाद आज भारत का अतीत है पर यह भारत के भविष्य को लगातार प्रभावित कर रहा है |

संदर्भ

  1. कॉलोनियलिज्म एंड इट्स फॉर्म्स ऑफ नॉलेज ( Colonialism And Its Forms Of Knowledge) — बर्नार्ड एस. कोन ( Bernard S. Cohn),प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस,प्रिंसटन,1996 ई. की प्रस्तावना में निकोलस बी. डर्क्स (Nicholas B. Dirks ) |
  2. द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बेंगाल एंड द डिस्कवरी ऑफ इंडियाज पास्ट ( The Asiatic Society Of Bengal And The Discovery Of India’s Past ) — ओ. पी. केजरीवाल (O. P. Kejariwal), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली, 1988 ई., पृष्ठ – 14 |
  3. द पुर्तगीज इन इंडिया ( The Pourtuguese In India) — एम. एन. पियरसन ( M. N. Pearson), कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैंब्रिज, 2008 ई., पृष्ठ – 123 |
  4. द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बेंगाल एंड द डिस्कवरी ऑफ इंडियाज पास्ट — वही |
  5. वही, पृष्ठ – 15
  6. ओरियंटलिस्ट जोन्स ( Orientalist Jones) — माइकल जे. फ्रैंकलिन ( Michael J. Franklin), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयार्क, 2011 ई., पृष्ठ – 1|
  7. द लाइफ एंड द माइंड ऑफ ओरियंटल जोन्स ( The Life And The Mind Of Oriental Jones) — गार्लैंड कैनन ( Garland Canon), कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैंब्रिज, 1990 ई., पृष्ठ – 198 |
  8. द वर्क्स ऑफ सर विलियम जोन्स ( The Works Of Sir William Jones ) खंड 3 — सं. लॉर्ड टेगनमाउथ ( Lord Teignmouth), जॉन स्टॉकडले ( John Stockdale) और जॉन वॉकर ( John Walker) के लिए प्रकाशित, लंदन, 1807 ई., पृष्ठ – 26 |
  9. ओरियंटलिस्ट जोन्स — वही, पृष्ठ – 256 |
  10. फोर्ट विलियम कॉलेज — लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, हिंदी परिषद् प्रकाशन, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद, 1947 ई., पृष्ठ – 4 |
  11. वही, पृष्ठ – 7 |
  12. द कॉलेज ऑफ फोर्ट विलियम इन बेंगाल ( The College Of Fort William In Bengal) — टी. कैडल ( T. Cadell) और डब्ल्यू. डेविस स्ट्रांड ( W. Davies Strand) के लिए छपा, लंदन, 1805 ई., पृष्ठ – 47 |
  13. उर्दू का आरंभिक युग — शम्सुर्रहमान फारूकी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008 ई., पृष्ठ – 17 |
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  38. वही, पृष्ठ – 107 |
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