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शशिभूषण द्विवेदी की कहानी ‘अभिशप्त’

शशिभूषण द्विवेदी नई-पुरानी कहानी के सीमांत के कथाकार हैं. नए तरह की जीवन स्थितियों-परिस्थितियों की आहट सबसे पहले जिन कथाकारों में सुनाई पड़ने लगी उनमें शशिभूषण सबस अलग हैं. उनकी कहानी ‘अभिशप्त’ मुझे बहुत पसंद है जो एक लम्बे अंतराल के बाद प्रकाशित उनके नए कहानी संग्रह ‘कहीं कुछ नहीं’ में शामिल है- मॉडरेटर

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अभी पेड़ से एक पत्ता टूटकर गिरा।

अभी-अभी हवा का एक झोंका आया। मैं जहाँ बैठा था वहीं बैठा रहा। वह चुपके से आकर मेरे बगल में बैठ गई और मैं सुनता रहा सूखी धरती पर पडऩे वाली पहली बारिश की तरह उसकी वह निर्मल हँसी। बिना बारिश भीग गया मैं। न आँख में आँसू हैं, न, दिल में गुबार…। एक सूनापन चारों ओर। पहाड़ हैं और बादलों में छिपे उनके शिखर। सबसे ऊँची चोटी हाथी टिप्पा। इसकी तलहटी में खड़ा है राजा का भुतहा महल। चारों ओर जंगलों से घिरा। रात-बिरात जंगली जानवर भी आते होंगे। आदमी तो नहीं आते।

—”नहीं, आते हैं कुछ तुम्हारे जैसे पगले।’‘ शिल्पी ने कहा था। मैं स्तब्ध। यह जादूगरनी है क्या…मन की बात पढऩे वाली। पता नहीं, मैंने कन्धे उचकाए। जादूगरनी मुस्कुरा दी। मैं डरने लगा हूँ इससे। दूर तक देखती है यह। गजब का पैनापन है इसकी आँखों में। मुग्ध हूँ इन आँखों पर मैं। इसकी मुस्कान जैसे कत्ल करने के बाद किसी कातिल की होती है…पुरकशिश।

शिल्पी का हू। हाथ मेरे हाथ में है और मैं राजा के भुतहे महल में घुसने की फिराक में। सुनता हूँ सदियों लम्बी चीख। परिन्दे फडफ़ड़ाने लगते हैं।

—”कौन रहता होगा यहाँ?’‘

—”आदमी तो नहीं रह सकता, प्रेत ही रहें तो रहें।’‘ शिल्पी ने फिर

कहा।

मैं शिल्पी को घूरकर देखता हूँ। उसकी नाक की लौंग महल के अँधेरे कोने में चमक उठती है…बिल्कुल जुगनू की तरह।

—”आखिर कहाँ जा रहे हैं हम?’‘ शिल्पी की आँखों में भी वही प्रश्न है जो पाँच साल पहले जया की आँखों में था।

थोड़ी देर मैं खामोश रहा। फिर बेतरह जया की याद आई। जया की याद आते ही मैं पसीने-पसीने हो गया।

—”क्या हुआ शशांक?’‘ शिल्पी ने फिर लय तोड़ी।

—”कुछ नहीं…अचानक भूला हुआ एक बुरा सपना याद आ गया।’‘ शिल्पी की पैनी निगाहों ने मुझे घूरकर देखा। मेरे बदन में हजारों-हजार सुराख हो गए।

—”न अब कुछ नहीं हो सकता। सब खत्म।’‘ मैंने सोचा।

—”मगर हम जा कहाँ रहे हैं?’‘ शिल्पी की फिर वही टेक।

—”एक लम्बी यात्रा पर। उसकी पगडंडियाँ इन्हीं खंडहरों के बीच से जाती हैं। पाँच सौ साल पहले कोई चला था इन पर और मर गया। सुनो उनकी चीख…। सुन रही हो न?’‘ जया को भी यही कहा था मैंने ठीक पाँच साल पहले।

—”मगर मुझे तो कुछ सुनाई नहीं देता…।’‘ शिल्पी का जवाब।

—”अपनी चीख तो सुनाई देती होगी। जो अपनी चीख सुन सकते हैं, दूसरों की चीख भी उन्हीं को सुनाई देती है।’‘ पता नहीं मैंने जया से कहा या शिल्पी से।

उसने कुछ नहीं कहा। मैंने भी जवाब की प्रतीक्षा नहीं की। मैं टार्च की रोशनी में महल की झरती दीवारें देखने लगा। लगा कि अभी भहराकर गिर पड़ेंगी। उनके बीच किसी विशालकाय पेड़ ने जड़ें जमा ली थीं। दीवारें दोफाड़। दीवार पर चाक से कुछ नाम लिखे थे—पुनीत-शालू, रजनी-विजय, सुशील-प्रतिमा…। कुछ लोग अपने प्रेम को इसी तरह जिन्दा रख पाते हैं शायद—मैंने सोचा।

—”अजीब पागल लोग होते हैं न ये भी। प्यार करते हो तो करो, बेमतलब उसका प्रचार क्यों करते हो। देखो कमबख्तों ने सारी दीवारें गन्दी कर रखी हैं।’‘ मानो प्रलाप कर रही थी शिल्पी। मैं फिर चौंका।

दाईं तरफ थोड़ी रोशनी दिखाई दी। रोशनी सीढिय़ों की तरफ से आ रही थी। सीढिय़ाँ परकोटे में खुलती थीं। हम सीढिय़ों पर चढ़े। सीढिय़ों के आस-पास ढेर सारे बरबाद कंडोम और शराब की खाली बोतलें पड़ी थीं। उन्हें देखते ही शिल्पी के चेहरे पर अजीब-सी दहशत छा गई। वह उबकाई लेने को हुई और चेहरे पर रूमाल रख तेजी से ऊपर भागी।

—”मुझे ये कहाँ ले आए तुम शशांक?’‘ शिल्पी चिड़चिड़ाई। हम दोनों परकोटे पर आ गए थे।

—”घबराओ नहीं, यह सब आदमी की ऊब और निरर्थकता की निशानियाँ हैं। ध्यान से देखो, क्या हर चीज यहाँ बेमतलब और फालतू नहीं लगती, प्यार भी?’‘

शिल्पी बिना कुछ बोले परकोटे की तरफ निकल आई और गहरी गहरी साँसें लेने लगी। परकोटे से विशाल गगनचुम्बी पर्वत श्रंखलाएँ देखते ही बनती थीं। वहाँ से दूर सर्पीली सड़कों पर दौड़ती-भागती बसें और गाडिय़ाँ छोटे-छोटे खिलौनों की तरह नजर आ रही थीं।

मैंने परकोटे से नीचे झाँककर देखा। नीचे खाई थी, इतनी गहरी कि सोचकर अब भी डर लगता है। यह विचार कि यहाँ से गिरे तो क्या होगा, हालाँकि निरर्थक था मगर भीतर कहीं बहुत गहरे डराने भी लगा था।

यह अजीब है लेकिन मेरे साथ ऐसा अक्सर होता है। जिस वक्त ऊँचाइयों से मैं डर रहा होता हूँ ठीक उसी वक्त वहाँ से कूद पडऩे की एक आत्मघाती इच्छा भी मेरे भीतर जोर मारने लगती है। परकोटे से खाई को देखते हुए भी मेरे मन में एक बार वहाँ से कूद जाने का विचार आया। शिल्पी ने मेरी आँखों में शायद मौत के उस आत्मघाती विचार को पढ़ लिया था। वह फौरन मेरे पास आई और मेरा-हाथ पकड़कर पचासों सीढिय़ाँ एक साथ उतर गई। वह बेतरह घबरा चुकी थी।

—”क्या हुआ?’‘ मैंने पूछा।

—”कुछ-नहीं। मैं डर गई थी थोड़ा।’‘

—”क्यों?’‘

—”पता नहीं, अचानक तुम्हारी आँखों में मुझे मौत की वीरानी और उजाड़ नजर आया। तुम खुद को मारना चाहते थे, क्यों?’‘

—”मैं अपने डर को मारना चाहता था।’‘

—”पता नहीं, तुम डर को मारना चाहते थे या डर तुम्हें। मैं अब तुम्हें यहाँ और नहीं रहने दूँगी।’‘ मेरा हाथ पकड़े-पकड़े वह तेजी से बाहर आई। अब हम महल के बाहर प्रांगण में थे। बाईं ओर से पुजारी जी आते दिखे। शिल्पी ने झुककर उनके पाँव छुए। मैंने हाथ जोड़कर प्रणाम की मुद्रा बनाई।

—”खुश रहो बिटिया।’‘ पुजारी जी बोले। फिर मुझे देख धीरे-से कहा, ”कैसे हो शशांक?’‘

—”ठीक हूँ पुजारी जी…काफी दिनों बाद आज आपके दर्शन हुए।’‘ मैंने कहा।

—”हाँ, देवी सुजाता के मन्दिर में एक बड़ा अनुष्ठान होने वाला है। उसी की तैयारियों में थोड़ा व्यस्त था? लेकिन यह बिटिया कौन है, पहले कभी देखा नहीं?’‘

—”ये शिल्पी है पुजारी जी, मेरी दोस्त। जल्द हमलोग शादी करने वाले हैं।’‘

—”ओह, बड़ी संस्कारी बच्ची है। मेरा आशीर्वाद तुम लोगों के साथ है।’‘

मुझे लगा पुजारी जी कुछ और कहना चाहते हैं लेकिन कह नहीं पा रहे। मैं विषयांतर का प्रयास करता हूँ, ”पुजारी जी, महल के भीतर वर्षों से मैं एक शिलापट देख रहा हूँ जिस पर एक अजीब-सी बात लिखी है।’‘

—”क्या?’‘

—”यही कि ‘स्त्रियाँ जन्मजात शासक होती हैं। वे एक साथ क्रूर, दयालु और महान हैं। कोई भी हद उनके आगे नहीं जा पाती।‘  इसका क्या मतलब है?’‘

एकाएक पुजारी जी गम्भीर हो गए। कुछ सोचते हुए बोले, ”वह शिलापट ही खंडहर होते इस महल का सच है बेटा। उसे अपनी मृत्यु से पहले इस छोटे-से पहाड़ी राज्य के राजा ने खुदवाया था कभी। रानी सुजाता की प्रतिष्ठा में। वही अन्तिम राजा था यहाँ का। उसके बाद न कोई राजा हुआ न रानी। तब से यहाँ सिर्फ मृत्यु का हाहाकार है।’‘

—”यह सुजाता कौन थी पुजारी जी?’‘ शिल्पी ने पुजारी जी को बीच में ही टोक दिया। पुजारी जी ने सिर उठाकर पल भर उसे देखा। उनकी आँखें भर आईं।

—”सुजाता राजा का दुर्भाग्य थी बिटिया। राजा से ज्यादा खुद अपना। एक मामूली गड़रिया की लड़की थी सुजाता। अपूर्व सुन्दरी और महान महत्त्वाकांक्षी। रानी बनने का स्वप्र देखा था उसने और उसके लिए माँ भवानी की विकट साधना भी की थी। तब यहाँ राजा रुद्रसेन काफी वृद्ध हो चले थे, लेकिन उस अवस्था में भी उनकी कामलिप्साएँ चरम पर थीं। एक दिन दुर्योग से वे जंगल गए शिकार करने और वहाँ गड़रिया की बेटी सुजाता की मदमाती मांसल देह के सम्मोहन में फँस गए। वे नहीं जानते थे कि सुजाता के लिए माँ भवानी का वरदान अभिशाप बन चुका है। माँ भवानी ने कहा था, ‘सुजाता निर्भय हो। तू विधाता की इच्छापूर्ति का माध्यम है। तू रानी बनेगी लेकिन कोई सामान्य पुरुष जब भी स्वर्णकंचन-सी दिपदिपाती तेरी देह को छूने का प्रयास करेगा, अपाहिज हो जाएगा।’ और इसी प्रयास में राजा अपाहिज हो गए बिटिया।…पाँच सौ साल पहले इस छोटे पहाड़ी राज्य की महारानी हुई देवी सुजाता। उधर बगल वाले मन्दिर में उसकी मूर्ति आज भी रखी हुई है अपने उसी चंडालिनी रूप में। कहते हैं राज्य के सभी पुरुषों को उसने बधिया करा दिया था। इसलिए, सुजाता के मन में यह बैठ गया था कि कहीं उसके रूप के आकर्षण में राज्य के सभी पुरुष अपाहिज न हो जाएँ। अभिशप्त रानी की सनक ने पूरे राज्य को वीर्यहीन कर दिया। हर दिशा, हर घर, हर चौराहे पर या तो स्त्रियाँ दिखतीं या फिर किन्नर।’‘

—”सुजाता को माँ भवानी ने वह अभिशाप क्यों दिया था, पुजारी जी?’‘ शिल्पी की आँखों में किस्से-कहानियों का कौतुक था और पुजारी जी की आँखों में एक उदासी।

—”कौन जाने बिटिया। सृष्टि में बहुत-से असम्भव और अभेद्य तर्क भी साँस लिया करते हैं। अकारण ही। हो सकता है कि माँ भवानी का वह अभिशाप भी सृष्टि का वैसा ही कोई असम्भव और अभेद्य तर्क रहा हो। या शायद यह सत्ता की अपनी ठसक थी जिसने महारानी सुजाता के सौन्दर्य को विषैला बना दिया था। अपनी कुटिलता और षड्यंत्रों से उसने सिंहासन के हर सम्भावित उत्तराधिकारी को ठिकाने लगाया। कहते हैं जब भी कोई उत्तराधिकारी मारा जाता, महारानी नौ दिनों के लिए अपने शोकभवन में चली जाती और जी भरकर रोया करती।’‘

—”लेकिन आपका यह आख्यान अधूरा है पुजारी जी। आप महारानी सुजाता की कथा से बिल्लेश्वर को कैसे हटा सकते हैं?’‘ मेरी बुदबुदाहट से पुजारी जी चौंके।

—”हाँ, सच है शशांक, सच है। बिल्लेश्वर को कैसे हटा सकते हैं?’‘

—”अब यह बिल्लेश्वर कहाँ से आ टपका पुजारी की?’‘ शिल्पी की जिज्ञासा चरम पर आ गई थी।

—बिल्लेश्वर सुजाता के बचपन का साथी था बिटिया। जंगल में जानवर चराता था। सुजाता से उसे प्रेम था और सुजाता भी उस पर बहुत विश्वास करती थी। मगर वह राजा नहीं था और सुजाता को रानी बनना था जिसके लिए उसने माँ भवानी को प्रसन्न किया था। सुजाता जब रानी बनी तब बिल्लेश्वर को ही उसने अपना प्रधान अंगरक्षक नियुक्त किया। बिल्लेश्वर की वीरता के तमाम किस्से लोग आज भी बड़े गर्व से सुनाते हैं। सुजाता की प्रसन्नता के लिए बिल्लेश्वर ने भी हर अपमान सहा और अपनी सभी व्यक्तिगत इच्छाओं की बलि दे दी। मगर जब महारानी सुजाता की सनक और क्रूरताएँ हद से गुजरने लगीं, तब राजशाही से विद्रोह का नेतृत्व भी उसी को करना पड़ा।

उसी रात महारानी सुजाता पर उसने अपना प्रेम प्रकट किया। मृत्यु सामने खड़ी थी। सुजाता एक भीषण अट्टहास के साथ चीख रही थी। अपाहिज राजा कुछ कहना चाह रहे थे, लेकिन उनके मँुह से गों-गों की कुछ अस्फुट-सी आवाजें ही निकल पा रही थीं। महारानी सुजाता के अत्याचारों से त्रस्त होकर प्रजा विद्रोह पर उतारू थी और महल को चारों ओर से घेरकर उसमें आग लगा दी गई थी। बिल्लेश्वर ने अन्तिम बार भरी आँखों से महारानी सुजाता को प्रणाम किया और बाहर निकलकर हिमालय की कंदराओं में खो गया। हालाँकि कुछ लोग यह भी मानते हैं कि बिल्लेश्वर बाहर नहीं आया था और महारानी के साथ उसने भी अग्निसमाधि ले ली थी। बिल्लेश्वर बाहर आया या नहीं भगवान जाने, लेकिन प्रजा के विद्रोह की गोपनीय योजना बिल्लेश्वर की ही बनाई हुई थी। इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। बिल्लेश्वर प्रेम और कर्तव्य के बीच आजीवन तिल-तिल मरता रहा। जीवन अजीब होता है। हमेशा अनोखा और चमत्कारिक।’‘ पुजारी जी खामोश हो गए। धुँधलका उतरने लगा था। हर तरफ एक खौफनाक खामोशी थी। खामोशी के भीतर ही दु:स्वप्नों का कोलाहल भी था।

—”शशांक, क्या सचमुच कोई बिल्लेश्वर, कोई सुजाता, कोई राजा था कभी?’‘ शिल्पी ने बाहर आते हुए पूछा! मैंने कोई जवाब नहीं दिया। उस समय मैं सुजाता और बिल्लेश्वर के बारे में सोचते हुए जया के बारे में सोचने लेगा था। उसके घातक सौन्दर्य और असम्भव आकांक्षाओं के बारे में। क्या दिन थे वे भी। दिन सोने तो रातें चाँदी जैसी होती थीं। मैं जया के पागल प्यार की खुमारी में था। हर वक्त जैसे हम बादलों पर सवार रहते। सिर्फ वही थी जो बिना आहट जब चाहती मेरे सपनों के रंगमहल में चली आती और दूर से ही मैं उसकी देहगन्ध पहचान लेता। अक्सर उसकी देह टटोलते हुए मैं उससे पूछता कि आखिर कहाँ छपाई है तुमने वह कस्तूरी?’

—”कौन कस्तूरी?’‘

—”वही जो मेरे सपनों में भी तुम्हें महकाती रहती है।’‘

—”पागल…’‘ वह बच्चों की तरह खिलखिलाती।

यह जया थी। जयश्री सिंघानिया। पेज थ्री की मायावी दुनिया में बाद में उसे इसी नाम से जाना गया। लेकिन तब वह जयश्री सिंघानिया नहीं, सिर्फ जया थी। जया जिसे मैं बेतरह चाहता था। उस वक्त वह एक मामूली घर की कस्बाई लड़की थी। मैं भी तब एक मामूली-सा ट्यूटर था जो वर्षों से बेरोजगारी की मार झेलते-झेलते ज्योतिषियों के बताए उस दिन के इन्तजार में जी रहा था जब अचानक रातों-रात-ऐसा कुछ होगा कि मेरी किस्मत बदल जाएगी, मगर वह दिन था कि आने का नाम ही नहीं ले रहा था।

वह जया का बी.ए. फाइनल ईयर था। तन-मन में कबूतरों की फडफ़ड़ाहट की खतरनाक उम्र।

मैं उन खतरों से वाकिफ नहीं था। सो ट्यूशन पढ़ते हुए कब वह मुझे ही पढ़ाने लगी, पता ही नहीं चला। बस एक दिन अचानक तन-मन में कबूतर फडफ़ड़ाए और हम कस्बे से भागकर बम्बई आ गए। वह कहती कि कस्बे में उसका दम घुटता है। उसकी माँ भी कस्बे में दम घुटने से ही मरी थी। फिर उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली। तब नई माँ के साथ-साथ उसे अपने पिता से भी नफरत हो गई थी। एक बार उसने मुझे बताया कि उसकी माँ कुल्टा है और पिता को पूरी तरह उसने अपने चंगुल में फाँस लिया है। ऐसा कहते हुए उसका चेहरा खतरनाक ढंग से विकृत हो गया था। फिर बोली, माँ मेरी खूबसूरती से जलती है। मैं मॉडल बनना चाहती हूँ। माँ मेरी इस बात पर हँसती है। मैं मॉडल क्यों नहीं बन सकती शशांक? आखिर कमी क्या है मुझमें? नहीं…मैं इस छिनाल को दिखा दूँगी कि मैं क्या कर सकती हूँ। बोलो…क्या तुम मेरा साथ दोगे?’‘ मैं खामोश रहा। उसने फिर पूछा तब झिझकते हुऐ धीरे-से मैंने सिर हिला दिया था।

शुरू के कुछ महीने बम्बई में हमें एक छोटी-सी चाल में काटने पड़े। मैं सुबह-सुबह काम-धन्धे की तलाश में निकल जाता और जया अपना प्रोफाइल बनाते-सँवारते मशहूर फोटोग्राफरों और मॉडलिंग एजेंसियों के चक्कर काटती। मॉडलिंग के उसके शौक को तब मैंने गम्भीरता से नहीं लिया था जबकि शुरू में तो उसके इस सपने को मैंने ही हवा दी थी। वैसे उसकी देह का एक-एक कोण बड़ी-से-बड़ी मॉडलों को मात देता था 34-24-37 का आइडियल स्टैटिक्स। उसे इसके जादू पर बहुत भरोसा था।

इधर दो महीने लगातार सड़कों पर चप्पलें चटकाने के बावजूद मुझे कहीं नौकरी नहीं मिली थी, अलबत्ता जया को जरूर छोटी-मोटी मॉडलिंग एजेंसियों में चांस मिलने लगा था। पैसा भी उसके पास ठीक-ठाक हो चुका था। कुछ समय बाद हम चाल छोड़कर फ्लैट में आ गए थे। फिर जया की सिफारिश पर मुझे भी एक एड एजेंसी में कॉपी राइटिंग का काम मिल गया। उस दिन सचमुच मैं बहुत-शर्मिन्दा था। लेकिन जया के रोम-रोम से उस दिन जैसे मेरे लिए प्यार-ही-प्यार छलक रहा था। अपनी सम्पूर्ण देहराशि उसने खुलकर उस रात मुझ पर लुटाई थी। जैसे कोई नदी थी जिसमें गहरे.. बहुत गहरे मैं डूब-उतरा रहा था। उस रात वह मुझे स्वतन्त्र और अपने से बहुत महान-सी लगी थी। यों कस्बे से भागते समय देवी सुजाता के मन्दिर में हमने अनौपचारिक रूप से शादी कर ली थी, लेकिन जया ने जाने क्यों मुझे यह कसम दी थी कि फिलहाल इस रिश्ते के बारे में मैं किसी से कुछ न कहूँ।

इस बारे में मैंने सचमुच कभी किसी से कुछ नहीं कहा।

धीरे-धीरे मेरा भी काम चल निकला था और जया को लेकर मैंने सपने बुनने शुरू कर दिए थे। जया भी मॉडलिंग से खासा नाम और पैसा कमा रही थी। अब अक्सर शराब के नशे में वह रात को देर से घर लौटती और लडख़ड़ाते हुए बिस्तर पर पसर जाती। आमतौर पर उसके साथ कारवाला कोई रईसजादा होता था जिससे लिफ्ट लेकर वह घर लौटती। शुरू-शुरू में एक-दो बार मैं भी इन पार्टियों में गया था, लेकिन फिर मुझे लगने लगा कि मेरे साथ होने से जया बहुत असहज महसूस करती है। शायद मेरे कस्बाई तौर-तरीके वहाँ लोगों को हास्यास्पद लगते थे। फिर कोई अगर उससे मेरे बारे में पूछता तो वह बेपरवाही से ‘जस्ट अ फ्रेंड’ या ‘रिलेटिव’ कहकर बात टालने की कोशिश करती। मैं खुद को बहुत अवांछित-सा महसूस करने लगता। बाद में वह मुझे समझाती कि इन पार्टियों की उसके प्रोफेशन में कितनी अहमियत है और अगर किसी को पता चल गया कि हम शादीशुदा हैं तो मेरा तो कॅरियर ही चौपट हो जाएगा। ‘सो डोंट टेक इट सीरियसली…बी कूल।’ वह सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए कहती। मैं भौंचक देखता रह जाता। एक मामूली कस्बाई लड़की में अब तक कहाँ छुपा था यह बिन्दासपन, यह आत्मविश्वास, यह दुनियादारी। मैं बौखला जाता तो वह हँस पड़ती। फिर हिरणी की तरह कुलाँचे भरते हुए मेरे पास आती और अपने सीने में मुझे छुपा लेती। मेरे कान में उसकी फुसफुसाहट उभरती…’पागल।’

यह हमारे सम्बन्धों के तीसरे साल की बात है। वह बुरी तरह बौखलाई हुई थी। आते ही अपने बड़े-बड़े नाखून मेरे चेहरे पर गड़ाते हुए चीखने लगी—”तुम इतने लापरवाह कैसे हो सकते हो शशांक?’‘

मैं भौंचक—”आखिर हुआ क्या?’‘

—”वही जो नहीं होना चाहिए था।’‘

—”मतलब?’‘

—”कुछ दिनों से मन अजीब-सा हो रहा था। आज मैं डॉक्टर से मिली। यू नो आई एम प्रेगनेंट।’‘

—”वाउ…वैरी गुड।’‘ मैं खुशी से चहकने लगा। वह रो पड़ी। शर्म, गुस्से और हताशा में उसका चेहरा अजीब-सा हो रहा था।

—”क्या कहा, वैरी गुड। आर यू स्टूपिड शशांक? तुम्हें पता भी है कि तम्हारी इस बेवकूफी से मेरा पूरा कॅरियर तबाह हो सकता है। बम्बई क्या मैं तुम्हारे बच्चे पैदा करने आई थी? ओह गॉड! अगर किसी को पता चल गया तो?’‘ वह रोते-रोते चीखने लगी। मैं अपराधी की तरह खड़ा चुपचाप उसे देख रहा था। जुबान जैसे तालू से सिल गई। उस रात वह देर तक रोती रही थी और मैं उसे समझाने की नाकाम कोशिशें करता रहा। मुझे लगा कि यह उसका शुरुआती भय है और मातृत्व का अहसास शीघ्र ही उसे भयमुक्त कर देगा। हालाँकि उन दिनों जया और सिंघानिया के अफेयर की चर्चा भी उड़ते-उड़ते मेरे कानों में पड़ी थी। सिंघानिया फिल्मी दुनिया में बड़े रसूख वाला फाइनेंसर माना जाता था। जया को उसी के जरिए किसी मल्टीनेशनल के लिए एक बड़ा ब्रेक मिला था। हालाँकि पहली बार जब जया और सिंघानिया के अफेयर की चर्चाएँ सुनी थीं तो थोड़ा अपसेट भी हुआ था, लेकिन फिर यह सोचकर चुप रह गया कि इस तरह की अफवाहें भी यहाँ बिजनेस का हिस्सा होती हैं। वैसे प्रेग्नेन्सी की खबर के दो दिन पहले जया ने खुद मुझसे कहा था कि सिंघानिया सर के साथ अगले हफ्ते वह पेरिस जा रही है। ”तुम यकीन नहीं करोगे…बहुत बड़ा वेंचर है यह। कसम से अगर यह टूर सक्सेसफुल रहा तो समझो हमारी तो निकल पड़ी। मिस जया फिर इंटरनेशनल सेलिब्रिटी बन जाएगी। क्यों क्या ख्याल है?’‘ उसने इठलाते हुए पूछा था। पता नहीं क्यों उस दिन उसकी वह अदा मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी। वह मुझे किसी पतुरिया की तरह लग रही थी। हालाँकि इस सोच के लिए बाद में मैंने खुद को धिक्कारा भी था।

अब मुझे उसके होने वाले बच्चे की फिक्र होने लगी थी। किस पर गया होगा वह…मुझ पर या जया पर। सोच-सोचकर खुश हो रहा था कि अचानक मेरे भीतर ही कोई मेरा दुश्मन पैदा हो गया। वह मेरी खिल्ली उड़ाते हुए कहने लगा, ”क्यों? अगर संघानिया पर गया हो तो?’‘

मैं बुरी तरह परेशान हो गया। घड़ी देखी। रात के ग्यारह बज रहे थे। तीन पैग हलक से नीचे उतारने के बाद एक-एक कर मैं अपने दुश्मनों से लडऩे लगा। जया अब तक नहीं लौटी थी। जैसे-जैसे समय गुजर रहा था, मेरे दुश्मनों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। वे सब मुझे घेरकर मारना चाहते थे। मेरा दम घुटने लगा। तभी दरवाजे की घंटी बजी। जया लौट आई थी। उसका शरीर गिरा-गिरा सा था। बीमार-सी लग रही थी। मैंने उससे पूछना चाहा कि अब तक कहाँ थी वह। वह चुप रही। मेरे बार-बार पूछने पर सिर्फ इतना कहा, ”मेरी तबीयत ठीक नहीं है। सुबह बात करेंगे।’‘ और वह बिस्तर पर गिरते ही नींद में चली गई या शायद बेहोश…। सुबह उसे सोता छोड़कर ही मैं दफ्तर चला आया। रात को जब लौटा तो जया घर पर ही थी। मुझे बेपनाह खुशी हुई। मैंने कहा, ”अच्छा किया जो जल्दी आ गईं। इन दिनों वैसे भी तुम्हें ज्यादा देर तक बाहर नहीं रहना चाहिए। बच्चे पर असर पड़ेगा।’‘ वह ठठाकर हँस पड़ी। बोली, ”पागल हुए हो। आज तो मैं कहीं गई ही नहीं। सारे अपाइंटेमेंट कैंसिल। डॉक्टर ने रेस्ट करने को बोला था। और ये बच्चा-वच्चा क्या लगा रखा है। मैंने तो कल ही अबॉर्शन करा लिया।’‘

…लगा जैसे किसी ने दसवें माले से मुझे नीचे धकेल दिया हो। कुछ भी तो मेरी समझ में नहीं आया। थोड़ी देर हकबकाकर मैं उसे देखता ही रहा। मुझे लगा मेरे भीतर के सारे दुश्मन बाहर आ गए। मुझे लगा सब मिलकर मेरी खिल्ली उड़ा रहे हैं। वह कह रही थी, ”नेक्स्ट वीक मुझे पेरिस जाना है। तुम्हारी समझ में तो कुछ आता नहीं। सिंघानिया सर को अगर पता चलता तो मेरी तो जान ही ले लेते। पेट फुलाकर मैं क्या खाक मॉडलिंग करती।…थैंक गॉड, सब अच्छे से निबट गया।’‘

—”लेकिन एक बार मुझसे पूछा तो होता। आफ्टरऑल मैं तुम्हारा पति हूँ। जनम-जनम तक साथ रहने की कसमें खाई थीं हमने।’‘ मैं जैसे नींद में बड़बड़ा रहा था।

—”पागलपन की बातें मत करो। ठीक है कि एक गलती हो गई थी मुझसे लेकिन बार-बार उसी गलती को दोहराना कहाँ की अकलमन्दी है। फिर तुम्हारी हैसियत ही क्या है! ये गाड़ी, ये फ्लैट सब तुम्हारी बीवी बनकर मुझे नहीं मिला…समझे।’‘

—”लेकिन मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।’‘ मैं रोने-रोने को हो आया। वह ठठाकर हँसी। बोली, ”आखिर रहे तुम वही मिडिल क्लास मास्टर ही न! प्यार करते हो, हुँह…लो करो प्यार, किसने रोका है?’‘ उसने अपना गाउन खोल दिया था। अब वह अपादमस्तक नंगी थी। मेरे भीतर के सभी दुश्मन बाहर आ चुके थे। सबके हाथों में नंगी तलवारें थीं। अब कुछ ही क्षणों में मेरा कत्ल कर दिया जाएगा। जया ने एक अंगड़ाई ली। मैं नपुंसक हो गया।

जया को उसी हालत में छोड़कर मैं उस रात शिल्पी के पास चला आया था। जया की चीखें मेरा पीछा कर रही थीं।

शिल्पी बार-डांसर थी। जया की अनुपस्थिति में पिछले कुछ दिनों से मेरी शामें उसी के साथ गुजर रही थीं। शिल्पी के साथ आते ही उसकी गोद में सिर रखकर मैं जार-जार रो पड़ा। उसने कुछ नहीं पूछा। बाद में भी शिल्पी ने इस बारे में कभी कुछ नहीं पूछा। क्या वह सब जानती थी। अगर नहीं तो कैसे वह मेरे आँसू पी सकी?

बाद में सिंघानिया से शादी करके जया जयश्री सिंघानिया बन गई। उन दिनों मीडिया में भी इस शादी को लेकर काफी चर्चा थी। इसी मौके पर सिंघानिया ने एक टीवी इंटरव्यू में घोषणा की थी कि जल्द ही वह जयश्री को लेकर एक मल्टीस्टारर फिल्म लाँच करने जा रहा है। हालाँकि वह फिल्म कभी नहीं बनी। अभी हाल ही में एक पार्टी में सिंघानिया का एक्स-सेक्रेटरी सोलंकी जरूर मिला था। कम्बख्त देखते ही मुझे पहचान गया। पास आकर जाम टकराते हुए बोला, ”तो आखिर चिडिय़ा उड़ ही गई न दोस्त!’‘ उसकी अश्लील मुद्रा देखकर मुझे गुस्सा आ रहा था मगर मैं जब्त कर गया। वह नशे में बड़बड़ा रहा था, ”सिंघानिया भी साला बड़ी कुत्ती चीज निकला। शादी-वादी तो खैर सब नाटक था। अपुन सब जानता है। बोले था कि मल्टीस्टारर फिल्म बनाएगा। मेरा ये बनागा फिल्म। अबे फिल्म क्या फोकट में बनता है। साले का सारा पैसा तो शेयर में डूब गया। रत्ती-रत्ती का हिसाब था मेरे पास। लेकिन जया,…क्या बोले कि सोने की चिडिय़ा थी मेरी जान। कमीने ने उसकी ब्लू फिल्में बना ली थीं। रातो-रात जब साला दिवालिया हुआ तो जयश्री के गहने तक बेच डाले कमीने ने और ये उड़ा, वो उड़ा। लेके पहुँच गया न्यूयार्क। और जयश्री, साली क्या झक्कास माल है यार…। आजकल न्यूयार्क में टॉप इंडियन पोर्न-स्टार है। अपुन देखेला एक-दो बार। तबीयत खुश।’‘ आगे वह कुछ बोलता, उसके पहले ही मैंने उसका कॉलर पकड़कर दो हत्थड़ रसीद कर दिए थे। पार्टी में खासा हंगामा मच गया था। मेरे भीतर के दुश्मनों ने फिर मुझे घेर लिया था। फिर क्या हुआ…पता नहीं। सुबह उठा तो मेरे सिर पर पट्टी बँधी थी और शिल्पी मेरे पास बैठी सुबक रही थी।

रात गहरा चुकी है। मैं देखता हूँ सामने एक खाई है। लगता है मैं अभी इसमें गिर पड़ँूगा। खाई की तलहटी से जैसे कोई मुझे पुकार रहा है। आखिर ये चीखें किसकी हैं? सुजाता की या जया की। पता नहीं। शायद मेरी ही।

—”हम रास्ता भटक गए शायद।’‘ मैं बोला।

—”नहीं हम घर की तरफ ही चल रहे हैं।’‘ शिल्पी ने फिर एक बार मेरा हाथ पकड़ लिया। हाँ, अब मैं निश्चिन्त था। हम घर की तरफ ही जा रहे थे।

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2 comments

  1. सुन्न कर दिया इस कहानी ने….

  2. साधारण विषय पर सुन्दर भाषा में लिखी गई औसत कहानी है .

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