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अनुकृति उपाध्याय की कहानी ‘इंसेक्टा’  

अनुकृति उपाध्याय ने अनेक कहानियां अछूते विषयों पर लिखी हैं. जैसे यह कहानी ‘इन्सेक्टा’, कीड़ों को लेकर इतनी रोमांचक कहानी भी लिखी जा सकती है यह इसे पढ़कर जाना. ‘हंस’ के नए अंक में प्रकाशित इस कहानी को पढ़कर आश्वस्ति हुई कि बेस्टसेलर के हल्ले के बाहर भी हिंदी लेखन में प्रयोग हो रहे हैं और गंभीर प्रयोग हो रहे हैं. पढ़कर राय दीजियेगा- मॉडरेटर

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एक गहरे गुंजार जैसे स्वर से “म” जाग पड़ा. चेतना के साथ पहला ख्याल आया – अब वे दिन में भी घुस आए. उसने मुश्किल से भारी पलकें खोलीं. खिड़की पर के परदे पर धूप जरी- गोट की तरह झिलमिला रही थी. उसने चौंधियाईं आँखें फिर से कस कर बंद कर लीं. “शिट”… इतनी धूप चढ़ आई. आज तो कमाल हुआ, किसी ने जगाया नहीं वरना रोज़ सुबह सात बजे से दरवाजा तोड़ने लगते हैं दोनो… उठो, उठो, कुम्भकर्ण की तरह सोते हो, पढ़ने वाले बच्चों को  ऐसे सोना चाहिए? वगैरह, वगैरह. आज क्या हुआ? गुंजार अब बंद हो गया था और कमरे में फिर घनी शांति छा गई थी. नींद की ढलान पर फिसलते हुए वह सहसा चौंक उठा. अरे… आज ही तो… ‘टुडे इज़ द डे’. वह एकबारगी ही उठ बैठा. चादर उसने उतार फेंकी. सर भन्ना रहा था और पैर बर्फ की तरह सर्द, आँखें रोज की तरह भारी. इतनी रातों की उखड़ी, अधूरी नींद एक दिन देर तक सो लेने से थोड़े ही पूरी होगी…

जब से रात वाले हमले शुरू हुए हैं, एक भी रात वह पूरी नींद नहीं सो पाया है. रात भर खिड़की की सन्धों, दीवार की दरारों, फर्श की छेदों से दाख़िल होने वाले असंख्य हमलावरों से जूझता रहता है, यह जानते हुए भी कि यह लड़ाई वह शुरू से ही हारा हुआ है. एक अकेले की जत्थों-के-जत्थों घुस आये आतताईयों के सामने क्या बिसात? वे आनन -फानन में कमरे पर काबिज हो जाते है और वह चारों ओर से घिरा, पलँग पर खड़ा अख़बारों के मुट्ठे बना जैसे-तैसे उन्हें ऊपर चढ़ आने से रोकता है. ‘ब्लडी’ अभिमन्यु भी एक बार लड़कर मर गया था, यहाँ तो रोज़ – रोज़ … उसने दांत किचकिचाए. अभिमन्यु के बाप ने कम से कम उसे लड़ना तो सिखाया था… या शायद उसकी माँ ने सिखाया था? ‘एनी वे’, अभिमन्यु को जिसने भी सिखाया हो, मुझे इन दोनों ने कुछ नहीं सिखाया, न बचना, न अटैक करना… सिखाना क्या, उन्हें मुझपर विश्वास ही नहीं. “कुछ हो तो कभी तो किसी और को भी दिखे, सिर्फ तुम्हें ही को क्यों  दिखता है ये सब? हमें तो कुछ नहीं दिखता दिखते? बेकार की बेवकूफी…”

क्या जवाब दूँ इस बात का? कहूँ कि रात को जब दोनों बैडरूम का दरवाजा बंद कर मस्ती कर रहे होते हैं, तब आते हैं वे? कभी अपनी आराम में खलल डाल कर मेरे कमरे में रहें रात -भर तो पता चले…सुबह जब वे वापस गार्डन में लौट जाते हैं तब कैसे दिखेंगे? “गार्डन से अच्छी दुश्मनी है तुम्हारी। लोग ऐसे गार्डन के लिए करोड़ों रुपए ख़र्च करने तैयार हैं इस शहर में और तुम हो कि सारा वक़्त बस ये शिक़ायत कि वो शिक़ायत…” ‘दैट ब्लडी गार्डन’… उससे बहुत प्यार है दोनों को, अपने इकलौते बेटे से भी ज्यादा… मैं मरुँ, जिऊँ, कोई परवाह नहीं…एक भी रात अगर दरवाजा खुला छोड़ दूँ अपने कमरे का तो? जब उनके ‘टीक’ और ‘महोगनी’ के महँगे

फर्नीचर और सिल्क -मढ़े सोफों पर अपनी दुर्गन्धित राल छोड़ते वे घिनौने जीव उनके बैडरूम तक पहुँच जाएंगे तब उन्हें पता चलेगा. डर से काँपता बच्चा नहीं हैं वो कि गलियारे में कुछ देर खड़े रहने के बाद चुपचाप लौट जाए.. लेकिन मैं अब और इन्तजार नहीं कर सकता… इस तरह रात रात भर जागकर इतने ‘स्ट्रैस’ में मैं ज्यादा दिन नहीं बच पाउँगा…मेरी ‘हार्ट बीट्स’ हर वक़्त मेरे कानों में धमाकों की तरह गूँजती है, वक्त-बेवक्त ‘नौसिया’, ठंडा पसीना…हर आवाज़ चौंका देती है, रोशनी में आँखें जलती हैं…’आई कांट होल्ड आउट मच लॉन्गर’, उसने हांफते हुए सोचा.

कीड़ों के आक्रमण ‘म’ के लिए नए नहीं हैं. पुराने बग़ीचे के बीच बना यह फैला- पसरा बँगला भले ही देखने वालों को मोहक लगता हो, असल में तरह तरह के कीड़े-मकोड़ों से भरा नरक है. घर की दीवारों में पुरानी सीलन जज़्ब है. ऊपर से उसके कमरे की बड़ी खिड़की भी घने, नम, अंधेरे बग़ीचे में खुलती है. खिड़की की चौखट को नमी ने आड़ा-टेढ़ा कर दिया है और चौखट और दीवार के बीच की जगह में से तरह – तरह के कीड़ों के झुंड उसके कमरे में अक़्सर धावा बोलते हैं. उनकी गिलगिली या करारे कवचों वाली देहों की दुर्गन्ध उसके कमरे में सदा भरी रहती है. “बस थोड़ी सी सीलन है और कोई बात  नहीं. पुराना घर है, थोड़ी बहुत तो रहेगी ही. वॉटर प्रूफ़िंग तो करवा दी है, अब और क्या करें? घर तुड़वा दें या बाग़ कटवा दें?” हाँ, तुड़वा दो, “डेस्ट्रॉए इट”… कुछ तो शांति मिले, ‘म’ ने दाँत भींच लिए. जैसे उन्हें पता ही नहीं कि ‘वॉटर प्रूफ़िंग’ की तीसरी ही रात दीमकों की क़तारें उसके कमरे में घुस आई थीं… दोनो भूल गए कि उस रात दीमकों ने उसकी ‘फ़िज़िक्स’ उस कॉपी- क़िताबें नष्ट कर दी थी,‘टर्मिनल इग्ज़ाम’ से दो दिन पहले? मैं दीमकों से घिरा पूरी रात चिल्लाता रहा लेकिन इस मनहूस मकान के दूसरे छोर पर बंद दरवाज़ों के पीछे सोते उन दोनों को कुछ सुनाई नहीं दिया… ‘फ़किंग क्रीचर्स’ मेरे इतनी मेहनत से बनाए सारे ‘नोट्स’, ‘प्रैक्टिकल शीट्स’ सब चबा गए…पूरी ‘टर्म’ की मेहनत चिन्दियाँ कर गए…लेकिन टुकड़े टुकड़े हुई क़िताबों को देखकर भी उन्होंने नहीं माना, नहीं माना… “इग्ज़ाम्स’ से ठीक पहले सब क़िताब-कॉपी फाड़ डालो और फिर ख़ुद ही बिसूरो. अच्छा बहाना है. मालूम है पढ़ाई लिखाई की नहीं, सो ख़राब ‘नम्बर्स’ के लिए ‘इक्स्क्यूज़’ पहले से तैयार. इतना दिमाग़ पढ़ाई में लगाओ तो…नाक कटवा रहे हो हमारी…” एक एक शब्द उसके दिमाग़ में दग़ा हुआ है. सिर्फ़ नम्बर, रैंक, इग्ज़ाम…इन्हीं की परवाह…साला मैं मरता हूँ तो मर जाऊँ, रात भर इन गंदे, घिनौने कीड़ों के बीच …

हमेशा से ‘म’ को कीड़ों से घिन या परेशानी रही हो, ऐसा नहीं है. पहले तो दिलचस्पी थी उसे कीट- पतंगो में. वह उत्सुकता से उनके जीवन चक्र देखता, क्या खाते हैं, कहाँ रहते हैं, कीड़ों से जुड़ा सब कुछ उसे चमत्कृत करता. वह उन्हें बाक़ायदा डिब्बों, ग़त्ते के बक्सों और बोतलों में बंद करके रखता. तरह- तरह के भृंग, गुबरैले, बीर-बहूटियाँ, इल्लियाँ, यहाँ तक कि गोज़र, कनखजूरे और ततैये तक, बाग़ और अड़ोस – पड़ोस से इकट्ठा कर लाता. किस प्रजाति का कीड़ा कौन सा पत्ता या फूल – फल खाता है, डिब्बे – बोतलों में क़रीने से जमाई मिट्टी या सूखे पत्ते या घास कब बदलनी चाहिए, सब उसे ज़ुबानी याद रहता. कीट – पतंगों के बारे में तरह – तरह की जानकारी का अंबार था उसके पास, ‘इंसेक्टा’ श्रेणी के सब ‘ऑर्डर’ ‘फ़ैमिली’ ‘जींस’ और ‘स्पिसीज’ उसके रट डाले थे. मम्मी – डैडी, सबको को उसके शौक़ के बारे में गर्व से बताते थे कि कैसे उसने एक बार अपनी दादी को एक शानदार रत्न की तरह चमकता, हरा- सुनहरा गुबरैला देने की कोशिश की थी, कैसे किसी उत्सव में शामिल होने आए मेहमानों की भीड़ में जेब में से एक बड़ा कत्थई कनखजूरा या धुआँसे रंग का कोई भृंग निकाला था, औरत, बच्चों में कैसी चीख़ -पुकार मच गई थी, वे हंस – हंस कर गर्दन हिलाते हुए कहते. कितनी पुरानी बात है ये, तब की जब वह उनका बेटा राजा बेटा था, इम्तिहान, खेलकूद, प्रतियोगिताओं सब में पहले नम्बर पर आता था. ‘आय वाज देयर गोल्डन बॉय देन’…लेकिन तीन साल पहले नए स्कूल में जाने पर सब बदल गया… ‘उन्हीं की ज़िद थी कि शहर के सबसे मशहूर और पुराने स्कूल में जाए. उसके पिता, दादा, चाचा यहाँ तक कि डैडी के चचेरे – ममेरे भाई भी उसी स्कूल में गए थे. सातवीं कक्षा तक जिस छोटे स्कूल में पढ़ा था, जहाँ उसके दोस्त और पसंदीदा टीचर्स थे, वहाँ से निकालकर आख़िरकार उसे उस बड़े स्कूल में डाल दिया था. “ ‘आवर थर्ड जेनेरेशन’! तीसरी पीढ़ी है इस स्कूल में. बेटा परम्परा चला रहा है!” डैडी ने कितने अभिमान से कहा था. सब को बताते फिरते थे “ ‘जस्ट लाइक मी’, हमारा होनहार बेटा…” मेरी ज़िंदगी तो ‘जस्ट लाइक मी’ और ‘हमारी नाक कटा दी’  के बीच झूलती रही है… ‘आय एम नॉट ए पर्सन’, उनके लिए तो मैं कुछ हूँ ही नहीं, कीड़ों से भी गया गुज़रा, यहाँ से उठा कर वहाँ डाल दो…डेढ़ सौ साल के इतिहास वाला स्कूल और ‘थर्ड जेनेरेशन’ का बोझ, सब मेरे ऊपर… किसी को जानता नहीं था वहाँ. सारे ‘कूल’ लड़कों के पहले से ही ‘दोस्त थे. ऊपर से पुराने स्कूल की तरह ‘ओन्ली बॉइज़’ नहीं, ‘को-एड’ …मधुमक्खियों की तरह भिनभिनाती और डंक मारती लड़कियाँ… सब हँसते थे मुझ पर, मेरे पुराने स्कूल पर, मेरे ‘इंसेक्ट कलेक्शन’ पर, यहाँ तक कि मेरे बालों पर भी …एक बार ज़रा लम्बे हो गए तो ‘हेडमिस्ट्रेस मैम’ ने सिर पर टोपी रखकर सारे स्कूल के सामने कटवा दिए थे … दो दिन स्कूल नहीं गया था, पेट दर्द का बहाना करके, लेकिन उन दोनों ने कुछ नहीं कहा न बालों के बारे में पूछा, सिर्फ़ दवा दे दी थी… स्कूल के लिए एक शब्द नहीं सुन सकते , सारा दोष हमेशा मेरा ही. उस बार ‘स्टैग बीटल’ का जोड़ा ले गया था स्कूल, ‘नैचरल सायंस’ के ‘प्रोजेक्ट’ के लिए. कितनी मुश्किल से मिला था ‘पेयर’. धरती के नीचे छिपे रहते हैं, सिर्फ़ ‘मेटिंग सीज़न’ में कुछ हफ़्ते बाहर निकलते हैं. रोशनी और नई जगह से घबराकर वे बक्से के एक कोने में दुबक गये थे, एक पर एक चढ़कर. “ ‘दिस सीम्स टू बी देयर मेटिंग सीज़न’!” टीचर ने फबती कसी थी और जाहिलों से भरी वो क्लास खिलखिला पड़ी थी. सब उसे तबसे ‘मेटिंग सीज़न’ कहने लगे थे, ख़ासकर आँखें नचाने वाली लड़कियाँ. “ईयू…’मेटिंग सीज़न’!” जहाँ-तहाँउसे देखकर चिल्ला पड़ती थीं, क्लास में, गलियारे में, खेल के मैदान में… मुझे ‘बुली’ करते हैं सब, मम्मी- डैडी को बताया था लेकिन उन्हें क्या? “ ‘बी स्ट्रॉंग’…स्कूल में नया होने पर थोड़ा बहुत होता ही है. ‘एंड वाई टेक सच क्रीचर्ज़ टू स्कूल’? ले ही क्यों जाओ ये भद्दे कीड़े हर जगह? तुम्हारी ‘एडवाइज़र’ कह रही थी तुम ‘मेंटिस’ और टिड्डे इकट्ठे कर लाते हो मैदान से. अपने ‘क्लासमेट्स’ के बारे में भी सोचो. सबको कीड़े मकोड़े पसंद नहीं होते.” सब मुझे ही सीखना चाहिए, सब मेरी ही ग़लती है…’म’ ने अपना सिर दोनों हाथों से दबा लिया. मेरा क्या? मेरी तरफ़ से कुछ सोचना ज़रूरी नहीं?

भनभनाहट फिर शुरू हो गई. ‘मोबाइल फ़ोन’ की घंटी है. दो दिन पहले ही यह सस्ता वाला ख़रीदा था. ‘आइ फ़ोन’ तो डेढ़ा की भेंट चढ़ चुका है पिछले ही हफ़्ते. शायद डेढ़ा का ही फ़ोन हो शाम के बारे में. ‘टुडे इज़ द डे’…’म’ ने फ़ोन उठाया. डेढ़ा नहीं मयूर था. “ ‘व्हाट द फ़क मैन’. डेढ़ा आधे घंटे से फ़ोन कर रहा हूँ. तू है कहाँ? फ़ोन क्यों नहीं उठा रहा?” मयूर उसका एक मात्र दोस्त है नए स्कूल में. मम्मी – डैडी को बिल्कुल पसंद नहीं. “ ‘ही इज़ रॉंग काइंड ऑफ़ इन्फ़्लूयन्स’. ग़लत क़िस्म का लड़का है. ड्रग्स -वग्स के झमेले में मत पड़ जाना उसके साथ.” उन्हें कोई परवाह नहीं कि मयूर ही सिर्फ़ उसकी ‘सैनिटी’ बचाए हुए है, वरना पागल हो गया होता वह अबतक. “ ‘मदर फ़कर’ कुछ बोल… ख़ुद मरेगा, मुझे भी मरवाएगा…” ‘म’ ने फ़ोन काट दिया और काँपते हाथों से डेढ़ा का नम्बर मिलाया. “साले, मादर…” फ़ोन उठाते ही डेढ़ा धड़ल्ले से गालियाँ देने लगा. “डे…डेढ़ा भाई…” ‘म’ हकला उठा, “डेढ़ा भाई…सब तैयारी है, कोई दिक़्क़त नहीं होगी, डेढ़ा भाई… जैसा आपने कहा सब वैसा ही तैयार रखूँगा, डेढ़ा भाई …” एक क्षण की ख़ामोशी के बाद फ़ोन कट गया. ‘म’ ने कलाई पर दृष्टि डाली. घड़ी तो फ़ोन के साथ ही डेढ़ा को दे दी थी. दिन बहुत चढ़ गया है, नहाना चाहिए और कुछ खाना…जल्दी करनी होगी, आज सब ठीक हो जाएगा, सब. वह बाथरूम में घुस गया.

जब नए स्कूल का पहला रिज़ल्ट आया था और वह प्रथम नहीं आया था तो मम्मी- डैडी हतप्रभ हो गये थे. कैसे? उनका होनहार बेटा पाँचवे नम्बर पर? उसने बताना चाहा था – डैडी, मम्मी, कुछ भी ठीक  नहीं  है… मेरे कमरे में ‘गार्डन’ से कीड़े घुस आते हैं, झुंड के झुंड…आँधी – जैसी तितलियाँ, कान- फाड़ू शोर करने वाले झींगुर और ‘सिकाडा’…कमरा उनसे भर जाता है, साँस तक लेना मुश्किल हो जाता है…पढ़ा – लिखा नहीं जाता… इम्तिहान के दिनों में रोज़ ‘एमरल्ड मॉथ्स्’ का झुण्ड हरे बादल की तरह मेरे कमरे में घुमड़ आता था, बिजली की बत्ती को ढाँक लेता था … ‘मॉथ्स्’ मेरे कान, नाक में घुस जाते थे, मुँह पर पट्टी की तरह चिपक जाते थे … मैं चिल्ला भी नहीं पाता…मैं सो नहीं पाता मम्मी, मेरे कान में हमेशा खसखसाहट सी होती रहती है, डैडी… फ़र्श पर गिलगिले घोंघे और स्लग्स छा जाते हैं… हर रात ये होता है…यह घर बेच दीजिए डैडी, कहीं और चलिए. समुद्र के पास जहाँ खारी हवा में कीड़े नहीं पनपेंगे…वह कितने दिनों तक गिड़गिड़ाया था. लेकिन उन्होंने सुना? उसकी हालत पर थोड़ी भी दया आई उन्हें? “पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता , वाहियात दोस्त बना लिए और कम नम्बर आने पर पागलों जैसी बातें करते हो. कीड़े – मकोड़े!…कहाँ हैं कीड़े? सिर्फ़ तुम्हारे सर में भरे हैं. ‘यू शुड बी अशेम्ड’…’ जैसे वे दोनों अशेम्ड रहने लगे हैं मेरे कारण…दोस्तों, परिवार वालों से झूठ बोलते रहते हैं – “फिर फ़र्स्ट आया है, ऑनर रोल में है…” और जब कभी झूठ पकड़ा जाता है तो उससे नए सिरे से नाराज़ हो जाते हैं. “किसी अच्छी ‘यूनिवर्सिटी’ से ‘ऐक्सेप्टन्स’ नहीं आई अब तक. लाखों ख़र्च  किए तुम्हारी ‘ट्यूशन’ और ‘काउन्सलिंग’ पर और नतीजा ‘ज़ीरो’. नालायक…” ‘म’ ने शावर बंद कर दोनों हाथों से कान भींच लिए. बस, आज सब ठीक हो जाएगा. डेढ़ा और डेढ़ा का घोड़ा, सब ठीक कर देंगे…

जब मयूर ने पहली बार डेढ़ा से मिलवाया था तो ‘म’ को थोड़ी निराशा हुई थी. पतला-दुबला छोटे से क़द का आदमी. सड़क पर जा रहा हो तो कोई दोबारा न देखे. ‘शर्ट’ के खुले बटनों से झाँकती हड़ीली गर्दन और पसलियाँ, लगे जैसे किसी दुकान में कपड़ा बेचता होगा या किसी दफ़्तर में क्लर्क होगा. ग़ौर से देखने पर ही उसकी आँखों की तेज़ी और चौड़े मज़बूत हाथों पर ध्यान जाता था.

“डेढ़ा भाई तेरी सारी ‘प्रोब्लम’ ही ‘सॉल्व’ कर देंगे ‘ब्रो’! देखने में बकरी, काम में शेर हैं अपने डेढ़ा भाई. नाम की तरह डेढ़ आदमी की ताक़त है इनमें.” मयूर ने आजिज़ी  से दाँत दिखाए थे.

“काम बोल.” .डेढ़ा ने पलक भी नहीं हिलाई थी.

“मेरे मम्मी- डैडी को… मम्.. मम्मी- डैडी…” ‘म’ बुरी तरह हकला उठा था.

“ऐ, तू अकेला नहीं जिसको मम्मी – डैडी है. सबको होते हैं. उनका ‘गेम’ बजाना है? ‘म’ के मुँह से आवाज़ नहीं निकली थी. “ ‘फुल’ काम करना है उनका? मैं यही करता है. तू पहला नहीं मम्मी- डैडी वाला! साफ़ बोल.”

“मैं… मतलब उन्हें मारना नहीं…बस कुछ दिन के लिए अस्पताल में रहने जैसा…मतलब तब तक मैं यह घर बेच दूँगा…फिर सब ठीक हो जाएगा. यहाँ इतने कीड़े हैं…’टरमाइट्स’ और…और कनखजूरे.. रहना मुश्किल है…”

“ये येड़ा है क्या?” डेढ़ा ने मयूर की ओर देखा था. “देख हाफ़ काम, शैतान का काम. हर क़िस्म का ‘रिस्क’ उसमें. और तेरे भेजे में भूसा है अगर तुझे लगता है कि मम्मी- डैडी के ‘ऑफ़’ हुए बिना तू इस घर का ईंट भी छू सकता है.” “डेढ़ा भाई क्या सॉलिड बात कही है”. मयूर चापलूसी में झूम रहा था. “देख, जब तू डॉक्टर के पास जाता है, तो उसे इलाज़ करना सिखाता है? डेढ़ा भाई भी तेरी बीमारी का डॉक्टर है, बस डॉक्टर डेढ़ा पर छोड़ दे सब और जो ये कहे वह कर.”

“तू चमड़गिरी बंद कर” डेढ़ा ने शांत स्वर में मयूर को कहा था, “और सुन बे पप्पू, काम करवाना है तो हाँ बोल, ‘टाइम’ खोटी मत कर.”

‘म’ के कंठ से आवाज़ नहीं निकली थी लेकिन बात पक्की हो गई थी. “फुल पेमेंट’ करना होगा, ‘अड्वैन्स’. वरना बाद में तेरा काम ‘फ़्री’ में करना पड़ेगा.” इस बार डेढ़ा महीन मुस्कुराया था.

“पैसे तो नहीं हैं…मतलब अभी नहीं है…”

“डेढ़ा भाई, मा – बाप इसके बहुत पैसे वाले हैं. बड़ी नौकरी, यह बंगला.” मयूर के कहने पर डेढ़ा को घर दिखाने ले आया था उस दोपहर जब मम्मी -डैडी दफ़्तर में थे और काम वाली कहीं ऊँघ रही थी. “अभी जो कुछ दे सकता है, ले लो. आपसे बचकर वैसे भी कहाँ जाएगा.” मयूर ने पैरवी की थी.

आख़िर में ‘म’ ने अपना ‘आइ-फ़ोन, आइ -पैड, घड़ी, जेबख़र्च के पैसे, सब दे दिए थे. “काम वाले दिन ‘गार्डन’ वाले गेट से आऊँगा. घर का दरवाजा खुल्ला रखने का जिससे बस ‘इन’ और ‘आउट’.” डेढ़ा ने चुटकी बजाई थी. ‘म’ ने रट लिया था – ‘गार्डन’ वाला गेट, घर का दरवाज़ा, भीतर घुस कर…बस ‘इन’ और ‘आउट’…शनिवार को दोपहर एक से दो के बीच. शनिवार यानि आज…

‘म’ नहा कर कमरे से निकला तो घर में फैली शांति से आश्चर्य में पड़ गया. इस समय तो मम्मी- डैडी ‘लिविंग रूम’ में बातें कर रहे होते हैं, घर में पुराने गाने बज रहे होते हैं, किचन से मटन- मसाले की ख़ुशबू आ रही होती है. आज सब शांत… ’लिविंग रूम’ की दूसरी ओर लम्बे गलियारे के अंत में ‘मास्टर बेडरूम’ का दरवाज़ा खुला था. उसने झाँक कर देखा – सब कुछ तरतीब से लगा, सिर्फ़ एक साड़ी पलंग पर पड़ी थी. वह लौट कर खाने के कमरे में आया. किचन के दरवाज़े पर काम वाली खड़ी थी.

“साब – मेमसाब’ क्लब गए हैं, बाबा, घोड़ा -रेस के लिए. लंच के बाद लौटेंगे”.

‘म’ सन्न रह गया. ‘ब्लडी रेस सैटर्डे’…कैसे भूल गया वह? हर महीने का तीसरा शनिवार, चाहे आँधी, बारिश हो, या उसको टायफ़ाइड, ‘रेस सेटरडे’ नहीं छोड़ा जा सकता. डेढ़ा को बताना होगा. वह अपने कमरे की ओर दौड़ा.

“डेढ़ा भाई थोड़ा चेंज है… वह  ‘हॉर्स रेसिंग’ है आज…वे दोनों लंच तक बाहर हैं…मतलब आप चार से पाँच के बीच में आओ…”

“देख बे, तू मुझे जमूरा  समझता है? वे घोड़ा दौड़ा रहे हों या कबूतर उड़ा रहे हों, अपनी ‘सेटिंग’ हुई थी….” म’ कुछ देर तक डेढ़ा की गालियों के परनाले के उस ओर नाक दबाए खड़ा रहा. “डेढ़ा भाई, चार बजे से पहले आ जाएँगे दोनों. सब जैसा आपने कहा था वैसा ही रहेगा, दरवाज़ा खुला रखूँगा…”

“तूने फिर फ़फड़गिरी की तो तेरी…”

काम वाली अब भी रसोई और खाने के कमरे के बीच मँडरा रही थी.

“बाबा दाल – चावल तैयार है.”

“दाल -चावल तुम खा लो और जाओ रात को मत आना अब.”

“मगर मेमसाब कह कर गया कि…”

“हमने बात किया मेमसाब से. तुम जाओ, आज रात तक छुट्टी.” काम वाली की आँखों में संशय बना रहा लेकिन वह चली गई.

‘म’ ने डोमिनोज से दो बड़े ‘पिज़्ज़ा’ मँगवाए और ‘कोल्ड ड्रिंक’ की बड़ी बोतल’. दिमाग़ पर कुछ काई के जैसा जमा लग रहा था, कान में रात वाले सिकाडा की सीटियाँ अब भी गूँज रही थीं. उसने मयूर को फ़ोन किया. “अभी आजा. प्रोग्राम में थोड़ा चेंज है…”

“चेंज के बच्चे, साले तेरी वजह से डेढ़ा की गालियाँ खा रहा हूँ…साले…”

“अब पिज़्ज़ा खा. दस मिनट में पहुँच जा ठंडा हो जाएगा वरना.”

मयूर पिज़्ज़ा डिलीवरी वाले लड़के के पीछे पीछे ही घर में घुस. “यार फ़ट गई आज तो, क्या करता है तू? डेढ़ा के साथ संभल कर काम करना चाहिए. साँप-बिच्छु है एकदम.

‘म’ ने पिज़्ज़ा का डब्बा खोला. “मुझे ध्यान नहीं रहा आज रेस है…”

“कुछ का कुछ हो जाता तेरी लापरवाही से”, मयूर मुँह का ग्रास निगल कर बोला. “तुझे ध्यान रखना था.”

“मुझसे कोई बात ही नहीं करते आज कल…बस इसके इतने नम्बर आए, वह ‘सेट’ में इतना ‘स्कोर’ लाया…मैं तो कुछ हूँ ही नहीं अगर नम्बर नहीं लाता…”

“चिंता मत कर, ‘ब्रो’, अब सब सही हो जाएगा.”  मयूर ने ‘ज्वाईंट’ सुलगा कर उसकी ओर बढ़ाया.

तीन बजे के कुछ बाद दोनों लौटे. ‘म’ ने अपने कमरे की खिड़की से गाड़ी देख ली थी. नहीं भी देखता तो उनकी बातों और हँसी की आवाज़ से पता चल जाता. मयूर को गए कुछ देर हो चुकी थी और उसने सब खिड़कियाँ खोल दी थीं फिर भी मम्मी ने घर में घुसते ही नाक सिकोड़ी. “स्ट्रेंज स्मेल …” वह पढ़ने का बहाना करते हुए कमरे के खुले दरवाज़े से उनपर आँख रख रहा था. वे दोनों कपड़े बदलकर ‘लिविंग रूम’ में अख़बार और ‘मैग्जीनस’ पढ़ने लगे. चार से कुछ पहले वह अपने कमरे से निकला और ‘डाइनिंग’ रूम के रास्ते घर के दरवाज़े की ओर बढ़ा. ‘लैच’ खोल देगा कि डेढ़ा के धकेलने से खुल जाए. दरवाज़े के पास पहुँचा ही था कि घंटी बजी. ‘म’ चिहुंक उठा. एक क्षण लगा डेढ़ा समय से पहले आ गया शायद …दरवाज़ा खोलते ही उसी पर गोली…फिर थोड़ा संयत हुआ, डेढ़ा घंटी थोड़े ही ना बजाएगा. दरवाज़ा खोलने पर बग़ल वाले पुराने पड़ोसी खड़े थे. गली में बच रहे दो तीन बँगलों में एक बँगला उनका भी था।

 “कैसे हो बेटा? देखो कौन आए हैं!” आंटी ने अपने पीछे छुपे दो छोटे-छोटे बच्चों को आगे किया. “ये दोनों कल ही आए. आरती और आदित्य लंदन गये हैं, पंद्रह दिनों के लिए.” वे सब लिविंग रूम में आ गये.

“अरे वाह! नानू- नानी के घर आए हैं? कितने दिनों बाद देख रहे हैं इन्हें.” मम्मी ने बच्चों को बाहों में भर लिया.

“ भाई बड़े हो गए तुम दोनों तो.” पापा मुस्कुराए, “याद ही नहीं जब हमारा बेटा इतना छोटा था.”

‘म’ के हाथ पैर ठंडे हो गये थे. कान फिर सरसरा रहे थे. ये लोग कैसे आ गये? अब क्या करे? डेढ़ा को फ़ोन…

आंटी ने उसका हाथ पकड़ कर पास खींचा. “तुम कैसे हो बेटा? कितने दुबले लग रहे हो…”

“रात-रात भर पढ़ता है” मम्मी बोलीं, “यूनिवर्सिटी ऐडमिशन की तैयारी है”.

“इसे तो “आइ वी लीग” कॉलेज में जगह मिलेगी, इतना होशियार है.” अंकल ने संतरे की फाँक छिलकर नाती – नाती को खिलाई. “हमें तो याद है कैसे कीड़े- पतंगे इकट्ठे करता रहता था छोटा था तब!”

“हाँ! रात में भी मुँह में टॉर्च दबाए हाथ में जाली थामे.” आंटी हँसी. “बच्चे बड़े हो जाते हैं, बचपन भूल जाते हैं…” ‘म’ ने धीरे से अपना हाथ आंटी के हाथ से छुड़ाया. कान में गूँजती सीटियों के बावजूद उसे गार्डन के दरवाज़े की हल्की घिसट सुनाई पड़ गई. डेढ़ा…बंगले में आ गया है वह…कुछ करना है…

“हमारा तो एक ही बेटा है, ‘ऑल आवर ऐसपीरेशंस’…” पापा ने महीनों में उसकी तरफ़ पहली बार प्यार से देखा. आंटी – अंकल के आने के बाद दरवाज़ा बंद करना तो भूल गया…अब? डेढ़ा दरवाज़ा खुला देख कर सोचेगा कि…अपने दिल की घड़घड़ाहट के ऊपर उसे डेढ़ा के पैरों की चाप आ रही है… बाग़ के सूखे पत्तों की चरमराहट, सीधी पर जूतों की आहट…सब कमरे में घुस जाओ, उसने चिल्लाना चाहा, दरवाज़ा बंद करो, इन बच्चों को बचाओ…इन्हें बचाओ…पर उसके सूखे गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही है …वह बेतहाशा दरवाज़े की ओर भागा. दरवाज़ा बंद करना होगा…उसे घर में घुसने से रोकना होगा किसी भी तरह… ‘म’ ने दोनों हाथों से अधखुले दरवाज़े के पल्ले को अपनी ओर खींचा, पर देर हो चुकी थी. दरवाज़ों की खुली फाँक से कीड़ों की बाढ़ उमड़ी आ रही थी – लाल – काले, भृंग, बीर-बहूटियाँ, गुबरैले, गोज़र, हर परिचित कीट जो उसने कभी मनोयोग से इकट्ठा किया था अब एक विराट जुगुप्सामय लहर में घर में घुस रहा था… वह डूब रहा था…घर डूब रहा था…

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2 comments

  1. इतना लिखना और अनेको अनेक पुस्तक पढना कोई आसान काम नहीं . मई जानकी पुल की छोटे-मोटे कहानियों को देख लेता हूँ. ख़ास कर जो साहित्य से जुडी हुई होती है उन्हें ज्यादा पड़ता हूँ. सामग्री उपलब्ध कराने के लिए आप सभी का धन्यवाद.

  2. कहानी मनोवैज्ञानिक लग रही थी, अंत आते-आते अजीब सी जासूसी ढब वाली हो जाती है.

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