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इतिहास, स्त्री एवं पवन करण का ‘स्त्री शतक’

वरिष्ठ कवि पवन करण की पुस्तक ‘स्त्री शतक’ की एक विस्तृत समीक्षा लिखी है अमित मंडलोई ने- मॉडरेटर

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पीढिय़ों का इतिहास पन्नों में दफन हो जाता है। उन्हीं के साथ नेपथ्य में चले जाते हैं शूरवीरों के किस्से और युद्ध की गाथाएं। खत्म हो जाती हैं सारी कही-अनकही कहानियां। लोरियों में घुलकर हवाओं में बिखर जाती हैं प्रेम और विरह की सारी कथाएं। वक्त की देहरी पर अगर कुछ बाकी रह जाता है तो वे होते हैं एक स्त्री के सवाल। वे छिनी हथोड़ी लेकर समय के पाषाण पर हर रोज चोट करते हैं। क्योंकि कहानियों में योद्धा होते हैं उनकी प्रेमिकाएं, गणिकाएं होती हैं, लेकिन उनके अहसास कहीं नहीं होते। उनकी प्रतिक्रियाएं नहीं होती। क्योंकि जानते हैं कि स्त्री की प्रतिक्रियाएं यदि वक्त पर समझ ली गईं होती तो दुनिया का इतिहास वह नहीं होता जो आज है। सदियों से स्त्री की देह पर उतरती पीढिय़ां उसके मन पर अब तक नहीं पहुंच पाई, हर बार कोई कवि ही झिंझोड़ कर यह बात हमें समझाता है। स्त्री शतक के जरिये कवि-लेखक पवन करण के हिस्से में फिर यही काम आया है।

स्त्री शतक में इतिहास के पन्नों में दर्ज ऐसी 100 महिलाओं को उनके अहसासों के साथ सामने लाकर खड़ा कर दिया गया है। हर किरदार एक सवाल है। सवाल हमारी पीढिय़ों से, हमारी सोच, समझ से। मान्यताओं, दुर्बलताओं और पाखंड से। शतक की पहली कविता ही आपके जिस्म ही नहीं आत्मा पर चढ़े सारे लबादे उतारकर फेंक देती है। वृहस्पति की स्त्री तारा, जिसे चंद्र भगाकर ले गए थे। वह जब कहती है कि चमक का घर अंधेरे में डूबा रहता है, तो भीतर तक घना कोहरा भर जाता है। चंद्र की करतूत को याद कर कवि कहता है मैं यदि तुमसे कहूं कि तुम्हारा चेहरा चंद्र की तरह सुंदर है… तो तुम मेरी यह उपमा .. अपने चेहरे से नोचकर फेंक देना…वजह आखिरी पंक्ति में मिलती है किसी पुरुष का किसी स्त्री के चेहरे में चंद्र देख लेना, चंद्र को खुद उसके चेहरे का पता बता देना है।

इंद्र की पुत्री जयंति ऐसा सवाल खड़ा करती है कि सांस लेना दूभर हो जाता है वह कहती है.. देवताओं को स्त्रियां तब तक ही प्रिय हैं। जब तक वे उनकी अनुगता हैं, कामिनी हैं.. पैर दबाती लक्ष्मी सी आज्ञाकारिणी और ऋषि-तपस्या भंग करतीं मेनकाएं हैं। इसके बाद कुछ और कहने को क्या बाकी रह जाता है। स्त्रियों के सवाल महादेव की अद्र्धांगिनी गौरी तक जाते हैं। जब कौशिकी उन्हें कठघरे में खड़ा करती है, पूछती है उनसे कि वे क्यों रुद्र के विनोद का जवाब नहीं दे पाईं। क्यों नहीं कह पाईं कि महादेव, विनोद में ही सही, आप मुझे काली कहकर संसार की असंख्य स्त्रियों को प्रताडि़त कर रहे हैं। मगर आप तो शिव कथन से इतनी भयभीत हो गईं .. कि आपने अपनी सांवली त्वचा ही.. उतार फेंकी मेरे रूप में। आपने सोचा नहीं कि वस्त्र की तरह अपनी सांवली त्वचा उतारकर आपके अलावा संसार की कोई स्त्री गौरी हो सकेगी कभी।

वे राम की बहन शांता की आवाज बन जाते हैं। कहते हैं… जब दशरथ उसे ऋष्यशृंग को ..सौंप रहे थे तब क्या उसने.. तुमसे कहा कि मैं किसी.. ऋषि से नहीं राम भैया जैसे किसी राजकुमार से ब्याह करना चाहती हूं। कृष्ण पुत्री चारुमति के दर्द को साझा करते हैं। चारुमति कहती है जब स्त्रियों को मान देने वाले पिता ही.. चूक जाएंगे हृदय परखने से मेरा.. तो इस बात का मेरे लिए महत्व रह जाएगा कितना कि मैं पुत्री कृष्ण की। वहीं कृष्ण की बहन एकनंगा भी वही सवाल उठाती है… खुद की अनदेखीं वे बहनें थीं हम.. जो अपने-अपने कालखंड की स्मृतियों में छूटती गईं सबसे पीछे.. जबकि हम में से एक कृष्ण की बहन थी और एक राम की। सच ही तो हैं संसार में कृष्ण और राम की वंशावली में शांता और चारुमति को हम कितना याद रख पाए हैं।

वे स्त्री के दूसरे रूप को भी उद्घाटित करते हैं। मंथरा के मन की थाह लेते हैं। कहते हैं… मंथरा, भरत और केकयी से पहले..अपने दासत्व के लिए राजगद्दी चाहती थी.. जो मिली भी उसे, उसके दासत्व ने.. पूरे चौदह बरस सूने राजसिंहासन पर किया राज … दैत्यों की उत्पत्ति के लिए चुनी गई दिति जब कवि के मुंह से बोलती है जो दिशाएं भी अवाक रह जाती हैं। वह पूछती है मुझे ही क्यों चुना इसके लिए.. क्या इसलिए कि मैं स्त्री थी.. कश्यप को भी तो जा सकता था चुना.. मेरी जगह उन्हें भी तो दहका सकती थी कामाग्नि.. अंतत: मां तो बनना था मुझे ही।

ब्रह्मा की अप्सरा के रूप में भी फिर वही सवाल हमें मथता है। अप्सराएं प्रेम करने के लिए नहीं.. प्रेम प्रकट करने के लिए होती हैं मुझसे कहा जाता अक्सर घर की तरह नहीं उनकी देहें होती हैं सराय की तरह.. मां बनने के लिए नहीं बच्चे जनने के लिए होती हैं उनकी कोखें… तो ऐसा लगता हैै किसी ने पीठ उघाड़ पुरुषों को महिमा मंडित करते तमाम किस्सों पर कोड़े बरसा दिए हैं। रति के रूप में वे कहते हैं…क्या यह स्त्री रूपा होकर भी एक स्त्री के गर्भ से जन्म न ले पाने की तुम्हारी पीड़ा है जो तुम्हे स्त्री के भीतर बांधे रखती है संकोच से।

अनामिका के मुंह से जब वे कहते हैं तो लगता है स्त्रियों की सारी पीड़ा को जुबान मिल गई है। दासी अनामिका कहती है… मैं दासी न होकर देवी होती.. और उसकी कामललक.. उसे खींच लाती मेरे पास.. देवताओं की नजरों में तब भी.. हम दोनों पवित्र बने रहते.. आखिर में वह कहती है समस्या मेरे दासी होने में थी.. न कि मेरे स्त्री होने में, मैं दासी थी इसलिए अशुद्ध थी.. कुलटा थी.. शूद्रा थी।

इतिहास की सौ स्त्रियों की भावभूमि से अवगत कराने के लिए पवन करण निश्चित तौर पर साधुवाद के पात्र हैं। उन्हें पढऩे के बाद समझ आता है कि कलाकार सूने कैनवास में रंग भरते हैं, अनगढ़ पत्थरों को देवता बना देते हैं और कवि मन को तराशता है। स्त्री शतक की हर कविता स्त्री के प्रति नई समझ विकसित करने की कोशिश करती नजर आती है।

पुस्तक ज्ञानपीठ से प्रकाशित है और ऑनलाइन सहित प्रमुख स्टोर्स पर उपलब्ध भी।

अमित मंडलोई

                                                                संपर्क .9057531264

पुस्तक का नाम : स्त्रीशतक

प्रकाशनक का नाम: भारतीय ज्ञानपीठ

प्रकाशन वर्ष : 2018

पुस्तक का मूल्य: 370 रूपये।

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One comment

  1. वाह ! बहुत अच्छा विषय भी चुना है। स्त्री सदैव से उपेक्षित सी रही है, वस्तु जैसा व्यवहार किया गया है उसके साथ। उसकी भावनाओं को तो हमने समझना ही न चाहा या यूँ कहें कि वह स्वयं यह भूल गई कि उसकी कोई भावनाएँ भी हो सकती हैं। वह तो मानो मशीन होकर रह गई।

    ऐसे में पवन करण की ‘स्त्री शतक’ निश्चित ही आशा की किरण हो सकती है और आशा की जा सकती है कि पुरुष अपनी ग़लतियाँ सुधारने के लिये अब आगे आयेगा तथा नारी को उसका यथोचित स्थान व सम्मान मिल सकेगा।

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