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त्रिलोकनाथ पांडेय के उपन्यास ‘प्रेम लहरी’ का एक अंश

आज प्रेम के देवता का प्रकट-दिवस है। मुझे त्रिलोकनाथ पांडेय के उपन्यास ‘प्रेम लहरी’ का स्मरण हो आया, जो राजकमल प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है। इस ऐतिहासिक उपन्यास में कई लहरें हैं प्रेम की। आज एक लहर जो इसकी मूल कथा से कुछ इतर है लेकिन इतिहास का जाना-माना अध्याय है- मॉडरेटर

 

हमसफर  

शाहजहाँ अपनी प्रियतमा मुमताज को हर सुख-दुख में अपने दिल से चिपकाये रखता था। बगावत के दिनों की कठिनाइयों, लड़ाई के मैदानों, शिकारगाहों और यात्राओं में मुमताज सदैव शाहजहाँ के साथ रहती।

ताप्ती नदी के बायें तट पर बसा खूबसूरत शहर बुराहनपुर खानदेश सूबे की राजधानी थी। हिन्दुस्तान के बीचो-बीच बसे इस शहर को दक्खन का द्वार भी कहा जाता था। इस शहर का मुगलों के लिए विशेष सामरिक महत्व था। शाहजहाँ शाहजदा खुर्रम के रूप में करीब पाँच वर्षों तक खानदेश का सूबेदार रहा और निवास किया बुराहनपुर के शाही किले के बुलारा महल में। साथ में रही उसकी महबूबा बेगम मुमताज।

अपनी प्राणप्रिया के साथ जलक्रीड़ा के लिए शाहजादे ने वैसा ही बनवाया था एक खूबसूरत हम्माम जैसा आगरे में था। फर्क सिर्फ इतना था इस हम्माम की गुम्बदाकार छत और दीवारें खूबसूरत चित्रकारी और काँच के रंगीन टुकड़ों से सजी थीं। जरा-सी भी रोशनी में ये काँच के टुकड़े जगमगा उठते थे। इनकी जगमगाहट भरी रोशनी जब मुमताज के दुग्ध-धवल सुवासित जल से भींगी संगमरमरी सुन्दर नग्न बदन पर पड़ती थी तो मुमताज जन्नत की हूर-सी लगती थी। शाहजादा इस नफीस नज़ारे पर मर मिटता था। दोनों घण्टों हम्माम में क्रीड़ा करते रहते थे।

शाहजहाँ के शासन के तीसरे वर्ष की बात है। उसे अपने पिता जहाँगीर के अत्यन्त विश्वस्त अमीर खानजहाँ लोदी के विद्रोह को कुचलने के लिए सैनिक अभियान पर दक्षिण की ओर कूच करना पड़ा। उसने बुरहानपुर को अपने सैनिक अभियान का मुख्यालय बनाने का निश्चय किया और शाही दरबार को आगरा से बुरहानपुर कूच करने का हुक्म दिया।

उस समय मुमताज की उम्र लगभग चालीस हो चली थी। अपने उन्नीस वर्षों के वैवाहिक जीवन में वह चौदहवीं बार माँ बनने वाली थी। लगभग हर साल बच्चा पैदा कर-कर वह बहुत कमजोर हो चली थी और इतनी दूर की यात्रा करना उसके लिए खतरनाक था। लेकिन यह बात आशिक बादशाह की समझ में न आयी। वह महबूबा को पीछे आगरा में छोड़ना सोच भी नहीं सकता था।

शाहजहाँ ने तुरन्त एक शानदार और आरामदेह पालकी तैयार करवायी जिसको बारी-बारी से ढोने के लिए आठ-आठ बलिष्ठ कहार नियुक्त किये गये। कहारों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया कि कैसे ऊँची-नीची जगहों से गुजरते हुए पालकी ऐसे ढोयी जाय कि बेगम साहिबा को तकलीफ न पहुँचे।

बादशाह एक विशाल तख्त पर बनाये गये छोटे-से सुन्दर कलाकृतिपूर्ण भवन में यात्रा कर रहे थे जिसे कई कहार उठाकर चलते थे। यह भवन मुलम्मा किये हुए खम्भों से बना था जिसमें काँच की खिड़कियाँ थीं और जिन्हें आँधी-पानी के समय बन्द कर दिया जाता था। खुले में चलने के शौकीन बादशाह कन्धों पर उठाये गए इस भवन के बजाय घुड़सवारी करके चलना ज्यादा पसंद करते थे। बादशाह की सवारी के पीछे मनसबदारों, अमीरों और हुक्मरानों का झुण्ड घोड़ों पर सवार होकर चल रहा था।

बेगम साहिबा के साथ उनके बच्चे भी थे। सत्रह बरस की सबसे बड़ी बेटी जहाँआरा और चौदह साल की रोशनआरा अलग-अलग हाथियों के हौदों पर बने मेघाडम्बर में यात्रा कर रही थीं। चारो बेटे अपने-अपने ढंग से घोड़े या हाथियों पर चल रहे थे। सोलह वर्षीय दाराशिकोह ज्यादातर अपने हाथी फतेहजंग पर चलता था, जबकि तेरह वर्षीय औरंगजेब घोड़े पर यात्रा कर रहा था। पन्द्रह वर्षीय शाहशुजा हाथी की सवारी करना पसन्द करता था, जबकि सबसे छोटा सात वर्षीय मुराद सेविकाओं की देखरेख में पालकी में यात्रा कर रहा था।

दलबादल नामक विशाल शाही तम्बू को कई हाथियों और ऊटों पर लादकर पहले से ही पड़ाव वाले जगहों पर पहुँचा दिया जाता था। शाही काफिले को पहुँचने पर वहाँ तम्बुओं का एक छोटा-मोटा शहर बस जाता था। सारे शाही ताम-झाम वहाँ उपलब्ध होते थे। मनोरंजन के लिए संगीतकार, मसखरे और नाटकमण्डली साथ चल रही थी।

पड़ाव वाली जगहों पर बादशाह का दरबार जुट जाता था जहाँ वह राज-काज निबटाते थे। बेगम साहिबा अपनी बेटियों के साथ तम्बू में ही रहती थीं। दाराशिकोह अपने आध्यात्मिक अध्ययन में लगा रहता था, जबकि औरंगजेब कुरान का पाठ करने में व्यस्त। शाहशुजा मौज करने और शराब पीने में मस्त था। छोटू मुराद खेल-कूद में मग्न होकर फुदकता रहता था – कभी बादशाह के पास तो कभी बेगम के पास और कभी-कभी अपने भाईयों के साथ।

राज-काज निबटाने के साथ-साथ बादशाह पड़ाव वाली जगहों पर अपने साज-समाज के साथ शिकार पर भी निकलते थे। कभी रास्ते में पड़ने वाले लोगों की फरियाद सुनते थे, उनके मामले निबटाते थे और गरीबों को खैरात बाँटते थे।

शाही काफिला आगरा से धौलपुर, ग्वालियर, डोंगरी होते हुए करीब पाँच महीनों में बुरहानपुर पहुँचा। बुरहानपुर पहुँचकर बादशाह सपरिवार अपने प्रिय बुलारा महल में ठहरे। उन्होंने पहले ही शाही किले में दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास बनवा रखा था जहाँ उनका दरबार पूरे शान-शौकत के साथ शुरू हुआ। शाही सेना खानजहाँ लोदी को शिकस्त देने और उसके सहयोगी अहमदनगर राज्य को तहस-नहस करने में लग गयी।

मुहब्बत जिन्दाबाद

बादशाह अपनी महबूबा मुमताज के साथ अपने खास शाही हम्माम में पहले की तरह रंगरेलियाँ मनाना चाहते थे। लेकिन, बारम्बार प्रसव से बेगम बहुत कमजोर थीं और लम्बी यात्रा से बीमार हो गयीं थीं। ऊपर से चैदहवीं प्रसव का समय एकदम नजदीक था। मन मसोस कर बादशाह ने बेगम को प्रशिक्षित दाइयों और सेविकाओं के हवाले किया और शाही हकीम की देख-रेख में बढ़िया-से-बढ़िया इलाज का इन्तजाम किया।

बुधवार के दिन गर्मी अपने उरूज पर थी। सुबह से ही बेगम की तबियत नासाज थी। उनका मन अजीब-अजीब आशंकाओं से भरा हुआ था। उनकी बेटी जहाँआरा लगातार उनके पास बैठी हुई थी। हकीम की दवाओं का कुछ खास असर न हो रहा था। घबड़ा कर जहाँआरा ने दुआओं का सहारा लिया। बदहवास-सी वह कीमती सामान और जवाहारात गरीबों में बँटवाने लगी ताकि उनकी दुआ उसकी अम्मी के काम आ सके। साथ ही, वह अल्लाह से लगातार प्रार्थना करती जा रही थी। लेकिन, इन सबका कुछ खास असर होता न दिख रहा था। बेगम मुमताज मारे दर्द के छटपटा रही थीं।

शाम होते-होते शाही हकीम के इशारे पर दाइयों और सेविकाओं ने सुरक्षित प्रसव के लिए प्रबन्ध करना शुरू किया। बेगम साहिबा का कराहना बढ़ता जा रहा था। बादशाह मरदाने में बैठे हुए लगातार बेगम का हाल पूछ रहे थे। दो घड़ी रात जाते-जाते बेगम बेदम होनी लगीं। उन्होंने जहाँआरा को भेजा बादशाह को बुला लाने के लिए।

बदहवास-से बादशाह जब तक पहुँचते तब तक बेगम ने एक नन्हीं-सी बेटी को जन्म दे दिया था। लेकिन उनके जननांग से लगातार रक्त-स्त्राव हो रहा था। बादशाह को बड़ी कातर निगाहों से देखते हुए बेगम ने उनका हाथ धीरे-से पकड़ लिया और बोला “अब मेरे जाने का वक्त आ गया है। ’’

थोड़ी देर सुस्ता कर बेगम ने फिर बोला, “आप वादा करो कि दूसरी शादी न करोगे और अब आगे से यही जहाँआरा आपका ख्याल रखेगी। ’’ यह कहते हुए बेगम ने बादशाह का हाथ जहाँआरा के हाथ में थमा दिया। बाप-बेटी इसका मकसद न समझ भौंचक्के-से रह गये।

इस बीच, फिर से थोड़ी ताकत जुटा कर बेगम ने बोलना शुरू किया “मेरी यह बेटी जो अभी पैदा हुई है इसकी मर्जी का हर तरह से ख्याल रखना और देखना कि कोई इसे अपशकुनी और मेरी मौत का जिम्मेदार न ठहराये। इसकी हर ख़ुशी का ख्याल रखना। ’’

बादशाह ने बेगम के हाथ को जोर से पकड़ लिया और सिसकने लगे, “बेगम हम तुम्हें जाने न देंगे। ’’

बेगम ने हल्के से सिर हिलाते हुए बोला, “मुहब्बत जिन्दाबाद!’’

बादशाह के मुँह से अपने आप निकल गया “मुहब्बत जिन्दाबाद!’’

ठीक उसी वक्त मुमताज ने अंतिम सांस ली।

 

अगले दिन, जुमेरात को, बेगम साहिबा का शव ताप्ती नदी के उस पार जैनाबाद, जो कभी मुगलों का आहूखाना (शिकारगाह) हुआ करता था, में दफनाया गया।

चारो तरफ रोने-पीटने की आवाजें उठ रही थीं। लेकिन, बादशाह आश्चर्यजनक रूप से शान्त थे। वह अपने होश में नहीं लग रहे थे। लगता था उनका मन-मस्तिष्क दूर कहीं खोया हुआ है। वह लगातार कुछ बुदबुदा रहे थे। गौर करने पर पता चला कि वह ‘मुहब्बत जिन्दाबाद’ ‘मुहब्बत जिन्दाबाद’ की रट लगा रहे हैं।

बेगम को दफन होने के बाद बादशाह ने अपने को एक कमरे में बन्द कर लिया। बाहर से लोगों ने सुना जैसे वह किसी से जोर-जोर से बातें कर रहे हों और बीच-बीच में ‘मुहब्बत जिन्दाबाद’, ‘मुहब्बत जिन्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे। कभी-कभी भीतर से कोई आवाज न आती थी – शायद बादशाह सो जाते थे या गहन समाधि – प्रेम-समाधि – की अवस्था में चले जाते थे।

यह स्थिति आठ दिनों तक चली। इतने दिनों बादशाह न कुछ खाये, न पीये, न कमरे से बाहर आये, न किसी से बात की। आठवें दिन वह बाहर निकले। लेकिन, इन आठ दिनों में ही बादशाह बिल्कुल बूढ़े-से हो गये। उनकी उम्र अभी मुश्किल से बयालिस या तिरालिस साल थी, लेकिन इन आठ दिनों में ही उनके काले घने सुन्दर बाल बिल्कुल सफेद हो गये।

कमरे से निकलकर बादशाह ने किसी से बात न की। वह सीधे शाही हम्माम गये जहाँ वह दीवार पर बने एक चित्र को एकटक देखते रहे। यह एक इमारत की तस्वीर थी। फिर वहाँ से निकल कर वह जैनाबाद की ओर चले। लोगों का हुजूम उनके पीछे चला। ताप्ती नदी पार कर वे बेगम की कब्र पर पहुँचे। कब्र पर हाथ रखकर उन्होंने जोर से बोला ‘मुहब्बत जिन्दाबाद’।

लोगों का हुजूम कुछ दूर रूका हुआ था और बादशाह कब्र पर हाथ रखे बड़बड़ा रहे थे, “बेगम, मैं समझ गया मुहब्बत कैसे जिन्दाबाद रहेगी। मैं मुहब्बत को जिन्दाबाद रखूँगा, जिन्दाबाद रखूँगा। ”

अगले चालीस दिन बादशाह बेगम की कब्र पर जाते रहे। चालीस दिन कब्र पर हर शाम दीये जलाये जाते रहे और प्रार्थना की जाती रही। चालीस दिनों तक बादशाह ने राज-काज पर बिल्कुल ध्यान न दिया।

इस बीच, शाही सेना ने सैनिक अभियान में फतह हासिल कर लिया, खानजहाँ लोदी को मार डाला गया और अहमदनगर राज्य पर कब्जा हो गया। लेकिन, जीत की ख़ुशी कहीं नहीं थी। पूरे मुगल साम्राज्य में शोक की घोषणा कर दी गयी; हर प्रकार के राग-रंग को रोक दिया गया; नये चटकदार वस्त्राभूषण पहनने पर रोक लगा दिया गया और उल्लंघन करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया।

इकतालिसवें दिन बादशाह ने प्रसिद्ध वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी को तलब किया और राजदाराने अन्दाज में बताया कि वह लगभग रोज एक ख्वाब देखते हैं कि अर्श-आशियानी बेगम मुमताज महल सफेद कपड़ों में लिपटी एक बेहद खूबसूरत सफेद इमारत में घूम रही हैं। ज्योंही उनकी ओर गौर करते हैं वह सफेद इमारत की सफेदी में सफेद धुआँ-सी समा जाती हैं और फिर नींद खुल जाती है।

बादशाह अहमद लाहौरी को शाही हम्माम में ले गये और दीवार पर बने इमारत की तस्वीर को दिखाते हुए बताया कि ख्वाबों वाली इमारत कुछ-कुछ ऐसी ही है, लेकिन शान और खूबसूरती में इससे हजारों गुना आगे।

अहमद लाहौरी सोच में पड़ गये जब बादशाह ने इच्छा जाहिर की कि ख्वाबों वाले महल जैसा ही सफेद मकबरा मरहूम बेगम की कब्र पर बनवाना है। काफी देर तक चुप रहने के बाद अहमद लाहौरी ने अर्ज किया कि खुद बादशाह हुजूर ने उस सफेद इमारत को ख्वाबों में देखा है और बेहतर यही होगा कि उस इमारत का खाका खुद बादशाह ही अपने इलहाम की रौशनी में बनायें।

बस फिर क्या था, बादशाह जुट गये खाका तैयार करने में। कागज पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचते कई दिन बीत गये, लेकिन सपनों के महल का नक्शा न बन पाया। बादशाह बहुत दुखी और क्षुब्ध हो गये। मारे दुख के कागज-कलम एक तरफ रख दिया।

दुख के दरिया में डूबे बादशाह को एक दिन लगा कि उनकी बेगम ने पीछे से उनके कन्धे पर हाथ रख दिया हो। पलटकर देखा तो वह ख्वाबों वाले महल का दृश्य सामने था। मरहूम बेगम उसमें मुस्कराते हुए खड़ी हैं। बादशाह को महसूस हुआ कि उनके जेहन में सफेद रोशनी का एक गुबार उठ रहा है। उस रोशनी में ही उन्होंने कागज पर रोशनाई से लकीरें खींचनी शुरू की और जब तक जेहन की रोशनी धुंधली पड़ती एक इमारत का नक्शा कागज पर तैयार हो चुका था।

अहमद लाहौरी ने जब उस नक्शे को देखा तो हैरत में पड़ गये और उनके मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा, “यह तो इन्सानी ईजाद न है। यह तो एकदम फिरदौसी है। ’’ अहमद लाहौरी ने हामिद खाँ, गयारत खाँ और मकरामत खाँ जैसे मशहूर वास्तुविदों को बुलवाकर सलाह-मशाविरा किया और जैनाबाद में जहाँ बेगम की कब्र थी वहाँ की जमीन का मुआयना किया। सबने एक मत से महसूस किया कि नक्शे के हिसाब से भव्य इमारत बनाने के लिए ताप्ती नदी के किनारे की दलदली जमीन ठीक नहीं है।

बादशाह ने जब वास्तुकारों की राय सुनी तो चिढ़ते हुए अपने हुक्म को दुहराया कि मकबरा उतना ही शानदार बनना चाहिए जितना उन्होंने ख्वाबों में देखा है। चाहे इसे आगरे में ही क्यों न बनाना पड़े। बस फिर क्या था, तुरन्त ऐलान हुआ कि मकबरा आगरा में यमुना के किनारे बनेगा और बेगम की कब्र वहीँ ले जायी जायेगी। इस ऐलान के साथ बादशाह ने आगरे की ओर कूच कर दिया।

बाद में, मरहूम बेगम के जनाजे को एक विशाल जुलूस के साथ, शाहजादा शाहशुजा के नेतृत्व में आगरा लाया गया। आगरे में यमुना के तट पर स्थित राजा मानसिंह के पोते राजा जयसिंह की जमीन में दोबारा दफन किया गया।

इस कब्र के ऊपर बनना शुरू हुआ ख्वाबों का महल जिसे लगभग बीस हजार मजदूरों, राजगीरों, जौहरियों और वास्तुविदों ने मिलकर बाइस वर्षों में तैयार किया। नाम दिया गया – ताजमहल। यह था बेगम मुमताज महल का अन्तिम विश्रामस्थल। सफेद संगमरमर की यह बेमिशाल इमारत बादशाह के ख्वाबों की हकीकत बयां करने के साथ-साथ पूरी दुनिया को जाहिर करती थी कि अपनी महबूबा के लिए कोई जो कुछ कर सकता है उसका यह ओज-ए-कमाल है।

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One comment

  1. वाह अद्भुत । कहानी कहने का अंदाज़ भी दिलचस्प । वाकई प्रेम लहर।

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