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वरिष्ठ कवि ऋतुराज की चीन डायरी

आज हिन्दी दिवस है। सुबह से सोच रहा था कि क्या लगाऊँ। अंत में मुझे लगा कि आज किसी वरिष्ठ लेखक का लिखा पढ़ा-पढ़ाया जाये। ऋतुराज जी की चीन डायरी कल रात ही ‘बनास जन’ में पढ़ी थी। सोचा आप लोगों से भी साझा किया जाये- मॉडरेटर

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15 अप्रैल, 1993

आज मैंने तय किया कि मैं बदलते हुए चीन का साक्षी बनूँगा।

पेकिंग विश्वविद्यालय की झील के किनारे एक बूढ़ा आइसक्रीम बेच रहा है। यहाँ भी सेलिक्स बेबीलोनिया (विलो) के वृक्ष पानी को छूने की कोशिश करते हुए झालरों की शक्ल में लटके हैं। हाएतियान जाती गली बिलकुल साफ है। सब जगह मानवीय ऊष्मा और गतिशीलता का स्पन्दन है। फुटपाथी बाजार खचाखच भरा हुआ है। मुझे चाँदनी चैक की याद दिलाता। यहाँ माइक्रोफोन पर मिनी बस के ड्राइवर सवारियों के लिये चिल्ला रहे हैं, तो छोटे-मोटे फेरीवाले भी शोर मचाने में कम नहीं हैं। लड़कियों के हाॅस्टल में लड़कों का बेरोकटोक आना जाना है। यहाँ तक कि साथ-साथ भी रह रहे हैं। बहुत बड़े डिपार्टमेंट स्टोर हंै यहाँ तक कि साथ-साथ भी रह रहे हैं। बहुत बड़े डिपार्टमेंट स्टोर हैं। जहाँ सब कुछ मिलता है। माँस की वही तीखी गंध सर्वत्रा है, व्यंजनों की अपरिचित विविधता…कुत्ते-बिल्ली पके-पकाए…। एक दुमंजिला इमारत में हाएतियान का बुक-सिटी अवस्थित है। चीन के सब प्रकार के प्रकाशकों के लिये एक शाँत पवित्रा व्यवस्थित बाजार। अधिकाँश पुस्तकें चीनी भाषा में हैं। मेरा बेटा भी, काश, यहाँ पढ़ता होता अपनी मनपसंद साथिन के साथ। इस तरह ट्यूलिपों और चेरी-ब्लासमों के बीच हाथ में हाथ पकड़े।…बंसी डाले घँटों बैठा रहता झील के किनारे चट्टान परा। तब शायद में उससे कहता, प्रेम में तेरना मगर डूबना नहीं, जैसे ये चीनी युवा-युवतियाँ प्रेम को जीवन का सबसे स्वस्थ अंग मानकर चलते हैं।

19 अप्रैल

चीनी मित्रों का व्यवहार सदैव एक समान नहीं होता। श्री छन चुंग रूंग कई देशों का दौरा करके लौटे हैं। भारतीय दूतावास में अत्यन्त आत्मीयता से मिला करते थे। लेकिन आज बोले भी नहीं। न मेरा हालचाल पूछा। अपने चीनी सहयोगियों से बात करते रहे।

विभाग का हर कोई कर्मचारी, भले ही निदेशक नेता के पद पर हो, सुबह दफ्तर पहुँचते ही पोंछा लेकर सफाई करता नजर आयेगा। यहाँ कोई छोटा बड़ा नहीं है। मेरी मेज, कुर्सी श्रीमती सुन ईन साफ करती हैं। श्री वाँग चिन फंग माॅप से फर्श साफ करते दिखायी देंगे। न कोई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी है, न घँटी, अपनी पानी की बोतल खुद लाओ, अपनी जरूरतें खुद पूरी करो और काम में लग जाओ।

न जानो क्यों पोलिश विशेषज्ञ चीन के साथ-साथ भारत का भी मजाक उड़ाती हैं। कहती हैं, भारत चीन की माँ है, यानी बौद्ध धर्म की जननी के रूप में, लेकिन क्या माँ होना ही काफी है? गरीब और विक्षिप्त-सी माँ से कौन प्यार करेगा?

20 अप्रैल

प्रो. सुन पाओ काँग भारी मच्छीमार निकले। उनका घर नदी यूछहरूह के पास है। उनके पास कोई एक दर्जन फिशिँग राॅड होगी।

आजकल चीन के वेतनभोगी वर्ग की एक मात्रा चिंता है कि किस तरह दिनभर सरकारी नौकरी करके अतिरिक्त समय में अपनी आय बढ़ाए। इसके लिए व्यापार करते हैं तो समय चाहिए।

प्रो. सुन पाओ पूछते हैं, क्या ऐसा करने से कार्यक्षमता पर असर नहीं पड़ेगा? वे साठ वर्ष से ऊपर के होगे तब उन्हें अपने ‘श्वेनशँग शोध संस्थान’ का काम संभालना है। साथ ही, हिन्दी-चीनी शिक्षण की एक पुस्तक भी तैयार करनी है।

आज श्रीमती सुनईंग ने मेरे स्वास्थ्य के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की। एक बड़ी बहन जैसे कि अपने लापरवाह भाई के प्रति चिंतित रहती है।

प्रो. सुन पाओ काँग ‘कुंजीभूत’ शब्द न जाने कितने सालों से इस्तेमाल करते आ रहे हैं। कोश टटोला तो हार मान ली।

श्री वाँग चिन फंग को मैंने ‘फ्रेंड, फिलाॅसफर और गाइड’ कहा तो वे बहुत खुश हुए। बोले, ‘मैं हमेशा आपके प्रति वफादार रहूँगा।’

…कल्पना जी, तुम्हारी रसोई से अब मेरी रसोई कहीं ज्यादा अच्छी है।

21 अप्रैल

‘बाल बिखेरे एक माँकृतू फू ने उसके बेटे की याद में एक कविता लिखी थी। आज अनुवाद किया…मस्त टटटू जैसा उछलता, कूदता, किलकारी भरता एक बेटा। बरबस बाशा की याद आ गयी, आँखें डबडबाने लगीं। क्या केवल वर्तमान में ही जीना इतना आसान होता है।

…लोगों का व्यवहार बदलता रहता है। मिसाल के तौर पर नेपाल के प्रो. डहाल। आज बस में मेरे पास ही सीट खाली होते हुए भी मुझसे दूर बैठे। उनमें यूरोपियनों को प्रभावित करने की चतुराई है। विकासशील और पिछड़े देशों के लोगों की यह हीनता-ग्रंथि यदाकदा प्रकट होती रहती है। पीकिंग विश्वविद्यालय की पानी की टंकी जैसा ओक का विशाल वृक्ष गोलाकार छत्रा वाला दूर से ही दिखायी देता है। सब तरफ चिनार ही चिनार पीपल जैसे ऊँचे हरे…चारों तरफ समृद्ध, उदारमना, आच्छादित करती प्रकृति…तुमने मुझे हमारे परिवार की आवाजों का कोई कैसेट भर कर नहीं दिया…जवा, पारमिता का पूरिया, सोहनी या यमन…यहाँ चिरपरिचित स्वरों को सुनने के लिये तरसता हँू।

एक दिन सुन पाओ के साथ नदी किनारे मछलियाँ पकड़ने जाऊंगा। खाना-पीना होगा, वे मछलियाँ पकड़ेंगे और मैं कविता करूँगा…।

अरे मेरे देश, तेरे नापित बंधु कितने सस्ते हैं जो केवल सात रुपयों में काट-छाँट, उस्तरेबाजी, मालिश, कंघी, मूंछ कटाई इत्यादि को अंजाम देते हैं। आज चीन में पहली हजाम हुई मात्रा दस युएन में। न मैं नाई बाई की बात समझा और न वह मेरी बात। कुछ देर बाद मैंने खुद को उसके हवाले छोड़ दिया। भारतीय और चीनी केश-सज्जा की शैलियों में जमीन-आसमान का अंतर है। चीनी शैली में सबसे पहले शेम्पू, फिर एक हाथ की अँगुलियों में बाल फंसा कर कटाई, गुद्दी पर मशीन, कैंची का मोटा-मोटा प्रयोग, कलम पर उस्तरे की बजाय छोटे रेजर का इस्तेमाल, फिर कैंची से तिरछी कटाई। इस प्रकार की चीनी हजामत में भारत की तरह अधिक समय नहीं लगता। ब्लोजर और कंधे की मदद से बालों को लहरदार बनाया जाता है। नाई-बाई की दुकान पर न जाने यहाँ किसी सुपर बाजार की तरह कितने प्रकार के प्रसाधन थे। कपड़ों पर बाल बिलकुल नहीं गिरे और ब्लोजर के बाद नहाने की जरूरत ही नहीं रही। ऐ मेरे देश के नापित सखा, तुम में सेवा-भाव भरपूर है पर कलाकारी तुम्हारे चीनी मित्रा से कम।

23 अप्रैल

चीन में काम आदमी को ढूँढ़ता है, आदमी काम को नहीं। महिलाएं पुरुषों को सहजता से तलाक दे सकती हैं। विवाह पर कोई दहेज नहीं लेना-देना है। हाँ, लड़के वाले को ही कभी-कभी अधिक खर्च उठाना पड़ सकता है। चीन की विकास दर बारह प्रतिशत हो गयी है, जबकि भारत की मौजूदा दर है ढाई प्रतिशत। आजकल जनसंख्या दर को नियंत्राण में रखने में कुछ कठिनाई हो रही है। शायद इसीलिये विवाह की न्यूनतम आयु बारह वर्ष तय की गयी है।

आज जेरिचा (यूगोस्लाव विशेषज्ञ) ने कहा, ‘राजनीतिज्ञ मूर्ख होते हैं। मैं उनसे नफरत करती हूँ। येल्तसिन महामूर्ख है क्योंकि वह हर किसी को चूमना चाहता है। क्लिंटन भी कम मूर्ख नहीं है। वह हर किसी को देखकर मुस्कुराता रहता है।’ प्रो. डहाल का कहना था कि ‘अगर राजनीतिज्ञ इस दुनिया में नहीं होते तो चीन का अंतरराष्ट्रीय रेडियो विभाग भी नहीं होता और न कोई सरकारी तंत्रा होता व्यवस्था बनाये रखने में। राजनीतिज्ञ एक अपिहार्य बुराई है।

…पेइचिंग में जेब कटते देर नहीं लगती। जेरिचा की तीन बार जेब कट चुकी है। तीनों ही बार वह उसके वेतन का दिन था। पर यह बात केवल विदेशी लोग ही कहते हैं। चीनी बंधु इस पर कतई यकीन नहीं करते।

24 अप्रैल

मक्खी से शुरू करता हूँ…यहाँ यह जीव कहीं नजर नहीं आया। हाँ, मच्छर जरूर हंै इक्का-दुक्का। वे भारतीय मच्छरों की तरह गाना नहीं सुनाते हैं। एक सुन्दर-सी शीशी में बाल्सम का तेल मिलता है, दावा है कि इसकी खुशबू से मच्छर नहीं काटेंगे।

यहाँ सिटी बस एक नहीं होती, बल्कि दो बसें जुड़ी रहती हैं। दो महिला कन्डक्टर अलग-अलग दरवाजों के पास पेटी के पीछे होती हैं जिनके पास दरवाजे खोलने, बंद करने का स्विच होता है। माइक्रोफोन से जुड़े टेप से सूचना दी जाती है कि कौन-सा बस-स्टाॅप है। यह महिला कन्डक्टर भारतीय कन्डक्टरों की तरह अपनी सीट से उठकर बस में चक्कर नहीं लगाती हैं। टिकट के लिए दरवाजे पर ही आॅटोमैटिक मशीन लगी होती है। कुछ बसें ट्रामों की तरह बिजली से चलती हैं। महिला बस ड्राइवर बड़ी मुस्तैदी से दो बसों की एक सिटी बस को चलाती है। किराया बहुत कम हैकृएक माओ में पन्द्रह-बीस कि.मी.। दस माओ का एक युएन होता है। निजी मिनी बसों के ड्राइवर-कन्डक्टरों के पास भी माइक्रोफोन होता है। ड्राइवर, जिनके साथ कन्डक्टर नहीं होता, कभी-कभी एक हाथ से बस चलाते हुए माइक्रोफोन पर सवारी बुलाते नजर आते हैं। लेकिन आमतौर पर कन्डक्टर लड़की हर मिनी बस में बड़ी फुर्ती से सवारियों की सेवा को तत्पर रहती है और हर स्टाप पर सवारियों के लिये आवाज लगाती है।

24 अप्रैल

चाहे वह उत्तर साइबेरिया से ठंडी तीखी हवाएं चलना शुरू हो जाती हैं और तापमान दो डिग्री से भी कम हो जाता है। वसंत तो है, अभी-अभी आया है, पर मदमत्त जंगली हाथी पर सवार होकर। गुलदाउदी, सालविया, पाॅपी, चीनी गुलाब…सब अपने उरूज पर हैं। इनके ऊपर अभी तो कोई खास असर नहीं हैं। धूप सुहानी नरम है, लेकिन मौसम बदलते देर नहीं लगती। कमरे से निकलने से पहले फोन पर मौसम के बारे में पूछना पड़ता है। अलूचे के फूल खिल चुके हैं। गुलाबों से सराबोर हो जायेंगी सड़कें। गमलों में फूल सजने शुरू हो गये हैं। कल तक जहाँ क्यारियाँ खाली पड़ी थीं, उनमें गमले रख दिये गये हैं।

यहाँ एक आवश्यक प्रथा है: किसी चीनी परिवार के यहाँ जाते समय कुछ न कुछ अवश्य ले जाना है। खाली हाथ नहीं जाना है। एक और प्रथा है, यात्रा के बाद लौटने पर अपने साथियों के लिये उपहार-स्वरूप कुछ न कुछ खाने-पीने की चीजें वितरित की जाती हैं। आज चू इंग (चीनी खबरों की नन्ही सम्पादिका) जब शाँघाए से लौट कर आयी तो उसने रेडियो विभाग के सभी साथियों में टाफियाँ, स्नैक्स आदि बाँटे।

…श्रीमती ल्यू हवे मेरी पहली यात्रा के लिये गाइड बनेंगी। वे बेहद विनम्र और संवेदनशील महिला हैं। जसदेव सिंह के साथ एशियाॅड में गाइड रही है। जसदेव सिंह उनके अत्यन्त आत्मीय प्रशंसक हैं।

25 अप्रैल

आज पेइचिंग के सब-वे मेट्रो की सैर की। सीतान के विशाल बाजार तक ट्रेन से यात्रा…सब-वे के स्टेशन बेहद साफ-सुधरे और ग्रेनाइट की टाइलों से चमचमाते हुए थे। बहुत आरामदायक सफर रहा। केवल गाँवों से आये लोग ही दरवाजा खुलने पर धक्का-मुक्की करते हुए ट्रेन में चढ़ते हैं, वरना सब कुछ पूरी तरह अनुशासित और शांत है। माइक्रोफोन से हर डिब्बे में गंतव्य आने की सूचना दी जाती है। आज पता चला कि पेइचिंग की सड़कों पर इतनी भीड़ क्यों नहीं रहती।

आज उस दक्षिण भारतीय शोध-छात्रा ने चीनी भाषा के उच्चारणों के बारे में बड़ी दिलचस्प बात की…शायद पूरा मुँह खोलकर उच्चारण करना इस अत्यन्त ठंडी जलवायु में चीनियों के लिये कठिन होता है। इसीलिये उन्होंने परस्पर संवाद के लिये ध्वनियाँ ईजाद की होंगी। क्या जलवायु का भाषा के उच्चारण से संबंध है? चीनी भाषा की चार काष्ठाओं (पिच) के पीछे सर्दी का कितना असर है?

जिन्हें थोड़ा-सा प्रेम चोरी-छिपे छीनने पर मिला हो या फिर वैवाहिक सहचर्य की रोती-झींकती निकटता से जिसमें मंदी आँच बची रही हो, वे क्या जाने इन चीनी युगलों का उन्मुक्त सड़क-छप प्रेम? सबसे बेखबर खजुराहों की मिथुन आकृतियाँ बनाते ये युवा लोग…शायद ये वही युवा हैं जिन्होंने लोकतांत्रिक आजादी के लिये संघर्ष किया था। अब प्रेम प्रदर्शन में उन्होंने ऐसी आजादी की चरितार्थ किया है। पाश्चात्य समाज को चुनौती देता उनका यह रोमांस वयोवृद्ध चीनियों को अच्छा तो नहीं लगता, पर वे इसकी अनदेखी करते हैं। जानते हैं कि टोका-टोकी करने से युवा पीढ़ी विद्रोही हो जाती है। और इस समय तो ठेठ राजनीतिक प्रत्ययों को भूलकर भौतिक आनन्द और ‘सम्पन्न होने की शान’ का युग प्रारम्भ हुआ है।

27 अप्रैल

आज खूब रोया। आधी रात को सपने में आयी बिटिया कहने लगी, ‘पापा, क्या मेरी शादी नहीं करोगे? भाग कर चले गये सारी जिम्मेदारियों से पिंड छुड़ा कर।’ बहुत देर तक रोता रहा।

जब कभी बाजार में टाफियाँ, फल, खाने-पीने का सामान खरीदता हँू तो बाशा की याद आ जाती है। कपड़े देखता हँू तो बाशा का नाप सोचने लग जाता हँू। नये जूते लिये तो सोचा, यह मेरा पाँव नहीं है बाशा का पाँव है। कितने अच्छे लगेंगे ये जूते उसके पाँवों में।

28 अप्रैल

आज ल्यू हवे साहिबा के साथ ल्यूशिंगशांग की सुरम्य झील और पर्वत शृंखला की सैर की। अवलोकितेश्वर का मन्दिर था, लम्बी सुरंगे, विशाल मैत्रोय (हँसते हुए बुद्ध) की प्रतिमा…सब कुछ अनिवर्चनीय। श्रीमती ल्यू हवे का आज जन्मदिन था। वे मेरे फोटुओं से पूरी एक रील भरना चाहती थीं। आधी से ज्यादा रील तो खींच भी ली थी। बाद में मैंने उन्हें मना कर दिया। चीनी कहावत है कि अगर पहाड़ों पर हो तो पहाड़ों से, अगर पानी के पास हो तो पानी से अपने जीवनयापन का स्रोत खोजना चाहिए। रास्ते में जगह-जगह लिखा थाकृ‘जंगल को आग से बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।’ हरा-भरा फल-फूलों से गदराया ग्रामीण परिवेश था, साफ-सुथरे ईटों के घर, घरों के चारों तरफ अहाते। ग्रामीण महिलाएं दालें, बीज, फल लिये रास्ते पर बैठी थीं। घुड़सवारी के लिये बहुत सारे घोड़े वाले थे। गेहूं के गझिन खेत थे और मक्का की बुआई के लिये किसान पलाव कर रहे थे। इमारतों की पारस्परिक कलात्मक छतों के कंगूरों पर शुभंकर पशु-पक्षी और ड्रेगन…एक शांत, शालीन और नैसर्गिक आत्मतुष्ट वातावरण…पहाड़ों में जैसे कुछ खोया है…सीढ़ियों-दर-सीढ़ियों के बाद एक अकल्पनीय नजारा दिखाई दिया। कभी सोचा भी न था कि बाँध के पीछे झील की इतनी लम्बी, गहरी भूलभुलैया होगी। हरा, स्फटिक जैसा हिलोरे लेता पानी और मोटरे-बोटों की माकूल व्यवस्था। इस पर्यटक-स्थल की देखभाल सैनिक करते हैं। नौ सौ वर्ष प्राचीन इस बौद्ध मन्दिर में अनेक बौद्ध कथाओं का चित्राण हुआ है। अत्यन्त प्राचीन पाषाण-प्रतिमाएं हैं और असंख्य भुजाओं, शिरों के अवलोकितेश्वर, यानी बुद्ध का स्त्राी-अवतार। मैंने बौद्ध बनकर प्रार्थना की कि मेरा परिवार और श्रीमती ल्यू हवे, जिनका आज जन्मदिन है, दीर्घायु हों।

29 अप्रैल

रेलवे एक्रोबेटिक्स ग्रुप का अविस्मरणीय प्रदर्शन। संगीतात्मक का व्यात्मक प्रस्तुति। अत्यन्त प्रभावकारी कोरियोग्राफी। तालियाँ बजाते-बजाते दर्शकगण थक गये। ध्वनि, प्रकाश और करतब का अद्भुत तालमेल था, साथ ही नट-विद्या और आधुनिक सर्कस का मिलाजुला स्वरूप भी। शरीर संतुलन ही नहीं बल्कि उसकी शुद्ध काव्यात्मक शिल्प संरचनाएं…सबसे ऊपर लड़कियों का आत्मविश्वास भरा मनमोहक सौंदर्य…।

1 मई

आज मई दिवस पर हुआनमिंग हुआन के खण्डहर हुए महल और उद्यान देखने लगा। ये कभी छिंग राजवंश के शाही निवास और बागीचा हुआ करते थे। इन्हें 1860 में इंग्लैंड और फ्रांस की सेनाओं ने नष्ट कर दिया। इस मनोरम बागीचे और सरेगाह को बनाने में एक सौ पचास वर्ष लगे थे। फुहई (सुख का समुर्द्र) झील अनुपम दृश्य उपस्थित करती है जिसके चारों तरफ ध्वंसावशेष तथा कथित सभ्य देशों की बर्बरता के साक्ष्य के रूप में यथावत रहने दिये गये हैं। एक प्रतिमा सबका ध्यान आकृष्ट करती है, ‘स्वर्ग से उतरा देवदूत’, अपने सिर पर सोम से भरा बड़ा थाल लिये खड़ा है। यहाँ लोक कलाकार पर्यटकों को पालकियों में बैठाकर गीत गाते हुए चलते हैं, बिलकुल राजवंश काल के उस स्वर्णिम समय का आभास देते हुए…।

मई दिवस साम्यवाद का पुनस्र्मरण है और चीन में एक विजय दिवस। दूसरे देशों में विशाल रैलियाँ निकलीं, रूस में हिंसक झड़पें हुईं, लेकिन चीन बिलकुल शांत और बिना किसी भव्य उत्सव, शोर-शराबे के चलता रहा। बस, अवकाश रहा, लोगों का बाग-बगीचों में मेला भरा। कुछ कर्मठ, योग्य श्रमिकों को सम्मानित किया गया। पता चला कि माओ त्जेतुंग (माओ चूशी)का हरा, बंद गले का कोट पहनना यहाँ अब अच्छा नहीं माना जाता। पूर्वी यूरोप से आये विशेषज्ञ फिर भी माओ का बैज लगाये हुए थे। किन्तु चीनी इस तरह के डेªस-कोड से बचते हंै। वे कहीं भी किसी तरह से सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर हुए गलत कामों की याद नहीं दिलाना चाहते। माओ के समय के लोग, बूढ़े-वयोवृद्ध जरूर अभी तक भी बंद गले के कोट पहनना पसंद करते हैं। लेकिन ऐसे लोगों ने चुपचाप पीछे खिसकना स्वीकार कर लिया है। वे शनैः-शनैः नौजवान पीढ़ी को सब कुछ सौंपते जा रहे हैं।

2 मई

अरे, मैं जिन्हें भिखारी समझता था…फटेहाल, रूखे, बेतरतीब बाल और निपट देहाती मेले-कुचैले कपड़े…वे तो ज्योतिषी जी महाराज निकले। कागज-पत्तरे लिये सड़क पर बैठे ये चीनी भाषा में भविष्य-फल लिखते…

आज एक तिब्बती कविता पढ़ी…

‘बिना तल्ले के बढ़िया जूते की तरह है

मेरे लिये वह राजकुमारी

वो क्यों भला करेगी मुझे प्यार

उसका होना, नहीं होना व्यर्थ है।’

दूसरी तिब्बती कविता भी कम रोचक नहीं थी…

‘जाते हो तो जाओ बहुत दूर

पर छोड़ जाओ यह कमीज

जिसमें बसी है तुम्हारी देह की बास

जब भी देखूंगी, संूघूगी इसे

तुम होगे मेरे बिलकुल पास।’

शायद हाल की ‘गाथा सप्तशती’ को इसके समकक्ष रखा जा सकता है। सूरदास की नायिका चोली नहीं धोती है। अब तो विज्ञान ने पुरुष हाॅरमोन की सैक्स-अपील के प्रशासन उपलब्ध करवा दिये हैं। पर कमीज में जो गंध है और उसे पहनने में जो एकात्म भाव व्यक्त होता है, उसको क्या कहें?

4 मई

पूरा विश्व लगती है हमारी बस। कोई अड़तीस देशों के भाषा विशेषज्ञ एक ही बस से सुबह काम पर रेडियो स्टेशन के लिये निकलते हैं और शाम लौटते हैं। हम लोगों में अधिकांश अपने-अपने देश के प्रमुख पत्राकार, दूरदर्शन, रेडियो के लिये काम करने वाले और भाषाविद् हैं। एक सुबह बस में हम सबने अपनी-अपनी भाषा में ‘बसन्त’ के लिये क्या लफ्ज आता है बताना शुरू किया तो रेडियो स्टेशन पहुँचकर ही दम लिया। रोज अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर बहस होती है। सारी दुनिया इस एक बस में भर गयी हैµअमेरिका, रूस, सीरिया, तुर्की, जापान, बर्मा, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, कम्बोडिया, यूगोस्लाविया, कोरिया, स्पेन, पीरू, जाम्बिया, बुलगारिया…सभी एक-दूसरे के मित्रा हैं और आते-जाते एक घंटा अहम मसलों पर बहस करते रहते हैं।

5 मई

श्रीमती ल्यू हवे काफी रहस्यपूर्ण हैं। उन्होंने मेरे प्रति स्नेह के कारण फोटुओं पर बहुत खर्चा कर डाला। कुछ फोटो उन्होंने रख लिये जिनमें वे खुद थीं। उनकी बातों से लगा कि विभाग में दूसरे साथियों से उनकी कम पटती है। वे अपनी पदोन्नति के लिये प्रयत्नशील हैं।

श्री वाँग चिग फंग घर का भी सारा काम करते हैं। मसलन, कपड़े धोना, प्रेस करना, पोंछा लगाना, सप्ताह में दो दिन (यानी जब दोनों का अवकाश होता है) खाना पकाना (बाकी दिनों तो पति-पत्नी दफ्तर के डाइनिंग हाल में ही भोजन करते हैं) बर्तन माजना आदि। घर की सजावट भी उनकी ही जिम्मेदारी है। चीनी परिवारों में कार्यरत महिलाओं को पुरुष बराबर सहयोग करते हैं, बल्कि ज्यादा ही। फिर भी महिलाओं द्वारा तलाक के नोटिस आम बात है। ज्यादातर मामलों में चीन की जन-अदालतें पुरुष के बजाय महिला का पक्ष लेती हैं।

7 मई

फूल तो बहुत सुंदर हैं पर गमले सुंदर नहीं हैं…काले, मुँह पर से फैले हुए…शायद चीनियों को इत्मीनान है कि सुंदर रंगीन फूलों को देखते वक्त आपकी नजर इन गमलों पर नहीं जायेगी। पहले से ही बने बड़े सीमेंट-चिप्स के गमलों में ये छोटे गमले रख दिये जाते हैं। तब ये दिखायी नहीं देते, लेकिन बरामदों, रास्तों पर रखी इनकी कतारें इनकी बदसूरती का पर्दाफाश करती हैं।

8 मई

अनुशासित चीनी समाज में सम्पन्न होने की होड़ बढ़ गयी है। तंग स्याओ फिंग का सूत्रा ‘हमें सम्पन्न होना है, सम्पन्नता शान की बात है’ चरितार्थ करते हुए हर कोई अधिक से अधिक धन कमाना चाहता है। विदेशी कम्पनियाँ अच्छा वेतन देती हैं, लेकिन इससे अंग्रेजी जानने वालों का रौब बढ़ रहा है। विदेशी प्रकाशन प्रेस में अंग्रेजी शिक्षण की अनेक पुस्तकें और कोश उपलब्ध है जिनके प्रति चीनियों में अपार आकर्षण है। यह खतरा बढ़ता जा रहा है कि विदेशी पूंजी से खड़ी की गयी कम्पनियाँ अधिक प्रतिभावान चीनियों को रख लेंगी तो सरकारी प्रतिष्ठानों में दोयम दर्जे के साधारण बुद्धि के कर्मचारी रह जायेंगे। लेकिन जो परिपक्व सोच के लोग हैं उन्हें अपनी सरकार की बुद्धिमत्ता पर पूरा भरोसा है। वे सोचते हैं कि पूँजीवादी गैर बराबरी और एकाधिकार यहाँ पतन नहीं पायेंगे। अन्ततोगत्वा, देश का नेतृत्व स्थिति संभाल लेगा। गरीबों का जीवन स्तर उठेगा, दैनिक उपभोग की वस्तुएं और अधिक सस्ती सुलभ होंगी। शायद भविष्य में, यानी एक दशक बाद, कोई दूसरा नेतृत्व का जाये और सरकार के प्रति अधिक कारगर आलोचनात्मक दृष्टि का विकास हो…।

अक्सर कोई न कोई दिन यहाँ जनता द्वारा किये श्रमदान का दिन होता है जिसमें मोहल्ले के लोग जनसेवा करते हैं। लोगों को निजी परामर्श देना, समस्याओं का निराकरण करना, यातायात में मदद करना आदि कार्यों में गली-मुहल्ले के लोग एकजुट होकर हिस्सा लेते हैं। यह सब अपने मुख्य कार्यभार के समय के अतिरिक्त समय में होता है। हरेक मोहल्ले के निवासियों का अपना संगठन संघ होता

है…मीटिंगंे होती हैं, गर्मागरम बहसें होती हैं और प्रत्येक सदस्य सक्रियता से अपने नेता के निर्देशन में जन-सेवा करता है।

गाँवों से आये श्रमिक प्रतिदिन बीस-तीस युएन कमा लेते हैं। वे बहुत मेहनती और मजबूत होते हैं। शहर में चल रहे निर्माण-कार्यों में ऐसे ही श्रमिक लगे हैं। देखने पर एक गरीब और एक श्रमिक में कोई विशेष अंतर नहीं प्रतीत होता। लेकिन शहर के दफ्तरों में कार्यरत कर्मचारी भी इन श्रमिकों की आय देखकर इनसे रश्क करते हैं।

9 मई

आज सुबह-सुबह गिनती करने बैठा कि अभी तक ऐसा क्या है जो मैंने यहाँ नहीं देखा:

  1. कहीं भी पेइचिंग में पालतू या आवारा पशु नहीं देते। हाँ, पकाने के लिये सुपरमार्केट में जीवित मछलियाँ, साँप, मुर्गे वगैरह जरूर देखे हैं।
  2. बहुत कम उर्म के लड़के-लड़कियों को कहीं भी काम करते नहीं देखा। होटलों, दुकानों पर युवा लड़के-लड़कियाँ ही काम करते हैं। टैक्सियों, बसों, मिनी बसों में आमतौर पर लड़कियाँ ही कन्डक्टर होती हैं। चीन की लड़कियाँ महान हैं, पूजनीय हैं। उन्होंने प्रकृति-प्रदत्त लिंगभेद को बहुत हद तक समाप्त कर दिया है। वे भारी से भारी मशीनें चलाती दिखायी देंगी।
  3. मैंने अभी तक शहर में कोई पेट्रोल-पंप नहीं देखा। शायद वह शहर से बाहर काफी दूर हैं।
  4. किसी भी गाड़ी/वाहन के साइलेंसर से धुआँ निकलते नहीं देखा।
  5. सड़कों के दोनों बाजू अनेक प्रकार के फूल खिले हैं पर किसी को भी फूल तोड़ते नहीं देखा।
  6. चीन में सभी कार्यालयों का समय आठ बजे सुबह से पाँच बजे तक है। साढ़े सात बजे अपार जन-समूह साइकिलों पर निकल पड़ता है। सड़क दुर्घटनाएं होती तो होंगी पर मैंने केवल एक सड़क दुर्घटना देखी है। शायद इसका कारण यह है कि साइकिल की सड़कें अलग हंै और पेइचिंग में मोटर-बाइक चलाने की अनुमति नहीं है।
  7. चीन में भिखारी नाम मात्रा के हैं, केवल वे हंै जो अपंग हैं। मैंने अभी तक केवल दो भिखारी फ्लाईओवर के रास्ते में बैठे देखे हंै।
  8. किसी को शराब पीकर उधम मचाते नहीं देखा।
  9. यहाँ अपराध बहुत कम हैं। केवल कुछ विदेशियों की जेबें साफ होने का सुनने में आया। हाथापाई करने पर अगर किसी को चोट लगती है या उसके शरीर को स्थायी क्षति पहुँचती है तो चोट पहुँचाने वाले को बहुत कठोर दंड मिलता है। उसे मिली सारी सुविधाएं छीन ली जाती हैं। अखबारों को सख्त निर्देश है कि वे राष्ट्रीय विकास से सम्बंधित खबरें अधिक दें, न कि हिंसा, अपराध की स्टोरी बनायें।

इस तरह ‘कन्फ्यूशियस की आदर्श शिक्षाओं’ का ही प्रचार-प्रसार किया जाता है। स्त्रिायों को पूरे अधिकार और मुक्ति मिल जाने से उनके प्रति अपराध बहुत कम हैं।

जैसा कि में पहले कह चुका हूँ कि अखबारों में तलाक के नोटिस ज्यादातर स्त्रिायों के द्वारा दिये गये हैं। किसी से परस्पर मन नहीं मिले तो तलाक आम बात है। जन-अदालतें फैसला करने में देर नहीं करती हंै। अगर दूसरा पक्ष नोटिस छपने के एक माह में अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं करे तो फैसला प्रार्थी के पक्ष में कर दिया जाता है।

10 मई

आज मैंने खाँस-बागीचा (बैंबू पार्क) और चिडियाघर देखे। बागीचे की झील में नौका-विहार के टिकट-घर के पास अचानक भारतीय फिल्मी गीत सुनायी दिया। हमारी फिल्मों के गीत चीन में लोकप्रिय हंै। राष्ट्रीय पुस्तकालय के बिलकुल निकट शहर की मुख्य सड़क पर पड़ता है। यह पार्क। विस्तार बहुत है और विविध आमोद-प्रमोद के साधनों से भरपूर है यह पार्क। चिडियाघर में जगत-प्रसिद्ध लैसर पेंडा देखा। ये वन्य-जीव सिंचुआन के वनों में बहुतायत से हैं। पेंडा यहाँ का राष्ट्रीय पशु है, इसीलिये इसे विशेष सुरक्षा और आरम्भ में रखा जाता है। किन्तु दूसरे जानवरों के कटघरे बहुत छोटे हैं, जबकि पेंडा के लिये बहुत विशाल वनाच्छादित क्षेत्रा है। हाथियों की दशा अच्छी नहीं है। बाघ भी बिलकुल सूखी, तपती धरती पर लेटा था। काले रीछ (स्लाथ बियर) गर्मी से परेशान थे। चिड़ियाघर में साँपों की प्रजातियों का बड़ा संग्रह था। चीन में साँप और बिल्ली के मिश्रित माँस से बना व्यंजन बहुत पसंद किया जाता है। रविवार था सो चिड़ियाघर में काफी भीड़ थी और एक जगह लाॅन में टेबल डाले तीन डाक्टरों का एक समूह आते-जाते लोगों के खून की जाँच, रोग का निदान आदि करने में व्यस्त था। यह यहाँ आम बात है। चीनी स्वास्थ्य विभाग की ओर से यह अत्यन्त व्यावहारिक और सुविधाजनक कर्तव्य माना जाता है। चिडियाघर के अधिकाँश कटघरों में एसी लगे थे जिनको देखने के लिये विशेष टिकट-व्यवस्था थी। यानी उनका खर्चा, रख-रखाव, टिकट-बिक्री से ही पूरा हो जाता है। फोटोग्राफी के लिये अलग से चार्ज देना होता है। चीन में फोटोग्राफी राष्ट्रीय शौक है, सर्वाधिक लोकप्रिय और जरूरी। जब कोई फोटो ले रहा होता है तो उसके रास्ते में कोई नहीं आता। सारा आवागमन रूक जाता है जब तक कि वह अपना काम पूरा नहीं कर लेता।

11 मई

चीन में राशन व्यवस्था समाप्त कर दी गयी है। आज खबर है कि महँगाई बारह से चालीस प्रतिशत तक बढ़ सकती है जिसके लिये चीनी वेतन-भोगियों को प्रति माह दस युएन अधिक मिलेंगे। क्या चीन पूँजीवादी बाजार व्यवस्था के दुष्परिणामों की तरफ अग्रसर है। खाद्य पदार्थ महँगे हो जायेंगे और निश्चित तौर पर इसका बोझ मध्यवर्ग के उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। क्या विदेशियों का भी वेतन इस अनुपात में बढ़ेगा?

चीन में कई जगहों पर विदेशियों से पाँच गुनी कीमत ली जाती है। यह दोहरी नीति चीन के ओलम्पिक्स की मेजबानी करने में बाधक सिद्ध हो रही है। देखना यह है कि खुली बाजार अर्थव्यवस्था में निजी स्पर्धा के कारण कीमतें कितनी घटती-बढ़ती हैं। एक तरफ निजीकरण की छूट है तो दूसरी तरफ आदेश निकला है कि पार्टी या सरकार का कोई भी नुमाइंदा किसी से उपहार या सिक्योरिटीज नहीं ले सकता। उसे ऐसी भेंटों को सरकारी कोष में जमा करना होगा। ऐसा नहीं करने पर उसके विरुद्ध कठोर दंडनात्मक कार्यवाही की जायेगी। नयी अर्थव्यवस्था का यह समय ही बतलायेगा कि पार्टी देश में अपना नियंत्राण किस सीमा तक रखती है। अगर वह असफल होती है तो उसके शक्तिशाली होने पर लोग संदेह करेंगे।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में नौकरी पाने की लालसा पनप रही है। अंग्रेजी के प्रति रूझान और मोह बढ़ रहा है। अधिक प्रतिभावान और महत्वाकाँक्षी युवा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की तरफ भाग रहे हैं। साथ ही, शेयर खरीदकर बिना श्रम किये मालामाल होने की लालसा बढ़ी है, इससे बैंकों की जमा-पूँजी कम हुई है। आज पींकिग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बता रहे थे कि आम चीनी नागरिक मजदूर, कर्मचारी और नेता…इन तीन वर्ग भेदों को मानता है और इनसे व्यवहार में अंतर बरतता है। इनमें परस्पर दोस्ताना संबंध अच्छा नहीं समझा जाता। प्रोफेसर की कही बात में कितना सच है, मैं खुद देखकर पता लगाऊंगा।

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