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मैं अब कौवा नहीं, मेरा नाम अब कोयल है!

युवा लेखिका अनुकृति उपाध्याय उन चंद समकालीन लेखकों में हैं जिनकी रचनाओं में पशु, पक्षी प्रकृति सहज भाव से उपस्थित रहते हैं. यह उनकी ताज़ा रचना है मौसम और परिस्थिति के अनुकूल- मॉडरेटर

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पतझड़ बनाम वसंत

मेरी खिड़की पर अक़्सर एक कौवा आ बैठता है। बड़बोला है, कर्कश भी। लेकिन मैं उसके लिए दाना पानी रख छोड़ती हूँ और जब वह आता है दस काम भूल कर उसकी झाँव झाँव सुनती हूँ। कारण ये है कि वो हवा, धूप और बारिश का हाल चाल सुना जाता है। कभी कभी उसका बताया हाल मेरी खिड़की में जड़े धरती-आकाश से मेल नहीं खाता। वह बता रहा होता है कि बाहर वर्षा की झड़ी है, जबकि मेरी खिड़की का निचाट आकाश धूप में जलजल कर रहा होता है। ऐसे में वह गर्दन टेढ़ी कर अपनी मनका आँख मुझ पर गड़ा देता है और कर्कश बोली को भरसक मद्धम कर षड्यंत्रकारी सुरों में कहता है – “सब कुछ जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं। मेरी ख़बर सीधे ऊपर से है!” चूँकि उसके पंख हैं और मेरे पैर धरती से बँधे हैं, मैं उसकी बात पर अपनी आँखों से ज़्यादा भरोसा करती हूँ। आख़िर वह सीधे ऊपर से ख़बर जो लाता है।

कल वह आया और अपनी कड़ी, चमकीली चोंच पानी के कटोरे में डुबा कर एक साँस में सारा पानी पी गया। फिर बोला – “आज दाना नहीं खीर खिलाओ, खीर।”

मैं चौंकी। “खीर? किस बात की खीर?”

“बहुत बड़ी बात की। आज से पतझड ख़त्म! माने साल में पतझड का मौसम ही नहीं! अभी अभी ऊपर से हुक़्म आया है! है ना बड़ी बात!”

“लेकिन…लेकिन ये कैसे हो सकता है? पतझड तो… यानि ऋतु-चक्र में पतझड की जगह कौन सा मौसम लेगा?”

“तुम बताओ तुम्हें सब से ज़्यादा कौन सा मौसम पसंद है?”

“मुझे? मुझे तो वसंत सबसे ज़्यादा पसंद है।”

“बस तो पतझड की जगह वसंत ने ले ली है! बाहर कच्ची मीठी धूप में जवा और चम्पा खिल रहे हैं! और क्या हवा है, पराग से पीली! तुम कोई वसंत का गीत क्यों नहीं गातीं?”

मैंने खिड़की से बाहर देखा। आकाश सपाट था। रूखी-सूखी हवा के थपेड़ों से वृक्ष चोटिल थे।पीले, जर्जर पत्ते लगातार झर रहे थे।

कौवे ने मेरी दृष्टि पकड़ ली। उसकी गर्दन टेढ़ी हो गई। “तुम्हें कितनी बार बताया, जो दिखाई देता है…”

आँखों-दिखते पूरे के पूरे मौसम का नकारा जाना मुझे हज़म नहीं हो रहा था। मुझे पहली बार ख़याल आया कि जिस ऊपर की कौवा हमेशा दुहाई देता है, उसे मैंने कभी देखा नहीं है, न तो सुना ही है। उसके होने का आश्वासन मात्र इस कौवे की बातें हैं। ये कैसा ऊपर है जो एक समूचे मौसम को झुठला रहा है? अगर इतने साल ये कौवा झूठ बोलता रहा हो तो? “लेकिन, ज़रा सुनो तो, कौवे…” मैंने कहना शुरू किया।

“कौवा किसे कह रही हो? मैं अब कौवा नहीं, मेरा नाम अब कोयल है। ऊपर से हुक़्म आया है।”

ये तो हद थी। खिड़की के ठीक बाहर नारियल के पेड़ पर कोयल बैठा पर सँवार रहा था! “ये तुम क्या कह रहे हो? देखो, वहाँ, नारियल पेड़ की डाल पर कोयल…”

कोयल ने अपना मख़मली सर उठाया। “अगर तुम्हारा इशारा मेरी ओर है, मैं तुम्हें बता दूँ कि तुम सरासर ग़लत हो। मैं कोयल नहीं, मेरा नाम अब मोर है।” ग़ुस्से में उसका स्वर पंचम छू रहा था।

पेड़ के नीचे लम्बी, डंठल सी टाँगों पर टहलते मोर ने भारी पूँछ लहराई। “इससे पहले कि तुम कुछ कहो, ये जान लो कि मैं कबूतर हूँ।”

उसके बग़ल में अपने ख़ूबसूरत लाल पंजों पर फुदकता कबूतर लापरवाही से दाना चुग रहा था। “तो फिर ये कौन है?” मैंने पूछा।

“कहाँ? किसकी बात कर रही हो?” सब समवेत स्वर में बोले। “यहाँ तो हमारे अलावा कोई नहीं।”

कबूतर बदस्तूर दाना चुगने में मशग़ूल था। मैंने नारियल पेड़ की ओर देखा। ये पेड़ यहाँ वर्षों से है, कौवे और मुझ से, दोनों से पुराना। मुझे इस पेड़ की विज्ञता पर भरोसा है। “मेरी तरफ़ क्या देखती हो? मुझे तो तुमने अभी अभी ग़लत नाम से पुकारा है। मैं तो अशोक हूँ।”

“और मैं आम!” अशोक झूमा।

आम हँसा।”बहुत अच्छे! अब तुम आए दिन पत्थरों का मज़ा चखो! हर ऐरा ग़ैरा जब तुम्हारी डालियाँ पकड़ कर झकझोरेगा, तुम्हारे बौर और पत्ते और फल नोचेगा तब पता चलेगा!”

मेरा सर चकरा रहा था लेकिन ऐसे में भी मुझे आम की बेवक़ूफ़ी पर दया आई।”तुम किस तरह की बात कर रहे हो? अपनी फलों से लदी डालियाँ देखो और उसकी छूँछी शाखें।तुम्हें लगता है लोग तुम पर पत्थर नहीं फेंकेगे, तुम्हें नहीं नोचे-खसोटेंगे? या वो झाड़ी में छिपी अहेरी बिल्ली चुग्गा चुगते क़बूतर को झपट नहीं लेगी? नाम बदल देने से या नाम मिटा देने से गुण और रूप बदल जाएँगे?”

मेरी बात पर एक क्षण को सन्नाटा छा गया। फिर एक इतनी गहरी सामूहिक साँस उठी कि मेरी खिड़की के पट धड़ाके से बंद हो गए। मैंने उन्हें खोलने की कोशिश की लेकिन वे जैसे वज्रद्वार बन गए। बाहर कोयल बना कौवा कर्णकटु सुरों में कह रहा था – “यहाँ? यहाँ कोई खिड़की नहीं। इसका नाम आज से दीवार है। ऊपर से हुक़्म आया है…”

मैं जान गई कि अविश्वास करने में मैंने देर कर दी थी…

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