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आलोक प्रकाश की कहानी ‘एक कामकाजी सोमवार’

आज सोमवार है. पढ़िए आलोक प्रकाश की कहानी. आलोक मुंबई में टाटा कन्सलटेन्सी सर्विसेज में काम करते हैं और अपने पेशेवर दुनिया के अनुभवों को कहानियों में ढालते हैं. यह कहानी भी बहुत समकालीन है- मॉडरेटर

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स्वाती के आफ़िस लाइफ में तीन पुरुषों का बड़ा दखल है- रवि,श्याम और महेश। ये चार लोग मिल कर एस्कलेशन डेस्क हेंडल करते हैं – वर्किंग आवर्स में ,एक ही क्यूबिकल मे बैठते हैं चारों।

श्याम- रत्ना के ड्राइंग रूम से उगते सूरज की लालिमा एकदम साफ दिखती है । उनके बेड रूम से अस्त होता सूरज दिखाई देती है- कॉर्नर फ्लेट है उन दोनों का । अन्य काम काजी दिनों की तरह,  श्याम अलार्म बजने के कुछ देर पहले जाग गया। चारों ओर अंधेरा फैला हुआ है,सुबह होने में अभी देर है लेकिन रात कब की जा चुकी है । लगभग चार घंटे की नींद हासिल हुई है उसे आज की रात। रविवार दोपहर को लंच के बाद तीन घंटे सोया था श्याम। तीन- चार घंटे की नींद शनिवार दोपहर को भी मयस्सर हुई थी। ड्राइंग रूम में सोफे पर लेट कर वॉटस्एप मैसेज के ढेर को खंगालना शुरू किया उसने।सब ग्रुप मसेज हैं- लोकल ट्रेन में टाइम पास का मसाला।

 रत्ना ने सप्तहांत की दोपहर को लगभग आधे घंटे की झपकी ली थी। चाय जब तैयार हो गई तो श्याम ने रत्ना को आवाज़ लगाई।

‘ उठ जाओ चाय तैयार है।’

एक आवाज़ में जब बात नहीं बनी तो श्याम ने दूसरी बार आवाज़ लगाई । रत्ना उठ कर ड्राइंग रूम में आ गई है। उसके आने के बाद श्याम के मोबाईल का अलार्म जागा- अब घड़ी में पाँच बज रहे हैं ।  श्याम के लिए अलार्म बैक उप का काम करता है । चाय  की कप टेबल पर रखने कि आवाज सुनकर रत्ना उठ कर बैठ जाती है।श्याम को विदा करने के बाद रत्ना को घर के बहुत सारे काम निपटाने हैं – दोपहर में जम कर सोना है उसे

 

स्वाती ने आज हाई हील सॅंडल धारण किया है। जूतियों का रंग चटकीला है। वो सम्हल-सम्हल के फुट ओवर ब्रिड्ज से उतर रही है। हालाँकि, हील नुकीला है , फिर भी स्वाती को चलने में बहुत ज़्यादा दिक्कत नहीं हो रहा है।या फिर, देखने वालों को मालूम नहीं पड़ रहा है। जूतियों की हिफ़ाज़त के लिए आज उसने डोंबिवली से शुरू होने वाली स्लो लोकल पकड़ी है। कपड़े उसने हलके रंग के पहन रखे हैं, ताकि देखने वालों के लिए उसकी जूतियाँ आकर्षण का केंद्र बने। डोंबिवली मुंबई से सटा एक छोटा सा शहर है । आप इसे मुंबई के हो रहे सतत् विस्तार का हिस्सा मान सकते हैं। हालांकि,मुंबई के सर्व सुविधा संपन्न इलाक़े में रहने वाले इसे मुंबई का हिस्सा नहीं मानते हैं।स्वाती साँवले रंग की साधारण नयन-नक्स वाली लड़की है। उँची कतई नहीं है वो , या यूँ कहें नाटी है वो। काले रंग से थोड़ा सा साफ  रंग है ,उसकी त्वचा का। हाँ, उसके चेहरे पर एक चमक है जो उसे आकर्षक बनाती है। उसके चेहरे में कुछ भी किताबी नहीं है। आँखे बहुत सुन्दर नहीं हैं, लेकिन बोलती हैं- नजरें मिलीं तो देखने वाला इग्नोर नहीं कर सकता है बहुत कम लोगों से स्वाती खुल कर बातें करती है , लेकिन जिनसे बातें करती है उनकी बातें दिल पर नहीं लेती है।

लेडीज़ कॉमपार्टमेंट में सभी ओर खामोशी पसरी है। सभी को बैठने की जगह मयस्सर है। सुबह ६ बजे भीड़ इतनी नहीं होती है कि डोंबिवली में आपको सीट न मिले। वातावरण सुगंधित है, बालों से कॉनडिसनर और शैम्पू की खुश्बू आ रही है और, बदन से डियो की। लेडीज़ से सटे जनरल कॉमपार्टमेंट तक ये सुगंध फैली हुई है। जेनरल कोम्पार्टमेंट और लेडीज़ डिब्बे के बीच पार्टीशन कुछ इस तरह का है कि  आप एक डिब्बे से दुसरे डिब्बे में आ-जा नहीं सकते हैं , हाँ; ताका-झाँकी कर सकते हैं। मोबाइल फ़ोन में डूबे हुए कुछ पुरुष यात्री बीच-बीच में मोबाइल पर से नज़र उठा कर लेडीज़ कॉमपार्टमेंट की ओर देख ले रहे हैं। सौंदर्य दर्शन से उनकी आँखों को आराम मिल रहा है, रूह को चैन आ रहा है। कुछ ऐसे भी हैं ,जो पूरी तरह मोबाइल में डूबे हुए हैं मोबाइल- दर्शन उन्हें सुकून दे रहा है। कुछ यात्रियों को अंदर बैठना गवारा नहीं है। हालाँकि वातावरण में आरामदायक ठंडक है लेकिन उन्हें और शीतलता की दरकार है। ठंडी हवा का आनंद लेने के लिए वो दरवाजे के पास खड़े हैं।

विखरोली स्टेशन के फुट ओवर ब्रिड्ज पर जब स्वाती ने चलना शुरू किया तो रवि उसके ठीक पीछे , उसका पीछा करते हुए चल रहा है। वो इससे बेख़बर है। स्वाती का ध्यान अपने आप को सम्हाल कर आफ़िस तक ले जाने में है ।हालाँकि, चलते हुए वो वॉटस् उप  मेसेज भी पढ रही है। जब वो सीढ़ियों से उतरने लगी तो रवि ने उसे मेसेज किया । ‘सम्हल के चलो ,वरना गिर जाओगी। ’

अब उसकी निगाहें रवि को ढूँढने लगी।जब उसने पीछे मुड़ के देखा तो रवि को अपने ठीक पीछे पाया। उसने रवि की पीठ पर एक धौल जमाया और दोनों एक ही ओटो रिक्शा में बैठ कर ऑफिस की ओर रवाना हुए।।रवि, छह फुटा जवान है पूरे शरीर में कहीं चर्बी मालूम नहीं पड़ती है। फुटबाल और क्रिकेट का बेहतरीन खिलाड़ी है , कितनी भी भाग-दौड़ करे थाकता नहीं है वो। वो विखरोली ईस्ट में रहा है । काम पर आने के लिए तकरीबन पाँच मिनट वॉक करने के बाद रवि रेलवे की फुट ओवर ब्रिड्ज का इस्तेमाल करता है। स्टेशन के पश्चिमी अहाते में आकर वहाँ से कंपनी के लिए ओटो रिक्शा पकड़ता है। उसके कामकाजी दिनों की शुरुआत 6.15 की अलार्म बजने से होती है, स्वाती राउत के दिन का आगाज़ इससे सवा घंटा पहले होता है।

 

आफिस परिसर में पहुँचते ही दोनों की हृदय गति थोड़ी तेज हो गई। वातावरण में अजीब खामोशी पसरी थी, श्याम और महेश फ्लोर पर उन लोगों से तकरीबन एक दो मिनट पहले आए हैं और उनका सिस्टम अभी रीस्टार्ट हो रहा है। अर्ली मॉर्निंग शिफ्ट में यही चार लोग होते हैं। श्याम ने ‘गुड मॉर्निंग स्वाती’ कहा और अपना हाथ स्वाती की ओर बढाया स्वाती ने एक संयमित ‘हेलो’ कहा और हाथ मिलाया।

‘तुम्हारा हाथ बहुत सख़्त है रे और गर्म भी है।’ स्वाती ने अपना अनुभव सांझा किया।

 ‘अरे स्वाती! किसी का  हाथ छूने से तुम्हें कुछ फील होता है क्या?’

स्याम ने माहौल को थोड़ा खुशनुमा बनाने की कोशिश की

कुछ भी बकवास!, छूने से कुछ भी नहीं होता है-कुछ भी फीलिंग नही आती है।’ स्वाती ने चिढ़ने का ढोंग करते हुए कहा

 

‘क्या बात करती हो तुम? अलग-अलग लोगों के छूने से , हम सब के अंदर ,अलग अलग तरह की फीलिंग आती है -मैं छूता होऊँगा तो तुमको ब्रदरली फील होता होगा,शुकून लागत होगा, रवि के छूने पर फ्रेंडली फील होता होगा, अलग तरह का एहसास होता होगा,  महेश के छूने पर हो सकता है, मीठी चुभन होती होगी।’

श्याम, स्वाती के उत्तर का मानों इंतजार कर रहा था।

 ‘सबके छूने पर ‘नर्मल’ फील होता है।’

‘तब तुम बिलकुल अबनॉर्मल हो। बीस की हो गई हो तुम न? ’

 ‘हाँ, मार्च में इक्कीस की हो जाउंगी मैं’

‘फिर तो ज़रूर कुछ प्राब्लम है । तुम्हें डॉक्टर से दिखना चाहिए’

‘कुछ भी प्राब्लम नहीं है ।‘

‘तुम्हारे साथ यही प्राब्लम है,तुम मेरे सजेशन को गंभीरता से नहीं लेती हो।’

‘क्योंकि तुम सिरियसली कुछ कहते ही नहीं हो, बकवास करते हो सिर्फ़’

‘अरे स्वाती! एक टिकट आया है कामन पूल में जल्दी से ले ले- पुराना टिकट है; एस एल वयोलेटेड।’ श्याम ने मसखरी को विराम दिया और काम की बात शुरू की।’

समस्या यदि एजेंट के द्वारा हल नहीं होता है तो ग्राहक टिकट लॉग करता है। इनकमिंग कॉल और मेल हेंडल करने वाले कर्मचारी को काम काजी भाषा में  एजेंट कहा जाता है। एस एल का मतलब सर्विस लेवेल अग्रीमेंट – समान्य भाषा में , वह समय सीमा जिसके अंदर समस्या का हल हो जाना चाहिए था। जटिल समस्याओं के लिए कंपनी द्वारा एक मेल आई डी उपलब्ध करवाया गया है इस ग्रुप आई डी पर आए मेल पर एसकेलेशन डेस्क के एजेंट काम करते हैं ।

देखिए मेडम ! घँस रहे हैं लेकिन हो नहीं रहा है।

 ‘क्या घिस रहे हैं सर ,क्या नहीं हो रहा है?’

रिचार्ज कूपन’

अच्छा सर! आप स्क्रेच नहीं कर पा रहे हैं! किस चीज़ से आप स्क्रेच कर रहे हैं?

‘फिलहाल तो नाख़ून से कर रहे हैं ,दूसरा भी कोई तरीका है क्या?…. और मेडम मुंबई का मौसम कैसा है?’

‘अच्छा है सर’

अरे बुड्ढे ! हेलपडेस्क में कॉल किया है को काम की बात कर न ! फालतू  में फ़लर्ट क्यों कर रहा है’

फोन को म्यूट पर रखकर स्वातिं ने अपनी  भड़ास निकाली

सर आप ठीक से ट्राइ कीजिए स्क्रेच करना आसन है’

‘जा ! उपरका कागजवे फट गया,अब कैसे मिलेगा कूपन कोड। ‘

‘आपको स्क्रेच करना होता है सर, फाड़ना नहीं होता है।’

‘अरे नाख़ून बड़ा नहीं है मेरा, कैंची की नोक से खुरेच रहा था; अब कैसे मिलेगा कोड मुझे?….. और मुंबई में कहाँ रहती हैं आप ?’

‘ये सब बातें डिस्कस नहीं करते हैं सर हम कॉल पर। अब कुछ नहीं हो सकता है सर।’

‘अच्छा जाने दीजिए , दस रुपया का टॉकटाइम था उसमें।’

‘आपको और कोई जानकरी चाहिए?’

‘नहीं! ‘

‘टॉक बेहिसाब मे कॉल करने के लिए धन्यवाद,आपका दिन शुभ हो।’

कॉल ख़त्म होते ही स्वाती ने ‘एस्कलेशन औक्स’ डाला और टिकट पर काम करने बैठ गई। लंच औक्स , टी औक्स , मीटिंग औक्स  और ट्रेनिंग औक्स- ये चार किस्म के औक्स (ब्रेक)हैं। मीटिंग औक्स का प्रचिलित नाम एस्कलेशन औक्स है। – या तो आप किसी का एस्कलेशन (शिकायत) हेंडल कर रहे हो , या फिर आपके खिलाफ एस्कलेशन आई है। जब आप औक्स पर हो तो आपके फ़ोन की घंटी नहीं बजेगी।

‘अरे कॉल फ्लो तो नॉर्मल है, फिर पता नहीं मुझे कैसे कॉल हिट हो गया?’ स्वाती ने किसी एक  को संबोधित किए बिना अपनी भावनाएँ व्यक्त की।

 

‘अरे स्वाती तुमने ‘औक्स’ क्यों डाला। ?’

मज़ाकिया माहौल में भी श्याम की अपनी ज़िम्मेवारी का एहसास है

‘श्याम, या तो मैं कॉल लूँगी या फिर  टिकट पर काम करूँगी। दोनों काम मेरे से नहीं हो सकता है।’

‘अरे स्वाती नौ बजे सेकेंड शिफ्ट वाले जाएँगे तो तुम और महेश टिकट क्लोज़ करने बैठना फिर साथ में ब्रेक पर जाना और लंच पर पर भी साथ में ही जाना।’ अब रवि भी इस संवाद का हिस्सा बन गया है

बिल्कुल सही- आज भी सिर्फ़ हम दोनों ही लंच पर जाएँगे ।तुम्हें क्यों जलन होती है’

 ‘अरे महेश के साथ क्वालिटी टाईम स्पेंट करना है उसे ऐसा करेंगे तभी तो वो एक दूसरे को  बेहतर जान पाएँगे। – स्वाती को महेश से प्यार हो गया है।’ अब श्याम की बारी थी।

बराबर बोल रहा है श्याम’, रवि ने चुटकी ली।

‘बोथ आफ यू सेट उप प्लीज़। न तो प्यार हुआ है न ही प्यार होगा कभी- ये सब बकवास है मेरे लिए।’

अरे इतनी अकड़ अच्छी नहीं है स्वाती, क्या बुराई है महेश में , ओप्रटूनिटी डज नट अलवेज कम टुवर्ड्स यू, वेन इट कम्स ,यू शुड ग्रेब इट’ रवि ने स्वाती को उपदेश दिया।

‘अफ़कोर्स अच्छा लगता है वो मुझे – बट वी आर जस्ट फ्रेंड्स’

‘अरे महेश लड़की पट गई – आज तो तुम्हारे तरफ़ से पार्टी होनी चाहिए।’ रवि मैनें तुम्हें पहले भी कहा था उसे  उसे चिकने छोकड़े पसन्द हैं ‘श्याम ने फिर अपनी बात रखी।

महेश शांत भाव से काम में लगा हुआ है – स्वाती का खास दोस्त है वो – प्यार होते होते रह गया टाइप। दोनों एक दूसरे से फ्लोर के बाहर फ़ोन पर लंबी बात-चीत नहीं  करते हैं- न ही साथ में मूवी देखने जाते हैं । एक दूसरे से ‘प्यार’नहीं हो उसका पक्का ध्यान रखते हैं दोनों। हाँ, फ्लोर पर एक दूसरे का साथ अच्छा लगता है उन्हें। दोनों को एक दूसरे के साथ अकेले में  और ग्रुप में भी  नोंक-झोंक करना अच्छा लगता है। महेश के लिए स्वाती के दिल में एक दोस्त से बढ़कर जगह है।

स्वाती ने दो महीने पहले ट्रेनी के रूप में  कंपनी का बी पी ओ सेगमेंट जाय्न किया है।अच्छी ग्रास्पिंग क्षमता के कारण उसे ट्रेनी होने के बावज़ूद एस्कलेशन टीम का हिस्सा बना दिया गया है। साधारणत: कम से कम दो साल के प्रॉडक्ट नोलेज होने के बाद ख़ूँख़ार कस्टमर के सामने कंपनी आपको एक्सपोज करती है। काल्स हेंडल करने लिए एक अलग टीम है, किसी दूसरे लोकेशन पर- फोन बैन्किंग टीम ।  एस्कलेशन टीम, मल्टी टास्किंग करने वाली टीम है। फोन बैन्किंग टीम  के अर्ली मॉर्निंग शिफ्ट में रीसोर्स स्ट्रेन्थ काफ़ी कम होता है। कॉल फ्लो ज़्यादा होने पर एस्कलेशन डेस्क को कॉल राउट होता है।

श्याम लीड रोल में है। भड़के हुए ग्राहकों की गलियाँ सुनना और उसके जॉब प्रोफाइल का हिस्सा है। जब भी ग्राहक आपे से बाहर हो जाता है और मैनेजर से बात करने की ‘गुहार’ करता है ,श्याम को कॉल ट्रान्स्फर किया जाता है। श्याम तब तक ग्राहकों की बात सुनता था जब तक भद्दी गलियों की बारिश न शुरू हो जाए। हालाँकि ट्रेनिंग में यह बात बार बार समझाई जाती है कि भद्दी गलियों को पर्सनली मत लो लेकिन, खोपड़ी के अंदर का सॉफ्टवेर इसे स्टोर नहीं कर पता है। माँ- बहन से भले हम प्यार करें ना करें लेकिन उनके नाम की गलियों बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, यह बात सर्व मान्य है।भद्ददी गालियाँ देने वालों को पी सी ओ बूथ पर से काल करके कुछ लोग अपनी भडांस भी निकाल लेते हैं। श्याम उनमें से नहीं है। बड़े ही प्यार से वो ग्राहक की बातें सुनता है। उनको बर्दास्त करता हैं।बर्दाश्त की हद पार हो जाने पर वो कस्टमर को तीन वॉर्ननिंग देकर कॉल डिसकनेक्ट कर देता है। कॉल हैंडल करने की बेमिसाल काबिलियत के वजह से ही वो टीम मैनेजर बन पाया हैं।

श्याम को ,एक भड़के हुए ग्राहक का कॉल , कॉल सेंटर से ट्रांसफर हुआ है। ग्राहक ने सीनियर औथॉरिटी  से बात करने की ज़िद ठान ली है – उसे मामूली एग्ज़िक्युटिव से बात नहीं करना है। – श्याम उतना सीनियर तो नहीं है लेकिन हाँ काम पर मौजूद लोगों में सबसे सीनियर ज़रूर है। ग्राहक के अनुसार इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए जो बिल उसे भेजा गया था वो बहुत ज़्यादा था और उसे वेव ऑफ चाहिए। श्याम के पास वेव ऑफ की औथॉरिटी नहीं है। उसके पास सिर्फ़ शिकायात दर्ज करने की ताक़त है। उसने शिकायत दर्ज की और जल्द इस पर अमल होने का आश्वशन भी दिया। हरेक काल की समाप्ति के पहले, कंपनी द्वारा लॉंच किए गये एप के बारे में जानकारी देना अनिवार्य है।- ये

कंपनी का एक दिशा निर्देश था जिसे मानने के लिए वो बँधा हुआ है।  उसने ग्राहक को बताया ‘ हमारी कम्पनी ने अब आपको एक और सुविधा प्रदान की है। हमारा एक एप लॉंच हुआ है- क्या आप उसके बारे में आप जानना चाहेंगें?

‘आपके कंपनी के पास ** मा रने की सुविधा है?’ ग्राहक ने पहली बार अपशब्द का इस्तेमाल किया। श्याम ने इसका उत्तर नहीं दिया । कुछ देर की संवादहीनता के बाद ग्राहक ने फिर अपना सवाल दोहराया। ग्राहक के सवाल से श्याम विचलित नहीं हुआ ।

‘ क्षमा चाहता हूँ सर, इस प्रकार के किसी सुविधा के बारे में मेरे पास जानकारी स्पष्ट नहीं है।’

इस उत्तर ने ग्राहक खीज गया और उसने कॉल डिसकनेक्ट कर दिया।

उसने पूरा विवरण अपने दोनों पुरुष सहयोगियों को बताया और तीनों मिलकर ठहाके लगा कर हँसने लगे।

स्वाती ने पूछा: क्यों इतनी ज़ोर से हंस रहे हो तुम लोग?

‘बोएज टॉक है स्वाति, तुम नहीं समझोगी’

रवि ने व्यंग मिश्रित अंदाज में कहा

सुबह के नाश्ते के बाद अर्ली मॉर्निंग शिफ्ट के एजेंट गण में एक सुकून का एहसास घर कर जाता है। जनरल शिफ्ट के कर्मचारियों के आने से काम का भार बँट जाता है। एक अच्छी सी फिलिंग आने लगती है अब अर्ली मॉर्निंग शिफ्ट के कर्मचारियों में। सोमवार का ख़ौफ़ अब उनसे दूर जा चुका है।

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One comment

  1. Good story! Just mirror depiction of a day in real life…..

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