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अन्नपूर्णा देवी की संगीत-साधना हरिदासी है, निर्मोही है!

चित्र साभार: द इन्डियन एक्सप्रेस

प्रवीण झा आजकल शास्त्रीय संगीत पर इतने रस के साथ लिखते हैं कि मेरे जैसा संगीत ज्ञानहीन भी संगीत समझकर उसका आनंद लेना सीख गया है. यही संगीत-लेखकों का काम भी होना चाहिए- आम पाठकों को संगीत दीक्षित करना. अन्नपूर्णा देवी पर लिखा उनका यह आलेख पढ़ कर बताइए कि क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ?-प्रभात रंजन

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उस दिन अली अकबर चुपके से भाग कर कालीदीन की फांसी देखने गए थे, जो बीच शहर में होने वाली थी। बाबा को खबर न थी, पर बहन अन्नपूर्णा जरूर यह राज जानती थी। अली अकबर यूँ तो पाँच साल बड़े थे, पर बहन से कुछ न छुपाते। अभी कुछ दिनों पहले घर में छुप कर बहन को नाचते देखा था, तो एक छोटी साड़ी लाकर दी थी। जब बाबा बाज़ार गए तो वह आंगन में खूब नाची। उसे संगीत सीखने की इज़ाजत न थी। बड़ी बहन जहाँ-आरा के ससुराल वालों ने पहले ही संगीत के चलते तानपुरा जला कर वापस भेज दिया था। वह वक्त कहाँ था कि इज्जतदार घर की लड़कियाँ संगीत सीखे? और लड़के अली अकबर को संगीत से अधिक रुचि पतंग उड़ाने में।

बाबा भले बंदिश गाकर समझाते-डांटते,

“सुर साधो हे गुणी,

सुर को पहचानो।

जो सुर न समझे, वो असुर कहलाए,

बेसुरा गाए-बजाए, वो गू खाए।”

लेकिन तमाम कोशिशों पर भी अली अकबर को सुर ही न मिले। बाबा पैर पटकते बाज़ार निकल गए। जब लौटे तो देखा, दस वर्ष की बेटी अन्नपूर्णा गा रही है और भाई को सरोद सिखा रही है।

बाबा उसके बाल पकड़ खींचते कमरे में ले गए और फिर आँखों में आँखे डाल कहा, “तुम्हें आज से मैं संगीत सिखाऊँगा। लेकिन तुम्हें संगीत से ही विवाह करना होगा। तुम्हें मैं अपने गुरुओं का रहस्य सिखाऊँगा। लेकिन ऐसी चीज सिखाऊँगा जिसे बाज़ार के लोग न समझेंगे। जो गुणी होगा, वही तुम्हें सुनेगा। अन्नपूर्णा! तुम ही मेरी उत्तराधिकारी बनोगी। संगीत से लोग नाम-शोहरत पाते हैं, तुम संगीत से ईश्वर को पाओगी।”

इस बात को कुछ दिन हुए तो सर मुँडा कर नयी मूँछों वाला एक गोरा युवक दरवाजे पर खड़ा था। बाबा ने गौर से देखा और उछल पड़े, “रवि! यह तो रवि है…। रवि आ गया।” बाबा रवि को उनके बड़े भाई उदय के साथ यूरोप में मिले थे। सूट-बूट में, घुँघराले लंबे बालों वाला, नाचने-गाने वाला रवि आज जब इस रूप में सफेद खद्दर कुर्ते में आया तो पहचानने में वक्त लगा। बाबा रवि को आंगन ले आए जहाँ सुरबहार लिए अन्नपूर्णा बैठी थी।

बाबा ने कहा, “रवि! तुम्हें इसी की तरह सुर साधना है।” यह सुन कर वह बालिका शरमा कर पड़ोस में भाग गयी।

मैं जब मैहर में उस आंगन में खड़ा था तो ये दृश्य जैसे सामने आ गए। वहीं पड़ोस में रविशंकर का वह बसेरा, जहाँ के भूतों की कहानी सुन कर अन्नपूर्णा आश्चर्य जताती। 

“जानती हो अनु! वे बड़े नाक वाले भूत हैं। एक नहीं, बहुत सारे।”

मुझे वह भूत-बंगला न मिला, लेकिन जब मैहर देवी की सीढ़ीयाँ चढ़ रहा था तो लगा बाबा और उदय शंकर भी साथ सीढ़ीयाँ चढ़ रहे हैं। और ऊपर पहुँच कर माँ शारदा के सामने उदय अपने छोटे भाई का विवाह-प्रस्ताव रख देते हैं। बाबा की आराध्य देवी के समक्ष उनके जीवन की सबसे हृदय-विदारक निर्णय की नींव पड़ रही है।

सालों बाद ऊपर एक कमरे में अन्नपूर्णा देवी सुरबहार बजा रही हैं, तो नीचे अपने नाना की गोद में बैठा शुभो पूछता है, “बाबा! क्या यह उदासी का राग है?”

बाबा की आँखों में आँसू आ गए लेकिन गौर से उस बच्चे को निहारा। जिस रस को समझने में बरसों लग जाते हैं, यह बालक दो पल में समझ गया? रक्त में माँ का गंभीर सुरबहार, पिता का यशस्वी सितार। और उनके गुरू के गोद में बैठा बालक भला कोई साधारण बालक तो न था। जब मैं पं. रविशंकर और शुभो की साथ बैठी रिकॉर्डिंग देखता हूँ तो लगता है कि गगन में ईश्वर ने एक ही रवि के लिए जगह दी है। शुभो की सितार के सामने लगे माइक्रोफ़ोन पर लोग शक करते रहे कि मद्धिम है। और ऐसे ही कयास अन्नपूर्णा देवी और पं. रविशंकर के लिए भी लगाते रहे कि एक श्रेष्ठ। अब 1955 ई. की वह प्रस्तुति किसने देखी, किसने सुनी?

हाँ! अन्नपूर्णा देवी की संगीत-साधना हरिदासी है, निर्मोही है। अगर इस सदी के दो शुद्धतम सितार-सुरबहार वादक चुनने हों तो, एक हैं मुश्ताक अली ख़ान और दूसरी अन्नपूर्णा देवी। ऐसे वक़्त में जब युवा पं. रविशंकर की लयकारी और विलायत ख़ान के बाज़ से दुनिया झूमने लगी थी, अन्नपूर्णा देवी अपने आलाप और तान से मन मोह लेती। उनका यह गुण कुछ हद तक निखिल बनर्जी में आया, लेकिन यह दोनों लंबे समय तक आम श्रोताओं के नसीब में न रहे। यह तो लंबी तपस्या कर उनका सान्निध्य पाने वाले पं. हरिप्रसाद चौरसिया, नित्यानंद हल्दीपुर और अमित भट्टाचार्य सरीखों को नसीब हुआ कि अन्नपूर्णा देवी को करीब से देख लें।

रही बात पंडित जी की, तो मुझे एक वाकया मिलता है कि जब 1982 ई. में एक न्यौते पर वह बंबई आए और अन्नपूर्णा देवी जी आयोजक थीं तो पूछा,

“तुम अपनी मुंडेर पर बैठे कौवों और कबूतरों को इतना अनाज क्यों खिलाती हो?”

अन्नपूर्णा जी ने कहा, “वे कभी धोखा नहीं देते।”

पंडित जी ने विनोदी भाव में हँसते हुए कहा, “उन्हें अनाज देना बंद कर दो, वह आना बंद कर देंगे।” 

वह पंडित जी को सदा एक गुणी संगीतकार और बाबा की परंपरा को विश्व-पटल पर लाने वाला मानती रहीं। बस उनकी राह वही थी जो बाबा ने तय की थी। संगीत से ईश्वर की प्राप्ति। 

स्वपन बंधोपाध्याय लिखते हैं कि एक दिन माँ अन्नपूर्णा देवी अपने फ़्लैट के बाल्कनी में कबूतरों को दाना दे रही थी तो एक गर्भवती कबूतर आकर बैठी। उन्होंने कबूतर को सहलाते कहा, “तुम उड़ते-उड़ते थक गयी हो। तुम अब अपना ख़याल रखो।” यह कह कर उन्होंने कबूतर को सहारा देकर उड़ा दिया और निहारने लगी। उन उड़ते कबूतरों में उनकी आँखें बाबा, भाई, पंडित जी, शुभो..और न जाने किस-किस को ढूँढ रही थी। जैसे आज हमारी आँखें संगीत की इस अन्नपूर्णा को ढूँढ रही हैं।

(स्वपन कुमार बंधोपाध्याय की पुस्तक “अन्नपूर्णा देवी: ऐन अनहर्ड मेलोडी” पर आधारित)

 

 

 

 

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2 comments

  1. बहुत सुंदर!

  2. वाकई बेहतरीन लिखा है।

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