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मनोज कुमार पांडेय की कहानी ‘पापियों के उद्धार की अनोखी योजना’

मनोज कुमार पांडेय मेरी पीढ़ी के उन कथाकारों में हैं जो न सिर्फ निरंतर लिख रहे हैं बल्कि नए-नए कथा-प्रयोग भी कर रहे हैं. यह उनकी नई कहानी है जो लक्षणा और व्यंजना में पढ़े जाने की मांग करती है- प्रभात रंजन

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स्वर्णदेश का राजा उन लोगों के लिए हमेशा दुखी रहा करता था जो किसी न किसी वजह से पतन के गर्त में गिरे हुए थे। वह बार बार उनके लिए द्रवित होता। कई बार तो रोने ही लगता। वह हमेशा सोचता कि उन पतितों से जो भी अपराध हुए हों पर हैं तो ये सभी स्वर्णदेश की इसी पावन धरती के निवासी। इन सबमें स्वर्णदेश की उसी पवित्र हवा और पानी का अंश है जो राजा में है। जो गुप्तमंत्री में है।

आह! गुप्तमंत्री कहाँ हो तुम, राजा ने एक भावुक साँस खींची।

      नाम लेते ही गुप्तमंत्री हाजिर हो गया। यही तो खूबी थी उसकी। कई बार तो खुद राजा तक को नहीं पता चलता कि वह गुप्तमंत्री को याद कर रहा है पर गुप्तमंत्री को पता चल जाता और वह तुरंत हाजिर हो जाता।

राजा उसकी इस अदा पर फिदा था पर कई बार जब वह अकेला होता था तो उसे डर भी लगता कि गुप्तमंत्री उसे इस हद तक जानता है। पर वह इस डर के मारे डर भी नहीं पाता था कि कहीं गुप्तमंत्री को उसके डर के बारे में पता न चल जाय।

      देर तक राजा गुप्तमंत्री को और गुप्तमंत्री राजा को देखता रहा।

गुप्तमंत्री ने देखा कि राजा की आँखों में आँसू हैं। वह विह्वल हो गया। प्रोटोकाल की परवाह किए बिना गुप्तमंत्री ने राजा के आँसुओं को पोंछ डाला और राजा के हाथ अपने हाथों में लेकर उन्हें सहलाने लगा। हाथ सहलाते सहलाते वह राजा की चरणों में बैठ गया।

राजा अब भी चुप और भावुक दिख रहा था।

अब गुप्तमंत्री से नहीं रहा गया। उसने पूछ ही लिया कि हे महाराज इस दास को बताइए कि वह कौन सी चिंता है जो आपको इस कदर कमजोर बना रही है?

      राजा बोला कि हे गुप्तमंत्री तुमसे ज्यादा मेरे बारे में कौन जानता है? मेरी भुजाओं में हजारों शेरों का बल है। आँखों में ज्वालामुखियाँ लहराती हैं। चलते हुए सँभलकर पैर रखना पड़ता है कि कहीं आसपास के लोगों को भूकंप का डर न सताने लगे। बचपन में मैंने एक दुष्ट हाथी को सूँड़ से नचाकर आसमान में उछाल दिया था जो आज तक एक क्षुद्र उपग्रह के रूप में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। और तो और…

जानता हूँ महाराज, गुप्तमंत्री ने कहा। इसीलिए तो आपकी यह दशा मुझे और भी विचलित कर रही है। अब अधिक समय लेकर दास के धैर्य का इम्तहान न लें और उस चीज के बारे में बताएँ जो आपको यूँ अधीर बना रही है। जितना मैं आपको जानता हूँ यह जो भी समस्या होगी हर हाल में स्वर्णदेश से जुड़ी होगी। इसके सिवा और किसी भी बात में वह क्षमता नहीं है कि वह आपको इस कदर अधीर बना सके।

गुप्तमंत्री की बात सुनकर राजा ने उसे गले से लगा लिया और गले लगाये हुए ही अपने भीतर की बात गुप्तमंत्री के कानों में कहने लगा। पूरी बात सुनकर गुप्तमंत्री के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं।

थोड़ी देर तक वह गंभीरता से सोचता रहा फिर बोला, उपाय है महाराज। पर ये उपाय ऐसा है कि इसके लिए आपको बहुत त्याग करना होगा। तरह तरह के लांछन सहने होंगे। इसलिए मैं यह उपाय आपके सामने रखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा हूँ।

बदले में राजा ने गुप्तमंत्री से कहा कि वह निर्भीक होकर अपनी बात कहे। जिस तरह कि वह अब तक करता आया है। और जिस लिए वह राजा को अत्यंत प्रिय है।

      गुप्त मंत्री ने तब कहा कि हे महाराज इस समस्या का एकमात्र उपाय यह है कि आप उस नदी को सबके नहाने के लिए खोल दीजिए जिसमें अब तक आप और आपके प्रिय अनुचर ही नहाते रहे हैं। इस नदी में नहाकर सब पवित्र और निष्पाप हो जाएँगे। आप उन सबको बुलाइए और गले लगाइए। आपसे मिलकर, आपको छूकर उनके भीतर बची रही सही कालिमा भी सदा के लिए नष्ट हो जाएगी। यह अलग बात है कि इसके लिए आपको विरोधियों की तरफ से तरह तरह के लांछनों और हमलों के लिए तैयार रहना होगा।

      राजा ने फैसला करने में पल भर भी देर नहीं लगाई।

उसने कहा कि स्वर्णदेश और उसके लोगों के हित में मैं कितने भी लांछन और हमले खुशी खुशी झेलने के लिए तैयार हूँ। जाओ और जाकर एलान करवा दो कि वह नदी जिसका पानी पीकर मैं बड़ा हुआ हूँ। जो मेरी रगों में खून की तरह बहती है वह आज और अभी से सभी तरह के अपराधियों, भ्रष्टाचारियों, हत्यारों और बलात्कारियों के लिए खोल दी गई है। वे आएँ और इसमें डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति पाएँ।

इस बात की व्यवस्था करो कि जेलों में बंद जो पापी नदी में डुबकी लगाना चाहते हैं उन्हें भी इस बात का पूरा मौका मिले। तुम तो जानते ही हो कि मैं किसी भी तरह के पक्षपात का घोर विरोधी हूँ। एक भी पापी निष्पाप होने से बचा रह गया तो मैं इस पूरी योजना को ही असफल मानूँगा। आज और अभी से यह नदी सभी तरह के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े पापियों के लिए पूरी तरह से खोल दी जाय।

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यह योजना पूरी तरह से कामयाब रही। स्वर्णदेश अपराधियों से लगभग मुक्त ही हो गया। नदी के दोनों किनारों पर पापियों की भीड़ लग गई। वे एक पवित्र खुशी से पागल हो रहे थे। नदी के जल में उतरते ही वे हमेशा के लिए पवित्र हो जाने वाले थे।

यह ऐसी बात थी जिस पर अभी भी उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था। वे खुद को और दूसरों को चिकोटी काट रहे थे और जाँच रहे थे कि कहीं वे सपना तो नहीं देख रहे हैं। और तब तो वे विह्वल ही हो गए जब उन्होंने पाया कि यह सपने जैसी लगने वाली बात एकदम सच्ची थी। फिर तो इतनी बड़ी संख्या में लोग पवित्र नदी में उतरे की नदी का पानी गाढ़ा और मटमैला हो गया।

पापी लोग नदी में नहाते गए और पवित्र होते गए पर उनके नदी में घुल रहे पापों की वजह से नदी में रहने वाले जीव जंतु त्राहि त्राहि करने लगे। जब उनकी त्राहि त्राहि का शोर ज्यादा बढ़ गया तो एक राजाज्ञा निकाली गई जिसमें उन्हें स्वर्णदेश के हित में चुप रहने का आदेश दिया गया।

आदेश में यह भी था कि नदी की सफाई के लिए जल्दी ही एक महाबजट जारी किया जा रहा है। खुद राज परिवार के अनेक लोगों ने पापियों के नदी-स्नान पर दबे-छुपे स्वर में आपत्ति जताई पर राजा के आदेश का खुला विरोध करने का साहस उनमें नहीं था।

      जब बड़ी संख्या में पापी लोग नदी नहाकर पापमुक्त और इससे भी ज्यादा इज्जतदार बन गए तो उन्होंने राजा को उनकी अपार दयालुता की याद दिलाते हुए माँग की कि अब उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाय। वे फिर से पुरानी दुनिया में न लौट जाएँ इस लिए जरूरी है कि उनका समुचित पुनर्वास किया जाय।

इस माँग में धमकी का स्वर साफ साफ सुनाई दे रहा था फिर भी स्वर्णदेश के हित में राजा ने इस धमकी को नजरंदाज किया और गुप्तमंत्री के साथ पुनर्वास योजना की रूपरेखा बनाने में जुट गए।

      यह बहुत ही कठिन काम था पर गुप्तमंत्री के सक्रिय सहयोग से राजा ने यह भी कर दिखाया। तय पाया गया कि पापी के रूप में इन इज्जतदार लोगों का जो क्षेत्र रहा है वही उन्हें दिया जाय। इससे दो बातें होंगी। एक तो उनके पास अपनी गलतियाँ सुधारने का मौका होगा और दूसरे स्वर्णदेश को उनके अनुभवों का लाभ भी मिल सकेगा।

यह जरूरी है कि लोगों के अनुभवों को नजरंदाज न किया जाय। स्वर्णदेश के आगे बढ़ने का यही एकमात्र रास्ता है। राजा ने गुप्तमंत्री का गाल थपथपाते हुए कहा था।

      अगले दिन राजा के हस्ताक्षर के साथ पुराने अपराधियों जो कि अब और देशप्रेमी नागरिक बन चुके थे उनके पुनर्वास के बारे में आदेश जारी किया गया। इसमें कहा गया था कि चोरों को चौकीदारी, गुंडों और डाकुओं को पुलिस, आतंकवादियों को सेना, ब्लैकमनी वालों को बैंकिंग, बलात्कारियों को स्त्री शिक्षा व कल्याण आदि के काम दिए जायँ।

आदेश में यह भी था कि उनसे कोई प्रमाणपत्र वगैरह न माँगा जाय और पवित्र होने से पहले का उनका आपराधिक रिकार्ड ही उनकी योग्यता का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र समझा जाय। इसी तरह से घोटालेबाजों, कफनचोरों, देशद्रोहियों और जमाखोरों का भी पुनर्वास किया गया।

यह योजना इतनी कामयाब रहेगी इसकी कल्पना राजा को भी नहीं थी। राजा के विरोधियों के पास विरोध करने का कोई मुद्दा ही नहीं बचा। सारे पवित्र हुए लोग अपने पिछले जीवन को इतना कोसते कि उतना विरोधियों के लिए भी संभव न होता।

वे बताते कि वे विरोधियों के चक्कर में आकर अपना सही रूप भूलकर पापी हो गए थे। और अब राजा जी के आशीर्वाद से उन्हें अपने सही स्वरूप का ज्ञान हो गया है। और जब तक राजा जी का आशीर्वाद उन पर बना रहेगा वे अपना यह स्वरूप कभी नहीं भूलेंगे।

यही नहीं वे राजा के विरोधियों को सबक सिखाने में राजा की बिना शर्त मदद के लिए भी तैयार थे। उनकी इस मदद के प्रस्ताव से राजा के गद्गद हो उठा। अपने ट्विटर संदेश में राजा ने कहा कि इसका मतलब यह है कि ये लोग पूरी तरह से बदल चुके हैं।

      राजा की इस उदार योजना के बावजूद जब राजा के विरोधी शांत नहीं हुए तो राजा को प्रजा के नाम एक सार्वजनिक संदेश देना पड़ा। संदेश देते हुए राजा ने कहा कि जो विरोधी है वह देशद्रोही है। और जो देशद्रोही है वह मेरा निजी दुश्मन है।

देशद्रोहियों को ललकारते हुए राजा ने कहा कि मैं पिछले राजाओं की तरह नहीं हूँ। मैं इनकी ईंट से ईंट बजा दूँगा। उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पापियों के निष्पाप होने की प्रक्रिया में सभी बंदीगृह पूरी तरह से खाली हो गए हैं। उन्हें इन्हीं देशद्रोहियों से भरा जाएगा।

राजा ने प्रजा यानी अपने समर्थकों को यह जिम्मेदारी दी कि वह इन देशद्रोहियों को सबक सिखाए और इन्हें काबू में करने में और स्वर्णदेश को आगे बढ़ाने में राजा की मदद करे। अपनी प्यारी प्रजा के सक्रिय सहयोग के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते, राजा ने कहा।

प्रजा ने गद्गद भाव से राजा की जयजयकार की। बदले में राजा ने प्रजा की तरफ हाथ हिलाया और वहाँ से सीधे विदेश यात्रा पर निकल गया।

      आगे का काम प्रजा ने बखूबी सँभाल लिया। अगले कुछ दिनों में प्रजा ने बहुत सारे देशद्रोहियों को मार गिराया। प्रजा के सहयोग से जल्दी ही सभी बंदीगृह फिर से आबाद हो गए। जल्दी ही मीडिया राजा की इस योजना के बखान से रंग गई।

मीडिया दिग्गजों ने कहा कि वे इस योजना का सिर्फ एक ही पहलू देख पाए थे। जबकि माननीय राजाजी ने न सिर्फ पुराने पापियों का उद्धार किया बल्कि उन तत्वों की भी शिनाख्त करने और धर-पकड़ने में सफलता हासिल की जो भविष्य में अपराध या कि पाप करने वाले थे। यह काम करने वाले वे स्वर्णदेश के ही नहीं बल्कि अखिल ब्रह्मांड के पहले राजा हैं।

      उधर इस प्रशंसा को निरपेक्ष भाव से स्वीकार करते हुए दूर एक रंग-बिरंगे देश के एक रंगारंग आयोजन में पत्रकार होने का अभिनय कर रहे एक मसखरे से राजा ने कहा कि वह बंदीगृह में बंद देशद्रोहियों के लिए जल्दी ही एक नई योजना ले आएँगे जिससे कि इन सब की आत्मा का शुद्धीकरण हो सके।

इस पर मसखरे ने तालियाँ बजाई जिससे ऐसी आवाज आई मानों वह अपना गाल पीट रहा हो।

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ई-मेल : chanduksaath@gmail.com

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2 comments

  1. अरुणेश शुक्ल

    मनोज पांडेय की सुन्दर कहानी।समसामयिक परिदृश्य में एक शशक्त सकारात्मक लेखकीय हस्तक्षेप।इस रचनात्मक साहस के लिए मनोज को बधाई।

  2. बहुत अच्छी कहानी है। अपने वक़्त को कहने का यह अंदाज़ बहुत मजेदार है।

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