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न माला न मंतर न पूजा न सजदा  तुझे हर घड़ी सोचना भी इबादत

रचना भोला यामिनी के लव नोट्स की किताब ‘मन के मंजीरे’ इस साल के आरम्भ में राजपाल एंड संज से आई थी. अपने ढंग की अलग सी शैली की इस रूहानी किताब की समीक्षा लिखी है कवयित्री स्मिता सिन्हा ने- मॉडरेटर

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तेरे पास में बैठना भी इबादत

तुझे दूर से देखना भी इबादत
न माला , न मंतर , न पूजा , न सजदा
तुझे हर घड़ी सोचना भी इबादत …
कहते हैं इश्क़ अपने आप में एक इबादत है। एक रूहानी सुकून … एक अनव्यक्त सी प्रार्थना … सूफ़ी के तन पर लिपटी एक फ़क़ीरी, जब खुद इश्क़ को गुमां नहीं होता कि उसकी शै में कौन कहाँ कितना डूबा, कहाँ कितना तर गया कोई। इश्क़ एक ऐसा तरंगित नाद जिसके हर स्पंदन पर बुल्लेशाह कहते हैं , नाच उठते हैं बेताले भी –
                 जिस तन लगया इश्क़ कमाल,
                 नाचे बेसुर ते बेताल।
सूफ़ी हज़रत सुलतान बाहू सच ही तो कह गये,
                 ऐन -इशक
                 जिन्हाँ दी हड्डीं रचया ,
                 रहन उह चुप-चुपाते हू ।
                 लूँ लूँ दे विच लक्ख जुबानाँ
                 करन उह गुंगियाँ बाताँ हू ।
(प्रेम जिनकी हड्डियों में रचता है , वे खामोश हो जाते हैं । मन के भीतर बसे प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिये देह के रोम रोम में लाखों जुबां आ जाती है और होने लगती हैं गूँगी बातें )
 जानी मानी अनुवादक और लेखिका रचना भोला ‘यामिनी ‘ की नयी कृति ‘ मन के मंजीरे ‘ इश्क़ के ऐसे ही कतरों से बना वह विशाल समंदर है , जिसे घूँट घूँट पीते हुए आप कभी उतरते हैं संसार के भीतर, तो कभी रह जाते हैं संसार से परे- क्या खूब लिखा आपने रचना – चाँद की डयोढ़ी पर बैठ /इतराती रहूँगी उसके पहलू में / वो ठहरा इश्क़ समंदर / भला एक जन्म में कितना सहेज पाऊँगी उसे? इश्क़ की हर बात कह देने के बाद भी अधूरी जान पड़ती है और लगता है बस वही तो कहना था, जो अब भी कहना बाकी है। कह देने और न  कह पाने की इसी ज़द्दोज़हद को हमारी बंजारा मिजाजी सखी ने बड़ी सहजता और बेहद खूबसूरती से कागज पर उतारा है। हर्फ़ दर हर्फ़ जैसे सदियों से जमी हुई उदासी बह चली हो आँखों से … जिस्म जैसे हो चाँदनी में धुला लिहाफ  …इश्क़ जैसे हो सर्दियों में गुनगुनी धूप की छतनार। और उस पर उनका यह कहना – उसकी महक और लम्स हैं /अबद और अजल/ और हमारा इश्क़ /ये जिस्म भर नहीं …
 पाँव पाँव चलता इश्क़ मानो वहीं टिक कर बैठ गया हो ऊतुँग शिखर से गिरते जलस्त्रोत के पास किसी पत्थर की ओट में ….और बस इंतज़ार उस एक माहताबी स्पर्श का …और बस वह सोने सा पिघल जाये …एकाकार हो जाये झील के उस चमकीले जल में जैसे देह की वासना से परे हो उसके प्रियतम का अभिसार। हमारे बीच अब किसी /विस्मय के लिये स्थान नहीं रहा /देह से परे कैसा विस्मय ! बकौल जिग़र -तू नहीं मैं हूँ , मैं नहीं तू है /अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे / मुझमें तुझमें कोई फ़र्क नहीं /इश्क़ क्यों दरमियान है प्यारे।
रचना ने आखिर क्या रच दिया ! छंदों में बंधा गद्य या कि गद्य में पिरोए हजारों अफ़साने या कि सूफ़ियाना एहसासों का एक ऐसा दस्तावेज़ , जहाँ नाभि और धरती धीरे धीरे एक हो जायें , अपने होने की दिव्यता के साथ या कि अनुभूतियों का ऐसा वृहद संसार जहाँ मौन भी सम्प्रेषणीय बन जाये या कि अहं से परे जहाँ व्योम परिहार्य हो । मैं हर बार  /उसकी होकर भी /जैसे उसकी होने से रह जाती हूँ /रूहों का सौदा करना / कब आसाँ हुआ है जानां /सदियां बीत जाया करती हैं /सब तेरा , सब तेरा कहते ! !
सूफियों के दरगाहों पर जो नात, हम्द और मन्कब्त गूँजते हैं – इनमें प्रेम , समर्पण और तारीफ के भाव होते हैं और अकीदत के साथ गाये जाते हैं। ‘ मन के मंजीरे ‘ भी बस ऐसा ही समां बांधता है कि आत्मा से परमात्मा के मिलन की अनुभूति होती है। एक ऐसा रूहानी संगीत जहाँ इश्क़ इबादत हो जाता है।रचना ने इस किताब को इश्क़ के इतने सुर्ख व चटख रंगों में रंगा है , जिसके सामने कायनात के सारे रंग फ़ीके पड़ जायें। हर एक हर्फ़ में इश्क़ का एक नया स्वाद, जिसकी लज्जत देर तक हमारी जिह्वा पर टिकी रहे, घुलता रहे इश्क़ का सोंधापन हमारे ज़िस्म से रूह तक में भी। किताब के हर पन्ने पर इबादत की लरजती खुशबुओं के छींटे, जो ज़िंदगी को इत्र सा महकाये रखे ।
जब प्यार किसी राह चलते राहगीर के /होंठों की प्यास बन कर मुखरित हो उठता है /जब नदी किनारे पड़ा पहाड़ी गोल पत्थर /नाना रंगों में सजकर /किसी के घर की जीनत हो जाता है /जब दौड़ने लगता है रगों में ख़ुदा /और दिल में खिलने लगते हैं /उसकी नेमतों और रहमतों के फूल / तब लिखे जाते हैं /ये लव नोट्स … हाँ यक़ीनन तब ही लिखे जाते हैं ये लव नोट्स ॥
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