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जब ग़ज़ल नहीं बुन पाता हूँ कहानी बुनने लगता हूँ- गौतम राजऋषि

गौतम राजऋषि भारतीय सेना में कर्नल हैं लेकिन हम हिंदी वालों के लिए वे शायर हैं, ‘हरी मुस्कुराहटों का कोलाज’ के कथाकार हैं, साहित्यिक बहसों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले लेखक हैं. उनसे एक बेलाग और बेबाक बातचीत की है युवा लेखक पीयूष द्विवेदी ने- मॉडरेटर

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सवाल ये सवाल तो आपसे अक्सर ही पूछा जाता होगा कि फ़ौज में काम करते हुए लेखन के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं, लेकिन मेरा सवाल ज़रा अलग है कि फौलादी माने जाने वाले फ़ौजी हृदय में कविता के कोमल अंकुर कैसे फूट पड़े? इसके पीछे कोई ख़ास वजह या किस्सा हो तो बताइये।

गौतम कोई ख़ास वज़ह तो नहीं, कविताओं का एक बचपन से ही शौक था जो सेना में शामिल होने के बाद भी बना रहा। दरअस्ल कविता मेरे लिये एक उस काल्पनिक द्वार की तरह है जिसके जरिये मैं किसी और दुनिया में प्रवेश कर जाता हूँ। वो साइंस फिक्शन वाली फ़िल्मों में दिखाते हैं ना कि कोई गोल सा पोर्टल खुलता है पृथ्वी पर जिसमें अंदर घुसने पर फ़िल्म का किरदार किसी और ग्रह पर पहुँच जाता है…ठीक वही पोर्टल मेरे लिये कविता है, फिर चाहे वो कविता लिखना हो या उसे पढ़ना। कविता में…एक अच्छी कविता में वो तिलिस्म होता है जो अपने डूब कर पढ़ने वाले पाठक को किसी दुनिया से किसी और दुनिया में पलक मूँदते ही ले जाने की क्षमता रखता है। इस मुआमले में विज्ञान अभी बहुत पीछे है कविता से। वैसे आपके इस सवाल से नीरज जी के एक विख्यात गीत की पंक्तियाँ याद आ गयीं। फ़िल्म ‘प्रेम पुजारी’ का गीत है…”ताकत वतन की हमसे है” जो विगत तेरह साल से मेरे मोबाइल का कॉलर-ट्यून भी है, की पंक्तियाँ…

“सीना है फ़ौलाद का अपना, फूलों जैसा दिल है

तन में विंध्याचल का बल है, मन में ताजमहल है”

सवाल बात चली है, तो एक ज़रा व्यक्तिगत सवाल कि आप फेसबुक पर बड़े इश्क़ मिज़ाजी ख़यालात साझा करते रहते हैं, ज़िन्दगी में इश्क़ से साबका पड़ा है कभी?

गौतम मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि इश्क़ से ज़्यादा सामयिक और इश्क़ से ज़्यादा सटीक कुछ भी नहीं है लिखने के लिये। मुझे ज़िन्दगी से इश्क़ है दरअस्ल। अपने प्रोफेशन में मौत को इतनी बार साँस भर की दूरी से गुज़रते देख चुका हूँ और कई नज़दीकी दोस्तों को खो चुका हूँ कि ज़िन्दगी के हर लम्हे से इश्क़ में सरापा डूबा रहता हूँ। सच कहूँ तो अपने सवाल में आपका इशारा जिस इश्क़ से है, वो तो मैं शायद तीसरी कक्षा से करता आ रहा हूँ, यदि तनिक संकोचवश नर्सरी कक्षा की बातें भूल जाऊँ तो (हाहा) !…और फ़ेसबुक की तो बात ही अलग है। कोई उदास शेर लगाते ही, “सब ठीक है ना” के संदेशे आने लगते हैं इनबॉक्स में और इश्क़ में डूबा कोई नया शेर लगाया नहीं कि इनबॉक्स “कौन है बे वो” की उत्सुकताओं से सराबोर होने लगता है।

सवाल आपकी ग़ज़लें अपने अनूठे प्रतीकों के कारण विशेष रूप से आकर्षित करती हैं, कहाँ से सूझते हैं ये प्रतीक?

गौतम वली साब का एक बड़ा ही विख्यात शेर है..

“क्या नज़ाकत है कि आरिज उनके नीले पड़ गये

हमने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का”

शायरी से अपनी मुहब्बत के शुरूआती दौर में जब ये शेर सुना तो शायर की इमेजरी ने एक नाख़त्म होने वाले लम्हे भर के लिये निःशब्द कर दिया…मतलब, नज़ाकत की ऐसी कल्पना कि सपने में तस्वीर को चूमने से माशुका के गालों पर नीले धब्बे पड़ गये। उफ़, शायर का तसव्वुर…जैसे ख़ुद ब्रह्मा द्वारा नया सृजन। लेकिन जब भी दोस्तों को ये शेर सुनाता तो साथ में शब्दों के मतलब बताने की मेहनत करनी पड़ती…आरिज यानी कि गाल…बोसा मतलब चुंबन। वो शायद दसवीं कक्षा की बात थी और मैंने सोचा कि अगर मैं कभी ग़ज़ल कहूँगा तो उसे पढ़ने या सुनने वालों को कभी मतलब समझाने की नौबत नहीं होगी। तो आप और मेरी ग़ज़लों के पाठक जिसे अनूठे प्रतीक कहते हैं, वो दरअस्ल हमारे आसपास की रोज़मर्रा की चीज़ें होती हैं, जिनमें इतना अपनापन होता है कि वो पसंद आता है लोगों को। एक ग़ज़ल कही थी मैंने ‘नीला नीला’ रदीफ़ लेकर, जिसका मतला यूँ था कि “उजली-उजली बर्फ़ के नीचे पत्थर नीला नीला है / तेरी यादों में ये सर्द दिसम्बर नीला नीला है”। इसी ग़ज़ल का एक शेर देखिये जो अस्ल में वली साब के शेर की आसान सी तर्जुमानी है(वली साब से करबद्ध क्षमा-याचना के साथ)…”मैंने तो चूमा था तेरी तस्वीरों को रात ढले/सुब्ह सुना कि कुछ तेरे गालों पर नीला नीला है”। कहने का सार ये कि एक ग़ज़ल को ख़ूबसूरत होने के लिये उर्दू के भारी-भरकम लफ़्जों की ज़रूरत नहीं। एक मेरा शेर जो बहुत ही लोकप्रिय हुआ है…”धूप शावर में जब तक नहाती रही/चाँद कमरे में सिगरेट पीता रहा”…अब इस शेर के प्रतीकों में कुछ भी अनूठा तो नहीं। सब आस-पास की देखी-भाली  चीज़ें हैं और हम जिसे देखने के अभ्यस्त होते हैं, उनका नये तरह से इस्तेमाल उन्हें दिल के क़रीब ले आता है।

सवाल आपकी पहली किताब ग़ज़ल संग्रह थी, जो लोकप्रिय भी हुई। फिर अगली किताब में सीधे कहानीकार कैसे बन गए?

गौतम महज़ किताब आने या न आने भर से तो कोई कहानीकार बनता या नहीं बनता है। गुलेरी जी बस एक कहानी से सिरमौर हो गये, हम जैसे हज़ारों लिखने वाले सौ कहानी लिख कर भी उस मुक़ाम तक नहीं पहुँच पायेंगे। मेरी किताब भले ही अब आयी हो, लेकिन कहानी लिखते आठ-नौ साल हो गये हैं। पहली कहानी दो हज़ार दस में ‘पाखी’ पत्रिका में आयी थी…तब से लगभग पंद्रह कहानियाँ लिख चुका हूँ। छपना ही यदि पैमाना है कहानीकार होने का तो किताब आने से पहले चार कहानियाँ हंस में, दो कहानी जनसत्ता में और एक-एक कहानी वागर्थ, कथादेश, परिकथा, लमही, वर्तमान साहित्य, कादम्बिनी, अहा ज़िन्दगी, कथाक्रम जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में आ चुकी हैं। किताब अभी लाने का कोई इरादा था नहीं, सच कहूँ तो। वो तो कथादेश पत्रिका में छपने वाले मेरे मासिक कॉलम “फ़ौजी की डायरी” पढ़ने के बाद राजपाल प्रकाशन की चीफ़ एडिटर मीरा जौहरी जी ने इच्छा ज़ाहिर की…तो कहानियों की यह किताब “हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज” आ गयी। दरअस्ल क्या है न कि ग़ज़ल कहना तनिक मुश्किल काम होता है…तो जब ग़ज़ल नहीं बुन पाता हूँ, कहानी बुनने लगता हूँ।

सवाल आपकी कई कहानियाँ के विषय तो यथार्थपरक हैं ही, उनकी प्रस्तुति भी ऐसी है कि कई कहानियाँ पढ़ते हुए तो ऐसा लगता है कि हम कहानी नहीं, कोई सत्य घटना पढ़ रहे हैं। ये कहानियाँ कितनी सच्ची और कितनी काल्पनिक हैं?

गौतम आपने तो पूरी किताब डूब के पढ़ी है, पीयूष और आभारी हूँ आपका कि किताब की शुरूआती समीक्षाओं में आपकी लिखी समीक्षा बहुत ही ख़ास है। किताब में कुल इक्कीस कहानियाँ हैं और सब की सब सच्ची हैं…अधिकांश आँखों देखी और चंद कानों सुनी, थोड़ा-बहुत लेखकीय कल्पना का पुट लिये। बस ‘बार इज क्लोज़्ड ऑन ट्यूज़्डे’ का आख़िरी हिस्सा काल्पनिक है, वरना सारी कहानियों का एक-एक हिस्सा सच है।

सवाल किसी कहानी का वास्तविकता के इतने निकट हो जाना कि उसमें कहानीपन का ही लोप हो जाए, अच्छा नहीं माना जाता। आपको नहीं लगता कि आपकी कई कहानियों में ये समस्या रही है?

गौतम शुक्रिया पीयूष, आपने यह सवाल पूछा वरना यहाँ पूरा इंटरव्यू यही सोचते हुए बीत जाता है कि कब कोई ऐसा सवाल आएगा कि थोड़ी सी असहजता महसूस हो। आजकल जितने भी लेखकों के साक्षात्कार पढ़ता-देखता हूँ, मुझे लग रहा था कि इन दिनों साहित्यिक साक्षात्कार में तीखे सवालों का चलन ख़त्म हो गया है। इतनी मिठास…इतनी मिठास कि देखकर शुगर बढ़ जाने का ख़तरा नज़र आता है मुझे। शुक्र है कि ये भ्रम कहीं तो टूटा और लेखकों का मुँह पोछने वाले सवालों से परे ऐसा कोई सवाल सामने आया।

सवाल में उठायी गयी आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूँ मैं। ‘हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज’ की कई कहानियाँ वास्तव में कहानी से ज़्यादा संस्मरण प्रतीत होती हैं। क़ायदे से कहानी विधा पर सही ढंग से उतरती हुई बस दस-ग्यारह कहानियाँ हैं किताब में। लेकिन मैंने ज़्यादा परवाह नहीं की इस बात की। साहित्य मेरा शौक है बस। मैं इस साहित्य-जगत में शोहरत पाने या पुरोधा बनने की लालसा से नहीं आया हूँ। ग़ज़लों में भी मैंने बनी-बनायी परिपाटी को तोड़ा  है…आलोचना भी ख़ूब हुई कि देशज से लेकर आम हिन्दुस्तानी शब्दों का इस्तेमाल करता हूँ मैं, जो क्लासिकल ढर्रे के बरख़िलाफ़ है। मेरा अपना मानना है कि मेरे पास सुनाने को कुछ नयी कहानियाँ हैं और सुनाने का ख़ास अपना सलीका है। ढाई-तीन हज़ार लोगों के हाथों में किताब है और तक़रीबन उतने ही लोगों ने साहित्यिक पत्रिकाओं में इन कहानियों को पढ़ा होगा। इससे ज़्यादा कभी सोचा नहीं…मेरे आसमान का विस्तार इतना भर है। समस्त आलोचनाओं को हृदय के क़रीब रखता हूँ और इनसे सीख लेकर अगली बार बेहतर करने की कोशिश करता हूँ। ये कोशिश भी दरअस्ल ख़ुद की संतुष्टि के लिये है, ना कि चर्चा में बने रहने के लिये। अपनी इस किताब को लेकर जो एकमात्र आशंका मेरे मन में थी कि एक ही विषय और परिवेश पर आधारित कहानियाँ होने की वज़ह से कहीं किताब से पाठक ऊब न जायें बीच में…लेकिन ख़ुशी है कि अभी तक जितनी पाठकीय प्रतिक्रियाएँ आयी हैं, सबने सराहा ही है। अगली किताब में इस कमी को दूर करने का भरसक प्रयास होगा।

सवाल आपका गज़ल संग्रह इस बार भी जागरण बेस्टसेलर में जगह बनाए हुए है। कैसे देखते हैं आप इस सूची को?

गौतम ख़ुशी होती है किताब को इस फ़ेहरिश्त में शामिल देख कर। और-और पाठकों तक पहुँचने का माध्यम बन रही है जागरण की बेस्टसेलर मुहिम, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे इस फ़ेहरिश्त में पारदर्शिता की साफ़ कमी दिखती है। जहाँ इस फ़ेहरिश्त में शामिल कुछ किताबें निश्चित रूप से पाठकों की माँग देखते हुए शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़तीं, वहीं दूसरी ओर चंद किताबों का शामिल होना ना सिर्फ उन किताबों के लेखकों बल्कि प्रकाशकों को भी हैरान कर रहा है कि ये कैसे हो गया। लेकिन इस कमी के बावजूद जागरण बेस्टसेलर का मैं स्वागत करता हूँ। हिन्दी में सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला अख़बार जब नयी हिन्दी किताबों का नाम लेता है, तो किताब दूर-दराज़ इलाक़ों तक पहुँचती हैं और हमारी हिन्दी का विस्तार होता है।

सवाल आपके प्रिय लेखक-लेखिका? पुराने और समकालीन सब तरह के नाम बता सकते हैं।

गौतम पढ़ने का रोग पाल रखा है मैंने…एक तरह से लत कह लीजिए आप। हिन्दी साहित्य के लगभग सारे पुराने और क्लासिकल लेखकों का लिखा पढ़ चुका हूँ। जितने भी चर्चित नाम हैं सब के सब शामिल हैं प्रिय की फ़ेहरिश्त में कि वे सब के सब आराध्य की श्रेणी में आते हैं।

इस इक्कीसवीं सदी की शुरूआत से सामने आये लेखकों की…विशेषकर कहानी और कविताओं की तमाम किताबें ढूँढ़-ढूंढ़ कर ख़रीदी है मैंने और इन सबको पढ़ा है। कहानीकारों में मेरी पसंद उदय प्रकाश, अखिलेश, ममता कालिया, प्रियंवद, मनीषा कुलश्रेष्ठ, कुणाल सिंह, चंदन पांडेय, अल्पना मिश्र, प्रभात रंजन, शशिभूषण द्विवेदी, पंकज सुबीर, विमल चंद्र पांडेय, प्रत्यक्षा सिन्हा, मधु कांकरिया, विवेक मिश्र, पंकज मित्र, निलाक्षी, वंदना राग, गीताश्री, किशोर चौधरी, योगिता यादव, उपासना नीरव, सिनीवाली शर्मा हैं। कवियों और शायरों में मेरी पसंद अनिरुद्ध उमत, गीत चतुर्वेदी, आशुतोष दुबे, दिनेश कुशवाहा, शिरीष मौर्य, विकास शर्मा राज, अभिषेक शुक्ला, स्वप्निल तिवारी, इरशाद ख़ान सिकन्दर, मनोज कुमार झा, केशव तिवारी, नील कमल, ज़ुबैर अली ताबिश, बाबुषा कोहली, शैलेय, सौरभ शेखर, अपर्णा मनोज, विपिन चौधरी, रश्मि भारद्वाज, अशोक कुमार पाण्डेय, राकेश रोहित, अविनाश मिश्र, सुशोभित सक्तावत, दर्पण शाह, उपासना झा, वीरू सोनकर हैं।

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