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तसनीम खान की कहानी ‘मेरे हिस्से की चांदनी’

समकालीन युवा लेखन में तसनीम खान का नाम जाना-पहचाना है. उनकी नई कहानी पढ़िए- मॉडरेटर
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आंगन में फैली रातरानी के महकने का वक्त हो चला। वो इस कदर महक रही थी कि पूरा घर इस खूशबू से तर हो गया। हवा के झोंकों के साथ इसकी खुशबू कमरों की खिड़कियों से होकर आती रही और छोटे—बड़े सभी इस पुरखुशबू माहौल में नींद की आगोश में चले गए। चांद अपनी चमक इस खुशबुओं से भरे आंगन में बिखेर रहा था। आसमान में चांद पूरा था, तो चांदनी भी बड़ी खुशी से इठला रही थी। पूरा घर उनिंदा यानी शांत हो चला। बस, एक कोना था जहां अब भी कोई जाग रहा था। बड़े से खुले चौक के एक ओर छत पर चढ़ रही सीढ़ियों में से ही एक पर वो बैठी थी। दीवार पर टेका लगाए और सीढ़ी के किनारे चल रहे पिलर पर उलझे थे उसके दोनों पांव। एक टक वो उस चांद को देख रही थी, जिसकी चांदनी उसे चेहरे के नूर में इजाफा कर रही थी, लेकिन उसका दिल किसी अंधेरे कुएं में उतरा जा रहा था। आज की यह खुशबूओं और चांदनी से भरी रात उसके लिए नहीं थी। यही बात उसे और उसकी आंखों को बोझिल कर रही थी। हर अरमान से खाली सी उसकी आंखें चांद पर ही टिकी रही, जैसे वो अपना कुछ खोया उसमें ढूंढ रही हो। एक आंसू सा उसके चेहरे के नूर को बिखेरता हुआ सा उतरा।
‘आज की यह चांदनी तो मेरे हिस्से में नहीं। चांदनी भी बंटती है भला, ये बंटवारा मुझे कतई मंजूर नहीं।’ यह कहते उसने अपने घुटनों के भीतर सिर छिपा लिया। वो जानती है कि उसकी इस मंजूरी या नामंजूरी की जरूरत किसी को नहीं।
रात आधी हो चुकी थी। चौक की चांदनी के पीछे अंधेरे कमरे में दो आंखें और जाग रही थी, जो इन सीढ़ियों की ओर ही देख रही थी। दो आंखों से आ रहे आंसुओं को बूढ़ा गए हाथों से पौछा और अम्मा ने पूरी ताकत से आवाज लगाई, अरी निगहत, ओ री निगहत। आ जा, सो जा दुल्हन, रात बहुत हो गई।
निगहत ने तो जैसे सुना ही नहीं, अब भी उसकी खाली आंखें, उस पूरे चांद को देख रही थीं।
बूढ़ी अम्मा जानती हैं कि उनके कहने से कुछ नहीं होगा। यह जगराता चलता रहेगा, फिर भी वो हर दिन यह आवाज देना नहीं भूलती। बस इस आवाज में दिन के हिसाब से नाम भी अलग होते। कुछ कुछ चांदनी रातों में नाम निगहत होता, तो कुछ रातों मीना।
ऐसा भी नहीं कि अम्मा की आवाज से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा हो। कई देर से रुके—रुके आंसू अब लगातार बह निकले थे। आंखें अब भी आसामान की ओर थीं। अगले दो दिन और उसे उसी दर्द से गुजरना होगा। चांद और चांदनी के बीच यूं ही अकेले बैठना होगा। दिल की अरमानों को मसोस कर और अपने हिस्से की चांदनी को किसी ओर के आगोश में होने की चुभन साथ लिए जीना होगा।
‘बस दो रातें ही तो ओर हैं।’ निगहत ने फिर अपने दिल को दिलासा दिया। आंसुओं से भारी हो चुकी उसकी आंखें अब खुले रहने से इंकार कर रही थीं। वैसे भी चौके में लगी बड़ी सी घड़ी सुबह के 3 बजा रही थी। वो बोझिल कदमों से सीढ़ियां पार करते हुए नीचे आई और अपने कमरे की ओर रुख किया। दरवाजे तक पहुंचते—पहुंचते फिर उसकी रुलाई फूट पड़ी। फिर आंखों को साफ किया और भीतर चली आई। आंगन में सो रहे तीनों बच्चों की ओर देखा और वहीं उनके पास एक कोने में लेट गई। उसका मन अब भी पास के कमरे में ही था। उसके कान उस कमरे से आने वाली आहटों पर लगे रहे। हालांकि सब शांत था, लेकिन फिर भी उसे पास के कमरे से लगातार आवाजें आते रहने का वहम हो चला।
सुबह पांच बजते—बजते उसकी आंख खुल गई। टंकी के पास मुंह धोने आई तो सामने ही मीना बाल सुखाते मिल गई। एक टीस उसे भीतर तक उतर गई। सुबह—सुबह मीना का नहाना उसके लिए किसी कयामत से कम नहीं होता। और इस पर मीना का गुनगुनाना उसे और भी जला देता।
सबसे अनजान बनते वो चुपचाप रसोई में नाश्ता बनाने में जुट गई। जानती थी सैफु्द्दीन यानी उसके शौहर को नहाते ही चाय का कप हाथ में बहुत पसंद है। वो चाहती थी कि उसके नहाकर निकलने से पहले ही वो उसके लिए चाय लिए खड़ी हो। हुआ भी यही। सैफुद्दीन तौलिए से बाल पौंछता बाहर निकला और निगहस चाय की प्याली लिए उसके सामने हाजिर हो गई।
‘अरे वाह।’ सैफु्द्दीन ने तौलिए को निगहत के कंधे पर डालते हुए चाय की प्याली ले ली। एकबारगी निगहत रात के आंसू भूल कली सी खिल गई। उसे लगा जैसे ‘अरे वाह’ सैफुद्दीन ने चाय के लिए नहीं उसके लिए कहा हो। वो बिना कुछ कहे रसोई में चली गई। उसे महसूस हुआ कि अब मीना का मूड खराब हो गया और वह पैर पटकते हुए कमरे में घुस गई। निगहत को क्या, वो तो पूरे जोश से भरी रही और सुबह के नाश्ते से लेकर दिन तक के खाने का काम निपटा दिया। आज उसने सैफुद्दीन की पसंद के दम आलू बनाए थे। वो हर काम सैफुद्दीन के पसंद का करना चाहती थी। रात उसकी नहीं तो क्या दिन तो उसका हो सकता है ना। सारा काम कर वो आईने के सामेन संवरने पहुंच गई। ताकि किसी तरह मीना से कम नहीं दिखाई दे। जबकि जानती है। मीना और उसकी उम्र में दस—बारह साल का अंतर है, जो साफ दिखता भी है। उसके बाद भी वो अपने अधेड़ उम्र को मीना की जवानी के बराबर करना चाह रही थी। वो देख रही थी कि मीना अनमनी सी अपने कमरे में आरी—तारी का काम कर रही है। वो यह देख और भी खुश हो गई।
घर में यह माहौल कमोबेश हर दिन का था, बस कभी खुश मीना होती तो कभी निगहत। कभी निगहत अनमनी सी हो जाती तो कभी मीना। दोनों भंवरों की तरह सैफुद्दीन नाम के फूल के ईर्द—गिर्द मंडराते रहती और सैफुद्दीन को दोनों का यह मंडराना उसकी हैसियत को उंचा कर देता।
आज शाम को मीना की रसोई से छुट्टी थी, शादी की दावत आई थी घर भर के लिए। सभी दावत निपटाने मदरसे की ओर चल दिए। यहां कुछ नए—पुराने रिश्तेदार भी मिल गए। अम्मा की सहेली सईदन और उनकी बहू भी आए थे। अम्मा बहुत खुलूस से दोनों से मिली। दोनों को अपने पास ही बिठाए रखा। अम्मा के पास ही बैठी निगहत और मीना भी बड़ी खुशी से उन दोनों से मिली। निगहत को तो वे जानती थीं, मीना को देख पूछा— ‘यह कौन है?’
यह पूछते ही निगहत और अम्मा ने एक—दूसरे की ओर देखा, जबकि मीना शरमाने में लगी थी। अम्मा ने धीमी आवाज में कहा, सैफुद्दीन की दूसरी बीवी है।
सईदन आपा ने बनावटी मुस्कुराहट लिए उसके सिर पर हाथ फेर दिया। मगर उनके साथ बैठी बहू किश्वर को बात नागवार गुजरी। झट से निगहत से रूबरू होते पूछा— ‘आप लोग साथ ही रहती हो।’
‘निगहत ने मीना की ओर हंसते हुए नजर डाली और कहा, ‘हां— साथ ही रहती हैं।’
मीना तपाक से बोली— ‘बहनों की तरह रहते हैं हम।’
किश्वर ने हैरत से पूछा— ‘दिक्कत नहीं आती तुम लोगों को।’
मीना ने कहा— ‘काहे की दिक्कत। सुबह का काम ये कर लेती हैं और शाम का मैं। और तो और ये भी हम में झगड़ा नहीं होने देते। तीन रात इनके पास, तीन मेरे पास और एक रात अम्मा और बच्चों के पास सोते हैं। ऐसे में कोई झगड़ा नहीं।’
किश्वर ने उसे हैरत से देखा और उसके अनपढ़पन या भोलेपन पर बहुत हमदर्दी हुई उससे।
निगहत कुछ शर्मिंदा हुई और बात का रुख बदल दिया।
‘और सुनाओ आपके बच्चे कैसे है…’
रात जैसे—जैसे गहराने लगी, निगहत का दम निकलने लगा। रातरानी की खुशबू उसे फिर से बेकल करने लगी। कभी इसकी खुशबू से खुश रहने वाली निगहत को अब इसका होना ही बुरा लग रहा था। सीढ़ियों पर बैठे फिर वो चांद को घूर रही थी।
‘कैसी खुशबूएं? सौत हो तो जिंदगी से एक बू आने लगती है। पराई रातों की बू, जिसमें सैफूद्दीन मीना के साथ होता है।’ उसने फिर अपने आप से बात की।
मीना की आवाजें उसके कानों में गूंज रही थीं— ‘बहनों की तरह रहती हैं…’
‘बहनें भी सौतनें बन जाएं तो फिर कहां बहनें रह पाती हैं।’ और यह तो— वो मन ही मन बातें किए जा रही थी
अच्छी—भली ही तो चल रही थी जिंदगी। दो बेटियों और दो बेटों के साथ। इस आंगन में अकेले निगहत की ही चलती थी। पूरा घर उसके जिम्मे तो था ही, हुकुमत भी उसी की थी। अम्मा का एक ही बेटा था सैफूद्दीन। सो अपनी इकलौती बहू पर अम्मा खूब प्यार लुटाती और वो भी अम्मा का खूब खयाल रखती। सैफूद्दीन भी बीवी से मोहब्बत किया करता। वो चाहता था कि निगहत हर वक्त उसी के आसपास मंडराती रहे। और निगहत को घर के कामों में उलझा देख वह झल्ला जाता। शाम को घर आते ही वो निगहत का इंतजार करता कि वो उसके पास आए, दो घड़ी बैठे, पर निगहत वक्त नहीं निकाल पाती।
‘निगहत, मेरे लिए भी तो कुछ वक्त निकाल लिया करो।’ एक दिन उसने निगहत से शिकायत की।
‘सारा वक्त तुम्हारा ही तो है।’ वो पलटकर जवाब देती।
‘नहीं तुम पहली सी नहीं रही। अब पहले सा खुलूस कहां तुममें। आकर मुझसे लिपटती भी नहीं हो। ना ही रात को मुझे वक्त दे रही हो। पूरे दिन तो इस घर और बच्चों में उलझी रहती हो, फिर रात को तो मेरे साथ हुआ करो। बच्चों के पास ही सोने की क्या आदत डाल ली तुमने।’
‘क्या करूं, बच्चों को आदत है मेरी। और मैं भी रात तक बहुत थक जाती हूं, बस इसीलिए।’ सैफूद्दीन के इशारे का निगहत ने भी इशारे में ही जवाब दे दिया।
धीरे—धीरे सैफूद्दीन निगहत से दूर होने लगा। अब तो शाम को भी घर नहीं आता। ना निगहत से शिकायत करता और न ही उससे मोहब्बत। निगहत भी इस खिंचाव से कुछ परेशान होती, लेकिन घर के कामों में अपने को लगाए रखती।
इतवार का दिन था, जब सैफूद्दीन ने यह फरमान सुनाया था। निगहत दिन का काम निपटाकर हमेशा की तरह अम्मा के पास आकर बैठी थी।
‘अम्मा मैं कौसर खाला की बेटी मीना से निकाह कर रहा हूं।’
लेटी हुई बूढ़ी अम्मा को उठने में तकलीफ होती है, लेकिन यह सुनते ही उन्हें ऐसा झटका लगा कि तुरंत उठ गई।
उनके पैर दबाना छोड़ निगहत तुरंत सैफूद्दीन के पास आ गई।
‘ऐसा क्यूं कर रहे हैं आप। क्या कमी रह गई मुझमें, जो किसी को मेरी सौत बना रहे हो।’
‘मुझे जरूरत है एक और बीवी की, बस इसीलिए।’
‘बीवी होते हुए तुझे उसे बेवा से निकाह की क्या सूझी।’ अम्मा ने उसे झिड़कते हुए कहा।
‘अम्मा बेवा का घर बसाना भी तो सवाब का ही काम है। वैसे भी मैं कौनसा नया काम कर रहा हूं, सभी करते हैं हमारे यहां दो निकाह। मेरे दूसरे निकाह से तुम लोग इतने हैरान क्यूं हो।’ सैफूद्दीन ने बेशर्मी से कहा।
‘नहीं, ऐसा नहीं होगा, तुम दूसरा निकाह करोगे तो मेरा और बच्चों का क्या होगा। अपने चारों बच्चों की तो सोचो।’ निगहत रोते हुए बोल रही थी।
‘मैं कौनसा तुम्हें और बच्चों को छोड़ रहा हूं। कुछ सीख अपनी भावज से, वो भी तो अपनी सौतन के साथ ही रहती है, बड़ी बहन की तरह।’
‘नहीं, मैं अपनी आंखों के सामने अपनी सौतन को बर्दाश्त नहीं कर सकती।’
‘नहीं कर सकती तो रास्ता खुला है, तुम जा सकती हो इस घर से।’ ढिठाई से बोलते हुए सैफूद्दीन कमरे से बाहर निकल गया।
इसके बाद से सैफूद्दीन से न तो अम्मा ने कोई बात की और न ही निगहत और बच्चों ने। बात न बनते देख निगहत ने अपना सामान समेटा और बच्चों को लेकर मायके आ गई। उसकी उम्मीद के मुताबिक कुछ न हुआ। न तो सैफूद्दीन उसे मनाने ही आया और न ही सैफूद्दीन ने निकाह की जिद छोड़ी और एक दिन उसकी निकाह की खबर भी आ गई।
‘देख, निगहत अब मर्द जात यह तो करते ही है, तेरे लिए कौनसी नई बात है यह। तेरी भी छोटी अम्मी है। हमने भी तो बर्दाश्त की है। तू भी थोड़ा बर्दाश्त कर ले इन बच्चों के लिए। कहां जाएगी? कुछ नहीं कर सकते हम सब इस बारे में। तुझे तो अपने घर चले जाना चाहिए।’ निगहत की अम्मी बोली।
निगहत ने बस बेबसी से अपनी अम्मी की ओर देखा और यहां से भी उसने अपना सामान समेट लिया।
शाम होते—होते वो फिर अपने घर में थी। सैफूद्दीन ने हंसकर उसका सामना उठाया और उसके कमरे में चल दिया। वो उसके आने से बहुत खुश नजर आ रहा था। सिर झुकाए चुपचाप निगहत अम्मा के कमरे में पहुंची और सलाम किया। वहीं बैठी अम्मा की भांजी और नहीं बहू मीना उठकर निगहत के पास आई और सलाम किया। निगहत बिना जवाब दिए वहां से अपने कमरे में लौट आई। न उसने सैफूद्दीन से बात की और ना ही चारों बच्चों ने। दोनों बेटो अमान और अयान के कमरे में अब मीना के रहने का इंतजाम हो चुका था। इसीलिए भी वो खफा थे।
इस घर में कुछ ही दिन पहले नई दुल्हन आई थी, लेकिन पूरे घर में सन्नाटा यूं पसरा था, जैसे मातम के दिन हो। निगहत ने अपनी खामोशी न तोड़ी। वो चुपचाप अपने घर का काम निपटाती और कमरा बंद कर बैठी रहती। अब उसने अम्मा के पास भी बैठना बंद कर दिया था। सैफूद्दीन के दूसरे निकाह के लिए वो अम्मा को भी जिम्मेदार मानती थीं कि उन्होंने अपनी बेवा भांजी का घर बसाने के लिए सैफूद्दीन को दूसरी निकाह के लिए नहीं रोका। दोनों बेटियां उसके पास बैठे उसे दिलासे देने की कोशिश करती, लेकिन उनकी अम्मी पर चुप्पी छा रखी थी।
‘अम्मी, अम्मा बुला रही हैं।’ अलमास ने आकर निगहत की तन्हाई को तोड़ा।
सिर पर दुपट्टा सही करते हुए वह अम्मा के कमरे में आ गई। वहां मीना पहले ही मौजूद थी।
‘देख भई निगहत, अब जो होना था वो तो हो गया। सैफूद्दीन पर तुम दोनों का ही हक है। इसीलिए मैंने और सैफूद्दीन ने तय किया है कि वो तुम दोनों को बराबर वक्त दे। हफ्ता में तीन दिन मीना और तीन दिन तेरे साथ रहेगा। एक रात वो मेरे और बच्चों के बीच सो जाएगा। इस तरह तुम दोनों की हक तलफी नहीं होगी। दोनों हंसी—खुशी रहो, अब बस यही चाहती हूं।’ कहते हुए अम्मा ने एक लम्बी सांस ली, जैसे दिल पर कोई बोझ अब भी हो।
शाम को खाना खाते ही सैफूद्दीन निगहत के कमरे में था, यानी पहले तीन दिन निगहत के थे। सैफूद्दीन के सामने वो घंटों खामोश रही। जैसे ही सैफूद्दीन ने उसे बाहों में भरा वो फूट पड़ी। खूब रोई, जब तक कि सैफूद्दीन का शर्ट भीग नहीं गया हो। बस कहा कुछ नहीं। सैफूद्दीन उसके सिर को देर तक सहलाता रहा कि जब तक उसकी हिचकियां बंद नहीं हो गई। सैफूद्दीन जानता है कि औरत जात है ही इतनी मुलायम उसे खड़े रहने के लिए भी सहारे की जरूरत तो होती ही है। इसीलिए निगहत के दूर जाने का तो सवाल ही नहीं था।
दूसरे दिन निगहत को घर कुछ पहले सा लगा। उसने नहा—धोकर एक नया सूट पहना और खूशबू भी लगाई। दिन में सैफूद्दीन की पसंद का खाना बनाया और सैफूद्दीन के आते ही उसके आगे पीछे हुई।
इधर अब सैफूद्दीन के भी दिन अच्छे आ गए थे। पहले तो उसे एक बीवी से तवज्जोह न मिलने की शिकायत थी कि अब तो दोनों ही उसके आगे—पीछे घूमती। एक तरबूज का थाल लाती तो दूसरी आम काट लाती। एक चिकन बिरयानी तो दूसरी मुर्ग मुसल्लम उसके लिए तैयार रखती और दोनों ही नए कपड़े पहने, मेकअप किए इस तरह घर में घूमती कि दो नई बहुएं यहां ब्याह आई हैं। जिसके तीन दिन होते वही सैफूद्दीन के खिदमत में कोई कसर न छोड़ती।
‘अरी निगहत, कब तक बैठी रहेगी, आजा सो जा।’ अम्मा ने फिर सीढ़ियों की ओर आवाज लगाई।
निगहत की सोच का सिलसिला टूटा। आंख से फिर एक आंसू टूट गिरा। ‘सैफूद्दीन… तुम यही तो चाहते थे।’ उसे याद आया बच्चे होने के कुछ सालों बाद से ही उसे सैफूद्दीन के साथ सोने की हसद नहीं रही थी। धीरे—धीरे वो उससे जिस्मानी तौर पर दूर रहने लगी थी और अब जब सौतन सामने हैं तो वो अपने तीनों दिन उसकी रातों के बिछ जाती है। अब जिस्म सैफूद्दीन को नहीं चाहता, फिर भी सौतन से कमतर आंकने को वह कैसे बर्दाश्त करती।
‘अब बस एक रात और काटनी है’, यही सोचते हुए वो फिर अपने कमरे में आ गई। चांद की रोशनी आज कल से कुछ कम हो गई थी और उसका दर्द भी। ‘बस एक रात ओर’ का दिलासा देते हुए उसने आंखें मूंद ली।
आज तो सुबह से निगहत को जैसे पंख लगे थे। पूरा मेकअप और बदन से आती कई तरह के इत्र की खुशबूएं उसे और दिनों से जुदा बना रही थी। अपने हिस्से का सुबह का काम निपटाकर वह फिर अम्मा के पैर दबाने पहुंच गई। उसे खुश देख अम्मा भी खुश थीं। सोचा चलो, इसकी तीन कयामत की रातें तो खत्म हुई। रात होते ही आज सैफूद्दीन अपनी पहली बीवी के पहलू में पहुंच गया। निगहत की चांदनी आज ठंडी हवाएं भी साथ लाई थी।
मगर सीढ़ियां, सीढ़ियों की सिसकियां कहां खत्म हुई।
मीना बीच की एक सीढ़ी पर बैठी चांद को तक रही थी। चांद अब पूरा नहीं था। अधूरे चांद की अधूरी सी चांदनी में बैठी मीना ने सोचा— आज की चांदनी मेरे हिस्से में नहीं। ‘इस दर्द की टीस को चांद तू ही जानता है, इससे तो अंधेरे में बैठी बेवा ही अच्छी।’
‘अरी, मीना, कब तक वहां बैठी रहोगी, सो जाओ, रात बहुत हो गई है।’ अम्मा ने अपने आंसू पौंछते हुए आवाज दी।
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