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उपन्यास की स्त्री: अपूर्णता का विधान 

आशुतोष भारद्वाज शिमला के उच्च अध्ययन संस्थान में अपनी फ़ेलोशिप के दौरान भारतीय उपन्यास की स्त्री पर एक किताब लिख रहे हैं। उसका एक अंश- मॉडरेटर

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उपन्यास की भारत में यात्रा कई अर्थों में भारत की खोज में निकली एक साहित्यिक विधा की यात्रा है। पिछले डेढ़ सौ वर्षों से भारत आधुनिकता और राष्ट्रीयता के जातीय स्वरूप पर चल रहे एक कसमसाते विमर्श से गुजर रहा है। उपन्यास इस विमर्श का एक प्रमुख और प्रामाणिक दस्तावेज़ है। उपन्यास और राष्ट्र के सम्बंध पर काफ़ी लिखा जा चुका है, यह लेख यह प्रस्तावित करना चाहता है कि भारतीय उपन्यास की यात्रा कई अर्थों में उसके स्त्री किरदार की यात्रा है। राष्ट्रीयता और आधुनिकता से उपन्यास का संवाद अक्सर स्त्री की ड्योढ़ी पर दर्ज हुआ है, अनेक उपन्यास स्त्री किरदार के ज़रिए इन प्रत्ययों को प्रश्नांकित और पुनर्परिभाषित करते है।  स्त्री वह आइना है जिसमें हमें इस उपन्यास की एक मुकम्मल छवि मिल सकती है, अपनी सभी सच्चाइयों, प्रेम, फ़रेब, निरीहता, हसरत और वासना के साथ।

स्त्री शुरू से ही भारतीय उपन्यास के केंद्र में रही है। अनेक भाषाओं के शुरुआती उपन्यास स्त्री-केंद्रित थे — रानी केतकी की कहानी (हिंदी, १८०१), यमुना पर्यटन (मराठी, १८५७), राजमोहन वाइफ़ (अंग्रेज़ी, १८६०), सरस्वतीचंद्र (गुजराती, १८८७-१९००), इंदुलेखा (मलयालम, १८८८), उमराव जान अदा (उर्दू, १८९९), मोनोमती (असमिया, १९००) इत्यादि।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से ही उपन्यास ने ऐसी (कु) ख्याति अर्जित कर ली थी कि इस पर स्त्री को बिगाड़ देने के आरोप लगने लगे थे। तत्कालीन भारतीय समाज मानने लगा था कि उपन्यास पढ़ कर स्त्री भ्रष्ट हो जाती है। यह मान्यता बेवजह नहीं थी। उपन्यास राजनैतिक विचारों और सामाजिक मान्यताओं को प्रश्नांकित कर स्त्री को समाज के प्रति विद्रोह करना सिखा रहा था। दूसरे, उपन्यास पढ़ने की क्रिया भी बड़ी विध्वंसक थी। रामचरितमानस या सत्यनारायण की कथा समूह में पढ़ी जातीं थीं, लेकिन उपन्यास का पाठ नितांत एकाकी कर्म था। उन्नीसवीं सदी के एक दृश्य की कल्पना कीजिए। एक लड़की जो अभी तेरह की भी नहीं है या एक नई वधू जो किसी पेड़ के नीचे या छत पर अकेली बैठी एक किताब पढ़ रही है जिसके भुरभुरे पीले पन्ने आकाश की रोशनी में चमक रहे हैं। एक समाज जिसने स्त्रियों को अब तक सिर्फ़ धार्मिक ग्रंथ ही पढ़ते देखा था अचानक उन्हें विद्रोही प्रेम की कथाओं में डूबता पा रहा था. उपन्यास पढ़ती स्त्री की छवि उसके परिवार को बेचैन करने के लिए काफ़ी थी।

उस समय के भारतीय साहित्य ने स्त्री और उसकी प्रिय किताब के मध्य चल रहे संवाद को बड़े जतन से दर्ज किया है। अनेक कृतियों की स्त्री किरदार उपन्यास पढ़ अपने जीवन का निर्माण करती है। जब उपन्यास भारत में अपनी शैशवावस्था में ही था, इंदुलेखा की नायिका ने परम्परागत नायर परिवार में हलचल पैदा कर दी थी क्योंकि वह धर्मग्रंथों के बजाय उपन्यास पढ़ती थी। रविंद्रनाथ टैगोर के चोखेर बाली (१९१३) की बिनोदिनी बंकिम चंद्र के विष वृक्ष (१८७३) को पढ़ती है। दोनों उपन्यासों की नायिका विधवा हैं लेकिन एक विवाहित पुरुष से प्रेम करती हैं, एक वर्जित सम्बंध की हसरत लिए जीती हैं।

१९०० के आसपास लिखी शरत चंद्र की कहानी अनुपमा का प्रेम किसी लड़की पर उपन्यास के प्रभाव की अद्भुत कथा कहती है। इसका शुरुआती वाक्य साहित्य के महानतम पहले वाक्यों में रखा जा सकता है: “ग्यारह साल की होने तक अनुपमा ने अपना दिमाग़ उपन्यास पढ़-पढ़ कर पूरी तरह से ख़राब कर लिया था।”

टैगोर के बड़े भाई ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर का नाटक अलीकबाबू (१९००) भारतीय स्त्री के जीवन में उपन्यास के योगदान पर इससे भी बड़ा वक्तव्य है। इसकी नायिका हेमांगिनि अपनी सहायिका से कहती है:  “तुम्हें मालूम है उपन्यास क्या है? उपन्यास एक नये तरह की किताब है जो हाल ही आयी है, जिसमें किसी भी अन्य किताब से कहीं अधिक ज्ञान है। पहले मुझे रामायण और महाभारत पढ़ना अच्छा लगता था, लेकिन उपन्यास पढ़ने के बाद इन्हें छूने का भी मन नहीं करता।”

कुछ ही दशकों में उपन्यास ने स्त्री को सम्मोहित कर दिया था, लेकिन अचंभा होता है कि उस समय के साहित्य में सिर्फ़ स्त्री उपन्यास पढ़ती दिखाई देती है। इन तमाम रचनाओं में शायद एक भी पुरुष पाठक नहीं है जबकि शुरुआती उपन्यासकार अमूमन पुरुष ही थे। क्या उपन्यास को बोध था कि उसे स्त्री अपने एकांत में पढ़ेगी, कि वह किसी एकाकी स्त्री को सम्बोधित है? क्या आरम्भिक भारतीय उपन्यासकार की चेतना में यह दर्ज था कि वे किसी स्त्री के लिए लिख रहे थे? क्या ये उपन्यासकार एक साथ दो स्त्रियों से अपनी कल्पना में संवादरत थे — स्त्री बतौर किरदार, और पाठिका भी? यह चेतना भारतीय उपन्यास को किस दिशा में ले जा रही थी?

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वापस राष्ट्रीयता और आधुनिकता पर आते हैं.

झूठा सच (१९५८) के पहले खंड के अंत में हिंदू स्त्रियाँ एक सरकारी क़ाफ़िले में भारत में प्रवेश करती हैं। भारत ने हाल ही अपनी नियति से साक्षात्कार किया है। इन स्त्रियों को उनकी मातृभूमि में जिसका नाम अब पाकिस्तान हो गया है मुस्लिम युवकों ने बेतहाशा लूटा है। इन हिंदू स्त्रियों ने रास्ते में तमाम मुस्लिम स्त्रियों को हिंदू युवकों द्वारा लूटे जाते भी देखा है। अमृतसर पहुँचने पर उनके साथ चल रही भारतीय अधिकारी गहरी साँस ले कहती है: “ लो बहनो, पहुँच गए… उतरो! तुम्हारा वतन तो छूटा पर अपने देश में, अपने लोगों में पहुँच गयीं.”

राष्ट्रवाद का जो स्वप्न भारतीय उपन्यास ने बंदे मातरम के रूप में आठ दशक पहले आनंदमठ (१८८२) में रचा था, जिस स्वप्न ने राष्ट्रभक्तों की अनेक पीढ़ियों को संचालित किया था, वह स्वप्न यशपाल के पन्नों में स्वाहा हो गया है। आनंदमठ की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता काग़ज़ पर मुक्त हो चुकी है, देश को हासिल किया जा चुका है लेकिन — राष्ट्र खो गया है। वह स्त्री भी खो चुकी है जिसे अमूर्त माँ भारती का दैहिक स्वरूप होना था।

झूठा सच की नायिका तारा पूछना चाहती है — क्या राष्ट्रवाद का आदर्श, जैसा अनेक राष्ट्रवादी इसे समझते थे, अतिपौरुषेय है, स्त्री-विरोधी है? बँटवारे के दौरान हुई हिंसा के लिए साम्प्रदायिकता को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। क्या इस पाश्विक हिंसा के लिए राष्ट्रवाद ज़िम्मेदार है? आख़िर जिन्होंने हम स्त्रियों को जानवर की तरह बरता, वे बड़े गर्व से ख़ुद को ‘राष्ट्रवादी’ कहते थे?

आनंदमठ और झूठा सच के मध्य स्थित है गोरा (१९०५), राष्ट्र और आधुनिकता के स्वरूप पर ब्रह्म समाज और हिंदू पुनरुत्थानवादियों के बीच चल रहे विमर्श की कथा। ऊपरी तौर यह नायक-प्रधान उपन्यास है लेकिन तीन स्त्रियाँ इस विमर्श की सबसे सशक्त आलोचना करती हैं — सुचरिता, ललिता और आनंदमयी। पहली दो ब्रह्म समाजी हैं, आनंदमयी हिंदू हैं, लेकिन तीनों अपने सम्प्रदाय की संकीर्णता से परे निकलती हैं, दोनों नायकों यानि गोरा और विनय को परिवर्तन के लिए प्रेरित करती हैं। मसलन जब ललिता से विवाह करने के लिए विनय ब्रह्म समाज में दीक्षा लेने को तैयार हो जाता है, ललिता उसे हिंदू बने रहने के लिए कहती है क्योंकि वह नहीं मानती कि “मनुष्य का जो भी धर्म-विश्वास या समाज हो उसे बिलकुल छोड़कर ही मनुष्यों का परस्पर योग हो सकेगा”.

कट्टर हिंदू गोरा जाति व्यवस्था का समर्थक है, मानता है कि भारत का भविष्य हिंदू के पुनरुत्थान में निहित है, लेकिन सुचरिता के सम्पर्क में आकर वह अपने विचार की कमज़ोरी पहचानता है। जो नायक आदर्श हिंदू स्त्री को घर की चारदीवारी में समेट देता था, वह “सुचरिता के ज़रिए सत्य की प्राप्ति करता है” और मानता है कि “जब तक भारतवर्ष की नारी उसकी अनुभव गोचर नहीं हुई थी, तब तक उसकी भारतवर्ष की उपलब्धि कितनी अधूरी थी।”

महत्वपूर्ण यह है कि गोरा के भीतर यह परिवर्तन स्त्री की किसी कथित संवेदनात्मक अपील की वजह से घटित नहीं होता। सुचरिता गोरा को तर्क से झकझोरती हैं। उपन्यास इस ग़लत अवधारणा को ध्वस्त करता है कि पुरुष तार्किकता का  झंडाबरदार है, जबकि स्त्री को संवेदना और आवेग से फुसलाया जा सकता है. इस उपन्यास में गोरा आवेग से संचालित होता दिखाई देता है जबकि सुचरिता और आनंदमयी तर्कनिष्ठ नज़र आती हैं, उग्र राष्ट्रवाद का प्रतिकार करती हैं।

ग़ौरतलब है कि टैगोर उग्र राष्ट्रवाद का प्रतीक पुरुष को बनाते हैं, उसके प्रतिकार के लिए स्त्री को चुनते हैं जो भारतीयता का कहीं संश्लिष्ट और समन्वयकारी स्वरूप प्रस्तावित करती है।

लेकिन इसके बावजूद टैगोर कहीं चूक जाते हैं. सुचरिता का चित्रण समस्यामुक्त नहीं है। सुचरिता के भीतर गोरा की वजह से कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आता, लेकिन जैसे ही गोरा सुचरिता की वजह से अपना रास्ता बदलता है वह आख्यान में नायक के लिए सिर्फ़ एक माध्यम, नायक की यात्रा को सरल बनाने का एक साधन बनती प्रतीत होती है। दोनों के बीच का संवाद और कारोबार लगभग एकतरफ़ा सा प्रतीत होने लगता है।

यह उपन्यास ऐसी आधुनिकता प्रस्तावित करना चाहता है जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हो। लेकिन क्या इसकी आधुनिकता एक ऐसी जगह पहुँचती है जो स्त्री को स्वतंत्र चुनाव की, पुरुष से प्रश्न करने की जगह तो देती है, लेकिन वह पुरुष के जीवन में महज़ एक लाइटहाउस, एक प्रेरणा बनती नज़र आती है? पुरुष की प्रेरणा — इस विशेषण में सिमटने से ही शायद तमाम स्त्रियाँ बचना चाहती हैं। वे नहीं भूली हैं कि पिछली सदी की स्त्रियों को पुरुष की प्रेरणा होने की सांत्वना देकर उनके विकल्प सीमित कर दिए जाते थे।

क्या अनेक बड़े उपन्यास भी स्त्री को इसी आइने से देखते हैं? क्या इससे स्त्री की स्वतंत्रता बाधित होती है, और उपन्यास की आधुनिकता संकटग्रस्त हो जाती है?

इस प्रश्न के साथ एक और बड़े उपन्यास पर आते हैं.

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यू आर अनंतमूर्ति का संस्कार(1965) एक वेद-शिरोमणि आचार्य के एक अछूत स्त्री चंद्री के साथ हुए आकस्मिक दैहिक सम्बंध के बाद उपजे आध्यात्मिक संकट को परखता है. पिछली सदी के महानतम उपन्यासों में रखी जाने वाली इस कृति में स्त्री के स्वरुप आलोचकों का ध्यान कम गया है।

यह अनुभव प्राणेशाचार्य को तो झकझोर देता है, आत्मचिन्तन में डुबो देता है, लेकिन चंद्री के जीवन पर खरोंच तक नहीं आती। आचार्य का मोनोलॉग पूरी तरह आत्म-केन्द्रित है, उनके भीतर इस घटना पर चंद्री के दृष्टिकोण को जानने की कोई इच्छा नहीं है. वे धर्म और नैतिकता पर चिंतन जरुर करते हैं, लेकिन उनकी सुई ऐन्द्रिक अनुभव पर ही अटकी हुई है. चंद्री आचार्य के लिए सिर्फ़ एक विराट दैहिक अनुभव है, ब्रह्मचारी आचार्य की लिबिडिनल रिलीज़ का माध्यम है। ग़ौर करें, उपन्यास भले ही नारणप्पा के अंतिम संस्कार पर उठे प्रश्न से शुरू होता है, कथा जल्द ही आचार्य की कामेच्छा पर सिमट जाती है। आचार्य को नहीं सूझता कि चंद्री देह से कहीं अधिक भी हो सकती है.

दूसरे, उपन्यास एक औचित्यहीन और बेतुका सरलीकरण करता है। उपन्यास की सभी ब्राह्मण स्त्रियाँ “दुर्गन्धभरी, उबाऊ, अपाहिज” हैं, जबकि छोटी जाति की स्त्रियाँ सम्मोहिनी नायिकाएँ हैं जिनकी तुलना मेनका इत्यादि से होती है। उपन्यास के ब्राह्मण चंद्री की कल्पना कर लार टपकाते हैं, अपनी लालची और रसहीन पत्नियों को कोसते हैं। क्या स्त्री की मादकता इतने निश्चित तौर पर जातिगत होती है या विभिन्न जातियों के स्वभाव कहीं अनिश्चित और जटिल हैं? इस उपन्यास के अंग्रेज़ी अनुवादक ए के रामानुजन स्त्री किरदारों के “बेहिसाब ध्रुवीकरण” को तो इंगित करते हैं लेकिन इससे उपजी समस्याओं को नहीं देख पाते।

चंद्री ही नहीं किसी ब्राह्मण स्त्री के पास भी अपना कोई स्वर नहीं है, सभी स्त्रियाँ पुरुष द्वारा ही परिभाषित होती हैं, स्त्री के लिए सदियों से सींचे जाते रहे पुरुष के आईने से ही दिखाई देती है।

आलोचकों ने आचार्य को एक आधुनिक नायक माना है। धर्म पर प्रश्न आधुनिकता में उनके प्रवेश का क्षण है, लेकिन आधुनिक चेतना की परख उस अवकाश से भी हो सकती है जो यह अपने ‘अन्य’ को देती है। चंद्री का प्रवेश नायक के ‘अन्य’ बतौर होता है लेकिन जैसे ही उसका एकमात्र कार्य यानि आचार्य के साथ संसर्ग पूरा हो जाता है, वह कथा से ग़ायब हो जाती है, मात्र एक उत्प्रेरक बन कर रह जाती है जिसका एकमात्र उद्देश्य आचार्य को आत्मचिंतन की ओर धकेलना था। क्या आचार्य और उनके रचयिता उपन्यासकार को बोध था कि वे चंद्री के साथ संवाद सिर्फ़ अपनी कल्पना में ही कर सकते हैं जहाँ वे उसे मनचाही छवि दे सकते थे? अगर चंद्री को उपन्यास के पन्नों में पर्याप्त स्थान मिला तो वह आचार्य पर कड़े प्रश्न उठायेगी, इसलिए वह आचार्य के लिए सिर्फ़ अनुपस्थिति में ही स्त्री हो सकती थी?

अनुपस्थित स्त्री। चंद्री लेकिन कोई अपवाद नहीं है।अनेक बड़े उपन्यासों में स्त्री के पास विकल्प बहुत कम होते हैं, वह अक्सर पुरुष के एक लिए प्रेमिका, एक देह, एक माध्यम की तरह जीती है। एक प्रश्न पूछा जाता है — चिड़िया मृत्यु के लिए आख़िर किस जगह जाती हैं? एक प्रश्न यह है — उपन्यास की अनुपस्थित और विकल्पहीन स्त्रियाँ कौन सा ठौर खोजती हैं? आचार्य तो अपनी आंतरिक तलाश में निकल गए, चंद्री कहाँ जाएगी?

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इस विधा के जन्म से ही यूरोप के उपन्यास किसी आंतरिक या बाह्य यात्रा में निकले पुरुष को रॉबिंसन क्रूसो और डॉन कीहोते जैसे नायकों में चित्रित करते रहे हैं। एक लंबी परंपरा जो जल्द ही नोट्स फ़्रम द अंडरग्राउंड तक पहुँच जाती है, लेकिन ख़ुद को खोजती स्त्रियाँ बहुत देर से और बहुत कम दिखाई देती हैं। मदाम बोवारी और अन्ना करेनिना अपने अकेलेपन से जूझती स्त्रियाँ थीं जो अपने उपन्यासों की तमाम कलात्मक शक्ति के बावजूद आखिर में सिर्फ प्रेम ही खोज रहीं थीं। यूरोपीय उपन्यास की तमाम महान नायिकाएँ सिर्फ़ प्रेम और शादी चाहती हैं, उसकी तलाश में ही चुक जाती हैं। इसका अर्थ यह क़तई नहीं कि प्रेम एक विराट अनुभव नहीं है, बल्कि यह कि जहाँ पुरुष किरदार तमाम अनुभवों की यात्रा पर निकलते हैं, स्त्रियाँ अमूमन एक अदद पुरुष की चाह में ही जीती हैं। यह तर्क दिया जा सकता है कि चूँकि समाज की स्त्री यायावरी नहीं है, परिवार ही चाहती है, इसलिए उपन्यास की नायिका उसका ही अनुकरण करेगी। इस तर्क के प्रत्युत्तर में यह पूछना चाहिए कि समाज की सीमाएँ तो समझ आती हैं, क्या कोई रचनाकार भी उन सीमाओं से ख़ुद को बाँध लेता है?

जैसा ऊपर कहा भारतीय उपन्यास के केंद्र में आरंभ से ही स्त्रियाँ रहीं हैं, लेकिन ऐसे उपन्यास कम हैं जहाँ कोई स्त्री किसी अकेली यात्रा में अपने अस्तित्व को तलाश रही है। स्त्री किरदार विद्रोही और निर्भीक होते गए, लेकिन उनका विद्रोह अमूमन प्रेम पर ही एकाग्र रहा है। स्त्री के लिए प्रेम की आज़ादी का निश्चित ही महत्व है, उसके द्वारा उपन्यास में हासिल की जाने वाली यह पहली आज़ादी रही है लेकिन तुलना करें उन पुरुष किरदारों से जिनकी तड़प उन्हें स्त्री-प्रेम के अलावा भी कई दिशाओं में ले जाती थी। दिलचस्प है कि यह प्रवृत्ति सिर्फ पुरुष ही नहीं स्त्री के लेखन में भी दिखती है। शेखर: एक जीवनी और मित्रो मरजानी अपने शीर्ष किरदारों के विद्रोह की वजह से जाने जाते हैं। शेखर प्रेम में है लेकिन अनेक राहों पर चल रहा है, किसी बड़े सत्य की तलाश में है, जबकि पचास साल बाद भी मित्रो अमूमन “अपनी यौनिकता की स्वच्छंद अभिव्यक्ति” के लिए याद की जाती है। कमला दास की माई स्टोरी का एक ऐसी स्त्री की कहानी बतौर जिक्र होता है जो अपनी सेक्सुएलटी के अनेक आयाम खोज रही है।

शेखर और मित्रो अपवाद नहीं हैं। इतिहास में मीरा या अक्का महादेवी जैसे गिने-चुने उदाहरण के सिवाय एकांत और स्व की खोज पर अमूमन पुरुष का ही विशेषाधिकार रहा है। बुद्ध सरीखे तमाम पुरुष आंतरिक साधना के लिए एकांत चुनते थे, यशोधरा उस अनुपस्थिति को स्वीकार करने के लिए बाध्य थीं जो पुरुष के निर्णयस्वरूप उन पर आ ठहरी थी। आधुनिकता ने शायद पहली बार स्त्री को वह जगह दी जहाँ वह अकेली किसी तलाश में निकल सकती थी। लेकिन यह जगह आसानी से उपलब्ध नहीं थी — समाज में नहीं, उपन्यास में भी नहीं। शायद इसलिए स्त्री उपन्यास के केंद्र में तो आयी, लेकिन उसके विकल्प सीमित रहे आए।

क्या आज भी एक एकाकी स्त्री को किसी यात्रा पर जाते देखना उपन्यासकार को असहज बना देता है? चूंकि यात्रा, भले वह आंतरिक हो या बाह्य, यात्री को समाज के प्रभाव से दूर ले जाती है, क्या ऐसी यात्रा का स्पेस उपन्यास की स्त्री के पास आज भी सीमित है?

इस प्रश्न के लिए अरुंधती रॉय के द गॉड अव स्मॉल थिंग्स (१९९७) पर आते हैं जिसमें केरल में रहती एक तलाक़शुदा सिरियन ईसाई स्त्री अम्मू एक अछूत के साथ सम्बंध बनाती है। अरुंधती का व्यक्तिगत जीवन निर्भीकता और असहमति का बेहतरीन उदाहरण है। उनकी नायिका के पास कौन से विकल्प उपलब्ध हैं?

अम्मू का अपने परिवार और सामाजिक नियमों के ख़िलाफ़ विद्रोह उपन्यास की बुनियाद है। लेकिन सतह को थोड़ा खुरचिये, उसका विद्रोह अपने भाई चाको और उसकी विदेश से लौटी पत्नी मार्ग्रेट कोचम्मा के बीच सहसा उमड़े प्रेम के ख़िलाफ़ नज़र आता है। उपन्यास का अंत इस भाव पर होता है जो अम्मू के भीतर वेलुथा के साथ पहली बार संबंध बनाने के बाद उमड़ता है — “हाँ, मार्ग्रेट, अम्मू ने ख़ुद से कहा. हम भी ऐसा करते हैं!”

यह महत्वपूर्ण वाक्य है जो अम्मू के विद्रोह को समझने की कुंजी है। अंतरंगता के इस दुर्लभ क्षण जो अम्मू को न मालूम कितने सालों बाद हासिल हुआ है, उसे अपने भाई की पत्नी एक ईर्ष्यालु विजय के साथ क्यों याद आ रही है? क्या अम्मू का विद्रोह ईर्ष्या से जन्मा है? क्या यह वाक़ई “प्रेम के नियम” तोड़ने की आकांक्षा थी, “नियम जो तय करते थे किसे प्रेम किया जाएगा, कितना और किस तरह से,” जिसका यह उपन्यास बार-बार दावा करता है? या अम्मू का विद्रोह सिर्फ अपने भाई और उसकी पत्नी के ख़िलाफ़ था? अपने बच्चों की उपेक्षा देखती एक माँ घर में आयी एक स्त्री और उसकी बच्ची पर उड़ेले जा रहे प्यार से झुलस जाती है। किसी कीड़े की तरह उसे कुरेदता यह घाव एक अछूत से सम्बंध बनाने के निर्णय में तब्दील होता है। एक ऐसा पुरुष जो उसके पड़ोस में रहता था लेकिन जिसके साथ उसका कभी कोई संवाद नहीं था। अम्मू और वेलुथा के बीच कोई जुड़ाव या लगाव नहीं था जिसका अवसर आने पर विस्फोट हुआ हो। क्या ये “प्रेम के नियम” नहीं थे जिन्हें चुनौती देनी थी, बल्कि सिर्फ़ प्रेम का आघात था जिसका बदला एक स्त्री लेना चाह रही थी? क्या अम्मू का विद्रोह निहायत ही रूढ़िगत कर्म है जहाँ एक घायल स्त्री आवेश में आ सामाजिक पायदान में अपने से कहीं निचले पुरुष के साथ संबंध बनाती है? क्या उपन्यास अम्मू को इस दैहिक विद्रोह के अलावा कोई और विकल्प देता है?

अम्मू को निर्मल वर्मा के एक चिथड़ा सुख की इरा के बरक्स रखते हैं। इरा का प्रेम भी कथित सामाजिक नियमों के विरुद्ध है। वह भी प्रेम के नियम तोड़ती है, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया आंतरिक है। अम्मू मार्ग्रेट को सामने पा ईर्ष्या से सुलग जाती है, इरा नित्ती भाई की पत्नी को देख घनघोर ग्लानि से भर उठती है, पीछे हट जाना चाहती है। क्या इन दोनों उपन्यासों की स्त्रियों का प्रेम की चोट के प्रति दृष्टिकोण बुनियादी तौर पर भिन्न है? आधुनिक जीवन में स्वतंत्रता का अर्थ है अनेक उपलब्ध विकल्पों में किसी एक को चुन लेने का अधिकार। अम्मू अपने निर्णय लेने में कितनी स्वतंत्र है?

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इस छोटे से लेख में जिन उपन्यासों का ज़िक्र हो पाया है वे ज़ाहिर है समूचे भारतीय उपन्यास और उसकी स्त्री का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। इनके अलावा भी इरा समेत अनेक स्त्री किरदार हैं जो इस लेख की प्रस्तावनाओं का प्रतिकार करेंगी, जिनके पास अनेक विकल्प हैं, जिनका जीवन कहीं अधिक स्वतंत्र हैं। लेकिन इसके बावजूद यह कहने में कोई समस्या नहीं कि क़रीब सवा सौ वर्षों के दौरान अनेक भाषाओं में लिखे गए जिन उपन्यासों को यह लेख केंद्र में रखता है वे निसंदेह भारत के प्रतिनिधि उपन्यास कहे जा सकते हैं। कई और प्रतिनिधि स्त्री किरदार भी होंगी, लेकिन विष वृक्ष की कुंद से लेकर इंदुलेखा, सुचरिता, तारा, मित्रो, चंद्री और अम्मू इतिहास और साहित्य के एक ऐसे लम्बे धागे में पिरोयी हुई हैं जहाँ उनकी संगति में तमाम और स्त्रियाँ भी हैं। उपन्यास में भी, उसके बाहर भी।

इसलिए यह कहा जा सकता है कि भारतीय उपन्यास ने स्त्री को यह सहूलियत तो बहुत जल्द दे दी थी जहाँ वह अपने एकांत में इस विधा से संवाद कर सकती थी, लेकिन ऐसा एकांत जहाँ वह ख़ुद को बग़ैर किसी सहारे के तलाश सकती अभी भी हासिल नहीं हुआ है।

लेकिन एक सच्चाई और भी है। अपने अस्तित्व की तलाश में निकली स्त्री मानव इतिहास और साहित्य में चूँकि हाल ही आयी है, तमाम रचनाकार उससे सामंजस्य नहीं बिठा पाए हैं, उसके सामने असहज महसूस करते हैं। ख़ुद लेखिकाओं के स्त्री किरदारों के पास भी सीमित विकल्प हैं। पीछे मुड़ कर देखने पर कोई इन किरदारों को अनेक संभावनाएँ दे सकता है, लेकिन यह इतिहास और उपन्यास में उनकी स्थिति के प्रति शायद न्याय नहीं होगा. उन्हें शायद ऐसा जीवन ही जीना था जो भविष्य को अधूरा नज़र आता, जिसे देख यह प्रश्न उठता: उपन्यास की स्त्री किस भारत की तस्वीर बनाती है?

बालचंद्र राजन की बेमिसाल किताब द फ़ॉर्म अव द अन्फ़िनिश्ड के हवाले से कहें तो उपन्यास की स्त्री अपूर्णता का विधान है — लेकिन इस अपूर्णता में भी वह कहीं मुकम्मल है।

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