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भोजपुरी के भिखारी, जिन्हें मल्लिकजी कहा जाता है

आज भोजपुरी के अमर लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की जयंती है. उनको याद करते हुए, उनके योगदान को याद करते हुए प्रसिद्ध लोक गायिका चन्दन तिवारी का यह लेख पढ़िए. बेहद पठनीय और जरूरी लेख आज के दिन के लिए- मॉडरेटर
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आज 18 दिसंबर है. भोजपुरी के लिए बहुत ही खास दिन. भोजपुरी के सबसे लोकप्रिय अवलंबन भिखारी ठाकुर की जयंती है. बिना कुछ ज्यादा पढ़े—लिखे, मामूली अक्षरज्ञान लेकर, अपने परंपरागत हजामत के पेशे को छोड़कर, रामलीला से प्रभावित होकर भिखारी ठाकुर ने जब भोजपुरी में अपना दल बनाकर नाटक लिखना, नाटक करना शुरू किया था, तभी से उन्हें नोटिस लिया जाने लगा था. उनके समय में ही उन पर एक से बढ़कर एक लोग काम करने लगे थे. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवदी की पत्रिका सरस्वती से जुडे रहे महेश्वराचार्य ने तो उनके जीवन में ही उन पर किताब लिखी था. राहुल सांकृत्यायन, बाबू जगजीवन राम, आईसीएस अधिकार जगदीश चंद्र माथुर, मशहूर कलाकार हरि उप्पल  से लेकर न जाने कितने लोग हुए, जिन्होंने भिखारी ठाकुर के जीवन में ही उनको पहचाना, उनके बारे में बताया. बाद के दिनों में भी कई लोगों ने उन पर गंभीरता से काम किया. छात्र नेता कामरेड चंद्रशेखर ने उन पर ही अध्ययन किया था, मशहूर रंगकर्मी संजय उपाध्याय उनके मशहूर नाटक बिदेसिया का 700 से अधिक शो देश में घूम—घूम कर, कर चुके हैं.अब भी कर रहे हैं. जैनेंद्र जैसे युवा साथी ‘नाच भिखारी नाच’ नाम से उन पर सिनेमा बनाकर, घूम—घूमकर उसे दिखा रहे हैं. संजीव जैसे मशहूर साहित्यकार ने उनके ऊपर जीवनीपरक उपन्यास ‘सूत्रधार’ लिखा है,​ जिसकी खूब चर्चा हुई है. ऐसे अनेकानेक काम हुए थे, हो रहे हैं. भिखारी ठाकुर ने अपने जीवन में ही लिखा था— ‘अबहीं नाम भइल बा थोरा, जब ई छुट जाई तन मोरा, सेकरा बाद नाम खूब होईहन, कवि सज्जन मिल के गुण गईहन…’ वही हो रहा है. साल—दर—साल भिखारी ठाकुर का नाम बड़ा होते जा रहा है.उनकी यश—कीर्ति बढ़ती जा रही है. भारत की सर्वाधिक लोकप्रिय लोकभाषा भोजपुरी के सबसे मजबूत अवलंबन बनते जा रहे हैं. साल—दर—साल उनके नाम पर पुरस्कार, सम्मान, आयोजनों की संख्या बढ़ते जा रही है. यह अच्छा ही है लेकिन इसमें बुरा यह है कि जब भिखारी ठाकुर के नाम पर आयोजनों की संख्या इतनी बढ़ती जा रही है, फिर भोजपुरी में स्त्री विरोधी गीत भी उसी संख्या में क्यों बढ़ते जा रहे हैं. जो भिखारी ठाकुर को नायक मानेगा, उनका जयकारा करेगा, वह स्त्री के देह को केंद्र में रखकर विकृति क्यों फैलायेगा. भिखारी ठाकुर की पहचान की कई रेखाएं थीं. वे एक साथ गीतकार, संगीतकार, नाटककार, अभिनेता, सामाजिक सुधारवादी प्रणेता आदि सब थे लेकिन उनकी एक बड़ी पहचान यह थी कि उन्होंने अपने समय में स्त्रियों की इच्छाओं—आकांक्षाओं को मजबूत स्वर देते हुए उनकी मजबूती और मुक्ति के द्वार खोले.
ऐसा भिखारी ठाकुर के गीतों से गुजरने के आधार पर कह रही हूं. उनके दो दर्जन के करीब गीत गा चुकी हूं, गाती हूं. नाटकों के भी गीत लेकिन उससे ज्यादा नाटकों से इतर स्वतंत्र तराने. बड़े से बड़े कंसर्ट में गा चुकी हूं. नौजवान से लेकर बूढ़े तक अब भी उसी तरह से नाचने लगते हैं उनके गीतों पर.जैसा मामूली कलाकार महसूस करता है कि उनकी हनक और खनक कितनी है. भोपाल—विशाखापटनम—बनारस से लेके दिल्ली तक में जब भी शो करती हूं, सब कुछ छूट जाये तो छूट जाये लेकिन भिखारी ठाकुर के गाने की फरमाईश जरूर होती है. मैंने तीन जगहों पर गौर किया था. एक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के शो में, दूसरा भारत भवन भोपाल में और तीसरी बार इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली के शो में. इन जगहों पर जब शो कर रही थी और मैंने जैसे ही बोला कि अब भिखारी ठाकुर के कुछ गीत सुनाउंगी, तालियां बजी. मैं सोचती कि अभी तो गीत के बोल गुनगुनाये भी नहीं, सिर्फ नाम लिया भिखारी ठाकुर का तो इस कदर तालियां बज रही हैं. दरअसल जब भिखारी ठाकुर के रचनासंसार से गुजरेंगे तो लगेगा कि तालियां बजाने के लिए, जोश और उर्जा से भर जाने के लिए उनका नाम ही काफी क्यों होता है. कहीं पढ़ा था कि बाबू जगजीवन राम कहा करते थे कि जिन्हें भी लगता हो कि उनमें उर्जा खत्म हो गयी है, बुढ़ापा घेर लिया है, कुछ करने की क्षमता नहीं बची वे एक बार भिखारी ठाकुर का तमाशा देख ले, जवानी और उर्जा वापस आ जाएगी.
यह तो एक बात है. उनके गीतों से गुजरते हुए हमेशा यह महसूस करती हूं कि भिखारी ठाकुर ने दो दर्जन से अधिक अपनी रचनाओं में स्त्री को मजबूत करने का, स्त्री के स्वर को मजबूत करने का ही अभियान अपने समय में चला रखा था. वे असाधारण काम कर रहे थे अपने समय में. भोजपुरीभाषी इलाके के पुरूषवादी मानसिकता को उनकी ही भाषा में चुनौती देना, स्त्रियों को आजाद करने का अभियान चलाना, स्त्रियों को प्रेम करने के लिए उकसाना, अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने—जीवन साथी चुनने, जीवन गुजारने के लिए प्रेरित करने का काम जब वे कर रहे होंगे तो न जाने​ कितनी परेशानियों से उन्हें जूझना पड़ा होगा. भिखारी ने अपने समय में सब कुछ लिखा. बिदेसिया जैसा नाटक, जिसमें पलायन के बहाने स्त्री के विरह वेदना की बात की उन्होंने, गबरघिचोर जैसा नाटक, जिसके जरिये उन्होंने स्त्री के तन और मन की आजादी की बात को ठेठ तरीके से लेकिन मजबूती से रखा, बेटी बेचवा जैसा नाटक जिसमें उन्होंने अपने समय की कुरीतियों पर प्रहार किया और लोगों को इसके खिलाफ गोलबंद किया, राधेश्याम बहार जैसा नाटक जिसमें राधा और कृष्ण के बहाने प्रेम उद्दात रूप में सामने आता है. बहुत कुछ लिखा भिखारी ने अपने समय में. कई फुटकर गीत लिखे. वे गबरघिचोर में स्त्री के तन और मन के आजादी के बात कर रहे थे लेकिन संस्कार और सरोकार के दायरे में रखने की हिदायत भी अपने गीतों में दे रहे थे. अपने एक फुटकर गीत में लिखते हैं— छव गज के साड़ी पेन्हलू, अंचरा कईलु छोट, आधा पेट के झुल्ला सिया के भइलु मेंही से मोट. अजबे बनवलू चलनिया हो, ओढ़नी तर के जनिया… वे अपने समय में समाज में बदलाव के बीज डाल रहे थे. मुझे उनमें एक खास बात और अच्छी लगती है. उन्होने अपनी रचनाओं का 80 प्रतिशत हिस्सा स्त्री को समर्पित् किया. अब सोचती हूं कि जब भिखारी ने अपनी मातृभाषा भोजपुरी को साधते हुए जीवन का अधिकांश हिस्सा और रचना का अधिकांश हिस्सा महिलाओं को गरिमा प्रदान करने, उसके मान को बढ़ाने, उन्हें मजबूत करने, उन्हें आजाद करने में ही लगा दिया तो फिर भोजपुरी के लोकगीतों में स्त्रियों को दिन—ब—दिन देह के भूगोल में बांधनेवाले कौन लोग हैं. एक ओर भिखारी का नाम भी बढ़ते जाना, उनके नाम पर आयोजन, सम्मान, पुरस्कार भी बढ़ते जाना और दूसरी ओर स्त्री को देह की परिधि में बांधकर, उसके मन को मार सिर्फ तन पर ​गीत रचने,गाने,सुननेवाले कौन लोग हैं?
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One comment

  1. अनिल गोयल

    सतीश आनन्द ने बिदेसिया को एक शैली के रूप में विकसित करने के लिए जो योगदान दिया है, उसका कहीं जिक्र नहीं किया गया इस लेख में!

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