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मनीषा कुलश्रेष्ठ की पुस्तक ‘बिरजू लय’ का एक अंश

प्रसिद्ध लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कथक-गुरु बिरजू महाराज पर एक पुस्तक लिखी ‘बिरजू लय’. अभी हाल में ही उसका प्रकाशन नयी किताब प्रकाशन से हुआ है. प्रस्तुत है पुस्तक का एक छोटा सा अंश मनीषा कुलश्रेष्ठ की भूमिका के साथ- मॉडरेटर

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कथक’ संसार से मेरा नाता, कथक की ‘विशारद’ तक शिक्षा ग्रहण करने मात्र का रहा. मैं कभी ‘परफॉर्मिग’ कलाकार नहीं रही.  यह मेरा सौभाग्य था कि मैंने रायगढ़ घराने का ‘कथक’ सीखा था, मेरे गुरु ‘भगवान दास माणिक’, दिवंगत कथकाचार्य कल्याण दास महंत के शिष्य और पौत्र भी हैं. कथक सीखने के दौरान मेरी दृष्टि गुरु जी की किताबों के संग्रह पर रहा करती थी, जहाँ अन्य शिष्याओं के लिए कथक की किताबें महज इतिहास रटने का ज़रिया होती थीं, मेरे लिए वे बहुत रोचक और पठनीय सामग्री का विपुल भंडार होती थीं. मैं हर बार उनसे एक किताब माँग कर ले जाती. रायगढ़ घराने के राजा चक्रधर ज्यू का कथक प्रेम मुझे हैरान करता था, उनकी किलोग्रामों में लिखी गई किताबों का ज़िक्र यह सोचने पर मजबूर करता था कि क्या कथक नृत्यकला का ऎसा महासागर है? वहाँ दोनों घरानों के महागुरुओं की स्पर्धा और उसमें से उपजे दोनों घरानों की खूबियों वाले ‘रायगढ़ घराने’ को जानते हुए अच्छ्न महाराज की खूबियों को जाना था. कथक पर अध्ययन में मेरी रुचि बढ़ती ही रही.
कथक की प्रस्तुतियाँ जब-जब अवसर मिला देखीं. तानसेन महोत्सव में, ग्वालियर में. स्पिक मैके के कार्यक्रमों में जयपुर में. जयपुर घराने के हर बड़े कलाकार का नृत्य देखा, पंडित दुर्गालाल जी का अद्भुत नृत्य कॉलेज के ज़माने में देखने का अवसर मिला था. जयपुर और लखनऊ घराने की विशिष्टताएँ बाद के कलाकारों में तो घुलती नज़र आती हैं, लेकिन जब दिल्ली आने पर बिरजू महाराज की साक्षात प्रस्तुतियाँ देखने का अवसर मिला तो जो यह रोचक और बराबरी का फर्क एक सम्मोहन जगाता रहा था, वह और बढ़ गया.
कथक में आमद यानि अवतरण सदा मेरे आकर्षण का विषय रहा है किसी भी कथक प्रस्तुति में, रायगढ़ घराने में हम दोनों आमदें करते थे, जयपुर घराने की ‘ धातिट – धातिट- धा-धातिट’ लय चौगुन में जाती थी, वहीं मंद गति और कोमल संचालन के साथ लखनवी आमद – मद्य विलंबन में “धा तक थुंगा, धागे दिंग था….
कथक के प्रति एक जिज्ञासु आत्मलीनता के चलते अनवरत अध्ययन भी बना रहा. जब मुझे रज़ा फाउंडेशन की यंग क्रिटिक फैलोशिप के लिए आवेदन करने का अवसर मिला तो मैंने समय गँवाए बिना ‘सिनॉप्सिस’ बना कर दे दी. वह स्वीकृत हुई. अब मुझे बिरजू महाराज पर एक समालोचनात्मक पुस्तक लिखनी थी.
मनीषा कुलश्रेष्ठ
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बिरजू महाराज : तीन सौ साल पुरानी जीवित परंपरा के वाहक

एक सितारा उगता है, अकेला. निरभ्र आकाश के कोने में संकोच के साथ और धीरे – धीरे सूर्य साबित होता है, उसका अपना सौरमंडल बनता है, ग्रह – उपग्रह और अनंत को अपने प्रकाश में डुबो लेता है.
कितना ही बचें हम बिरजू महाराज के मूल्यांकन में उनकी विरासत से, वह सामने आ खड़ी होती ही है, क्योंकि वह जितनी समृद्ध थी, उतनी ही बिरजू महाराज तक आते – आते लखनऊ घराने के जहाज का मस्तूल जर्जर हो चुका था,  जिसे नया स्वरूप् देकर, जहाज़ को नई दिशा दी को बिरजू महाराज ने।

किशोर बिरजू महाराज जब अपने पिता के समय में एक अपना बचपन  वैभव में जीने के बाद, उनको खोकर, महज दो साल की तालीम पाकर अपनी मां के संरक्षण में अभावग्रस्त जीवन बिता रहे थे. तब कपिला वात्स्यायन ‘संगीत’ भारती के लिए उन्हें दिल्ली लाईं, वे चौदह वर्ष के थे और गुरु बने, तब के उनके शिष्यों में रानी कर्णावती रहीं. इस बहाने उनकी स्वयं की प्रतिभा का विकास हुआ. वे मुंबई लच्छु महाराज के पास भी आते – जाते रहते रहे. सीखते रहे.
भारतीय कलाकेंद्र में निर्मला जोशी जी ने लखनऊ में विनिष्ट होते इस घराने को दिल्ली में संरक्षण देने के प्रयास में शंभू  महारज को आमंत्रित किया. कहते हैं, तब पहली और अंतिम बार बिरजू महाराज और शंभू  महाराज ने कर्ज़न रोड पर कॉंस्टीट्यूशनल क्लब में निर्मला जी के अनुरोध पर नृत्य किया था. चाचा ने गत निकास, गत भाव और अभिनय प्रस्तुत किया, भतीजे ने तोड़े, परण और तत्कार प्रस्तुत किए.
संगीत भारती से निर्मला जोशी बिरजू महाराज को भारतीय कला केंद्र उन्हें लाईं और वे बतौर शंभू  महाराज के सहायक काम करने लगे. वे दोनों चाचाओं से नृत्य सीखते भी रहे और अपने शिष्यों को सिखाते भी रहे. भारतीय कला केंद्र उन दिनों उत्कृष्ट कलाकारों का केंद्र बनने लगा था. डागर ब्रदर्स, उस्ताद मुश्ताक़ हुसैन. उस्ताद हाफिज़ अली खाँ, और सिद्धेश्वरी देवी आदि की संगीत कला की धाराएँ बहा करती थीं.  “उन दिनों भारत की राजधानी दिल्ली में कई महान कलाकार एकत्रित हो चुके थे. मशहूर तबला नवाज़ पं चतुर लाल और सितार वादक पं रविशंकर आदि भी दिल्ली में संगीत के वातावरण को सजाए थे. ऎसे महत्वपूर्ण सांगीतिक वातावरण में फलते – फूलते प्रतिभावान बालक बिरजू महाराज गायन, वादन तथा नृत्य तीनों कलाओं में निपुण हो गए.” यह उल्लेखनीय है कि तत्कालीन राजनीतिक काल भी ऎसा था जब कलाओं के पुनरुत्थान और संरक्षण के लिए संस्थाएँ बन रही थीं, वह बात अलग है कि कालांतर में ये संस्थाएँ कितनी उपयोगी साबित हुईं या सफेद हाथी बन कर रह गईं, किंतु उस समय इन संस्थाओं ने बहुत से बड़े कलाकार भारत को दिए और वैश्विक स्तर पर भारत की एक सांस्कृतिक पहचान बनी.
पं. बिरजू महाराज के कला – कौशल और सृजनशीलता को पल्लवित होने का अवसर और अधिक मिला. “ संगीत नाटक अकादमी के तत्वाधान में 1954 – 55 के आस पास कुछ उच्च कोटि की नृत्य नाटिकाओं का निर्माण किया गया, जिनके नाम हैं शान ए अवध, मालती माधव, कुमार संभवम, कथक थ्रू द एजेस आदि. इन सभी नृत्य नाटिकाओं में संगीत निर्देशन प्रसिद्ध घरानेदार संगीतकार ‘डागर बंधुओं ने दिया, स्वयं गाया भी बजाया भी.”
बिरजू महाराज की कला यात्रा और उनके आज के बिरजू महाराज होने का श्रेय केवल बिरजू महाराज की पारंपरिक विरासत को नहीं दिया जा सकता बल्कि उन समस्त हाथों और साथों और संगतों का है जिन्होंने उन्हें बिरजू महाराज होने में अपना योगदान दिया. परिस्थितियाँ, गुरु, संस्थाएँ, वे संस्था प्रधान, वे गायक, वे वादक, राजनेता…वह समय और परिवेश और स्वयं कलावंत दर्शक, समीक्षक सभी ने मिल कर बिरजू महाराज को बनाया. और यह तभी संभव था जब स्वयं किशोर बिरजू महाराज ने स्वयं को विनम्रता के साथ सौंप दिया. इसके पीछे शायद वे अभाव और उनकी मां की शिक्षा रही होगी.
सत्ताईस साल की उम्र में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार आज के समय में अचंभा हो सकती है, क्योंकि आज के प्रतिस्पर्धा से भरे, सिफारिशी युग में सत्ताईस साल में तो कोई कलाकार अपनी एकल प्रस्तुति के लायक नहीं समझा जाता. 1986 में वे पद्मविभूषण से अलंकृत हुए. इसी वर्ष ‘कालीदास सम्मान’ भी मिला.
आज बिरजू महाराज स्वयं कथक की अनूठी गंगा – जमनी परंपरा के महज वाहक ही नहीं, एक लाईट हाउस हैं. वे नृत्याचार्य भी हैं और नर्तक भी, जब वे मंच पर आते हैं, आते ही दर्शकों से एक  सहज संबंध जोड़ लेते हैं, न केवल गुणवंतों से बल्कि आम दर्शकों से भी. यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि वे आम और शास्त्रीयता से परे किसी भी व्यक्ति को लय, यतियाँ, ताल और उसकी मात्राओं को, सम को आम भाषा में, सहज उदाहरणों में समझा जाते हैं, समझाते हुए, उसकी यति में रह कर भी वे अनूठे उदाहरण पेश करते हैं. यही वजह है कि भारत में एक औसत व्यक्ति भी कथक का अर्थ बिरजू महाराज ही समझता है. बिरजू महाराज की जो सबसे बड़ी उपलब्धि रही है वह है उनका कम उम्र में ख्यातनाम हो जाना. और वह ख़्यानाम होना यूँ सहज भी नहीं था, इसके पीछे एक कच्ची, लचीली और नियति के मुक्कों से खूब गुंथी हुई नम मिट्टी और बहुत से महारत भरे हाथ रहे हैं. सत्ताईस वर्ष की आयु में तो उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिल गया था, अपनी उम्र के चौथे दशक में तो वे पद्मविभूषण से विभूषित हो चुके थे.
किंतु क्या यह यात्रा इतनी आसान है कि एक चौदह साला किशोर कथक नर्तक लखनऊ से दिल्ली लाया गया और वह परंपरा बन गया!  ऎसे ब्रजमोहन में यहाँ एक संगमरमरी विनम्रता थी, कि आओ गढ़ो मुझे ! जो भी बन सकूँ !! यही विनम्रता आज भी बिरजू महाराज का स्थायी गुण है. वे ब्रिटिश टीवी पर नाहिद सिद्दीकी को दिए गए एक साक्षात्कार में कहते हैं. “हमें तो आज भी हम से बेहतर कोई कथक का जानकार मिले तो उसे उस्ताद बना लें.”
कथक के प्रति यह आस्था बिरजू महाराज के भीतर छिपे अनहद का सिमटाव है. मनुष्य में अहं जहाँ अपने चरम पर पहुँच चुका है. भौतिकता के अंध विवर से निकास का रास्ता है नृत्य. इस बात को हम आउटडेटेड कह कर नकार भी सकते हैं, मगर जो नाचते हैं वे जानते हैं कि भीतर और बाहर के बिखराव को अपने नम हाथों से थाप देता है नृत्य.
स्वयं बिरजू महाराज कहते ही हैं कि उनके पूर्वज राजदरबारों तो नाचे ही, लेकिन धार्मिक आयोजनों में नृत्य मंडलियों में भी कथक होता था, तब साजिन्दे वाद्यों को देह से बाँधे कथक के साथ साथ सभा में चलते जाते थे. कथक नाच के माध्यम से कथानक प्रस्तुत करते थे. कालीय दमन, रास, राम और कृष्ण की बाल लीलाएँ, रावण वध, और भी अनंत कथाएँ उस अनंत हरि की.
हमेशा यूँ ही ग्राफ़ चलता है, होता यूँ है कि कोई छोटी सी कलात्मक अभिव्यक्ति एक उठान लेते हुए एक लंबे कालांतर में कलाकारों, रसिकों द्वारा अपनाई सराही जाती है, कला के विशुद्ध स्तर पर आकर वह शास्त्रीय शिल्प ओढ़ती है, व्याकरणबद्ध होती है पहले श्रुति और स्मृति और फिर ग्रंथों के स्वरूप में. वह कला का विशुद्ध रूप बन कर सामने आती है…स्वर्णकाल पाती है. फिर जनरुचियों में उतरती है, कला जनमानस के समूह तक आती है, उसमें फरमाईशें और आम जन तक संप्रेषणीयता का तत्व आने लगता है और कला के क्याकरण में समय का बदलाव और जनता की माँग मिलावट लाते हैं, भाषा, अंदाज़ और कविता तीनों प्रभावित होते हैं. और कला तट बदलने लगती है. ऎसे ही कथक मंदिरों से दरबारों और दरबारों से और आगे जनता में आया. फैला…अपनाया गया इसे.
अपनी परिशुद्ध ताल और लयकारी तथा भावपूर्ण गतों के लिये प्रसिद्ध बिरजू महाराज ने एक ऐसी शैली विकसित की है, वह पदचालन की सूक्ष्मता और मुख व गर्दन के चालन और विशिष्ट चालों (चाल) और चाल के प्रवाह का श्रेय वे अपने प्रख्यात परिवार से मिली विरासत को देते हैं। वैसे तो बिरजू महारा़ज अपने आप में एक परंपरा का नाम है, एक तकनीक का नाम है और नाच के विशुद्ध शास्त्रीय प्रारूप में एक प्रयोगात्मक श्रृंखला का नाम हैं।  हर महान कलाकार  की तरह स्वयं महाराज जी  विनम्रता के साथ हर निपुण कलाकार को अपने आप में घराना मानते हैं।
कला की हर पारंपरिक विधा पर समय का प्रभाव पड़ता है। उसकी अभिव्यंजना में समाज और तत्कालीन समय की अवधारणाएं अनजाने ही आ जाती हैं। अपनी रचना प्रक्रिया में बिरजू महाराज कथक को जनमानस के निकट ला पाए । उनकी परंपरा में  कथक की शास्त्रीयता केवल क्लिष्ट तालों और अंकगणितीय नृत्त शास्त्र से उपर उठी है, मात्राओं के चमत्कार, सहज अभिव्यक्ति बन गए हैं, और आज भी मायने रखते हैं।
नवसृजन के प्रति अपने सुनहरे काल में महाराज जी का झुकाव रहा है, उन्होंने  कथक केंद्र के और अपने दोनों की नवयुवावस्था में, कुमार संभव, शाने अवध आदि नृत्यनाटिकाएं , बैले आदि की रचनाएं की थीं। तो नवसृजन और परंपरा की शुद्धता के बीच उन्होंने एक हद तक सामंजस्य बिठाया भी. विरासत में मिली, एक स्त्रोत से निकली, मगर विभिन्न रंग, रूप, रस और गंध वाली तीन रसधाराओं की अद्भुत  त्रिवेणी बिरजू महाराज ने कथक में अपना निज तत्व डाल कर कथक को अभूतपूर्व योग दिया. तीन भाई और उनके नितांत भिन्न ढंग कथक नाचने के, और विशद व्याकरण और ज्ञान बिरजू महाराज को हस्तांतरित हुआ था. उनको यह सूझ और बूझ अब अपने भीतर जगानी थी, कि परंपरा के इस विशद और वैविध्यता पूर्ण मगर बिखरे ख़ज़ाने में से ‘कथक’ को एक शास्त्र सम्मत मगर कलात्मक नृत्य में कैसे साधा और शोधन किया जाए.
एक ज़माने में कहते आए हैं लखनऊ घराना, नज़ाकत का, लास्य को समर्पित, परिलक्षित घराना है, जहाँ बोल, बंदिशें, ख्याल, ठुमरियाँ, ग़जलें और बेहतरीन अभिनय का अंग है, वहाँ लयकारी और तत्कार की जादुगरी मिसिंग है. नृत्त का अंग कमज़ोर है. नृत्त यानि शुद्ध नाच. ताल की मात्राओं और यतियों के बीच विलंबित और द्रुत लय पर क्लिष्ट अंगसंचालन, जो मंच पर जादू जगाता है. बिरजू महाराज ने लय को साधा और लय सम्राट बने.
आशीष मोहन खोकर कहते हैं – नृत्त वह अमूर्तन का नृत्य है, जिसमें हस्त मुद्राएँ निरर्थक होती हैं, उनका प्रयोग केवल सौंदर्य बढ़ाने के लिए किया जाता है लेकिन बिरजू महाराज के यहाँ हस्त मुद्राएँ बाक़ायदा हिस्सा लेती हैं नृत्त में, अपनी नृत्त तिहाइयाँ प्रस्तुत करते हुए भी हस्त मुद्राएँ लय का मिजाज़ प्रकट करती हैं, उस अमूर्तन के निर्वात में अपना एक वायवीय महत्व रखती हैं. नृत्त की प्रतिष्ठापना में हाथ सहयोग देते हैं.

अपने तीनों पथप्रदर्शकों के प्रमुख लक्षणों के मिश्रण सहित उन्होंने अपनी अलग शैली विकसित की है, अपनी प्रतिभा से हस्तक और पद संचालन को सतर्क सूक्ष्मता प्रदान करने के साथ – साथ अतिनैतिक सूक्ष्मता प्रदान की. उन्होंने कथक कला को गौरव की पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया है. आज भी कथक नर्तक उनसे प्रेरणा पाकर, जाने या अजाने उनका अनुकरण करते हैं. वे कथक के युगप्रवर्तक हैं. और एक परंपरा कायम की है.”  (परंपरा और बिरजू महाराज – “ कलावार्ता नवंबर – दिसंबर 1984”)
वैसे बिरजू महाराज की नृत्यकला पर अकसर यह संदेह किया जाता है कि एक नौ साल के बालक की स्मृति, खंडो में ली गई तालीम, चौदह साल ही से नृत्य शिक्षा देने वाले कलाकार ने अपना ही कोई ‘कथक’ बना लिया है. उनके कथक में कुछ भी जो तकनीकी है वह परंपरा से बहुत थोड़ा आता है.
बिरजू महाराज कहते हैं (संदर्भ प्रभा मराठे महानायक ऑफ कथक डांस नर्तनम)
अपनी तीन से लेकर दस साल तक की उम्र तक मैंने अपने पिता की तमाम छवियां अपने तईं सोख ली हैं। मैं उनका पुत्र हूं। उनका रक्त बहता है मेरे शरीर में।  एक हद तक मैं उन्हीं की तरह नाचने के लिए बना हूं।  बना हूं ना? लेकिन जिसे घराना कहते हैं, वह केवल पारिवारिक विरासत की चीज़ नहीं है, यह कहीं उदार और वृहत सामाजिक सरोकार की चीज़ है। तुम्हें पता है – एक परण है, बढ़इया की परण। इसके पीछे एक कथा है, बहुत पहले लखनऊ में एक महान पखावज वादक हुए हैं कुदउ सिंह. वे जहाँ रहते थे उसके नीचे वाली मंजिल पार एक बढ़इया दुकान चलाता था. वह पखावज सीखना चाहता था. वह हिम्मत जुटा कर कुदउ सिंह से मिला. मगर उसे निराश लौटना पड़ा क्योंकि उनका नियम था कि केवल ब्राह्मण शिष्यों को सिखाते थे. लेकिन बढ़ई की इच्छाशक्ति मजबूत थी. वह कोई भी चीज़ बारीकी के साथ सीखने में तेज था, उसने उस्ताद को देख कर, सुन कर सीख लिया. उन्होंने एक रोज़ उसे एक जगह बजाते देख लिया. उन्होंने केवल उसके लिए अपने नियमों को लचीला किया और अपनी उस्तादी में ले लिया. इस तरह लखनऊ घराने में केवल ‘बढ़इया की परण’ शामिल हुई. अन्यथा लखनऊ कथक परंपरा में किसी की कंपोज़िशन स्वीकार नहीं की जाती. मैं अपने घराने का बेटा हूँ, लेकिन फिर भी मुझे भी इसमें मेरा अपना कुछ देय तो देना है न! बाबूजी के जाने बाद, मेरे पैरों के नीचे ज़मीन नहीं थी. कुछ दिन नेपाल दरबार में, कुछ दिन पटना में बहनोई के यहाँ, कुछ दिन छोटे चाचा के यहाँ जो बड़े भाई की मृत्यु से बेज़ार थे.कुछ दिन बॉम्बे जहाँ मेरे बड़े चचा फिल्मी हीरोइनों को सिखाने में व्यस्त थे. तमाम दुखों के बाद मेरे साथ जो अच्छी बात हुई, वह यह थी कि सौभाग्य से मेरे आस – पास बड़े कलाकार बने रहे, मेरे दोनों चचा, डागर बंधु, रविशंकर जी, हाफ़िज़ अली खान साब, मुश्ताक़ हुसैन साब, पुरुषोत्तम दास जी, चतुर लाल, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी, किशन महाराज चचा, गुदई महाराज ये लिस्ट अंतहीन है. मैंने इनको रियाज़ करते, प्रोग्राम करते देखा है. उनकी बातें सुनी हैं, उसके सोचने का ढंग खुदमें उतारा है.”
इस तरह परंपरा प्रवाह में अपने उत्स के साथ उतरे बिरजू महाराज, जहाँ उनकी आधुनिक समझ और प्रतिभा ने कथक में ट्रेंड सेट किए, वहीं कई जगह कथक विरल भी हुआ. इसकी गाढ़ी क्लिष्टता में तरलता आई और यह मंच के अनुरूप ढल गया. कुछ लखनऊ घराने के परंपरा वाहक शिष्यों ने आगे बढ़ाई परंपरा तो कुछ ने विचलन दिया. प्रवाहमान होने का अर्थ निरंतर पोषित, प्रदूषित और फिर छनना और फिर स्वच्छ होना और आगे बढ़ना है. नदी जैसे बहुत से तटों से मीठे और खारे लवण रास्ते में लेती चलती है, फिर वे अवक्षेपित हो छूटते हैं, पानी अपना मूल तात्विक नहीं छोड़ता वह जहाँ होता है दो अणु ऑक्सीजन एक अणु हाईड्रोजन ही होता है.
” अगर मेरे पिता अच्छन महाराज अगर आज का नाच देख पाते मुझे शक है कि वे इसमें से कुछ कथक की तरह पहचान पाते। ” बिरजू महाराज की यह टिप्पणी प्रशंसनात्मक है, कि किसी पछतावे में ढकी हुई ? या शायद थोड़ी – थोड़ी दोनों भावों से भरी क्योंकि उन्होंने पिछले पचास सालों में कथक में आए बदलावों को और इसकी शास्त्रीयता में आई तरलता को देख चुके हैं।  (इंडियन क्लासिकल डांस ,  पृष्ठ 4, लीला सैमसंग   अविनाश पसरीचा)
हालांकि परंपरा से अपना चुना हुआ तत्व लेने की और उससे अपना ‘स्व’ खड़ा करने की सूझ बूझ हरेक में नहीं होती. बिरजू महाराज में थी, बल्कि अपूर्ण स्कूली शिक्षा के वावजूद बिरजू महाराज तीक्ष्ण बुद्धि के रहे हैं. उन्होंने अपना वजूद खुला रखा, नृत्य का कलात्मक पक्ष समझने की चाह रखी, बैले को समझा, विदेशी दर्शकों और विदेशी छात्रों से संवाद कायम किया. अपना ‘स्व’ कायम किया जो कि हज़ारों के लिए प्रेरक बना. लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि कलाकार का खुद को खुला रख देना हर सीख के प्रति उसे महान बनाता है, वहीं खुद को किसी किले में बंद कर लेना, उसके ह्रास का कारण भी बनता है. कथक एक जीवंत और प्रवाहमय विधा है, जो परंपरा की बहुत गहरी जड़ों से पोषण पाती है ।

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