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‘इमा’ तुझे रोके है , रोके है मुझे ‘बेटी’

मणिपुर की राजधानी इम्फाल का इमा बाजार, जहाँ सिर्फ महिलायें बाजार लगाती हैं. उसके बारे में एक जीवंत टेक्स्ट लिखा है गीताश्री ने. वह अभी हाल में मणिपुर यात्रा पर गई थीं. बहुत साधा हुआ गद्य, न्यू जर्नलिज्म की तरह यानी ऐसा रिपोर्ताज जो पढने में साहित्य सा आनंद दे- मॉडरेटर
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वह अवाक मेरा मुँह ताक रही थी. वह मेरी भाषा नहीं समझ पा रही थी और वह कुछ बोल नहीं पा रही थी. हम बाहरी थे उनके लिए. उनसे संवाद कैसे स्थापित करुं,  मैं अकबकाई-सी खड़ी थी. मैं मुस्कुराना चाह रही थी और चाहती थी कि बूढे चेहरे पर कम से कम व्यवहारिक, व्यापारिक सहजता तो दिखे.
एक रंगीन मफ़लर पर मेरी नज़र अटक गई थी. महिलाओं के उस बाज़ार में प्रवेश करते ही आँखें चौंधिया गईं थीं, कई कारणों से. शुरुआत कहीं से तो करनी थी.
मैं मफ़लर की तरह इशारा करके उसका मूल्य पूछ रही थी. वह बूढी औरत कुछ समझ नहीं पा रही थी. उसने मुझे लगभग इगनोर कर दिया.
पीछे से किसी स्त्री की आवाज आई- आपको यहाँ शॉपिंग करनी है तो दूकान पर बैठी स्त्रियों को “ इमा” बोलो. फिर देखो…! इमा का रेस्पेक्ट जरुरी है. “
पीछे एक मणिपुरी युवती खड़ी थी, अपने पारंपरिक परिधान में. उसके साफ हिंदी बोलने पर मैं गदगद होने ही वाली थी कि उसने कहा- मैं दिल्ली में पढी हूँ… हिंदी लिख – पढ लेती हूँ. यहाँ बाज़ार में बूढी औरतें हिंदी नहीं समझती, मगर युवा लडकियां आठवीं तक हिंदी पढीं हैं, उनसे मदद लो आप..!
मुझे रास्ता बताते हुए वह बाला बाज़ार की भीड़ में खो गई.
मेरे साथ आए स्थानीय गाइड हेनरी कहीं पीछे छूट चुका था. हेनरी का नाम मैने ओ हेनरी कर दिया था और उसे हमारा पूरा ग्रुप “लास्ट लीफ़” बुलाने लगा था. मैने हेनरी को खोजा. फिर याद आया कि हेनरी के अनुसार इमा का अर्थ “माँ” होता है.
वह लडकी जाते जाते बता गई थी कि दुकानदार स्त्रियों से कैसे बात करनी है. मुझे ये नहीं अंदाज़ा था कि वह फ़ायदेमंद मंत्र दे गई थी जिसके सहारे बाज़ार में जमकर छूट मिलती है.
मैने शुष्क बूढी औरत को कहा – “इमा”, वो मफ़लर कितने का ? उसने इमा सुनते ही जो कहा , मैं हैरान.
“ बेटी” लो … ! मतलब इतनी हिंदी तो जानती ही है कि स्त्री ग्राहक को कहाँ रोक लेना है. उसका तना हुआ चेहरा ढीला पड़ा. माथे पर चंदन की लंबी लकीरें थीं.
उसने दाम बताए और अच्छी खासी छूट भी दी. मुझे शॉपिंग मंत्र मिल गया था. चार हज़ार स्त्रियों के बाज़ार में सारी “ इमा” निकलीं और हम बेटियाँ. बाज़ार में भीतर धंसते हुए जिसे मैं हैलो इमा कहती, वो कहती- बेटी, बेटी.. “
वो फिर माएँ थीं जो इमा सुनते ही मुस्कुरा पड़ती थी और जिनके सूखे चेहरे पर सहजता आ जाती थी.
मैं इंफाल के ऐतिहासिक “ इमा मार्केट , इमा कैथल“ के बारे में बात कर रही हूँ जिसे मदर्स मार्केट के नाम से भी जाना जाता है. इस बाज़ार की भी एक दिलचस्प कहानी है. बताते हैं कि 16वीं शताब्दी में जब यहाँ पर राजा का शासन था तब अधिकांश पुरुष सेना में भर्ती होते थे या उन्हें चावल की खेती करने के लिए दूर दराज़ इलाक़ों में भेज दिया जाता था. ऐसे में बाज़ार सूने. न कोई विक्रेता न कोई ख़रीदार. जब पुरुष नदारद हो तो ऐसी स्थिति में महिलाओं को ही बाकी काम करने पड़ते थे। उन्हें घर से निकल कर बाहर का मोर्चा संभालना पड़ता था. सन 1533 में इस बाज़ार की नींव रखी गई थी. ऐसा बाज़ार सिर्फ मणिपुर की राजधानी इंफाल में ही नहीं , सूबे के हरेक जिले में , बड़े शहरों में मिलेगा. हर जगह एक इमा मार्केट है जिसकी जड़े इतिहास में धंसी हैं.
ज्यादातर महिलाओं के लिए युद्धकाल का मतलब परेशानी, परिवार को अकेले संभालना और राशन साझा करना था.
ऐसी ही आवश्यकताओं ने स्त्रियों को मुक्त किया है हमेशा. इतिहास गवाह है कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जब सारे पुरुष मोर्चे पर चले गए तब स्त्रियों ने ही सारा कार्य – व्यापार संभाला था. दफ़्तरों में घुसकर काम किए. जब पुरुष मोर्चे से वापस लौटे तो स्त्रियों ने क़दम पीछे करने से इनकार कर दिया. उन्होंने साबित कर दिया था खुद को कि आवश्यकता पड़ने पर सारे काम कर सकती हैं जो उनके लिए वर्जित थे. जिनसे उन्हें वंचित रखा गया था. व्यापार भी उनमें से एक है.
मणिपुर का समाज 500 साल पहले अपनी स्त्रियों को मुक्त कर चुका था, वजह एक ही होती है, मुक्ति का देशकाल अलग.
इमा बाज़ार पाँच सौ साल पुराना है और तब से आजतक इसकी परिपाटी नहीं बदली. इस बाज़ार में सिर्फ शादीशुदा स्त्रियाँ ही व्यापार कर सकती हैं. उनकी जगहें तय हैं जहाँ वे पिछले कई दशको से बैठती चली आ रही हैं. माँ अपनी बेटी को विरासत सौंपती चली आ रही है. यह विरासत बेटों को नहीं मिलता, शादीशुदा बेटियों को मिलता है. पाँच सौ साल से यही रिवाज चला आ रहा है. समय के साथ भी नहीं बदला है यह रिवाज.
“यह बाज़ार नहीं परंपरा है . मेरी माँ ने मुझे सौंपा है यह काम. आगे मैं अपनी बेटी को सौंपूँगी मगर शादी के बाद”
युवा दूकानदार राजेश्वरी टूटी फूटी , तुतलाती हिंदी में बताती है. इन्हें बाज़ार का इतिहास पूरा नहीं पता. बस इतना मालूम है कि इस बाज़ार पर मातृसत्ता क़ायम है , जिसे कोई नियम क़ानून बदल नहीं सकता. राजेश्वरी के बग़ल में बैठती हैं 70 साल की वेदमणि ! इंफाल के पास के गाँव से रोज आती हैं. सुबह नौ बजे तक बाज़ार में माल लेकर पहुँचती हैं और शाम चार से पाँच बजे के बीच दूकान समेट कर गाँव निकल जाती हैं. वे पिछले चालीस साल से इमा बाज़ार में दुकान चला रही हैं . उनकी चिंता ये है कि उनके बाद इस परंपरा को आगे कौन बढ़ाएगा. इकलौती बेटी प्रदेश छोड कर विदेश चली गई है और उसे ये काम पसंद नहीं. वेदमणि अपनी विरासत सौंपने के लिए उचित पात्र ढूँढ रही हैं. वे नयी पीढी से थोड़ी खफा भी हैं कि ऐसे भागती रहेंगी तो यह बाज़ार कहीं मातृसत्ता के क़ब्ज़े से निकल न जाए. ढेरों बेरोज़गार युवक दुकान लगाने को बेताब घूम रहे हैं. अभी तो पुरुष यहाँ सिर्फ ख़रीदार की तरह आते हैं . दुकान लगाने का हक नहीं उन्हें. पितृसत्ता पूरी तरह अपदस्थ है इस बाज़ार से.
बहुत बडा बाज़ार है जहाँ एक साथ चार हज़ार महिलाएँ बैठती हैं एक साथ. दूर दराज़ के इलाक़ों से रोज सुबह आती हैं, शाम को वापस जाती हैं. कुछ को बाज़ार की इमारत के अंदर जगह नहीं मिली है, वे बाहर पटरियों पर बैठ कर बेचती हैं दैनिक आवश्यकताओं से जुड़ी चीज़ें.
अगर आप मणिपुर की यात्रा पर जा रहे हैं तो इमा बाज़ार की सैर के बिना अधूरी रहेगी यात्रा.
महिला व्यापारियों को आदर से “इमा” कहिए, चाहे वे युवा ही क्यों न हो, बदले में सामान, मुस्कान और भारी छूट पाइए.
तुतलाती हुई हिंदी की मिठास यात्रा की थकान दूर कर देगी. यकीन मानिए… ऐतिहासिक इमारत के भीतर बसे बाज़ार में “इमाएं” शोर नहीं मचाती !
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2 comments

  1. रोचक रिपोर्ताज

  2. ऐश्वर्ज कुमार

    इस रोचक परिदृश्य को समेटती यह रिपोर्ट पेश करने के लिए अनेकों धन्यवाद। यह जानकारी महिला प्रश्न के कई सरोकोरों पर जिनके बारे में पुरूष समाज अक्सर प्रश्न उठाता है, उसका सटीक जवाब पेश करती है। इसे सांझा करने के लिए आभारी हूँ।

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