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फ़नकार नहीं, सुनकार!

शाम को संगीत सभा होती है. जब इस सभा में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को लेकर प्रवीण झा को पढने को मिल जाए तो कहना ही क्या. पढ़िए उनके कुछ संगीत-किस्से- मॉडरेटर

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यह विडंबना है कि क्रिकेट पर किताबें रामचंद्र गुहा और शशि थरूर सरीखों को लिखनी पड़ी। राजदीप सरदेसाई तो फिर भी पत्रकार हैं। राहुल भट्टाचार्य, हर्षा भोगले और शिवेंद्र सिंह जी खेल पत्रकारिता से जुड़े हैं, तो उनका भी इस विधा पर अधिकार है। लेकिन क्रिकेट पर किताब तो भारत के गली-गली के बच्चे भी लिख सकते हैं। यह तो भारत के रक्त में बसा है, कि एक पैंसठ वर्ष के बुजुर्ग भी जब मैकग्राथ को गेंद फेंकते देखते हैं तो कहते हैं कि यह ‘गुड-लेंथ’ गेंद थी, एक कदम बढ़ा कर शॉट न लिया तो बेहतर ही है कि जाने दिया। यही बात कभी संगीत-लेखन की भी थी। अमजद अली ख़ान को एक बार कहते सुना कि पटना जाता हूँ तो सँभल कर बजाना होता है, लोग-बाग पकड़ लेते हैं कि ग़लत बजा रहा है। यही हाल अविभाजित भारत के लाहौर की छतों पर बैठे लोगों के बारे में भी कहा जाता। कि महफ़िल जमी तो आह-वाह के लिए बड़ी ज़हमत करनी होती। जिसने कभी तबले को हाथ भी न लगाया, वह भी कहता कि तबलिया सम ही ढूँढता रह गया। नाचते भले न थे, लेकिन नाच जानते थे। तो उन्हें आंगन टेढ़ा कहने का हक था।

हालिया सुनीता बुद्धिराजा जी की ‘रसराज: पंडित जसराज’ पढ़ा तो यही बात मन में कौंधी। उसमें कई दफ़े ‘सुनकार’ शब्द का जिक्र है। फ़नकार नहीं, सुनकार! यानी जिसमें संगीत सुनने का गुण हो। ऐसे सुनकारों के सामने गायक-वादक भी चौकन्ने रहते कि वे भैंस के आगे बीन नहीं बजा रहे। सुनीता जी ने तो सैकड़ों मंच-संचालन किए, संगीतकारों को करीब से देखा। उन्होंने कुछ गाया-बजाया भले नहीं, लेकिन वह सुनकार हैं। आज की पीढ़ी में यतींद्र मिश्र जी वही भूमिका निभा रहे हैं। वह भी संगीतकारों के हाव-भाव से लेकर उनके जीवन और संगीत को बारीकी से लिख रहे हैं। लेकिन संगीत को लिखना एक भगीरथ कार्य है।

पहली बात तो यह कि ये लेखक प्रशिक्षण से इतिहासकार नहीं है। उनकी लेखन-विधि में इतिहासकारों के वैज्ञानिक तर्क कम मिलेंगे। इसे मैं प्राकृतवाद या ‘रोमांटिसिज़्म’ कहना चाहूँगा जिसमें इतिहास कई दफ़े एक परीकथा जैसी कही जाएगी। जैसे पं. जसराज के पूर्वजों के समय आशीर्वाद देने पानी पर चल कर गुणीजन आए। या कोई मर कर जी उठे। साधुओं के आशीर्वाद से लुप्त आवाज़ वापस आ गयी। गजेंद्र नारायण सिंह इतिहासकार थे, लेकिन उनके भी लेखन में ऐसी कई परीकथाएँ मिलेंगी। हालांकि संगीत का एक मूल तत्व आध्यात्म भी है, और ऐसे कई संदर्भ रूपक भी हो सकते हैं। ख़ास कर जब ये संदर्भ सुने किस्सों की तरह लिखे गए। इतिहास जो पहले भी लिखा गया, उसमें काव्यात्मक परीकथाएँ तथ्यों के मध्य रही है। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ की तुलना हम आधुनिक कश्मीर इतिहास से नहीं कर सकते। उस समय वैज्ञानिक तर्क तो पश्चिम में भी नहीं आए थे। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि भारतीय मानसिकता में जब तक दैविक या ‘सुपरलेटिव’ तत्व न आए, तब तक उससे जनमानस जुड़ाव नहीं महसूस करता। कुमार गंधर्व स्वर्ग से आए थे, पैग़ंबर थे, यह बातें प्रशंसा-तंज हर रूप में कही गयी। लेकिन वाकई कुमार गंधर्व और नत्थन ख़ान सरीखों के गायन में ईश्वर दिखने लगे। अगर बिना अलंकारों के यह बात लिखी जाती, तो शायद वजन न आता।

दूसरी समस्या यह है कि ज्ञान में कई ‘फ़िल्टर’ लगे हैं। वह छन-छन कर आ रहा है, और एक गप्प से दूसरी गप्प भी निकल रही है। कई बातें स्मृति के आधार पर हैं, जो उस्तादों ने बाल्य-काल में सुनी-देखी। इतना ही नहीं, एक ही प्रकरण चार संस्मरणों में चार तरह से लिखी मिलेगी। वंशावली भी पक्की कहनी कठिन है। ग्वालियर घराने की वंशावली अगर हम कुमार प्रसाद मुखर्जी, सुनीता बुद्धिराजा और ग्वालियर की मीता पंडित जी से पढ़ें-सुनें, तो भिन्न-भिन्न मिलेगी। हालिया अन्नपूर्णा देवी जी के जन्म-वर्ष पर मैहर घराने के उनके परिवार वाले भी उत्तर देने में असमर्थ थे। स्वपन कुमार बंदोपाध्याय ने आखिर कुछ कयास लगा कर एक जन्म-वर्ष का निष्कर्ष निकाला। एक और बात है कि घरानों के मध्य (और घरानों के अंदर) श्रेष्ठता की भी प्रतिद्वंद्विता रही है। कई घराने स्वयं को तानसेन के वंशज कहते हैं, जिससे एक श्रेष्ठता का प्रमाण-पत्र मिल जाता है। सेनिया बंगाश, मैहर सेनिया, बीनकार घराने, ग्वालियर तो जोड़ते ही रहे हैं, बेतिया वाले भी कहते हैं कि असली वंशज वे हैं!

लेकिन इन समस्याओं के बावजूद यह क्रोनिकल लिखना आवश्यक है। मराठी भाषा में नियमित ऐसे क्रोनिकल लिखे जाते रहे हैं, और संगीत इतिहास में सबसे समृद्ध आज भी मराठी भाषा ही कही जाएगी, जिनके हिन्दी अनुवाद हुए ही नहीं। एक महत्वपूर्ण विशेषता जो सुनीता जी और यतींद्र जी के लेखन में दिखी, वो यह कि उन्होंने हर बात डिक्टाफ़ोन पर रिकॉर्ड की है। तो इतिहास ‘उत्तम पुरुष’ (फर्स्ट-पर्सन) में अधिक लिखा। यह वैज्ञानिक रूप से सर्वश्रेष्ठ स्रोत माने जाएँगे कि पंडित जसराज या लता जी ने अपनी कहानी अपनी ही जबानी कही। वह हू-ब-हू बिना लाग-लपेट के किताब में आ गया। जब हम सुनी बातें लिखते हैं, तो कुछ हमारे विचार और कुछ सुनाने वाले का मसाला जुड़ जाता है। इन दोनों की लेखनी में यह न के बराबर है। हर बात संदर्भित है, और सीधे तुरंग-मुख से (फ़्रॉम हॉर्सेस माउथ) है।

एक आखिरी सवाल जो एक संगीतकार ने ही उठाया कि संगीत की समझ तो हमें सालों के रियाज के बाद आती है, एक लिक्खाड़ भला संगीत पर क्या लिखेगा? उसे क्या लयकारी, ताल और तान समझ आएगी? और यह बात ठीक भी है कि सचिन तेंदुलकर क्रिकेट पर शशि थरूर से बेहतर कह सकते हैं। लेकिन सचिन के पास तो बस बैट पकड़ने का हुनर है, कलम के सिपाही तो वह हैं नहीं। संगीतकार के पास वक्त कहाँ कि वह लिखे, और लिखे भी तो दूसरों पर कैसे लिखे? यह जरूर हुआ कि कुमार प्रसाद मुखर्जी सरीखे सुनते-लिखते हुए बंदिश रचना भी सीख गए और गाने भी लग गए। लेकिन यह कठिन है और दोनों कार्य भिन्न है। तो बेहतर यही है कि संगीतकार एक लेखक को माध्यम बनाएँ। जब लेखक ऐसे पुल बनाएँगे तो जनमानस और शास्त्रीय संगीत के मध्य बढ़ती खाई पार करना आसान होगा। पुराने जमाने में तो एक रियासत के खुफिए या भाट दूसरी रियासत के संगीतकारों को सुन कर आते और तारीफ़ करते, फिर न्यौता भेजा जाता। अब तो यह आसान है कि एक क्लिक पर यू-ट्यूब में फ़नकार मिल जाते हैं। अब यह नवाबों-राजाओं की जागीर कहाँ? यह विडंबना है कि आज भी यह ‘एलीट’ वर्ग के लोगों की पसंद बना है, क्योंकि संगीत की बात उतनी सहजता से नहीं हो रही, जितनी सहजता से क्रिकेट की बात हो रही है।

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लेखक संपर्क:doctorjha@gmail.com 

 

 

 

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