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लेडी मस्तराम की कहानियां-1- ‘प्यार का बोरोलीन’

हाल में ही एक लेखिका ने मुझे अपनी पांडुलिपि भेजी ‘लेडी मस्तराम की कहानियां’. मैं लेखिका का नाम नहीं बताऊँगा लेकिन पाण्डुलिपि से एक कहानी लगा रहा हूँ. लेखिका को पहचानिए और इस बात पर अफ़सोस जताइए कि क्यों इस तरह की कहानियां लिखने के लिए हिंदी के लेखक-लेखिकाओं को अपना नाम छुपाना पड़ता है-प्रभात रंजन

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प्यार का बोरोलीन

 

‘लेडी मस्तराम बनना है क्या?’

मुझे अच्छी तरह याद है। मैंने पूर्णेंदु सर को अपनी पहली कहानी पढने के लिए दी थी। उन्होंने दो दिन बाद कहानी को बड़े करीने से लिफ़ाफ़े में डालकर लौटाते हुए कहा था।

मुझे अच्छी तरह याद है वृहस्पतिवार का दिन था। उन दिनों मैं सोलह वृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। हर वृहस्पतिवार के दिन मैं गरीबस्थान मंदिर में भोले बाबा को जल चढाने जाती थी। जल चढ़ाकर लौट रही थी तो रिक्शे वाले को रिंग बाँध की तरफ से लेने के लिए बोल दिया। वहीं कोने पर उनका बंगला था। जब मैं पहुंची तो वे आम के पेड़ के नीचे कुर्सी डाले अखबार पढ़ रहे थे। ठंड जा चुकी थी लेकिन गर्मी ठीक से आई नहीं थी। छांह में बैठकर धूप को महसूस करना अच्छा ही लगता था। पेड़ में खूब मंजर आये हुए थे। पीछे से चिरई-चुनमुन की आवाजें आ रही थीं। चारों तरफ फूल ही फूल। पूर्णेंदु सर के पहले कविता संग्रह ‘रंगारंग’ के शीर्षक की प्रेरणा शायद यहीं से मिली हो उनको!

कैसे भूल सकती हूँ मार्च की वह मनहूस सुबह जब मेरी पहली कहानी को अच्छी तरह लिफ़ाफ़े में सहेजकर लौटाते हुए पूर्णेंदु सर ने महज एक वाक्य कहा और अन्दर की तरफ चले गए। जिस महीने में फूल खिलते हैं, लोगों के दिल मिलते हैं, मेरा टूटकर मुरझा गया था। लेखिका बनने के मेरे सपने पर सर ने जैसे सूखे पत्तों की बारिश बरसात कर दी हो।

पूर्णेंदु सर ने ही मुझे लेखन के लिए प्रेरित किया था। कहा था ऐसे अनुभवों को लिखो जिनको किसी ने न लिखा हो और ऐसे लिखो कि पढने वालों को लगे ऐसा तो वह भी लिख सकता है।

एक महीने तक वैशाली नोट बुक के न जाने कितने पन्ने फाड़ने के बाद मैंने शब्दों को जोड़ जोड़ जो लिखा वह क्या किसी लायक नहीं था? क्या उसकी नियति पीले लिफ़ाफ़े में बंद हो जाना थी?

क्या मेरे लिखे का कोई अर्थ नहीं था या मेरी जिंदगी का? जिनको भूल जाने से पहले मैं जिसको दर्ज करके हमेशा के लिए भूल जाना चाहती थी। मैं तो पीछे का सब भूलकर आगे निकल जाना चाहती थी।

पूर्णेंदु सर ने भूलने कहाँ दिया?

यह है मेरी पहली कहानी जो तब लिखी गई थी जब न कंप्यूटर आया था न हाथ में घड़ी घड़ी घंटी बजाने वाला मोबाइल फोन। 5 रुपैया के रेनोल्ड्स का पेन खरीद कर लिखे थे-

किरायेदार से मेरे जीवन की कहानी के किरदार तक

भाई के दिल्ली पढने जाने के बाद घर में मैं माँ-पापा के साथ अकेली रह गई। नया नया डेरा बनवाये थे पापा बाईपास के पास। ऊपर दो रूम था जिसमें हम लोग रहते थे। नीचे चार कमरा था जिसमें किरायेदार आते जाते रहते थे। उस ज़माने में चारों रूम में तो कभी किरायदार नहीं आये लेकिन एक न एक किरायेदार जरूर रहता था।

पापा ने नियम बना रखा था कि वे कभी किसी विद्यार्थी को भाड़े पर कमरा नहीं देंगे। नौकरीपेशा लोगों को घर देना ठीक रहता है। रहते हैं, ट्रांसफर हो जाता है चले जाते हैं। जब तक रहते हैं टाइम पर किराया भी दे जाते हैं।

मनोज मोहन नाम था उनका। किरायेदार थे। यूनियन बैंक का नया नया ब्रांच शहर में खुला था। उसी में कैशियर लगे थे। सवेरे कब तैयार होकर ऑफिस चले जाते। कब लौटकर आता कुछ पता नहीं चलता था। वैसे झूठ क्यों बोलूं कि मुझे पता नहीं चलता था। संयोग से एक दिन मैंने सवेरे साढ़े आठ बजे कमरे की सफाई करते हुए खिड़की का पल्ला सीधा किया तो देखा हाथ में बैग लटकाए जा रहे थे। उसके बाद से क्या संयोग था कि सवेरे मैंने उसी समय कमरे की सफाई करने लगी। जब खिड़की खोलती वह जाते दिखाई देते।

मौसी कहती थीं कि जवान पुरुष जहाँ रहते हैं वहां आसपास के सारे खिड़की-दरवाजों की फिजा को भांप जाते हैं। न जाने उनको कैसे इस बात का पता चल जाता है कि किस खिड़की के पीछे कौन रहती है, किस दरवाजे के खुलने पर किस वक्त कौन निकलती है- न जाने कैसे वे भांप जाते हैं। नहीं, मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि मनोज ने कभी खिड़की खुलने पर ऊपर देखा भी हो। वह तो माथा झुकाए जाता था माथा झुकाए आ जाता। ‘बहुत सलज्ज लड़का है’, मैंने सुना एक दिन पापा खाना खाते समय माँ से कह रहे थे।

‘बेटी से बियाह करना है क्या? सलज्ज है तो क्या करना है? समय पर किराया देता रहे बस…’

माँ ने पापा के कटोरे में दाल डालते हुए कहा।

‘फिर भी!’ पापा ने हाथ से बस का इशारा किया और बोले।

पापा की आदत थी सवेरे एक ही बार खाना खाकर ऑफिस चले जाते थे। कलेक्टेरियेट में सप्लाई विभाग में बड़ा बाबू थे।

दिन में घर में माँ और मैं दोनों रहती थी। हाइवे पर घर था, हमेशा चहल-पहल बनी रहती। डर जैसी कोई बात ही नहीं थी। उस साल मैं प्राईवेट से इंटर की परीक्षा की तैयारी कर रही थी। इसलिए घर से बाहर कभी कभार ही निकलती। वह भी माँ के साथ। लेकिन माँ कथा सुनने, सत्संग सुनने कई बार चली जाती थी। मुझे सख्त हिदायत रहती- माँ पापा को छोड़कर किसी के लिए दरवाजा मत खोलना।

दरवाजा तो नहीं खोलती लेकिन खिड़की रोज खोलती थी। एक दिन खिड़की खोलते समय धूल का ऐसा झोंका आया कि मुझे खांसी होने लगी। उसी समय फ़्लाइंग शर्ट जींस पहने, हाथ में चमड़े का बैग लटकाए मनोज बाबू गेट खोलकर बाहर निकलने ही वाले थे कि खांसी की आवाज सुनकर उनकी नजर ठीक खिड़की पर आकर ठहर गई। और मेरी नजर उनके ऊपर ठहर गई। कुछ देर दोनों की निगाहें ठहरी रहीं फिर उसने उसी तरह नजर झुकाई और गेट खोलकर चला गया।

मेरी एक फुआ हैं। नेपाल में रहती हैं। बचपन से उनकी एक ही बात याद है- जब जब जो जो होना है तब तब सो सो होता है!

झूठ क्यों बोलूँ कि इस तरह उससे नजर मिलना, फिर उसका इस तरह नजर झुकाकर चले जाना अच्छा लगा था। मुझे नहीं लगता है कि ऐसी कोई लड़की होती होगी जिसको यह सब अच्छा न लगता हो। कह शायद कोई नहीं पाती, लिखने में भी झिझक जाती हैं।

अच्छा लगने का असर था या सिर्फ संयोग! लेकिन उस सुबह के बाद से ऐसा बार बार होने लगा। सुबह पूरब वाली खिड़की खुलती। सामने से बैग उठाये जाते मनोज बाबू दिखाई देते। गेट खोलने से ऐन पहले एक बार गर्दन ऊपर उठाते और निगाहें सीधे खुली खिड़की पर जातीं, मेरी आँखों से टकराती और झुक जातीं। गेट खुलता और झटके से वे बाहर निकल जाते…

कुछ नहीं होता था लेकिन अच्छा लगता था। सुबह की हल्की हवा और मुलायम धूप में सब कुछ खिला खिला लगने लगता।

तीन महीने इसी तरह बीत गए। माँ-पापा में किरायेदारों को लेकर जो चौकन्नापन होता है वह जाता रहा। तीन महीने में किराया देने के अलावा कभी ऊपर की सीढियों पर मनोज बाबू ने कदम तक नहीं रखा था।

‘किसी चीज की जरूरत हो तो बोलियेगा’, वह जब भी ऊपर आते तो जाते समय माँ यह कहना नहीं भूलती थी।

वैसे माँ के कहने के बाद ही उस बात को सब भूल जाते थे। यहाँ तक कि खुद माँ भी।

एक दिन दोपहर में दरवाजे पर घंटी बजी। मैं पढ़ाई में लगी हुई थी। चौंककर उठी। माँ तो डॉक्टर विश्वनाथ झा के घर कथा में गई थी। आधा ही घंटा हुआ था गए। इतनी जल्दी लौटने का सवाल ही नहीं उठता था। कौन था?

‘कौन है?’

दरवाजा खोलने से पहले पूछना जरूरी था। मैं घर में अकेली थी न।

‘मैं हूँ… मनोज।’

मनोज मतलब मनोज मोहन मतलब मनोज बाबू! आज तक दिन में कभी दिखाई नहीं दिए था तो आज कैसे?

मैंने दरवाजा खोला और सवालिया निगाहों से उनकी तरफ देखा।

‘ई नीचे गिरा हुआ था। देने आया था…’ कहते हुए उन्होंने हाथ में लपेटा हुआ कपड़ा आगे बढ़ा दिया।

‘ओह’ कहते हुए मैंने उनके हाथ से कपड़ा लिया और अन्दर कमरे में रखने चली गई। छत पर सूखने के लिए कपड़ा डाले थे। उसी में से मेरी शमीज और पैंटी न जाने कैसे नीचे गिर गई थी। असल में पैंटी को छुपाकर सुखाने के लिए शमीज के नीचे डाला था। पता नहीं कैसे हवा में उड़कर दोनों कपड़े नीचे गिर गए। कभी कभी कपड़े गिर जाते हैं। कोई नई बात नहीं। लेकिन यह पहली बार हुआ कि कोई ऊपर पहुंचाने आ गया।

मुझे इतनी शर्म आई कि लगभग पीछे मुड़ते हुए मैंने हाथ में कपड़े लिए और सीधा अन्दर भागी। जब वापस आई तो वे गेट पर ही खड़े थे। इससे पहले कि मैं कुछ कहती वही बोल पड़े

‘आज सर्दी के कारण थोड़ा बुखार जैसा बुझा रहा था इसलिए ऑफिस से जल्दी आ गए।’ कहते हुए मनोज बाबू जाने के लिए पीछे मुड़ने ही वाले थे कि मेरे मुंह से निकल गया-

‘चाय पीकर जाइए। दवाई लिए हैं कि नहीं?’

पहली बार घर के बाहर के किसी पुरुष से अकेले में बात की थी। साँसें तेज तेज चल रही थी और इसके कारण आवाज थोडी काँप भी रही थी।

मनोज बाबू बिना न नुकुर किये कमरे में कुर्सी पर बैठ गए। मैं चाय बनाने चली गई।

ट्रे में चाय लेकर आई और उनके पास ट्रे रखने में घबराहट के कारण शायद ट्रे हिल गई और चाय का कप नीचे गिरने लगा। कप को थामने के लिए अचानक मनोज बाबू ने अपना हाथ आगे कर दिया था इसलिए गरम गरम चाय उनकी बांह पर भी गिर गई। हडबडाहट में मैंने भी हाथ आगे कर दिया और मेरा हाथ उनकी बांह पर चला गया। पता नहीं चाय की गर्मी थी या उनके शरीर की पल भर में ही ऐसा महसूस होने लगा जैसे मेरा पूरा बदन जल रहा हो। पता नहीं क्यों वह जलन अच्छी भी लग रही थी। मन कर रहा था कि हाथ ऐसे सटा रहे बदन ऐसे ही जलता रहे। लेकिन यह तो पाप होता। माँ कहती थी कि मर्द कोई भी हो उससे कुछ दूरी बनाकर रखना चाहिए। शादी से पहले किसी भी पुरुष से फालतू बात भी नहीं करना चाहिए। माँ की बात याद आई और अचानक मैं पीछे मुड़कर अन्दर वाले कमरे में भागी। वापस आई तो हाथ में बोरोलीन का ट्यूब था।

‘घर में बर्नोल नहीं है तो बोरोलीन ले आई। लगा लीजिये…’ उनकी तरफ बोरोलीन का डिब्बा बढाते हुए मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा। मैंने ध्यान दिया कि उनकी आँखें लाल थी। पता नहीं बुखार की गर्मी थी या वही गर्मी जो मुझे चढ़ी हुई थी। मुझे एकटक देखते हुए उन्होंने बोरोलीन का ट्यूब लिया और चुपचाप सीढ़ी से नीचे उतर गए। मन में तो हो रहा था कि अभी कुछ देर और बैठते, दूसरा मन कह रहा था जल्दी से चले जाएँ मनोज बाबू। कहीं किसी ने देख लिया तो जाने क्या हो जाए…

आग तो लग चुकी थी। गर्मी चढ़ चुकी थी। उस दिन से न तो मन पढ़ाई में लग रहा था न किसी काम में। किसी न किसी बहाने से खिड़की पर जाती नीचे देख लेती। कहीं… कोई नहीं दिखता था लेकिन मन में लगा रहता था। उस दिन जैसी गर्मी चढ़ी थी वह एक बार और चढ़ जाए। मन ऐसा बौराया हुआ था कि अपनी उँगलियाँ भी अगर अपने बदन से लगती थी तो मन चिहुंक जाता था।

मेरी एक सहेली है रूमा। वह मैट्रिक के परीक्षा के लिए स्कूल के होस्टल में पढने के लिए रहने चली गई थी। उसने बताया था कि मामा के लड़के रोहित से उसको प्यार हो गया था। जब वह होस्टल में रहती थी तो वह देखने के लिए। नाश्ता लेकर, मूढ़ी-चूड़ा लेकर आते रहते थे। घंटा घंटा भर रहते, दोनों खूब बतियाते और दोनों को प्यार हो गया। एक दिन होस्टल की मैडम से मार्केटिंग करवाने का परमिशन माँगा। मैडम को पता था कि भाई है। परमिशन दे दी। बाहर निकलकर बोले कि बजरंग सिनेमा के पीछे नीले रंग का गेट वाला घर है। वहीं चली जाना। मेरे दोस्त बंटी का घर है। घर में बस उसकी भाभी हैं आज। उनको बताये हुए हैं तुम आने वाली हो। दस मिनट बाद मैं भी आ जाऊँगा।

रूमा पहले तो डर गई। रोहित के प्यार के सामने सब डर पीछे छूट गया। उस दिन दो घंटे तक दोनों को भाभी ने ऊपर वाला कमरे में बंद कर दिया।

‘ऊपर ऊपर से इतना प्यार किये उस दिन मत पूछो सुमन, कितना अच्छा लगता है। कोई छूता रहे। अंग अंग सहलाता रहे, लगता है जैसे हवाई जहाज की सैर हो रही हो। मत पूछो। ऐसा मन करता है कभी ख़त्म न हो यह सब। चलता रहे। अपने अंग अंग से किसी के अंग अंग का हो जाना ही तो प्यार है।’

‘मतलब तुम सब कुछ कर ली?’ मैंने कुछ आश्चर्य से पूछा।

‘नहीं पागल। कसम से कहते हैं। बस ऊपर ऊपर से किये। कभी किस्सू, कभी… मत पूछ प्यार में कैसा कैसा होता है…

‘दो घंटे तक बस यही?’ मुझे समझ में नहीं आ रहा था।

‘अरे जब होगा तब समझ आएगा। सुख क्या होता है सुषमा। तब समझ आएगा।’

रह रह कर रूमा की बात याद आ रही थी और सोचती रहती थी वही गर्मी एक बार फिर से चढ़ जाए। वही सब दुबारा… लेकिन कब कहाँ?

संयोग से तीन दिन बाद एक दिन…

एकादशी का दिन था। माँ उस दिन शिव मंदिर गई थी। शहर के दूसरे कोने में। बोली थी महीने का सामान भी बाजार से लेती आएँगी। तुम खाना बनाकर खा लेना।

सुबह के ग्यारह भी नहीं बजे थे कि घर की घंटी बजी और मेरे मन की भी- कौन?

वही थे। मनोज बाबू। इस बार बोरोलीन लौटाने आये थे।

‘आज लंच के बाद बैंक जाना है। सोचा आपका बोरोलीन लौटा आऊँ। उस दिन के लिए बहुत धन्यवाद’, बोरोलीन बढाते हुए वे ऐसे बोल रहे थे जैसे जाने वाले हों।

‘बैठिये न।’ मेरे मुंह से जाने कैसे निकल गया।

‘माँ-पापा नहीं हैं क्या?’ इधर उधर देखते हुए वे बैठने के लिए कुर्सी की तरफ बढे।

‘नहीं।’ माँ मंदिर गई हुई हैं। आप बैठिये मैं चाय बनाकर लाती हूँ’, कहकर मैं किचेन में जाने ही वाली थी कि मनोज बाबू की आवाज आई।

‘नहीं, चाय नहीं पियूँगा। न हो तो आप भी बैठ जाइए न।’

‘अअअ… आपसे कुछ पूछना था। बात ये है कि मैं भी बैंकिंग की तैयारी करना चाहती हूँ परीक्षा के बाद। आप कुछ इस बारे में गाइड कर देते। पापा कहते हैं कि बैंक की नौकरी सबसे अच्छी होती है। इस बार के प्रतियोगिता दर्पण में उसके बारे में आगरा यूनिवर्सिटी के किसी प्रोफ़ेसर का लेख भी छपा है। आपको दिखाती हूँ’, कहकर मैं उठने ही वाली थी कि उन्होंने हाथ पकड़ लिया और बोले,

‘बैठिये न। मैं जब तक हूँ अच्छे से गाइड कर दूंगा। किताब, नोट्स अभी भी सब मेरे गाँव वाले घर में है। छुट्टी में जाऊँगा तो लेता आऊंगा।’

एक मन हाथ छुआने के लिए दूसरा मन कह रहा था जो हो रहा है होता रहे । मैं बैठ गई। शायद मैं भी यही चाहती थी। क्या मैं यही चाहती थी?

लग रहा था जैसे बदन में खून की धारा तेज हो गई हो। अंग अंग जैसे टभक रहा था। क्या यही वह छुअन थी जो उस दिन उससे खो गई थी। उसका हाथ मेरी उँगलियों से ऊपर की तरफ बढ़ रहा था। धीरे धीरे…

धीरे धीरे अच्छा लगता जा रहा था। लग रहा था बस ऐसे ही चलता रहे, आसपास कहीं कोई न हो। बस मैं और मनोज बाबू हों। अगले ही पल लगता था कहीं कोई आ न जाये। कोई मुझे मनोज बाबू के साथ इस हाल में देख न ले। अगले ही पल लगता था कोई कुछ न देखे। मनोज बाबू का हाथ ऊपर बढ़ता जा रहा था और उनकी साँसें करीब आती जा रही थी। उनकी तेज तेज चलती साँसों की गर्मी मेरे शरीर से जब छूती थी तो लगता था जैसे गर्म तवे से गर्म पानी की बूँदें उड़ रही हों। दोनों हाथों से उसने मुझे अपनी बांहों में ऐसे पकड़ जकड लिया जैसे धामिन सांप किसी को जकड़ लेती हो। लग रहा था पूरा बदन टूट जाए। मन कर रहा था कोई पूरे बदन को ऐसे ही जकड़ कर तोड़ दे।

‘जानती हो जिस दिन तुमने मुझे पहली बार प्रणाम कहा था उसी दिन से मुझे तुमसे प्यार हो गया था। इन सुन्दर आँखें हैं तुम्हारी। साफ़ पानी में तैरती दो मछलियाँ हों जैसे’, मनोज बाबू ने मेरी आँखों को चूमते हुए कहा।

‘मुझे भी आप बहुत अच्छे लगते हैं। कितने सलज्ज हैं आप। मुझे भी आपसे इसीलिए प्या…’ अपनी बात पूरी करती इससे पहले ही उन्होंने पागलों की तरह मुझे किस करना शुरू कर दिया। गाल पर, गर्दन पर और जब होंठों पर उनके होंठ आये तो लगा जैसे जैसे शरीर का खून उबलने लगा हो और उबलकर बाहर निकलना चाह रहा हो। उनके हाथ मेरे कुर्ती के अन्दर था। कुर्ती उठाकर बैठते हुए उन्होंने मेरी नाभि को चूम लिया। ऐसी सिहरन हुई कि उनकी पीठ पर मैंने अपना सर टिका दिया। उन्होंने मुझे धीरे से उठाया और उनके हाथ मेरी सीने पर कुछ टटोल रही थी।

‘शमीज के नीचे तुम ब्रा पहनती हो?’ मनोज बाबू की आवाज में चुहल था।

‘हाँ बिना शमीज के ब्रा पहनेंगे तो शर्म नहीं आएगी क्या?’ मैंने उनके सीने पर सर टिकाते हुए कहा।

उन्होंने मुझे जोर से भींच लिया। मनोज बाबू का अंग अंग तन गया था। मुझे महसूस हो रहा था। मुझे कुछ ध्यान नहीं रहा। जब ध्यान आया तो देखा कि मैं फर्श पर लेटी हुई थी ऊपर मनोज बाबू चढ़े हुए थे। मुझे जोर से भींचे हुए किस किये जा रहे थे। दीन दुनिया कुछ ध्यान नहीं आ रहा था। मन हो रहा था बस यह चलता रहे। तभी जोर की आवाज हुई और हम दोनों अचानक से उठते हुए संभल गए।

फोन की घंटी बज रही थी। मैं भागी फोन उठाने के लिए।

माँ का फोन था। उन्होंने दुकान से यह बताने के लिए फोन किया था कि रिक्शे का इन्तजार कर रही थी। वह घर आने वाली थी।

‘माँ आ रही हैं’, फोन रखते हुए मैंने बदहवास सी हालत में कहा।

मनोज बाबू ने दरवाजा खोला और दनदनाते हुए सीढियां उतर गए।

ऐसा लगा जैसे मैं सपने में थी और माँ ने आकर जगा दिया हो।

अच्छा हुआ जो जो जगा दिया। नहीं तो जाने क्या हो जाता। अगले ही पल सोचा- क्यों जगा दिया माँ ने। कितना कुछ होते होते रह गया!

जो होना था वह तो हो चुका था-

प्यार!

मैंने प्रेम वाजपेयी के उपन्यास ‘तन्हाई और परछाइयां’ में पढ़ा था, ‘प्यार में मिलने से ज्यादा मजा बिछड़ने में आता है।‘

 पाँच मिनट के प्यार के बाद फिर एक लंबी जुदाई… मेरे पहले प्यार के नसीब में शायद यही था।

पुनश्च:  यही वह कहानी है जिसे लौटाते हुए पूर्णेंदु सर ने कहा था- लेडी मस्तराम बनना है क्या?

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3 comments

  1. भक्क। मस्तराम जैसा कुछ है ही नही इसमें। घिसीपिटी कहानी।

  2. घिसा पिटा plat

  3. सचमुच इस कहानी में नाम छिपाने लायक क्या है समझ में नहीं आता. इससे कहीं ज्यादा सपष्ट शब्दों में सेक्स के बारे में लिखा जा चुका है. कहीं किसी और कारण से तो नाम नहीं छिपाया जा रहा, जैसे, इस एहसास के कारण कि शायद कहानी सामान्य है! या इस कारण कि अपनी औसत सी कहानी पढने के लिए पाठक जुटा सके? यह भी संभव है कि लेखिका बहुत शर्मीली हो. कम उम्र हो. अभी हाल में मैंने एनएसडी के लॉन में सेक्सुअलिटी पर दो स्ट्रीट प्ले देखे. मैं उन कम उम्र लड़कियों और लड़कों की खुल कर इस विषय पर संवाद बोलने और बाद में चर्चा करने की सहस से हैरान रह गयी. ‘साहस’ है, ऐसा तो मुझे लग रहा था, उनके लिए यह सामान्य बात थी. बहुत अच्छा लगा.

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