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मृणाल पांडे की कहानी ‘चूहों से प्यार करने वाली बिल्ली’

वरिष्ठ लेखिका मृणाल पांडे की एक लघु रूपक कथा पढ़िए- मॉडरेटर

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गली की एक दीवार पर भूरे बालों और कंजी आखों वाली मन्नो बिल्ली आज फिर बैठी  बैठी पंजे में थूक लगा लगा कर चेहरा साफ किये जा रही थी. मन्नो का जिगरी दोस्त झग्गड बिल्ला कुछ देर उसे देखता रहा फिर उसने मन्नो से पूछा, आज सुबह तू खंडहरों में नहीं दिखी.| कुछ खाने पीने का इरादा नहीं क्या तेरा? चल एकाधेक चूहा पकड कर मज़ेदार नाश्ता कर लेते हैं , क्या पता कुछेक अंडे भी हाथ लग जायें किसी झाडी में.  चल ना. राख जैसी रंगत और नुँचे हुए कानों वाला झग्गड मुहल्ले भर में बिल्लियों का पहलवान दादा करके मशहूर था. मजाल क्या कि उसके होते गली में पराई गली का कोई और बिल्ला या बिल्ली आ घुसे ? तुरत बदन को धनुष बनाये गुर्राता झग्गड उस पर टूट पडता और फिर जो महाभारत होता कुछ पूछो मत. आखिरकार नुँचा नुँचाया परदेसी बिल्ला या बिल्ली तीर की तरह झग्गड के इलाके से तीर की तरह भागता दिखाई देता और विजय गर्व से सीना फुलाये झग्गड दीवार पर बैठ कर अपने घाव चाटता हल्की गुर्राहट से मुहल्ले को देर तलक जताता रहता कि देखो यह मेरा इलाका है. खबरदार जो हमसे टकराये तो , हाँ.

मन्नो ने भक्तिन वाला मुँह बनाया , हमें नहीं खाने चूहे वूहे , हम वेजीटेरियन हो गई हैं हाँ ! टी वी वाले योगी बाबा का कहना है कि मीट माट खाना अधर्म है | पच्छिमी खाना शरीर को खराब करता है. उनकी सलाह मान कर अब हम तो सिर्फ दूध और दूध से बने पदार्थ ही खायेंगी.

  • हा हा हा , झग्गड हँसा, अरे बावली , तेरा भेजा फिरेला है क्या ? बिल्ली चूहे नहीं खायेगी, तो क्या योगी बाबा की तरह फल का रस पियेगी ? और दूध ? यहाँ बस्ती के बच्चों को तो फल या दूध मिलता नहीं, गली की बिल्ली को कौन जूस या दूध पिलायेगा | साँप भी होती तो चल सकता था. पर बिल्ली तो लोग पालते ही इस लिये हैं कि चूहों की भरमार न हो पाये. तू चूहा मारने से इनकार करेगी तो तुझे कौन पूछेगा ?
  • न पूछे. हम इंसानों की चलाई पौलिटिक्स का विरोध करते हैं जो जीव को हिंसा सिखाती है. बाबा का कहना है कि खुराक बदलने के बाद भी हमको दूध और फलों से विटामिन मिलेंगे भरपूर और हिंसा से हम हो जायेंगे दूर. जय भारतमाता!
  • ले! बिल्ली के लिये चूहा खाना कोई हिंसा है? यह तो हमारा कुदरती स्वभाव है. कुदरत ने हर जीव के लिये खाने की जो आदतें तय की हैं उनका निर्वाह करने से सबका भला होता है. अब देख तू यदि चूहे खाना छोड देगी तो चूहों की तादाद दिन दूनी रात चौगुनी यहाँ तक बढ सकती है कि एक दिन वे किसानों के बखारों का अनाज तक चट कर देंगे. अब देख न, जहाँ शेरों को मार डाला गया वहाँ हिरनों, नीलगायों की तादाद इतनी बढ गई है कि बेचारी बकरियों भेडों को चारा नहीं मिलता. जब रात को जंगल से आकर हिरन खरगोश और नीलगायें खेतों में खडी तमाम फसलें चर जाते हैं तो लोग बाग कहते हैं काश शेर बचाये होते तो इतने चारा खाने वाले जीव हमारा जीना कठिन न करते. दूसरी तरफ यह सोच कि, बाबा लोग की भी तो पौलिटिक्स होती है. कल को अगर उनके खिलाफ किसी दूसरे चैनल पर कुछ दूसरे बाबा लोग कहने लगे, कि चरागाह कम हो रहे हैं. दूध देने वाले जानवरों को बचाने को बहुत सारा चारा खाने वाले हाथी घोडे सरीखे पशुओं को अब मीट माट खाना चाहिये ताकि भैंसों – गायों बकरियों ऊँटों को चारा मिलता रहे , तब तो हमारी भी जान खतरे में आ सकती है. बाबाओं का क्या ? वो तो मंच से कूद कर अपने आश्रम में छुप जायेंगे , मारा जाई बिल्ला ! इंसान अपनी सोचे तो हमको भी अपनी सोचना चाहिये. अमरीका योरोप में जहाँ गाय का ही मीट चलता है , सुनते हैं आजकल कई जगह मुर्गियों गायों के चारे में घोडे कुत्ते का मीट मिलाया जा रहा है ताकि जानवर जल्द खूब मोटे हों और इंसान को उनसे ज़्यादा माँस मिल सके.

मन्नो कुछ चिंता में पड गई. बात तो झग्गड गलत नहीं कह रहा था. सुबह से भूखी बैठी है , दूध तो क्या सडा फल तक नसीब नहीं हुआ है. आखिरकार एक छलाँग लगा कर दीवार से उतरी और पूँछ उठा कर झग्गड से बोली , टी वी वाला बाबा गया भाड में , चल अपुन शिकार करते हैं.

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