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‘जापानी सराय’ और अनुभव का नया संसार

अनुकृति उपाध्याय के कहानी संग्रह ‘जापानी सराय’ की समीक्षा लिखी है डॉ. संजीव जैन ने. यह कहानी संग्रह ‘राजपाल एंड संज’ से प्रकाशित है- मॉडरेटर

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‘सोचना, पुकारने से कदम भर ही दूर है’
(जापानी सराय और अनुकृति जी की अन्य कहानियां)

यह किसी कहानी का शीर्षक नहीं है, यह एक वाक्य है जो अद्भुत तरीके से जापानी सराय संकलन की ‘रेस्टरूम’ कहानी में प्रयुक्त हुआ है। इस एक वाक्य ने मुझे अनुकृति जी की जीवन से गुंधी गंधाती कहानियों पर लिखने को मजबूर किया है। सृजनात्मक भाषा जीवन के गहरे तल्ख और बेतरतीब अनुभवों से ही जन्म लेती है। जापानी सराय की सभी कहानियों में जीवन का यह अद्भुत सौंदर्य महसूस किया जा सकता है हरसिंगार के फूलों की खुशबू की तरह जो देह की गंध के साथ एक नई हरवायंदी गंध बन कर तन मन में फ़ैल जाती है।
हम सबने इंद्रधनुष देखा है, पर कंचनजंगा फाल में तेजी से गिरते दूधिया पानी के बीच तीन आयामी इंद्रधनुष की लुकाछिपी का सौंदर्य स्वर्गीय अनुभूति देता है। यह तीन आयामी प्रभाव उस परिवेश की देन है जहां तीन और से अलग अलग झरने गिरते हैं ऊपर से सूय की रोशनी पानी के बारीक कणों का हवा में उड़ते रहने से पैदा होता है। ऐसा ही कुछ अनुकृति जी ने अपनी कहानियों में किया है। भाषा, अनुभूति, और परिवेश के ऊपर चिंतन की रोशनी से इनकी कहानियों में तीन आयामी इंद्रधनुषी प्रभाव पैदा हो सका है।
अनुकृति उपाध्याय का यह पहला कहानी संग्रह है और मैं इसमें सृजनात्मक भाषा की अनपरखी अनप्रयुक्त संभावनाओं को महसूस कर रहा हूं। बतौर लेखक के दायित्वों में एक दायित्व यह भी होता है कि वह भाषा के नये क्षितिजों की खोज में व्याकुल दिखाई दे। जीवन जिस तरह बदल रहा है और जीवन के नये आयामों की खोज निरंतर हो रही है तो इस जीवन को फिर रचने वाली भाषा जड़ और खोखली हो तो जीवन भी भरे-पूरे गतिशील अनुभवों और प्रवहमान यथार्थ के रूप में आने की जगह जड़ और खोखले रूप में ही प्रस्तुत होता है। जापानी सराय में एक रात बिल्कुल शांत और पूर्वग्रह मुक्त तरीके से गुजारने पर जीवन ताजी गिरी बर्फ की खुशबू की तरह महसूस हो सकता है।
इनमें से कुछ कहानियां वाकई ‘ सोचने, और कदमभर दूर से पुकारने’ की अनुभूति पैदा पर रहीं हैं। ‘जापानी सराय’ संकलन की पहली कहानी है। इससे गुजरते हुए डूब जाने को मन करता है। टोक्यो जैसे व्यस्त और अत्याधुनिक शहर में ‘जपानी सराय’ आधुनिकता का विलोम रचती महसूस होती है। विलोम का मतलब मध्यकालीन नहीं, विलोम का अर्थ भविष्य की वह उम्मीद जो हम आधुनिकता की चकाचौंध में गंवाते जा रहे हैं, जीवन की खुशबू जो कृत्रिम रंगों और साधनों में चमगादड़ों की तरह विलुप्त होती जा रही, वह इसमें महसूस की जा सकती है।
इस कहानी में किसी चरित्र की कोई पहचान नहीं। नायिका या नैरेटर है और एक मरीन जूलोजिस्ट है। कथा के दो अनजाने चरित्र हैं जो अनजानी अपरिचित जगह एक रेस्तरां में अचानक मिलते हैं। मिलना बात चीत होना कथा नायिका कुछ भी नहीं बताती है अपने बारे में सिवाय इसके कि वह ‘टी टोटलर’ है और बीयर या शराब नहीं पीती है और पेशे से वकील हैं। इतना परिचय भी बातचीत के दौरान आ जाता है। मजे की बात है कि मरीन जूलोजिस्ट ही अपनी कथा कहता है। इस पूरी संवाद संरचना का कोई लाजिक नहीं है, मगर जीवन की सार्थकता है। मरीन जूलोजिस्ट कहता है “जानती हो सब कुछ कह डालने के लिए अजनबियों से अच्छा कोई नहीं होता।” या फिर जब वह यह कहता है कि “तुम बार में कभी अकेली हो ही नहीं सकतीं।” यह दो बिल्कुल अजनबियों के बीच का संवाद है। क्या इतना सार्थक और जीवंत संवाद हम अपने साथ जीवन बिताने वाले लोगों से कर पाते हैं? शायद नहीं। यहीं वह बात है जो कहानी को एक बिल्कुल अपरिचित आयाम देती है।
दोनों अपनी पीड़ाओं में बंधे हैं, उनके बीच संवाद एक समानुभूति की सहजता का संवाद है। कथा नायिका की आंखों से आंसुओं का बहना सिर्फ एक संकेतभर है उसके एकाकी जीवन की अनगिनत पीड़ाओं का। वह कहता है “ दर असल पीड़ा चिरंतन है, हम सब अपनी पीड़ा में एक से हैं, नंगे और नि: शस्त्र। तो उसे सहने में कैसी शर्म?” अभूतपूर्व जीवन दर्शन है। यहां पीड़ा का आदर्शीकरण नहीं है न पीड़ा के कारणों या परिस्थितियों का दुखड़ा रोया गया है। यह पीड़ा को सहज में स्वीकारने और जीने की कला है। यहां स्त्री पुरुष की पीड़ा का भी भेद नहीं है। आंसू दोनों ओर हैं क्योंकि सबके पास अपनी पीड़ा है और उसे सहने में कोई शर्म नहीं है। जिस दिन हम पीड़ा को बेशर्म होकर जीना सीख जायेंगे उस दिन पीड़ा उत्सव की तरह महसूस होगी।
यह जीवन के प्रति अलग तरह की एप्रोच है। यह एप्रोच जीवन में एकाकीपन की तल्खी को जीने की ताकत देती है। एक तरह की प्रतिरोधक क्षमता विकसित करती है। यह जीवन का इस तरह का स्वीकार ‘एक सराय’ की तरह का सहजताबोध आज की अनिवार्यता है। कहानी एक जीवन को सराय की तरह जीने के नया आयाम खोलती है। अजनबियों के बीच हम कितने कम्फर्ट हो सकते हैं, और अपनों के बीच बहुत औपचारिक और असहज। एक नये तरह का विलोम संबंध है, जो अनुकृति जी ने रचा है।
जापान में ‘चेरी ब्लासम’ का आगमन एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। भारत में शिलांग में भी नवम्बर माह में ठंड के पहले चेरी ब्लासम के फूल खिलते हैं। सब कुछ गुलाबी नजर आता है। मौसम का यह रंग बहुत खूबसूरत होता है जिसका आनंद लेने दूर दूर से लोग आते हैं। इस कहानी को भी लेखिका ने अनाम तरीके से ही लिखा है। कथा नायिका हो सकता है स्वयं लेखिका हो टोक्यो में उतरती है होटल में पैंतीसबीं मंजिल पर कमरा है। बीच बीच में उसे टोकने वाला कोई है, कौन है यह कोई संकेत नहीं दिया। पर पता चलता है कि वह पुरुष है और देसीपन को हेयता से देखता है। वह रास्ते में कथानायिका को टोकता है।
जीवन अनजाने बंधे नियमों को स्वीकार करने के खिलाफ हैं, वे नियम कितने भी आधुनिक हों या कितने भी पुरातन। “अनजान बंधे नियमों पर चलने वाला कुछ भी समझने में उसे हमेशा अड़चन रही है।” इस एक वाक्य को लिखने के लिए पूरी कहानी लिखी गई है।
अनुक‌ति जी जिस परिवेश में काम करती हैं, वह कारपोरेट दुनिया है, चकाचौंध से भरी, अजनबीपन के विचित्र संस्करण मिलेंगे यहां, सब इतने आत्मीय और शालीन दिखेंगे जैसे कोई स्वर्ग हो, पर यह चकाचौंध अंदर से जीवन से रिक्त होती है, यह रिक्तता का नया जंगल है, एक साथ पास पास रहने वाले रेत के कणों का संसार है। इसके बीच से स्निग्धता की नमी सरस्वती नदी की तरह गायब हो चुकी है। बहुत बारीक संकेतों से या भाषाई कौशल से इस रिक्तता को बयां किया है। कहानियों में घटनाओं, चरित्रों के स्थूल विवरण और वर्णनों से बचा गया है, यह सायास नहीं है, दर असल बाहर के जीवन में इतनी स्थूलता और औपचारिकता है कि उसका विलोम तो कहानी में आना स्वाभाविक था। चरित्रों के नाम और थे उनका बाहरी विवरण बिल्कुल गायब है, बहुत दिखावटी जीवन के रंगों की जगह भी कहानियों में नहीं है।
ऐसी ही एक कहानी है ‘रेस्टरूम’। इस कहानी में ही वह वाक्य लिखा है जो मेरे लेख का शीर्षक है। ‘सोचना, पुकारने से कदम भर दूर है, लड़की।’ इसमें ‘लड़की’ शब्द की जो झंकार है उसकी अनुगूंज कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ‘ए लड़की’ तक जाती है। यह संबोधन इस अद्भुत वाक्य के साथ है जिसे मैं हिंदी गद्य के श्रेष्ठतम वाक्यों में से एक कहूंगा।
शब्द के दो आयाम होते हैं चिंतन और कर्म । यह बात कितने सार्थक तरीके से अनुकृति जी ने इस वाक्य में कह दी। शब्दों के बिना सोचा नहीं जा सकता और सोचे बिना पुकारा नहीं जा सकता और सोच लिया तो लगभग पुकार लिया कितना निजी सा वाक्य है। ऐसा लगा जैसे प्रेमिका के बारे में सोचा और वह एक कदम दूर दिखाई दे जाये, ऐसा ही महसूस हुआ इस वाक्य को पढ़ते हुए। इसमें ‘कदम भर दूर’ पद कितने सलीके से प्रयोग किया है। मैं बहुत देर रुका रहा इस वाक्य पर। भाषा में इस तरह के वाक्य इससे पहले मैंने शिक्षाविद ‘पाओलो फ्रेरे’ और जेपत्सिता आंदोलन के संगठनकर्ता ‘सब कमांडेंट मार्कोस’ के बाद पहली बार किसी के गद्य में पढ़ें हैं।
इस तरह बिल्कुल अद्भुत और नये तरह के वाक्य पढ़कर बहुत ही अच्छा महसूस हुआ। यह जीवन में बहुत गहरे तक धंसे बिना संभव नहीं। इस वाक्य की ताकत और ध्वनि भाषा के इतिहास में बहुत दूर और गहरे तक गूंजेगी। यह भाषा का एकदम नया मुहावरा है। इस संकलन में ऐसे और भी वाक्य हैं, जिन्हें मोतियों की तरह सजाकर रखने को मन कर रहा है। जैसे ‘मुझे तो किसी और तरह देखना आता ही नहीं।’ ‘उत्सुक और नर्वस’, ‘ किसी अनजान भाषा में भी चिरौरी और विनय पहचाने जा सकते हैं।’ ‘रुखे सूखे अनुच्छेदों में काइंया लालच’ ‘हम अपने को समझने में उतना समय भी खर्च नहीं करते जितना एक शर्ट चुनने में।’ ‘ऐसी मुस्कान जो यत्न से चिपकानी नहीं पड़ती।’ ……इन वाक्यों में अद्भुत आकर्षण है ठीक वैसा ही जैसा प्रेमिका के साथ पहली बार समय गुजारने में या मानसरोवर पर अचानक पहुंच जाने पर होता है।
रेस्टरूम जिंदगी का वह आयाम है जो निजी समय और निजी स्थान का प्रतीक है। जीवन में निजी और स्वतंत्र समय और स्थान निहायत जरूरी है। पर जीवन का यह निजी स्थान भी पीड़ा और आंसुओं का सबब बन जाये तो बहुत मुश्किल हो सकता है। जीवन विखर सकता है, सम्पूर्ण तानावान टुकड़े टुकड़े हो जाता है। इस बिखराव को लेखिका इस तरह व्यक्त करती हैं-”सब कुछ निकालकर यदि मेज पर रखा सकता तो? रखकर सहूलियत से देखा जा सकता, उलट-पुलट कर, अंधेरे में टटोलने के बजाए?” हम चीजों और लोगों को अंधेरे में टटोलकर देखते महसूसते रहते हैं, एक बंदपन हमारी जिंदगी में घर किये रहता है। हम कभी भी चीजों को लोगों को मेज पर रखी वस्तुओं की तरह उलट – पलट कर देखने या कहने जितना साहस या खुलापन नहीं ला पाते। यही कारण है कि रेस्टरूम रुदन रूम बन जाता है, आंसुओं का घर बन जाता है, पीड़ा का सागर लहराता दिखाई देता है।
जीवन समय और स्थान की तर्कसंगत संगति का नाम है पर जब इनकी अन्विति विच्छिन्न हो जाती है तो जीवन एकाकी पशु की तरह बन जाता है। इस कहानी की कथा नायिका जिसके आसपास रेस्टरूम को बुना गया है, वह इस तरह महसूस करती है- “सब कुछ थोड़ा सा बिगड़ा हुआ है, अपनी धुरी से थोड़ा सा हिला, अपनी लीक से कुछ टेढ़ा, जैसे किसी ने तस्वीर तिरछी लटका दी हो।” जीवन किसी के बिना अपनी धुरी से हिला हुआ महसूस होता है। आधुनिक जीवन की अनेक विडंबनाओं में से एक यह भी है कि हर व्यक्ति चाहे स्त्री हो या पुरुष भीड़ में अकेला है। यह भीड़ रिश्तों की, दोस्तों की, बाजार की या वस्तुओं में से किसी को भी हो सकती है। सब अपनी वैयक्तिकता में कैद हैं। जापानी सराय में एक अजनबी से परिचय रेस्तरां में होता है। वहां भी आंसू हैं दोनों के जीवन में। रेस्टरूम में बुर्का वाली लड़की उसे मिलती है उसके जीवन में भी आंसू हैं। दूसरी कहानियों में भी आंसू और पीड़ा किसी न किसी रूप में अंतर्निहित है। यह आकस्मिक नहीं है। अनुकृति जी जिस दुनिया को अपने आसपास जी रहीं हैं उसमें सबके निजीपन में वे आंसुओं की स्थिति महसूस करतीं हैं, यह जीवन में गहरे तक उतरे बिना संभव नहीं है।
संकलन की आरंभिक चारों कहानियां एक ही कहानी के विस्तार के रूप में पढ़ी जा सकती हैं। उनमें व्यक्ति या चरित्र की कोई स्पष्ट पहचान नहीं है। वह कोई भी हो सकता है, स्वयं अनुकृति जी भी हो सकतीं हैं या कोई भी। उस भागते दौड़ते चकाचौंध से भरे जीवन में अकेले होने की तीखी अनुभूति की टीस हमें सुनाई देती है।
वे निर्मल वर्मा की तरह परिवेश को मानसिक स्थिति की सघनता बताने के लिए चित्रित नहीं करतीं। अनुकृति जी की कहानियों में परिवेश अपने भौतिक रूप में जैसा वह वैसा ही आता है, उस पर मानवीय भावों का कोई किसी तरह का आरोपी या संबंध बैठाने की कोशिश नहीं की गई है। ‘चेरी ब्लॉसम’ गुलाबी फूलों का मौसम है, पर इस मौसम का कोई गहरा प्रभाव न सकारात्मक न नकारात्मक पैदा करने की कोशिश नहीं की गई है। मौसम है और कथानायिका है टोक्यो के कुछ लोग हैं जो अपनी अपनी तरह से इस मौसम के फूलों का लुत्फ उठा रहे हैं। बस एक सहज स्थिति का प्रस्तुतीकरण भर है। यह एक विशेष मानसिक स्थिति है, जिसे किसी परंपरागत मानवीय भावनाओं में कैद नहीं किया जा सकता।
इन कहानियों में भाषा के तथाकथित या परंपरागत अलंकरण, बिम्ब, प्रतीक, व्यंजना, या अवसाद को नहीं देखा जा सकता। भाषा स्मृति-विस्मृति, पकड़ना-छूटना, लयबद्धता-लयभंग की मानसिक दशाओं को पूरी जीवंतता और यथार्थ वास्तविकता के साथ प्रस्तुत करती है। अनेक जगह स्वगत संवादों के दौरान लयभंग की स्थिति को महसूस किया जा सकता है। ऐसा लगता है कि राग भैरवी के बीच अचानक राग मालाकोस आ गया हो, और फिर धीरे से राग भैरवी पर आ गया हो संगीत।
यह लयभंग दर असल लयबद्धता का विलोम बनकर नहीं आता है यह पूरक है। यह जीवन का द्वंद्वात्मक संबंध है। इन कहानियों के बीच से गुजरते हुए स्थितियों और व्यक्तियों के बीच के इस द्वंद्वात्मक संबंध को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। जीवन की गतिशीलता को कहानियों की भाषा और स्थितियों की गतिशीलता के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है।
जिंदगी बेवजह बीतती जा रही है, अनुकृति जी अपनी कहानियों में जीने की वजह ढूंढती नजर आती हैं। तमाम उलझनों, विसंगतियों, अनावश्यकताओं के बीच आ छोटी छोटी वजहें जो बिना प्लान के मिल जाती हैं, वे ही जीवन की व्यस्तताओं में फुर्सत के पल की तरह सार्थकता प्रदान करती हैं। अनुकृति जी अपनी कहानियों में इन वजहों को उपलब्ध करती हैं और जीवन को महसूस करने का बहाना बनाती हैं। इसी तरह कि एक कहानी है हरसिंगार। पूरी कहानी अंत से पहले तक एक ट्रेडिशनल कहानी है। पिता की मृत्यु पर मोना का घर जाना और पिता के प्रति बेटी का प्यार सब कुछ परंपरागत है। मैं अंत के पहले तक सोचता रहा कि यह कहानी क्यों लिखी? हरसिंगार का कोई संदर्भ समझ नहीं आया। अंत से ठीक पहले अनुकृति जी चौंकाती हैं, वही इस कहानी में हुआ। परंपरागत आलोचक और पाठक इस कहानी के अंत को कतई स्वीकार नहीं करेंगे। भारतीय मूल्य व्यवस्था के संदर्भ में खतरनाक अंत किया है इस कहानी का, अनुकृति जी ने। उनपर तमाम तरह के मूल्यविध्वंस के आरोप और आक्रमण किये जायेंगे इस कहानी के अंत को लेकर। मैं भी बहुत समय तक सोचता रहा कि क्या यह अंत जरुरी था, यदि था तो क्यों? बहुत चौंकाने वाला अंत है। आपने जोखिम उठाई है तो उसे सही संदर्भ में समझना जरूरी है।
मोना के पिता की मृत्यु हो चुकी है तमाम कार्यक्रम हो चुके हैं, घर के पुरुष गंगा स्नान के लिए गये हैं, महिलाएं गहरी नींद में सो रही हैं, मोना उस हरसिंगार के नीचे खड़ी है जहां उसके पिता अक्सर बैठा करते थे। वातावरण का सजीव और मादक चित्रण है। इसी समय मोना को अपने प्रेमी विश्वा की याद आती है और वह जयपुर में है तो फोन करके उसे बुलाती है। देह पर हरसिंगार के फूलों की गहरी मादक सुगंध है, एक कोठरी में दोनों मिलते हैं और देह की खुशबू और हरसिंगार की महक एकमेक हो जाती है। दोनों एक दूसरे में समा जाते हैं। कहानी समाप्त हो जाती है।
पिता की चिता की आग ठंडी नहीं हुई और बेटी …..? भारतीय समाज और मूल्य व्यवस्था इस बात को कभी नहीं पचा पायेगी। पर जीवन को दूसरी तरह से देखा जायेगा तो यह अस्वाभाविक नहीं है‌। तन मन अशांत और बेचैन है, सब लोग जीवन की भौतिक जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त हैं। यदि मोना अपने तनाव और जीवन को सहज करना चाहती है तो इसमें गलत क्या है? इस कठिन वक्त में हम सब अपने सबसे प्रिय जनों के पास होना चाहते हैं। यदि मोना को अपने सबसे प्रिय साथी से मिलने की जरूरत महसूस हुई तो कुछ भी अस्वभाविक नहीं है। यह जीवन को जीने का एक सर्वाधिक तरीका है‌।
यह संदर्भ अनुकृति जी ही प्रस्तुत कर सकतीं थीं, यह जीवन का अलग दृष्टिकोण है, यह किसी का अपमान नहीं है जीवन का एक रंग है‌। इसे पचाने में समाज को सौ साल लगेंगे। पर अनुकृति जी का नजरिया साफ है। जीवन एक प्रवाह है जो रुकता नहीं, कुछ समय के लिए ठहर सकता है, पर आगे बढ़ना ही जीवन है।
पिछली पूरी सदी साहित्य को अंतर्द्वंद्व, आत्मसंघर्ष, आत्माभिव्यक्ति, अस्मिता, अस्तित्व जैसी अवधारणाओं के खांचों में बांटकर देखती परखती रही। यह खांचाबद्ध जीवन की अभिव्यक्ति थी‌। पर क्या वाकई जीवन खांचाबद्ध था ? कभी हमने यह प्रश्न नहीं पूछा। अनुकृति जी की कहानियां हमें यह सवाल करने को विवश करती हैं। इन कहानियों में जीवन तमाम तरह के खांचों के खिलाफ हैं। जया, मीरा, मोना जानकी किन खांचों में फिट होते हैं? कोई सांचा बना ही नहीं इनके लिए। मोना में, मीरा में, जया में, अस्तित्वादी अंतर्द्वंद्व नहीं है। निर्णय लेने और जीने का साहस है। यही साहस स्त्रियों को पूरी दुनिया में जाने की, काम करने की, जीने की उम्मीद बनता है।
परंपरा, समाज, मूल्य, नैतिकता, यौनिकता यहां विश्लेष्य नहीं हैं, अनुकृति जी की कहानियों में इनका कोई रूप दिखाई नहीं देता। न इनका होना न विरोध। यह जो नया दृष्टिकोण है जीवन के प्रति यह आधुनिकता की सीमाओं से परे है। स्त्री को संपूर्ण मानवीय और भौतिक परिवेश के घात-प्रतिघात के बीच जूझते-सुलझते, डूबते-उतराते देखना और चित्रित करना स्त्री के आदर्शीकरण और पाश्विकीकरण की अतिवादी विचारधारा के खिलाफ ले जाता है। न तो किसी को ग्लेमराइज करने की कोशिश की है न यथार्थ और उत्तर आधुनिकता के अतिवादी रूपों को थोपने की कोशिश की गई है। यह दृष्टिकोण जीवन की नई खोज का रास्ता है।
प्रेम संबंध और सेक्स के बीच कहानियों में अक्सर स्त्री को अतिवादी स्थितियों में दिखाकर या तो असाधारण मानवीय रूप में दिखाया जाता है या अमानवीय करण की पतित स्थितियों में। अनुकृति जी की स्त्री किसी भी रूप में बस एक स्त्री है न कम न ज्यादा। न आदर्शीकरण न अमानवीय करण। इस रूप में जबतक हम स्त्री को स्वीकार नहीं करेंगे तब तक असंतुलन और अमानवीय स्थितियों के शिकार होते रहेंगे।
प्रजेंटेशन कहानी भारतीय जमीन पर लिखी अप्रवासी कहानी है। इसको पढ़कर ऊषा प्रियंवदा याद आ गईं। इस कहानी की मीरा ‘शेष यात्रा’ की अनुका का पूर्वांश है। मीरा का अंतिम वाक्य की “मैं दो दिन बाद वापस जा रही हूं।” के बाद जो मीरा की मानसिक स्थिति होती (जिसे अनुकृति जी ने नहीं रचा) वह बहुत कुछ अनुका की मानसिक स्थिति के रूप में शेष यात्रा में ऊषा जी ने लिखी है। काल को एकदम उलट पुलट दिया आप दोनों ने। ऊषा जी साठ साल पहले प्रजेंटेशन की मीरा के अंत का विस्तार अपनी अनुका के जीवन से आरंभ करती हैं, उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि साठ साल बाद अनुकृति उनकी अनुका का पूर्वांश लिखेंगी।
एक बार शेष यात्रा को आप फिर से पढ़ेंगें तो शायद मेरी बात आपको बहुत कुछ सच लगे। रुकोगी नहीं राधिका की राधिका भी मीरा के चरित्र का विकास है। समय और परिवेश के अंतर को नजर अंदाज कर दिया जायेगा तो बहुत कुछ ऐसा है मीरा को ऊषा जी के तीनों उपन्यासों के साथ अलग तरह से खड़ा करता है। यह बात अनुकृति जी को किसी परंपरा के विकास की कड़ी के बताने के रूप में नहीं कह रहा हूं। आपके शिल्प और कहानी कहने के ढंग, कथ्य का अनुठापन सब अलग है। यह कहना आपका अलगपन नजर अंदाज करना नहीं है।
प्रजेंटेशन की मीरा और मनु और आगरा का परंपरागत भारतीय परिवार, और मीरा का अमेरिका जाने का अवसर सब एक द्वंद्वात्मक परिवेश रचते हैं। इस कहानी के कथाचयन और घटनाओं में, मनु के दृष्टिकोण में कुछ भी नया नहीं। बहुत बार यह कहानी अनेक रूपों में लिखी जा चुकी है। परंतु प्रजेंटेशन का रचना-शिल्प, मीरा का स्थितियों के सहज स्वीकार के साथ नये रास्तों पर चलने का निर्णय, अपने परिवेश और पारिवारिक दम घोंटू स्थितियों के प्रति अविद्रोह का भाव, रुढियों और अवरूद्धताओं को तोड़ने के लिए अपनी ऊर्जा का अपव्यय करने की बजाय अपने प्रजेंटेशन में उसका उपयोग करना अलग तरह की स्त्री को पहचानना है। अनुकृति जी ने इस नई स्त्री को न केवल जिया है, बल्कि उसके बीच से एक नई संभावना को खोजकर प्रस्तुत करने का प्रयास भी किया है।
नई दुनिया में काम करती लड़कियां अलग तरह से खुद को रच रहीं हैं। अनुकृति जी अपनी कहानियों से उस गफलत और गलतफहमी के कुहासे को छिन्न-भिन्न कर देतीं है, जो इस तरह के माहौल में लड़कियों के चारित्रिक पतन और विगड़ने का मिथक रचती रही हैं। यह एक तरह से नये तरह का यथार्थ है, नया भावबोध है, या अलग-सा, अपरिचित-सा, अबतक न परखा गया सा यथार्थ है जो हमें इस संकलन की कहानियों में मिलता है।
‘जानकी और चमगादड़’ इस संकलन की अलग थीम की कहानी है। इस तरह की तीन कहानियां इसमें हैं- इंसेक्टा, छिपकली और जानकी और चमगादड़।

जानकी और चमगादड़ कहानी एक बेव पोर्टल पर पढ़ी तो अनुकृति जी से मैंने पूछा था कि यह थीम कैसे सूझी आपको? मैं यह सोचकर हैरान हूं कि चमगादड़ के साथ एक सामाजिक और मानवीय रिश्ता ढूंढा जा सकता है करता इस ज़माने में भी। लेखिका कारपोरेट दुनिया में काम करती हैं जयपुर की रहने वाली हैं चमगादड़ के साथ मानवीय रिश्ता खोजना कैसे संभव है? चमगादड़ में इतनी संवेदनशीलता को महसूस कर पाना आज के अमानवीय होते जा रहे समय में, जहां इंसान इंसान के बीच ही संवेदनशील संप्रेषण संभव नहीं हो रहा वहां इस तरह की रचना का आना आश्चर्य चकित करता है। मतलब अब तक पड़ी गई कहानियों में सबसे अनोखी कहानी है। एक
विलुप्त प्राय जीव के साथ मानवीय रिश्तों का जो संप्रेषण और समन्वय लेखिका ने रचा है वह अद्भुत है।
इसका विलोम है छिपकली कहानी। जानकी और चमगादड़ में चमगादड़ जानकी की रक्षा करती है एक सांप से और स्वयं मारदी जाती है। इन दोनों के बीच एक सहयात्री जैसा रिश्ता कायम है। जानकी पीपल के पेड़ पर रहने वाली एक चमगादड़ से दोस्ती कर लेती है या रोज रोज आते जाते दोस्ती हो जाती है। दोनों में एक अबोला संवाद चलता रहता है। यह संवाद ही उनमें संवेदनशील अनुभूति को पैदा करता है। छिपकली में उस घर का जो लड़का है बारह साल का वह छिपकली को मां और नौकरानी के द्वारा मारे जाने पर भावुक हो जाता है, दुखी हो जाता है। एक अजीब सी कहानी रची है छिपकली नाम से। उस लड़के को अलग तरह की संवेदना दी है लेखिका ने जिसके कारण वह बहुत कुछ अलग तरह से महसूस करता है जीवन की सभी गतिविधियों को। तीसरी कहानी इंसेक्टा तो बहुत ही अलग है। ‘म’ इसका नायक हैं जिसे विभिन्न प्रजाति के जीव-जंतुओं से बहुत लगाव है। मनुष्य कुतरते बिल्ली पालता है तोता-मैना पालता है, पर बिल्कुल अलग और डरावने जीव-जंतुओं से प्रेम इन कहानियों की खासियत है।
महत्त्वपूर्ण यह है कि अनुकृति जी जीवन का विस्तार संपूर्ण प्राणीजगत में देखती हैं। कोई भी प्राणी अलग नहीं है यदि उसके साथ एक साथ होने का रिश्ता बनाया जायेगा। यह जीवन का विस्तार हैं, खुश होने के लिए दुनिया बहुत बड़ी है, सवाल स्वयं को खोलने का है। बंद जीवन से खुलेपन में निकले बिना इन कहानियों को महसूस नहीं किया जा सकता।
कहानियों का अंत अचानक आ जाता है, पर अप्रत्याशित नहीं होता। यह ठीक वैसा ही है जैसे हम किसी पहाड़ की चोटी की ओर जा रहे हों और अचानक ऊंचाई खत्म हो जाये, चोटी समतल मैदान में बदल जाये या चोटी के उस तरफ उतरने की ढलान का न होना।
संकेतों में कहने की तकनीक का नया संस्करण है अनुकृति जी कि कहानियां। जापानी जीवन को हावी न होने देने के साथ साथ छोटे-छोटे टुकड़ों में पूरा जीवन रख देना। मसलन शहरों के नाम, रेस्तरां, बार, स्टेशनों के नाम, सड़कों के नाम, बीयर और अन्य पेय पदार्थों के नाम, खाने की चीज़ों और खाने के ढंगों के माध्यम से या वेशभूषा के संकेत, सब-में जापानी जीवन झांकता है। ये सब हैं और गहरी अनुभूति के साथ हैं, उनमें परायेपन की बू नहीं आती, एक सहजता है इनके ‘साथ होने की स्थिति’ कहानियों में विभिन्न स्थितियों में महसूस होती है।
आरंभ की चार कहानियों में जो जापाने में लेखिका के अनुभव खंडों के संकेंद्रित समय में लिखी गईं हैं – जापानी सराय, चेरी ब्लासम, रेस्टरूम, शावर्मा इनमें जो ‘ मै’ शैली अपनाई है वह महत्वपूर्ण है और इसलिए कि विदेश में जहां अपना नाम अपनी पहचान न बन सकता हो, वहां संवेदना और समय के किसी आयाम में ही हम अपना अस्तित्व कायम रख सकते हैं। यही ये कहानियां करती हैं। रेस्टरूम के बासरूम में उस लड़की का होना और कथानायिका का होना, एक दूसरे को महसूस करना, आंसू और उनके पीछे की पीड़ा से संवेदना के स्तर पर ही जुड़ा जा सकता है, वहां किसका क्या नाम है इसके होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह तकनीक चारों कहानियों में है।
कुल मिलाकर ‘जापानी सराय’ की कहानियां पढ़ने और डूबकर पढ़ने की मांग करती हैं। हमारी कहानी परंपरा से कुछ अलग हैं, इसलिए पचाने में थोड़ा समय लगता है। पर कहानियों में संभावनाओं के नये क्षितिज खोलती नज़र आ रहीं ये कहानियां।

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डा. संजीव जैन
522 आधारशिला, ईस्ट ब्लाक एक्सटेंशन
बरखेड़ा, भोपाल, म.प्र.
462021
मोबा. 9826458553

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