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मृणाल पांडे की लम्बी कहानी ‘पार्टीशन’

जानी-मानी लेखिका मृणाल पाण्डे की कहानी ‘पार्टीशन’ पढ़िए. उनके लेखन में गजब की किस्सागोई के साथ-साथ विभाजन का एक विराट रूपक भी. हमेशा की तरह बेहद पठनीय और सोचनीय भी- मॉडरेटर

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पार्टीशन :                                    8 मार्च 2019

ऐसा कैसा बेसिर पैर का पार्टीशन?

अय देखा न सुना।

बँटे हुए घर के एक हिस्से में तो रसोई समेत पूरा भंडार, और दूसरे में सारे संडास और नहानघर?

अब इंसानों की ज़ात। न खाना छूट सकै, न पाखाने जाना। पर दो सगे भाइयों के परिवारों को रातोंरात रोज़ाना के साथ उठने बोलने ही नहीं, साझा रसोई में खाने या साझा संडासों में हगने से तक परहेज़ हो जाये तो अदालत और करती भी क्या? कह दिया सरकारी अमलेदार से माप जोख करवा के घर के मुरब्बे को दो बराबर हिस्सों में दोनो भाइयों के बीच बाँट दिया जाये। उनको क्या कि पुश्तैनी साझा घरों के किसी खीरे की तरह दो बराबर टुकडे नहीं किये जा सकते!

कचहरी के आर्डर पर फीते लिये हुए सरकारी खसरे खतौनी खुले । फिर माप जोख वाले आये । मापजोख के बाद सियाही से ऐसी सरकारी लकीरें खींच दीं गईं जिनका ज़मीन या पानी की कुदरती बनावट-ढलाव से कोई वास्ता नहीं था ।

इतने महाभारत के बाद भी दो घर बने तो आधे-अधूरे ।

अदालत के इशारे से घर एक के दो हुए तो दोनो के भीतर कुदालें चलने लगीं, दिन रात ।

पार्टीशन कोई हो, ठेकेदारों की बन आती है ।

कोठी मे तरह तरह के फेर बदल को जगह की कमी कतई नहीं थी । पुश्तैनी कोठी की इमारत खूब बुलंद थी, और हाता भी काफी बडा और खुला खुला । छत भी खासी लंबी चौडी और खुली थी जहाँ घर के लडके मर्द कनकौव्वे उडाते, बहुरियाँ मायके का बखान और बूढियाँ पोतों की तारीफ और बहुओं की निंदा करती हुई बडी अचार मुरब्बे पापड बनातीं, सुखाते आये थे ।

पर सबसे पहले ज़रूरी थी दोनों घरों के बीच एक मज़बूत दीवार ।

यह तय हुआ तो सबके दो टुकडे होने लगे । परिवार की बोली, बानी, खान पान, पहिरना, ओढना, सब का रवैया रातों बदला और बेमतलब बन गया ।

दोनो भाइयों ने अलग अलग ठेकेदार लगवाये थे । लंबी जिरह चली । भाइयों का मनमुटाव तो रहा, लेकिन भीतरखाने सुलह कर दोनो ठेकेदार दाम बढवाने को एक हो गये । पहले दोनों ने अपनी फीस दुगनी करवाई । तब बारी आई दीवार की चिनाई की ।

जैसा हुकुम था, ठेकेदारों ने वैसी ही पक्की ऊंची दीवार बना दी । और और ऊपरी सिरे पर टूटी बोतलों के काँच लगा दिये गये कि भैंचो इधर उधर आवत जावत का सवाल ही ना उट्ठे ।

आखिरकार दीवारवाले मजदूर बिदा हो गये । बच रही कोठी और उसको दो टुकडों में तकसीम करनेवाली मनहूस दीवार, जिसे न इन्ने रंगवाया न उन्ने । अलबत्ता दोनो तरफ अलग अलग दो फाटक लग गये जिनके अगल बगल मालिकान के नामों की दो अलग तख्तियाँ लटक गईं ।

अब भीतरखाने नयी गढवाई शुरू हुई ।

खुदाई की गंध पाकर सबसे पहले पुश्तों से बसे भंडार के चूहे बाहर माटी के बिलों में सरक गये । काकरोच नालियों में समा गये। दोनो भीतर भीतर अपने पुरखों की तरह नई पाली का इंतजार करने लगे। कहते हैं जब जापान पर बम गिरा था और इलाके की सारी इंसानी नसल मिट गई तब भी कई साल बीतने के बाद जैसे ही नई बसासत शुरू हुई, भीतर छुपे चूहे और कॉकरोच सही सलामत बाहिर निकल आये । बम भी उनका कुछ नहीं बिगाड सका था ।

खैर, चलो इसी बहाने नई तरह से सब हमारे लायक बन जायेगा । बेटे बहुओं ने कहा जिनको आनेवाले वकत में कोठी विरासत में मिल जानी थी ।

तो सा’ब इधर चूल्हों की कालिखभरी निश्वासें मिटीं । उधर काईदार संडासों नहानघरों की बारी आई । इस सब के साथ बहुत सारी धूसर फुसफुसाहटों में पुराना गायब हो चला । मसालों की गंध, पानी की मिट्टी से मिलने और फिर छुपे पिछवाडों में काई बनने की गंध । पुराने साबुनों, पेशाब और गू की गंध ।

दोनो नये घरों में अब रसोईघर टाइलवाले थे । दोनो में संडास और नहानघर भी अलग की बजाय एक ही साथ बन गये । अब हर सोनेवाले कमरे का अपना नहानघर और संडास था । सुबह सुबह दरवाज़ा ठकठका कर इंतज़ार काहे भाई ?

इस सबके बावजूद रोज़ाना अंधेरा होते ही कई बूढे उल्लू एक एक कर दोनो तरफ हाते के दरख्तों पर अपने सालों पुराने कोटरों से निकल कर शाखों पर बैठ जाते । पीली आँखों से वे जाने किसको क्या क्या अद्भुत इशारे करते रहते थे । लोग मानते थे कि वे रात को इंसानों का आगा पीछा, जीवन मरण सब साफ साफ देख सकते हैं , क्योंकि तमाम प्रेतात्माओं जिन्नातों से उनकी दोस्ती होती है । उल्लू हर मच्छर हर नक्षत्र, हर ज़मीन के भीतर मूंछें सुरसुराते चूहे, नालियों के भीतर कीचड और गू पर ज़िंदा हर काकरोच की बाबत जानते हैं । ऐसा चौकीदारों का मानना था जो खुद भी निशाचर थे । रात के जीव ।

दिन भर सोते, रात रात जाग कर पहरा देते, जागते रहो ! होशियार !

उनके और त्रिकालदर्शी उल्लुओं के बीच अदब भरी खामोशी रहती थी ।

आए होंगे । उल्लुओं की मार्फत पिरेतों से खबर मिली होगी तौ पुरखे एक एक कर ज़रूर आये होंगे अपनी कोठी को दो हिस्सों में तकसीम होते हुए देखने को । पर चौकीदारों को यकीन था कि मिट्टी, पानी, हवा, अक्कास और अगिन का बँटवारा होते देख कर शरीर में अवसाद और मन में ज्वर लिये वे वापिस उड गये होंगे ।

इतने कलेस, उलाहनों, और दिन रात के झगडों बीच मरने के बाद कौन टिकना चाहेगा ? चौकीदार आपस में कहते ।

महीनों तक ठोकापीटी चली । साझा छज्जे तोडे जाते रहे, पेडों से अधपके फल झडाये जाते रहे । कोई कोई जंग खाया दरवाज़ा ज़िद पकड जाता । क्षय होने से वो तब तलक कतई इनकार करता रहता जब तक कि भारी हथौडा न मँगवाया जाता । मजदूरों की गालियों से चरमराता अंत में वह ढह ही जाता ।

मच्छरों –मक्खियों से गुंजायमान, ठेकेदारों की कर्कश बमचख के बीच नींद की कामना को मकडी के जाले की तरह हटाते हुए दोनों तरफ के परिवार रात रात जागते । हर सुबह आती तो आलसी मक्खियोंकी भिन भिन से भरी हुई । एक दिन सब बढिया बन ही जायेगा वे सोचते । दोनो तरफ ।

शहरवालों को यह टूटती बनती नीम अंधेरी कोठी समुद्र पार का कोई मायावी द्वीप नज़र आती थी । वे दूर बैठे सिर्फ अफवाहों को सुनते जमा करते कहते, ऐसा कैसा पार्टीशन जी ? न देखा न सुना ।

बडे घरों की बातें खुद बाहर नहीं जातीं, चूती छत की तरह धीमेधीमे टपकती रहती हैं, बरसों तलक । चाँदनी रातों में शहर में छत दर छत कयास लगाये जाते जिनके पीछे खौफ नहीं, केवल जिज्ञासा होती थी, या केवल रोमांच । कोठी बहुत बडे लोगों की थी । उनके लिये शहर के नये लोग कृमि कीट की नाँईं थे ।

राधेश्याम बाबू से, जिनके बाप, कोठी के पहले मालिक के मुंशी रह चुके थे, चौकीदार महफूज़ मियाँ ने जाना था, कि शहर के नामी गिरामी वकील साब की पीले रंग से पुती जहाज़ जैसी ये कोठी, जिसके एक हिस्से में वे पहरेदारी करते थे, दूसरी में मुन्ना चौकीदार, एक ज़माने में एक थी । तब ये पीली कोठी कहलाती थी । इलाके की सबसे सुंदर कोठी हुआ करै थी ये तब । चार एकड में फैली ज़मीन का इतना बडा मुरब्बा वकील साहेब को उनके एक दिलदार ज़मींदार मुवक्किल ने अपनी पुश्तैनी ज़मीनों का भारी पेचीदा मुकदमा जीतने पर फीस के साथ बतौर तोहफे के दे दिया था ।

बहुत कुछ बिन मांगे मिल जाये तो क्या मन में शुबहा या डर नहीं पैठता होगा ? चौकीदार कहते ।

कर्ज़, मर्ज़, फर्ज़, औरतें, इन सब को लेकर भय तो हर किसी में रहता ही है । पर मुफ्त की ज़मीन मिल रही हो तो सब संसा मिट जाती है ।

साँझ निस्तेज हो कर बुझ जाती तब चौकीदारों की डूटी शुरू होती थी । पहले चारों तरफ ऊंचे नीडों के बीच, थकी चिडियों की चहचहाहट बंद होती । फिर चाँद उगता, अकेला । फिर झुंड के झुंड नछत्तर ।

जब इतना हो जाता तब मनुष्यों के बनाये तमाम नियम कायदे भी एक एक कर तहा कर कोठीवाले सोने चले जाते । तब दोनो कोठियों के चौकीदार गश्त शुरू करते, जागते रहो ! होशियार ! चिल्लाते लाठियाँ ठक ठकाते हुए ।

देर रात दोनो हर रोज़ कुछ घंटे नीम पीपल पाकड और जामुन की पीली पत्तियों की चुर्रमुर्र्र के बीच चुपचाप अगल बगल बैठते । वे अंधेरे के गवाह थे जो जब कहानियों से छूट भागना चाहते हैं, पर छूट नहीं पाते, तब प्रेतात्माओं की तरह रात गये वे अगल बगल के फाटकों पर पास पास सरक आते हैं ।

सावधान !

घर के भीतर जागती बूढियों को उनके पैरों की गश्ती आहट लगातार तब तक फिर भी मिलती रहती है जब तक डूबता सुक्कर तारा सुरज महाराज का रास्ता नहीं खोलने चल देता ।

कहानियों से चौकीदारों का दिल कई बार भर आते थे । पर वे ज़्यादा देर दुखी नहीं हो पाते थे । क्योंकि कोठी की दोनो मालकिनें देही से कमज़ोर पर जीभ से कसैली थीं । तिस पर उनके मनीजर और उनकी औलादें सात समंदर पार से कोठियों के गिर्द खुफिया कैमरों से उन पर लगातार शक की निगाह बनाये रखते थे ।

अरे महतारियों को कोई जिनावर माफिक ऐसे छोड जाता है कोई ? कितनी ही बूढी हों, अभी सरग पाताल के बीच अटकी उनकी माँयें ही तो उनकी पुश्तैनी विरासत को नागिनों जैसी थामे हुए थीं ।

‘कीडे मकोडे मनुष्य सबकी अपनी ज़िंदगी की मीयाद तय है । कोई डोरी तो नहीं कि हम जीने का मन न होने पर तोड दें ?’ मालिशवालियों ने लैप टाप पर बच्चों से बतियाती महतारियों को । बार बार खुद्द देखा सुना था

अपने कागज़ात पर कुछ लिखापढी करते निंदियाये बेटे सात समंदर पार से कहते थे, ‘ ठीक, ठीक है । अच्छा फिर..’

फिर लाइन कट जाती । महतारियाँ करवट बदल कर उनसे कहतीं, पीठ पर तेल से ज़रा कस कर मालिश कर दें ।

जब वे कपडे सँभालती डगमग नहानघरों को चली जातीं । उनके बिछौने समेटती मालिशवालियाँ देखतीं उनके तकिये कुछ भींगे हुए हैं ।

धरती पर जिसे नहीं होना था, वह घटता है । तो भी बहुत कुछ माया मोह शेष रह जाता है । कई कई रामनौमियाँ, करधनियाँ, दस तोलेवाली नथें, पंचलडे सतलडे हार, कंगन, बाजूबंद, चूहादंती चूडियां, सरपेंच, सोने के कामदार बटन, चाँद सितारे जडी रेशमी साडियों जोडों से भरे बक्से, बचपन के झबले, ननिहालों से आईं चाँदी की दूधभात वाली नन्हीं सी कटोरियाँ, गिलसियां, पुरानी अशर्फियां, गिन्नियाँ, यूरो, डालर, बिटकॉइन्स ।

वे बार बार बेटों को उनकी बाबत बताना चाहतीं, पर जो रात रात भर बहनेवाली पूंजी का सारे बरमांड में पीछा करते हैं, अपनी माँओं से बात करते हुए भी अधसोये रहेंगे ही । ‘ठीक है, ठीक है,’ कह कर वे हर बार यह थाती गिनाती माँओं को अधबीच चुपा देते हैं ।

उनकी अनचाही, लेकिन फिर भी तजी न जाती माँयें दु:स्वप्नों से भरी नींद की प्रतीक्षा करती हैं हर रात । अपने मालिकों को हर हफ्ते रपट देनेवाले मनीजर हर हफ्ते आते हैं, डराइवरों, मालियों, खाना पकानेवालियों, मालिशवालियों, चौकीदारों का हाल चाल थाहते हैं । पुलिसवालों से उनके गहरे रसूख हैं । नये साल पर, बडे दिन पर ईद बकरीद, होली दिवाली पर कोठियों की तरफ से वे इलाके के थाने में डालियाँ भिजवाते हैं । रात सायरन न बजाती पुलिस की वैन या दुपहिया हर रात चक्कर मार जाती है ।

बाहर चौकीदार जब पुकारते हैं ‘जागते रहो !’ तो उसका खास मतबल नहीं होता, कश खींच कर रात की कालिख में आग के सूराख बनाते महफूज़ मियाँ कहते ।

चौकीदार महफूज़ मियाँ बताते हैं कि उनके जनम से बहुत पहले उनके अपने इलाके में भी पारटीसन हुआ जिसे उनकी तरफ ‘भग्गी’ कहते हैं । तब ज़मींदारी खानदानों के कई लोग अनत देस जा बसे थे । जमीन उमीन छोड कर । उधर के उजडे लोग अपनी जमीनें छोड कर इधर आन बसे थे ।

भारी मारकाट की कहानियाँ बताते थे वो लोग जो उन्ने अपनी दादी से सुनीं थीं ।

चौकीदार मुन्ना की तरफ भी कई कहानियाँ थीं । उनकी अजिया बताती थीं कि इंगरेज के जमाने में भुतहा इमली इलाके की एक कोई भारी लाट थी जिसके बारे में मसहूर था कि वह धीमे धीमे धंस रही है । और जिस दिन वह गिरी, जातपाँत सब खतम । धरम करम मिट जायेगा धरती से । एक दिन उसके चौकीदारों ने पाया वह गिरी पडी है । तब भी बडी भारी मार काट मची थी । गांव के गांव खाली हो गये थे ।

इस इलाके की बडी बडी कोठियाँ रातोंरात खाली होते देखीं, तौ सरकार के कुछ अफसरों का दिल जिन ज़मीनों पर आगया उनको दुश्मन की मिल्कियत बता कर फिर सरकार से औने पौने खरीदा जाने लगा । इस दौरान अपने खान साहिब पे भी नालिश कर दी गई कि उनकी पुश्तैनी ज़मीनें तो अब तो दुश्मन की मिल्कियतवाली कटगरी में आती हैं लिहाज़ा इन पर सरकार का दावा बनता है ।

अमां ऐसा भी क्या न्याव ?

खान साहेब तुरत अपने पुराने दोस्त वकील साहिब के पास गये, जिनका तब बडा नांव था । और अक्ल माशेअल्ला ऐसी पेचीदा थी, कि कील डालो तो साली सक्रू बन कर बाहिर निकलती थी । खान साहिब से बातचीत के बाद भैया वकील साहिब ने सरकारी वकीलों की फौज के खिलाफ मुकदमा ऐसा जम के लडा, ऐसे ऐसे पेचीदा दाँव लगाये कि साल भर में उनके मुवक्किल को उनकी पुश्तैनी मिल्कियत बाइज़्ज़त वापिस मिल गई । अफसर टापते रह गये ।

ईद का चाँद उस बरस हँसुए की तरह उगा और वकील साहिब पर बरक्कत बरसा गया । मुकदमा जीतने के बाद एक मन मिठाई लेकर ज़मींदार साहिब वकील साहिब से मिलने आये थे । उन्ने वकील सा’ब से पेशकश की कि फीस के अलावा वो ज़मीन का चार एकड का एक फलदार मुरब्बा भी उनकी तरफ से बतौर तोहफा कुबूल फर्मायें ।

वकील सा’ब जानते थे कि उस नायाब ज़मीन की कीमत उनकी फीस से भी कई गुनी ठहरती थी । उनको क्या उज्र होता ? वैसे भी अल्ला के फज़ल से अब तक दो दो बेटों के बाप बन चुके थे और किसी मुनासिब जगह पर अपनी अगली पुश्तों के वास्ते एक खूब बडी सी कोठी बनवाने की सोच भी रहे थे । खान साहिब की तीन बेटियाँ थीं । ब्याह कर बाहर देस चली जायेंगी । तौ भी उनके लिये ज़मीन से कहीं बडा मोल खान सा’ब की दोस्ती का था ।

सो बडी मुहब्बत और खुलूस के साथ ये इत्ती बडी कोठी बनवाई गई । जैसा चलन था, पीढी दर पीढी ये कुटुंब के साझा इस्तेमाल के लिये ही बनवाई गई थी । बरसों यह गुलज़ार भी रही । जाने कितनी शादियाँ देखीं इसने, कितने मुंडन, होली-दीवाली, जापे और भोग सराध ।

पर समय होत बलवान । किसे पता था सगा खून इस तरह बँट जायेगा ?

किसे पता था कि भाभो एक दोपहरी को सोयीं तो फिर ना जागेंगी ।

अगले बरस इस जहाज़ सरीखी कोठी के मालिक पे अचानक भारी हार्ट अटैक आ जायेगा ।

काल के हाथ एक दिन मिटा देते हैं सब । नछत्तरों को भी भैया, क्या ?

नछत्तरों को भी ।

पर इच्छा कभी नहीं मरती । न सपने ।

शुरू में घर के लोग ही घरेलू नौकर चाकरों की मार्फत अपने अपने हातों पर नज़र रखते थे । दोनो हाते बँटवार के बाद भी काफी बडे थे और छायादार फलदार पेड पौधों की भरमार । पर डायन की तरह बगूलों से धूल बिखेरती हवा भुतहा पेडों और दीवारों के बीच गई रात जाने क्या क्या खेल कर जाती है ।

रात के अंधेरे में कई अजीब अजीब बातें होने लगीं ।

सोचा गया कि मज़बूत कद काठी के चौकीदार रखे जायें जो तेल पिलाई लाठियों के साथ रात भर जागते रहो, होशियार कहते हुए गश्त लगायें ताकि कोई घुसपैठ ना हो ।

शुरू में दो चार चौकीदार महीने की तनख्वाह लेने के बाद यह कहते हुए छोड गये कि रात के अंधेरे में दीवार के बीच से एक धूल का गोले आकार लेने लगते हैं । किसी को वकीलनी का भूत दिखा, किसी को वकील सा’ब का । हवन्नक जैसे चेहरे से वे मालिकान से कहते कि अचानक किसी झाडी से भी एक बगूला सा निकल के इंसान जैसा कुछ बनता है, फिर उनके खून को बर्फ जैसा जमाते हुए उनको झकझोर के जैसे उठा था, वैसे दीवार में घुस के गायब हो जाता है ।

शहर के कद काठीवाले चौकीदार नट गये तौ बाहर से चौकीदारों को बुलवाया गया । घर की औरतें कहती रहीं कि इससे ज़रूरी खर्चों पर कटौती हो जावेगी । पर जब मर्दों ने डपट दिया कि ज़रूरी है । वे भी चुप साध गईं । रात तेज़ हवा चलती तो अपार हवा उनकी मच्छरदानियों में जाने कैसे घुस कर उनको किसी गुब्बारे की तरह नक्षत्रों की ओर उडाने की कोशिश करती । कभी कोई बिल्ली अकारण रोती घूमा करती । कभी उल्लुओं की फडफडाहट एकदम पास ।

दोनो कोठियों के बीच लाग ढाँट का लंबा सिलसिला चला । खूब खर्चा हुआ मुकदमेबाज़ी पर जब दोनो तरफ पुश्तैनी ज़मीन का हवाला देकर दोनो घरों की लडकियों से मौरूसी ज़ायदाद का हक छीन लिया गया ।

एक एक कर बच्चे बाहर जाने लगे । कोठियों की हलचल मंद पडती गई । दोनो तरफ । उनकी अगली पीढी का दुबई, पेरिस कनाडा या अमरीका में जन्म । उनको याद दिलाने कभी कभार वो लोग लौटते । गुरिल्लों की तरह अपने अपने पिट्ठुओं पर बोतलबंद पानी, अपने कपडे और दवाइयाँ अलग से लिये हुए । यहाँ का कच्चा पानी, फल, सब्ज़ियाँ उनको ज़हर की तरह डराते थे ।

फिर कुछ दिन सैर सपाटा कर के, दिन भर फोटू खींच खाँच के एक दिन टीका लगा के या इमामज़ामिन बँधवा के वो वापिस बेबीलोन कहो या लंदन या कुस्तुन्तुनिया चले जाते ।

पीछे बस बूढी बेवायें ।

दोनो तरफ के बच्चों ने माँओं की हिफाज़ती को दो लंबे तगडे चौकीदार छांट के रखवाये । एक इस तरफ, एक उस तरफ । महफूज़ मियाँ इस तरफ । मुन्ना भाई उस तरफ ।

काली राख जैसी रात । पीछे दो अंधकार भरी भाँय भाँय करती कोठियाँ ।

बस दो चौकीदार जागते थे जिनकी बीडियाँ अंधेरे में दो सूराख बनाती थीं ।

चुप्पी । निचाट चुप्पी ।

महफूज़ मियाँ के पुरखे मेवात के जिल्ला भरतपूर सैड के थे । मुन्ना मथुरा सैड के किसी पहलवानी खानदान के ।

हमारे कहते हैं कि ‘मेव कौ कहा मुसलमान’, मुन्ना छेडता । मियाँ तूं भी हमारे ही जस ।

सो तौ है । गरीब की भैंचो जात क्या ?

अजब देस मेवात । भैंचो पहले गाली पिच्छे बात ।

पुरानी कहावतें, उनसे भी पुरानी कहानियाँ ।

रौद्र झिलमिल अपार कोठियों में निस्सहाय कैद, कभी सहन में धूप खाती, तेल लगवाती तो कभी भीतर अपनी छपरखटों पर पडी निद्राहीन बूढियोँ उसाँसें छोडती कभी पुकार लेतीं, अरे मियाँ जागते हो ?

जी हुज़ूर ।

काहे मुन्ना जागत हौ ?

जागत ही सरकार ।

आधी रात के घुप्प पलों में जादूपुर की इन्नरजाली कथायें घुग्घुओं की तरै पंख फडफडाती उतरने लगतीं ।

‘ये इंसानों की बस्तियाँ जो हैं न महफूज़ भाई, मुन्ना चौकीदार कहता है, ‘ ये सब साली मिट्टी हवा पानी अगिन जल से नहीं, कहानियों से बनी हैं ।’

महफूज़ मियाँ ने सर हिलाते हैं, ‘बात तो भैंचो सही है । ’

जब तमाम तरह की नई बनावटों के साथ अलग अलग ज़िंदगियाँ बह निकलीं, तो शौकीन मिजाज़ चच्चू सैड ने पहला काम किया के कबूतर पाल लिये कई तरां के । चच्चू को जिनावरों का शौक तो बचपन से था पर वकीलनी को पंछी कुत्ते या बिलार पालने से परहेज़ था । पुरानी चाल के नेम धरमवाली थीं । रसोई उनकी ऐसे चमकती जैसे शीशा । बहुओं को बताया जाता । सो कई दफे इस्कूल से वापिस आती बिरिया चच्चू जी पिल्ले या चिडिया के बच्चे उठा लाते जिनको उनके इस्कूल से वापिस आने तक कहीं फ़िंकवा दिया गया होता । दो तीन बार पैर पटके खूब चिल्लाये पर दद्दू जी ने अपने नये खिलौने उनको थमा कर बहला लिया । दद्दू जी का चंद्रमा उच्च का था सुभाव से शीतल थे ।

चच्चू जी के ससुराल में इसके उलट जिनावर पालने, पतंगबाज़ी और कबूतरबाज़ी का शौक खानदानी था । अपने हिस्से की कोठी में आते ही सलमा ने कई तरैयों के कबूतर और परिंदे मँगवा कर पाल लिये । छत पर रंग बिरंगी ललमुनिया के पिंजडे लटक गये । नवाबजान बढई से चच्चू के कुछ खास दुलारे लक्का कबूतरों के वास्ते दरीचे निकलवा लिये गये ।

जवाब में दद्दू जी ने दो बडे खूंखार जरमन के कुत्ते पाल लिये । हाते की रखवाली को दोपहर के खाने के बाद उनको दो घटे को खोल दिया जाता । फिर दोबारा रात दस बजे के बाद से सुबह तलक । मजाल कि उनके गश्त लगाते इधर की कोठी में उस सैड का कोई पैर भी रख सके ? सुना किसी के उकसाये उन्होने उधर के माली और धोबी समेत को चारेक बार काट खाया तो नौकरी छोड के चले गये कि इस साली कोठी के झगडे में हमारी जान नाहक काहे जाये भाई, एं ?

समय बहता गया । गोधूलि की मेघ सीमा पर साँझ उतरती । एक तरफ आरती घंटा, दूसरी तरफ अज़ान ।

होते होते अतीत के प्रेत भी मिट चले ।

विक्षुब्ध प्रेत । बीते ज़माने का सारा तामझाम खो कर दीवारों के आर पार खोजते भी तो क्या ?

उधर कबूतरों की सुनो । वो पंछी की जात, न दीवार मानें ना बाड । न पिरेतों से डरें , ना ज़िन्नातों से ।

कितनी तिथियाँ, कितने वार अतिथि, कितने रमज़ान, कितने होली दिवाली ।

फिर भी छत से रोजीना भाभो की महरी चिल्लातीं, कि ये गोस पोस पकने की बास से जियु घिन्ना जाता हैगा भाभो जी का । राच्छसों की तरैयाँ दिन रात का गोस , कोरमा । अरे खानेवालों के पेट में कीडे पडें । नौरातों में भी गोस मच्छी .

दूसरी तरफ से जुवाब आता अय बीबी जो हमारे खाने पे ऐतराज़ हो तो हो । हम तो वही पकायेंगी जो हमको पसंद है । तुम नाक पे कपडा बाँध लो । ज़्यादे दिल मचलता हो तो कह दो कुछेक बोटियाँ फेंक देंगे तुम्हारे कुत्तों के लिये भी । दीवार पे पंजे टिका के लार चुआते रहते हैं मुए ।

पृथ्वी की प्रेत नज़र । सहसा तैर जाता पुरखों का कोप । सुनाई देता इस या उस कोठी में बहुरिया के पेट अचानक गिर गया । माँएं छाती फाड रोतीं तो ज़च्चाघर और स्मशान पास खिसक आते । अंधकार की बेला में जाडे की रातों को कई बार कल तक की गर्भिणी के क्रोधभरे रुदन में रात गये उसके शिशु भ्रूण तारे बन चमकते तब चौकीदारों को पीपल के बीच छिपी मरचिरैया की चीख सुनाई देती ।

उजाले अँधेरे में चौकीदारों के कपाल के भीतर सपने एक एक कर बुझ जाते हैं । कौन रुक सकता था इन हाहाकारी कोठियों के हाते के उजाले में ?

मुए कबूतरन की बीट साफ करते कमर दुखने लगी हैगी उनकी, पुरानी नौकरानियाँ कहतीं । बडियाँ पापड सुखवाने डलवाये गये तौ बीट । अचार के मर्तबान मुँह पर धुला साफ कपडा बाँध कर रखवाये गये तो उन पर बीट । गेहूं धुलवा कर मचिया पर सूखने डालना तौ नामुमकिन हो गया । राम राम । धोतियों तक पर हग जाते थे ।

पतझर के उनींदे दिन थे । जिया अलसाने हो रामा के दिन ।

सुबह सुबह हल्ला मचा कई कबूतर मरे पडे थे । कुछ छत के इस पार कुछ उस पार । थानेदार को बुलवाया गया तौ उसने सर खुजलाते कहा कि सर पंछियों पर हमारा क्या बस चलैगो । आप ऐसा करें कि छत के ऊपर ऊपर तार का बाडा बनवा लें । दबी ज़ुबान से कहा सुना गया गया दिन उगने से पेश्तर कई गोलियाँ उस सैड से इस सैड फेंकी गईं थीं । पर रोजीना के झगडे में पुलिस कचहरी क्या करें ? दद्दू जी ने पहले ही कह रखा था कि हम दो लोगों के बीच का मसला है, हमीं निबटायेंगे । थल्ड पाल्टी लाने की जरूरत नहीं ।

अब भैया हमने तौ जैसी सुनी तैसी बताई ।

फिर सुना दद्दू के दोनो दोनो कद्दावर कुत्ते एक सुबह ढेर पाये गये । मूं से झाग निकल रहा था, पास में कुछ हड्डियाँ पडी थीं । अब कहो वैष्णो घर में ई अखाद्य कैसे पहुँचा ?

चौकीदारों के दुपहर की नींद के भीतर सपने नहीं आते । सब देवताओं को छोड कर  गुडी मुडी नवजात बच्चों की तरह रात गये मुन्ना और महफूज़ मियाँ अपने प्राणों के पास लौटते हैं । और तब पानी की तरह घुमड घुमड कर दो एकाकी दिल एक दूसरे से बात करते हैं । इंसानी रातें कहानियों के सहारे ही तो कटती हैं ।

क्यों तुमको, जिनके पास सब कुछ है, जो हमारी तरह पेट की खातिर दिन दिन बडे होते बच्चों और दिन दिन बुढा रही बीबियों को अकेला छोड कर परदेस में दूसरों के घर की पहरेदारी करने मजबूर नहीं हो, शांति के साथ रहना नहीं आता?

क्यों खुश नहीं हो पाते तुम अपनी या दीवार पार की खुशी में ?

धूल माटी, गाल भर हवा खाकर अधेड चौकीदार दो मग चाय पर गोल हो बैठ जाते । कभी कभार गश्ती पुलिसवाला रामसनेही भी अलाव देख कर हाथ सेंकने आ जुटता ।

तीन जोडी कान । कई कहानियाँ इस उस कहानी के पेट से निकलने लगती हैं ।

कोठी में बरतन मलनेवाली रामरत्ती की दादी ने रामनरेस की फुआ को बताया था के वकील साब के अदब से जो खानदान बरसों एकजुट बना खूब फलता फूलता रहा । पर फिर वकीलानी एक ही बहू ला पाईं थीं, कि चच्चू जी की बारी आती, उससे पहले ही सुरग सिधार गईं । वकील साहिब को दो साल बाद हार्ट अटैक आया और मिनटों में देही छोड दी । बस तब से घर को घुन लग गया ।

सब दिन होत न एक समाना ।

अगली पीढी में दोनो बेटों के बीच भीतरखाने बदफैली हो गई । बाद को बात इतनी बिगड गई, कि वकील साहब के बडे, जो दद्दू जी कहलाते थे, और उनके छोटे भाई चच्चू जी सगे भाई होते हुए भी जुदा होने पर तुल गये ।

शहर में पीली कोठी के पार्टीशन की बाबत कई बाशिंदों के बीच कही सुनी जाती कहानियाँ तनिक खोदो तौ ज़मीन के भीतर से परतों में सदियों से दफ्न नदियों की माफिक धार धार सतह पर आ जाती हैं ।

‘ और क्या सुनते हो महफूज़ भाई ?’ बातून मुन्ना ने महफूज़ भाई से पूछा जो उसीकी तरह कंबल ओढे बगल के फाटक पर जागता था ।

हूं ?

‘ रामसनेही की बात पर सोच रहा था ।

हूं ?

‘अब कोठीवालों का रसूख जित्ता बडा हो, लोगों के मुंह पर तो ताला नहीं लग सकता किसी तरैयाँ ।’

हूं ।

‘ बरतनवाली रामरत्ती ई बताई कि भाई भाई के बीच अलग्योझे का माहौल इस तरैयाँ बना, कि वकील साब के छोटे बेटे चच्चू जी ने अचांचक सालों पहले बाप की दी ज़ुबान झुठलाते हुए ऐलान कर दिया, कि वे घर की बडी बहू यानी भाभो जी की छोटी बहन से ब्याह नहीं करेंगे ।

रामरत्ती यह भी कहती थी कि जब से भाभो ब्याह के आईं थीं, कोठी में उनकी छोटी बहन का आना जाना लगा रहता था । चुहलबाज़ चच्चू का दद्दू भैया की साली साहिबा से हँसी मज़ाक भी चलता रहता । कभी कभार दोनो बहनों को दोपहर का सनीमा भी दिखा लाते थे चच्चू । यह सब देख कर भीतरखाने सब निष्फिकर से थे कि चलो घर की अगली बहू खोजने को बाहर नहीं जाना होगा । घर में कुशल गिरस्तन भाभो का भारी रुआब था । और दद्दू जी ही नहीं, चच्चू जी भी उनके कहे उठते बैठते थे । उनको पक्का यकीन था कि उनकी बहन ही उनकी देरानी बन कर घर की शोभा बढायेगी । हाँ ।

पर जैसा कि रामरत्ती की माय कहती थी, समय होत बलवान जगत में, समय होत बलवान !

उधर भाभो और उनके मायकेवाले छोटी के लिये गहना गुरिया साडी लहँगे मोला रहे थे और इधर बाप के मरने के बाद चच्चू जी को काम के सिलसिले में बाहर जाना पडा । यह वही शहर था जहाँ उनके बाप के उसी खानदानी मुवक्किल का घर था, जिसने कोठी की ज़मीन उनके वकील साब को दी थी और सालों तक उनको ईद मीलाद पर उनको तोहफे भिजवाया करते थे ।

ज़माने का क्या ? बदलना उसकी फितरत है । महफूज़ मियाँ ने लंबी चुप्पी के बाद कहा ।

चच्चू जी के टैम तक मुवक्किल मियाँ सरीखे कई पुराने ज़मींदार लोगों की शहर को चलानेवालों के बीच औकात ऐसी दो कौडी की हो के रह गई थी कि मुंसीपाल्टी चुनावों में कौंसलर का टिकट भी उनको नहीं मिला था । दिलों में मैल जो आगया था । बात बात में मसला हो जाता । ज़मींदार साहिब खानदानी आदमी थे सो बाहरखाने चुप साध गये । बडा दामाद जरमन में था, दूसरा इराक में । बीबी गुज़र चुकी थीं लिहाज़ा अखिरी बच्ची की किसी भली जगह शादी करना अब उनकी सबसे पहली और आखिरी ज़िम्मेदारी थी ।

हालात से आसानी से हार माननेवालों में से खान साहिब न थे । ठीकठाक तरह खाने पीने रहने को अभी भी काफी ज़ायदाद थी, फलों के बागान थे । बेदिली ही सही पर दिखावे को उनको अभी भी मान पान दिया ही जाता था । शहर बदल रहा था । दरख्त कट रहे थे । माल और पब खुल रहे थे । कौडियों की ज़मीन अशर्फियों पर तुलने लगी थी । पर उनकी ही तरह सारे खानदानी घरों के अगली पीढी के लडके बाहर जाने लगे थे, कनाडा,आस्ट्रेलिया, मैनचेस्टर । खान साहिब पा रहे थे कि उन सभी ने बहुओं के साथ इधर उधर  आशियाना बसा लिया था, वापिस कोई नहीं आता था । कुछेक ने तो बूढे माँ बाप को उधर बुला लिया गो कि खतूत से लगता था कि वहाँ बूढे खुश नहीं थे । उन्होने तय कर लिया था कि सबसे छोटा दामाद वह लायेंगे जो इधर ही बसा रहे । जो बचा है सब उसीका । उन्होने वकील साब के बेटे को बडी आवभगत से किरायेदार रख लिया ।

धीमे धीमे बातून चच्चू जी से घर की लडकियाँ खुलने लगीं । बडी या मँझली जब भी मायके आतीं उनसे पर्दा न करतीं । उनके शौहर भी बडी मुहब्बत से पेश आते । होते होते कुछ समय बाद नन्हों उर्फ सलमा का टाँका चच्चू जी से भिड ही तो गया । चच्चू जी बिंदास आदमी थे और बात जैसे ही परवान चढी तो जाके लडकी के बाप से कह दिया कि उनका इरादा सीधे शादी ब्याह का है । कुछ देर खामोशी के बाद पूछा गया, बरखुरदार, आपको कलमा पढना मंज़ूर है ?

है ।

इस तरैयां पीली कोठी को भनक होती इससे पहले चच्चू जी कलमा पढ कर सलमा का खाविंद बनना तीन बार कुबूल कर चुके थे । अब कहो ?

क्या कहना सुनना भाई । मन्ने भी उडती सी सुनी थी ।

महफूज़ मियाँ ने बीडी नीचे गिरा कर कुचल दी और अपनी कोठी के पीछे की तरफ जा कर लाठी से ठक्क ठक्क करने लगे ।

मुन्ना भी चल दिये ।

फिर वही काली रात । पानी अब बरसा कि तब बरसा ।

‘ हमलोगों के देवता में किसुन जी की एक कहानी दादी कहती थी ।’ बीडी खींचते मुन्ना फिर शुरू हुआ । तौ किसुन जी और रुकमनी का दिलफेंक बेटा था कोई शंब । शहर से उसकी बडी शिकायतें आती थीं । महतारी बाप ने एक दिन अपने बेटे को खुद्दै ताडने को ग्वाला ग्वालिन का रूप धरा और द्वारका में घूम घूम कर ‘दई ल्यो दई’, कहते घूमने लगे । शंब ने सुंदर ग्वालिन देखी तो बोला आजा मंदिर में आके मोकूं छाछ पिला दे । दुगुना रुपैया ले ले । ग्वालिन मटकी लिये जा पहुँची द्वारे । अब भीतर से शंब कहै तू भीतर आ तब पैसा दूंगो । वो बोली ना जी पहले पैसा फिर छाछ । तौ भैया शंब ने हाथ पकड ल्यो वाको । के पकडो ?

हाथ।

हाँ जोरा जोरी बढी तौ भैया महतारी बाप ने बेटे कौ असिल रूप दिखाया, और शरम से पानी पानी सर पर पैर रख के घर भागा छोरा । घर जाते हैं तो के देखते हैं कि छोरा एक बडी सी कील बना र्यो है । तो पूछी कि बेटा ई का ? तो जवाब मिलो के ई कहानी जिन्ने किसी को भी सुणाने को मूं खोला वाके मूं में सीधो जाके ठोक दूंगो ।’

किस किस का मूं बंद करैगो कोई ?

सोई तौ ।

पीली कोठी चच्चू जी के बियाह की खबर पहुँची तो मानो बम फटा । दद्दा जी रात भर छत पर सिगरेट फूंकते टहला किये, भीतर भाभो जी बेहाल बेसुध । उनकी बहन को खबर हुई तो उसेतो ऐसे दौरे पडने लगे कि घरवालों को आगरा ले जाके इलाज करवाना पडा । लौटी तो किसी कदर खामोश और गुम सुम । चुपचाप किसी ईसाई भक्तिनोंवाले लडकियों के कानवेंट में वार्डन बन कहीं दूर पहाड चली गई, फिर वह कभी पीली कोठी में नहीं देखी गई ।

अब भाभो ने साफ कह दिया कि अगर सामने के रास्ते से चच्चू और उनकी बीबी आये तो वो उसी मिनट पिछवाडे के रास्ते से मायके चली जायेंगी और फिर कोठी में पैर नहीं रक्खेंगी ।

कोठी वहीं की वहीं रही, जहाँ पर कि थी, पर बंटवार की नींव पड गई ।

शरीफों के घरानों के बीच बात मारपीट तक न जाये इस लिये अदालत की मार्फत एक बेतुकी सी बँटवार मंज़ूर करा ली गई , कि चल अब एक भाई इधर, एक उधर शांति से अपने अपने हिस्से में रहेगा ।

अदालत फैसला दे सकती है शांति तो नहीं ? पार्टीशन रे पार्टीशन सयाने देखते और उसाँस भरते ।

अपने घरों में भी उनकी सुनता कौन था ?

नक्काशीदार कंगूरों और खिडकी दरवाज़ेवाली कोठी के दोनो हिस्से इस मनहूस नंगी बूची दीवार और भगवा हरे फाटकों की वजह से दूर से पहले ही कतई बेमेल नज़र आने लगे थे । अब लोग उधर जाने आने से भी बचने लगे । पीली कोठी की बजाय इमारत शहर में दीवारवाली कोठी कहलाने लगी ।

दीवार तो ईंट गारे की चीज़, दिल ही बँट गये तो फिर उसका मतलब बस हर तरह का अलगाव । और यह काम ऊपरवाला झूठ न बुलवाये, बिला रंग की वह दीवार कोई सत्तर सालों से किये जा रही थी ।

शहर से उड कर कई और मशहूर किस्से भी आते रहते थे । मसलन कैसे पार्टीशन के बाद महीनों तक खानदान का एक हिस्सा मुंह अंधेरे लोटा लेकर जंगल जाने को मजबूर हो गया था । वे बहुएं तलक जिनका मुंह बाहर किसी मरद ने नहीं देखा था । किस तरह दूसरे हिस्से का परिवार महीने भर को खुले में राँधने खाने को मजबूर हो गया । नया बावर्चीखाना बना तो तमाम अल्लम गल्लम रखने को आंगन के सैड के सुंदर सहन जिसके बीचों बीच फव्वारा था, तुलसीचौरा था, बेले चमेली थे, पाट कर भंडार बनाया गया । दूसरी सैडवालों ने अपने लिये हाते के कुछ फलदार पेड कटवा कर नये पाखाने नहानघर बनवाये थे ।

वकील साहिब और खान साहिब के जीते जी पानी की इफरात थी उस इलाके में पहले । पूरा बाग था यहाँ आम का सिंदूरी, समरबिहिश्त, लँगडे, सफेदे, तोतापरी, बेगमपसंद, किसम किसम के नाम किसम किसम के आम । एक कुआँ भी था जहाँ कुआं पुजाई के लिये अडोस पडोस की नई बहुओं को भी गाती बजाती औरतें लाती थीं । पर जब कोठी तामीर की गई तो  पुराने कुंए को पाट कर मालिक ने बडे शौक से पानी की पैपलाइन डलवा ली थी । लाइन से पानी तब चौबीसों घंटे आता था फिर भी घर की गायों के हेत पानी को भरने के लिये एक बडा सा हॉज धूमधाम से बनवाया गया जिसके लिये सुनते हैं चार दिन तक यज्ञ हुआ । कई बहुओं ने बताया कि उनसे उस पर ही कुआं पुजाई की रसम करवाई गई थी ।

पार्टीशन की तहत अब पानी भी बँटने पर आगया था । ऐसा कैसा बँटवारा जी ? गिलासभर पानी के लिये सगे भाइयों के बीच जूतियों में दाल बँटने लगे ? कोई महीनाभर लग गया सुनते हैं, राजमिस्त्रियों को यही हिसाब किताब बिठाने में, कि अब तक एक ही पैपलाइन से भरती रहे उस टैंक को किस जुगत से इस तरह चार टंकियों से जोडा जाये कि किसी भी हिस्से को खाने नहाने को पानी कम बेशी ना मिले ।

चच्चू जीवाला हिस्सा यूं तो दद्दू जी वाले हिस्से से भिन्न नहीं था, पर सजावट एकदम जुदा जुदा । बारामदे में तखत रहता और सहन के अगल बगल दो चार मूडे रखे गये थे जिन पर बैठे खान साहिब सुबह शाम आनेजाने वालों से मिलते हुक्का पीते रहते थे । चच्चू घर से कचहरी जाते आते समय रात हो जाती । उनके घर की औरतें अमूमन मर्दाना हिस्से से ओझल रहती थीं । सिर्फ नन्ही बेगम यानी सलमा कभी कभार बारामदे के तख्त पर बैठी छालियां कतरती देखी जातीं ।

दद्दू जी के घर की बहुएं हरचंद कोशिश करतीं कि उस दम भाबो उस तरफ न आयें । इससे उनका ब्लड प्रेशर इतना चढ जाता था कि कई कई बार डाक्टरनी को बुलाना पडता ।

भाबो जी चल बसीं तो सुना चच्चू जी ने जवाब कहलाया सोग को आना चाहते हैं । इधर से मनै हो गई । कहते हैं दद्दू जी बेटों बहुओं से साफ कह गये थे कि उनकी मैयत देखने क्या, छूने भी ना दी जावे चच्चू लोगों को ।

फिर खान साहिब गये और उसके कुछेक बरस बाद ही यकायक सलमा बेगम भी, तौ दोनो बार उनके ही लोगों ने मिट्टी उठाई । उधर से जब जब रोने कुरानखानी की आवाज़ें और लोबान की खुशबू आईं, तो इधरवाले ज़ोरों से भजन के कैसेट बजने लगे ।

ठीक नहीं हुआ ।

आमने सामने कहने की किसी की हिम्मत न थी । कौन बडे लोगों के मूं लगे ? किसे अपने मूं में लोहे की कील ठुकवाने का शौक होता है भाई ?

अब तीसरी पीढी थी, पर बेरुखी मिटी नहीं गहराई ही थी ।

सत्तर बरस में बहुत कुछ बदल गया था । बारिश कम हो गई थी और शहर की नदी में पानी उतर चला था । पैप लैन से अब गली मुहल्लों के लिये सुबह शाम दो दो घंटे को पानी छोडा जाता था बस ।

पिछले दस बरस से, जब से मुन्ना चौकीदार एक तरफ और महफूज़ मियाँ दूसरी तरफ चौकीदार थे, उनका काम था ठीक चार बजे सुबह का पानी भरने और शाम चार बजे शाम का पानी भरने को मोटर चालू कर दें । मुन्ना बिरज सैड का था । उसकी जान गाने में बसती थी, या किस्सागोई में । दूसरी कोठी के चौकीदार महफूज़ मियाँ मेवाती । अब तक दोनो तरफ के बूढे मालिक मर चुके थे, उनकी बुज़ुर्ग बेवायें रह गई थीं । दिनों दिन बुढाती । एक दूसरी पर नौकरों की मार्फत निगाह रखती । चौकीदारों की नियमित चौकीदारी भी करतीं । दोनो पर रात किसी पल सोने का शक हो तौ मच्छी जैसी मिनमिनी आवाज़ से चिल्लातीं, कहाँ मर गये मुन्ना ? या महफूज़ मियाँ ?

टॉर्च चमकाते दोनो चौकीदार कहते, “यहीं हैं बीबी जी पिछवाडे चेक कर रहे थे ।”   दोनो ने अब तक रतजगे साबित करने का बुनियादी गुर सीख लिया था । कहानियाँ, बीडियाँ, टॉर्च का इधर उधर मारना और कभी कभार खाँसी ।

जवानों की कहो तो वही घर घर की कहानी दोनो कोठियों की भी थी ।

पार्टीशन के बाद दोनों घरों की एक पीढी पली पुसी, खूब पढी । ज़हीन तो ये नसल थी ही । एक से एक बढिया नौकरियाँ हाथ में आ गईं तो बेगाने होकर बच्चे परिवार समेत परदेस जा बसे थे । कहाँ की उर्दू कहाँ की हिंदुस्तानी । बरसों परदेस में रहते रहते दोनो तरफ के जवान लोग बस अंगरेज़ी में ही गिटपिट करने लगे थे । जाडों में बेटे बहुएं एकाध बार चक्कर लगा जाते । बाकी साल दोनो घरों को दो बूढियाँ थामे रहतीं ।

प्रकट में दोनो अम्मा कहलातीं थीं, पर चौकीदार रात को चाँद तारों तले बैठे बात करते तो उनको कहते बुढिया ।

‘ एक बार की बात है दो बूढियाँ थीं जो अगल बगल की दो झोंपडियों में अकेली रहती थीं । सुना महफूज़ भाई ?’

हूं ।

-तौ एक की भगती से खुस हो के वाको किसुन जी ने दरसन दिये और कहा माँग जो मांगती है । वो बोली कि मुझे एक बडी सी शाही कोठी दे दो । मिल गई ।

इब दूसरी बुढिया को लगी खार । उसने साल भर बस फलाहार कर भजन किया तौ किसुन जी उस पर भी प्रसन्न भये । कहा मांग ले जो माँगना है । सो वो बोली कि जित्ता मेरी पडोसन के पास है मोको उससे दूनो दे दो । इब पहली बुढिया सुबे उठती है तौ देखती है कि पडोसन के पास दू दू कोठी । जो भी वो माँगै, उसको दूनो पडोसन को मिल जाये । फिर एक दिन वाने कही कि हे किसुन महाराज मेरी एक आँख फूट जाये । अगले पडोसन की दोनों फूट गईं । लाठी लेकर ााने जाने लगी । फिर उन्ने कई मेरी कोठी फिर फूस की बन जाये । पडोसन की कोठियाँ भी गईं । फिर भी हिरस ना कम हुई तौ उसने माँगा कि मेरा एक हाथ एक एक टांग टूट जाये । पडोसन हाथ पैर से लाचार हो गई ।

फूस की कुटिया में पडी पडी लाचार बुढिया सोचै लगी, ई मेरे ही करमन कौ फल है ।’

-अच्छा भाई चलें चक्कर लगा लें…

दोनो घरों को पैसे की तंगी न थी । बेटे बैंकों में पीछे छोडी गई माँओं के लिये खाते खोल जाते थे जिनमें रुपया आता रहता । दो मनीजरों और कोई चारेक माली, झाडू बरतन वालियों और दवाइयों के लिये उसका ब्याज ही बहुत था । पर घर पर शाम ढले सिर्फ दो बूढियाँ बच रहतीं । चौकीदारों के लिये हातों के भीतर पिछवाडे में कोठरियाँ नलके अलग से थे । उनको छोड कर बाकी सब काम करनेवाले शाम गये घर चले जाते । दोनो हातों के पुराने पेडों की निचली टहनियाँ काट दी गईं थीं ताकि वे ऊंचे हों पर पत्तियाँ अधिक न गिरें और गर्मियों में चंदोबा भी कायम रहे । दोनो तरफ दो गराज भी थे जिनमें कार रहती थी ताकि मन होने पर बूढियाँ आ जा सकें । ड्राइवर सुबह से शाम तक अक्सर बैठे रहते । फून से ज़रूरत होने पर गाडी पोरच पे लगा देते । बूढियाँ उम्र के साथ कम ही निकलतीं थीं, पर ज़रूरत पडती ही थी, खासकर जब परदेस से लडके बच्चे आते । शेष समय ड्राइवर उनकी सफाई सुफूई करके देखते रहते कि तेल पानी ठीक है । कि चिडियों चूहों ने उनके भीतर घोंसले बना कर बच्चे वच्चे तो नहीं दे दिये । शाम को वे कैनवास के कवर से ढाँक दी जातीं । मनीजर सब का काम नियमित रूप से चेक करते थे । मनीजरों का काम बेटे । अब तो चारों तरफ लगे कैमरों से वे लोग स्काइप पर सीधे देख लेते थे कि सब ठीक ठाक है ।

चौकीदारों का तीन टाइम का खाना कोठियों से ही आता था और दिन में वे अक्सर सुरती मलते उबासियाँ लेते दिखते थे । बढिया काम था । रात भर चौकीदारी, दिन भर सोओ या टहलो । अक्सर दोनों एक दूसरे के गले की खँखार सुनते । जब बुढियाँ सोने का ऐतबार हो जाये तो कुछ देर साथ बैठ कर बीडी फूंक लेते । उनके बीच रात भर छोटी छोटी बातें होतीं, किस्से कहानियाँ निकल आते , फसलों के, गाँवों के, कोठियों के ।

तो सुन बे मेवाती, मुन्ना कहता । ई जमाना साला हैई नंगई का । सगे भाइयों का बँटवारा, मारी गईं औरतें । हमारीवाली बूढा दिन भर टी वी देखती हैं । कभी कभार लडकों बच्चों से बात हो जाती थी, पर अब कान जवाब दे रहे हैं । हलू हलू करती रहती हैं ।

इब देख तुम्हारे उधर भी वही फूल पत्ते परिंदे, हमारी तरफ भी . तेरी तरफ से धूल उडती है तो हमारे यहाँ हमारी तरफ की तुम्हारे यहाँ ।

नंगई का ये, हमारे उधर किस्सा है कि औरंगजेब पातशाह जामा मस्जिद को नमाज़ के लिये निकला तो उसने एक निपट नंगे फकीर को महल के सामने बैठा देखा । बगल में काला कंबल धरा था ।

भौंचक्का पातशा कहै कि तू नंगा काहे को है बे ? कुछ तो शरम कर ! जानता नहीं मैं कौन हूं ?

जानता हूं तू मुलक का सबसे बडा चौकीदार हैगा । फकीर पीठ खुजलाते हुए बोला । पर मत भूल के तेरे मेरे ऊपर हम दूनू से बडा एक चौकीदार भी बैठा है ।

पातशा ताव खा गया । बोला तेरी ये मजाल मुझसे मूं दराज़ी करता है ? चल उठा कंबल और अपनी शर्म ढाँक ले !

तो फकीर ने कहते हैं हंसते हुए अपना काला कंबल उठाया । क्या उठाया ?

काला कंबल ।

हाँ तो पातशा क्या देखता है, कि उसने अपने जिन दो भाइयों को गद्दी पाने को हलाक कराया था कंबल के नीचे उनके ही लहू से लथपथ सर पडे हैं ।

तब फकीर हँस कर पातशा से कहते हैं, बोल तेरी शरम ढाँकूं कि अपनी ?

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