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विकास के साथ परिवर्तन की नई सोच की कहानियाँ ‘राग मारवा’

इस साल के आरम्भ से ही ममता सिंह के कथा संग्रह ‘राग मारवा’ की चर्चा है। उनकी कहानियों का कथानक, उनकी सघन बुनावट बहुत स्वाभाविक है। आज इस कहानी संग्रह पर अनिता दुबे की विस्तृत टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर

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राग मारवा ” रेडियो सखी ममता सिंह का पहला कहानी संग्रह है । इस संग्रह में अलग-अलग ग्यारह कहानियों से ममता सिंह ने समाज से जुड़े उन बिम्बों को उकेरा है जहाँ सामाजिक मूल्य और मान्यताएं विकास के साथ धूमिल हुए है आपसी रिश्तों में कड़वाहट सद्भाव की होती कमी सगे रिश्तों को अपरिचित बनाती है तो साथ ही कहीं धार्मिक अंधता जातिवाद की जड़े मानवीय आधारों का हनन कर रही है । वहीं विकास के साथ परिवर्तन की नई सोच को भी दर्शाती कहानी है ।

कहानी संग्रह की पहली कहानी ” राग मारवा ”
एक शास्त्रीय गायिका के जीवन में आईं वो तमाम सच्चाई हैं जिसका सामना पिछली पीढ़ी में कई महिलाओं ने किया है । समाज को आइना दिखाती कहानी जहाँ माँ की साधना स्वयं उसी के बच्चे मात्र व्यापार और अपने स्वार्थ तक ही समझते हैं ।एक स्त्री, एक गायिका, एक माँ के अन्तः मन की तड़प को कुरेदती उसकी पीड़ा को नकारते समाज पर एक प्रश्न है। बहुत सोचने को मजबूर करती कहानी है ।

दूसरी कहानी “गुलाबी दुप्पट्टे वाली लड़की” एक गाँव की अनपढ़ निसंतान स्त्री की कहानी जो रूढ़िवादी परम्पराओं का शिकार होती है पुरूष प्रधान समाज से जूझती है और आखिर स्वयं गहरे अंधकार में अपने जीवन की रोशनी ढूढ़ती है माँ बनकर और कई और निसंतानों को संतान देकर अपने जीवन को समर्पित करती है जहाँ पढ़ा लिखा वर्ग भी इस सोच में शायद पीछे रह जाता है । जहाँ पुरानी रिवायतों के समाज में एक स्त्री का माँ होना ही उसके पूरे अस्तित्व से जुड़ा होता है ।इस समाज से कैसे एक लड़की जूझकर मिसाल बनती है इस कहानी का खास बिन्दु है।

तीसरी कहानी “जनरल टिकिट”में समाज की रूढ़ियों के परम्परागत रूप को नकारती लड़की की कहानी है जो स्त्री पुरूष के भेद को तोड़कर विकास की दिशा में अपनी महत्वाकांक्षा से कदम बढ़ाना चाहती है जहाँ समाज दो रास्तों पर चलता है। मध्यम वर्ग की लड़की जिसके सपने आगे बढ़ना है मगर समाज के दवाब में परिवार के बंधन उसकी रचनात्मकता के रास्ते खड़े रहते हैं और वो समय के साथ पीछे नहीं देखना चाहती बड़ती जाती है आगे अपने लक्ष्य की ओर यह उस समय की कहानी लगती है जब विकास के तेज कदमों के साथ समाज कदम नहीं मिला पा रहा था । कहीं – कहीं आज भी कई लड़कियों को इसी अवधारणा का शिकार होना पड़ता है ।जहाँ परिवार ही उसके रास्ते की एक दीवार बन जाती है ।

कहानी “फैमिली ट्री” महानगर की ही नही बल्कि आज हर कामकाजी महिलाओं के परिवार की है जहाँ बच्चों की देखभाल दूसरों पर निर्भर रखना मजबूरी है । मुम्बई की बारिश का डरावना रूप और वहीं एक माँ और बेटे के स्नेह बंधन के उस स्वरूप को दर्शाती है जहाँ बच्चा मासूम कल्पनाओं के जाल से निकल अपने परिवार ,माँ पापा के लिए चिन्तित होकर एक सफर तय कर बिना किसी आशंका भय से हिम्मत और विश्वास का परिचय देता है मगर अपनी माँ जो उसके सभी प्रश्नों का उत्तर है उसे सदा अपने पास चाहता है। परिवार के आपसी बंधन को जताती कहानी जिसमें दिनचर्या के संवाद को बखूबी उकेरा है और एक माँ का अपने बेटे के पालन में आनेवाले पड़ावों के साथ अटूट स्नेह बंधन और व्यस्तता के साथ महानगर की वास्तविक स्थिति को बताया है ।

कहानी “आवाज़ में पड़ गईं दरारें “एक ऐसी प्रेम
कहानी जहाँ शारव और सनोवर दोनों एक दूसरे से प्रेम के साथ अपेक्षा करते हैं मगर मन के ठहराव को बांध नहीं पाते और प्रेम के बाबजूद अपनी महत्वकांक्षा के साथ अलग दिशा खोजने चल देते हैं मानों मन की कई परतें हैं और हर व्यक्ति कब किसे ओढ़ता है यह समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस कहानी में बहुत सरलता और सहजता का लेखन वास्तविक रूप और सच समान प्रतीत हुआ है ऐसे अनुभवों से कहीं ना कहीं हर व्यक्ति गुज़रता है । कहानी में लगातार रोचकता और जिज्ञासा बनी रही ।

“धुंध” कहानी वर्तमान समय में कई परिवारों में घटित रिश्तों की कमजोर होती डोर को बताती है
जहाँ भिन्न-भिन्न मानसिकता के सदस्यों के बीच तालमेल बिठाने परिवार को एक साथ जोड़े रखने में कहीं ना कहीं किसी ना किसी सदस्य की भावनाएं आहत होती रहती हैं और वो परिवार से दूर होता जाता है । कहानी के परिदृश्य बहुत सहज और चलचित्र की तरह है मानों लेखिका ही नहीं अपितु पाठक भी इस यात्रा में साथ ही था । कहानी में कहीं – कहीं व्यंग्य का समावेश भी रोचकता लाया है लगता है मानों इस कहानी में एक पात्र हम भी थे जो मूक होकर इस कहानी के साथ चल रहे थे ।

“आसमानी कागज़” कहानी एक युवक के प्रेम के उन जज्बातों से भरी डायरी है जहाँ वो अपने प्रेम को इज़हार तो करता है मगर इकरार करने के पहले ही आपसी दूरी उनके बीच एक शून्य सा बना देती है नायक चाहकर भी अपनी बात स्पष्ट नहीं कर पाता और बस इन्तज़ार ही उसके पास बचता है ।कई बार दो व्यक्तियों की आमसहमति भी एक नहीं हो पाती परिस्थितियों और समय के घेर में उलझ जाती है जिसे समेट कर व्यक्ति सिर्फ समय काटता है शायद उम्मीद पर की बीता समय लौट आयेगा एक अनिश्चितता के साथ ।मानों जैसे प्यार में होने के लिए एक पल लगता है मगर उसे पाना शायद आसान नहीं होता । इस कहानी में प्यार भरे सुन्दर भावों की अच्छी प्रस्तुति की है ।

कहानी “सुरमई “आभासी दुनिया से बने रिश्तों का जादू है । वास्तविक दुनिया से बिल्कुल उल्टा बहुत दूर होते हुए जानते हुए भी व्यक्ति अपने मन भावनाओं को एक आवाज़ से बांध लेता है और यह हकीक़त में होता है । हम सभी रेडियो के दौर से गुज़रे है और अपने पसंदीदा प्रस्तुतकर्ता को अपने सबसे करीब भी महसूस कर चुके है यह काल्पनिक कहानी हो सकती है मगर इसमें हकीक़त की वो परछाई भी है जो आज भी सुनने वाले या श्रोता अपनी भावनाओं को एक आवाज़ से रिश्ते में बांध लेते है चाहे वो रिश्ता किसी भी रूप में हो । ममता सिंह स्वयं रेडियो सखी है और उनके जीवन में ऐसे कई अनुभव हुए होगे जहाँ उनकी आवाज़ से ही श्रोता अपने आपसे एक रिश्ते में बंध जाते रहे होगे मगर कहानी के रूप में उन अनुभवों को समेट कर इस प्रकार की सुन्दर प्रस्तुति बेहद मोहक, रोचक और मजेदार भी लगी है ।

कहानी “विदाई “एक बिखरते टूटते समाज के उन रिश्तों की कहानी है जहाँ सगे रिश्ते भी दूर और पराये हो जाते है । एक भाई बहन के रिश्ते बचपन के अटूट संबंध बड़े होकर कभी विपरीत दिशा में घूम जाते है जहाँ वो आपसी प्रेम को दुनियादारी और परिस्थितियों की बली चढ़ाकर अपरिचित सा जीवन व्यतीत करने को मजबूर होते है आपसी निर्भरता भावनाओं की अपेक्षा धन या खर्चे से जुड़ जाती है । एक लड़की की शादी में उसकी घर से विदा तो खुशियों को संजोय होती है मगर विधवा होने पर उसका अपना घर जुड़े लोग नाते रिश्तेदार सभी उसकी जिम्मेदारी बोझ समझने लगते है मतलब की रिश्तेदारी निभाता समाज आज भी मुँह खोले खड़ा है ।

“पानी पर लिखा ख़ामोश अफ़साना “कहानी पति पत्नि के बीच की वो परत है जहाँ दूरियाँ मन को विक्षिप्त कर देती है । कई परिवार में छोटी छोटी नाजुक इच्छाओं के पूरे ना होने पर इस प्रकार की समस्या होना आम बात है। रिश्तों में उपरी परत तो खुशहाल नज़र आती है मगर कई परतें और भी छुपी रहती है जहाँ रिश्ते घुटन से जुड़े होते है । इस कहानी में अर्थपूर्ण उपमाओं का बहुत सुन्दर उपयोग किया है।

“आखरी कॉन्ट्रेक्ट ” एक बेहतरीन कहानी है जहाँ धर्म की आड़ में इन्सान हैवान बन जाता है। मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं का मूल्य नगण्य होकर सिर्फ धार्मिक अंधता के चलते लोग भेदभाव से ग्रस्त होकर रहते है समाज को ना जाने किस दिशा में ले जाने की कोशिश करते लोग आपसी मोहब्बत को भुला देते है । वहीं कहानी के दोनों पात्र धार्मिक अंधता को छोड़ अपने प्यार के विश्वास पर आगे बड़ते है । आज भी विकास की परमसीमा में धर्म और जातिवाद का साया समाज को जकड़े है आपसी विरोध और अमानवीय कृत्य करते इन्सान धर्म के रक्षक नहीं हो सकते यह कहानी इसी जकड़न को दर्शाती है ।

ममता सिंह रेडियो की आवाज़ हैं घर -घर पहचानी जाती हैं। चूंकि मैं स्वयं आकाशवाणी का हिस्सा रही हूँ और आकाशवाणी से विशेष लगाव हैं लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय से उनकी आवाज़ से एक दोस्ती रही है । उनसे व्यक्तिगत परिचय से भी पहले रेडियो पर उनकी बातचीत से भी प्रभावित रही हूँ ऐसे में ही कुछ वर्षों पहले उनसे मुलाकात का अवसर मिला और तब एक साहित्य सम्मेलन में उनकी सुन्दर कहानी उनके ही मुख से उतने ही सुन्दर अंदाज से सुनी और सुनकर उनकी गहरी सोच में लेखिका की संवेदनाओं , भावनाओं का भी पता लगा था ।

सभी कहानियाँ समाज को आइना दिखाती है हम विकासशील होते हुए अभी भी कई रूढ़ियों धार्मिक अंधता जातिवाद के साथ स्वार्थी होते जा रहे है जहाँ मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं का स्थान संकुचित हो रहा है ।
मैंने एक आम पाठक के नज़रिये से इनकी कहानियों को समझने की कोशिश की है ।
ममता सिंह को विकृत होते समाज की इस दिशा में कहानियों के माध्यम से अपनी आवाज़ उठाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और अपने पहले मगर गंभीर विषयों पर कहानी संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाई ।शुभकामनाएं आगे भी यूँ अच्छी कहानियाँ पाठक तक पहुँचे।
अनिता दुबे

‘राग मारवा’ राजपाल एंड संज प्रकाशन से प्रकाशित है। 

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